१८५७ का स्वातंत्र्य समर (भाग - १) – पृष्ठभूमि और युद्ध का प्रारम्भ

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लुटेरे डलहौजी की हड़प नीति सन १९०७ अर्थात सन १८५७ की पचासवीं वर्षगाँठ ब्रिटेन में बहुत धूमधाम से मनाई गई | इसे विजय दिवस बताते हुए, समाचा...



लुटेरे डलहौजी की हड़प नीति

सन १९०७ अर्थात सन १८५७ की पचासवीं वर्षगाँठ ब्रिटेन में बहुत धूमधाम से मनाई गई | इसे विजय दिवस बताते हुए, समाचार पत्रों ने विशेषांक निकाले, ब्रिटिश शौर्य का जमकर बखान और इस स्वतंत्रता संग्राम को कुछ राजाओं का ग़दर बताते हुए रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब पेशवा जैसे श्रेष्ठ भारतीयों को हत्यारा और उत्पाती बताया गया | स्वाभाविक ही इस परिदृश्य को देखकर भारतीय देशभक्तों की आत्मा कलप गई | प्रख्यात विद्वान देशभक्त श्यामजी कृष्ण वर्मा के इंडिया हाउस में रहकर इंग्लेंड में वकालत पढ़ रहे नौजवान विनायक दामोदर सावरकर ने १८५७ की वास्तविकता सामने लाने की योजना बनाई | उन्होंने इंडिया हॉउस के मेनेजर मुखर्जी की अंग्रेज पत्नी की मदद से वहां की लाइब्रेरी में प्रवेश पा लिया और फिर अंग्रेजों की नाक के नीचे अंग्रेजों के ही गोपनीय दस्तावेजों का सूक्ष्म अध्ययन कर उन्होंने एक पुस्तक लिखी – १८५७ का स्वातंत्र समर | और कमाल देखिये कि १८५७ का वास्तविक इतिहास वर्णित करने वाली इस पुस्तक ने स्वयं इतिहास रच दिया | यह विश्व की इकलौती ऐसी पुस्तक बन गई, जिस पर प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया | यह केवल इसके नाम की दहशत थी, अंग्रेज जिसे ग़दर या विद्रोह बताते आ रहे थे, उसे स्वतंत्रता संग्राम बताना, आखिर उन लोगों को कैसे सहन होता ? भले ही हमारे प्रथम प्रधान मंत्री चच्चा नेहरू भी इसे ही क्यों नेताजी सुभाष के संग्राम को भी ग़दर ही बोलते आये हों, आईये हम तो अपने इस प्रामाणिक स्वतंत्रता संग्राम का पुण्य स्मरण करें, इसे जानें - 

१८४८ में डलहौजी भारत आया, स्वभाव से जिद्दी, दुस्साहसी राजनीतिज्ञ, जिसका एकमात्र उद्देश्य था, भारत की धन सम्पदा को लूटना | उसका पहला निशाना बना पंजाब | १८३९ में महाराज रणजीत सिंह के परलोक गमन के बाद से ही पंजाब अंग्रेजों की आँख की किरकिरी बना हुआ था | उत्तराधिकारियों के लगातार सत्ता संघर्ष के बाद भी पंजाब पर काबिज होना उनके लिए इतना आसान न था | महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के मात्र एक वर्ष बाद ही उनके उत्तराधिकारी पुत्र खड़गसिंह की मृत्यु हो गयी। उसके बाद अगले शासक नौनिहाल सिंह बने, किन्तु वह भी शीघ्र ही काल के मुख में समा गये। अब शेरसिंह गद्दी पर बैठे, लेकिन सन 1843 में शेरसिंह की भी हत्या कर दी गयी। अंततः राजमाता झिन्दन के संरक्षण में महाराजा रणजीत सिंह के अल्पवयस्क पुत्र दिलीप सिंह का राज्यारोहण किया गया। तत्कालीन अंग्रेजी सेनानायक मेजर ब्रॉडफुट की नीतियों के चलते सिख सेनापति लालसिंह तथा तेजासिंह के नेतृत्व में अंग्रजो के विरुद्ध सिक्खों का प्रथम संघर्ष प्रारम्भ हुआ । इस युद्ध में चार लड़ाइयाँ फिरोजशाह, मुदकी, बद्रोवाल और अलीबाल में लड़ी गयी जिनमे कोई भी निर्णय नहीं हो सका। पांचवीं एवं अंतिम लड़ाई 20 फरवरी, 1846 को सबराओ में हुई, जिसमें अंग्रेजी सेना ने लाहौर पर अधिकार कर लिया और 9 मार्च, 1846 ई. को अंग्रेजो एवं सिखों के मध्य लाहौर की संधि हुई।

इस संधि के परिणामस्वरुप सतलुज नदी की दक्षिण दिशा के सभी प्रदेशो पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया । अंग्रेजो ने सिखों से हर्जाने के रूप में डेढ़ करोड़ रुपया लिया, जिनमें से 50 लाख रुपये सिखों ने अपने कोष से दिए तथा शेष रकम के बदले कश्मीर एवं पंजाब के कुछ प्रांत अंग्रेजो को सौंप दिए। अंग्रेजो ने 50 लाख रुपये लेकर गुलाब सिंह को कश्मीर बेच दिया। कश्मीर का गुलाब सिंह को बेचा जाना सिखों को पसंद नहीं आया। फलतः लाल सिंह के नेतृत्व में सिखों ने पुनः विद्रोह कर दिया। अंग्रेजो ने सिखों को पराजित कर दिया तथा 16 दिसंबर, 1846 ई. को दिलीप सिंह से 'भैरोवाल की संधि' हुई, जिसके परिणाम स्वरुप दिलीप सिंह के वयस्क होने तक ब्रिटिश सेना का लाहौर में प्रवास सुनिश्चित कर दिया गया। लाहौर का प्रशासन आठ सिख सरदारों की एक परिषद को सौंपकर महारानी झिन्दन को 48 हजार रुपये की पेंशन पर शेखपुरा भेज दिया गया।

लेकिन जुझारू सिक्ख कौम क्या इतनी आसानी से पराजय स्वीकार कर सकती थी ? डलहौजी की साम्राज्यवादी नीतियों ने आग में घी का काम किया । जैसे ही अंग्रेजो ने मुल्तान के गवर्नर को अपदस्य किया, जनता ने विद्रोह कर दिया। और द्रितीय आंग्ल-सिख युद्ध प्रारम्भ हो गया। 22 नवम्बर, 1848 ई. को लड़ा गया रामनगर का युद्ध, 3 जनवरी, 1849 ई. को लड़ा गया चिलियाँवाला का युद्ध अनिर्णीत ही समाप्त हुआ। किन्तु 13 फरवरी, 1849 ई. को लडे गये गुजरात के युद्ध में अंग्रेजो ने सिख सेना को पराजित कर दिया। इतिहास में इसे 'तोपों के युद्ध' के नाम से भी जाना जाता है।

उसके बाद 30 मार्च, 1849 ई. को लॉर्ड डलहौजी ने पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। महाराजा दिलीप सिंह को 5 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन देकर रानी झिन्दन के साथ इंग्लैंड भेज दिया गया तथा दिलीप सिंह से वह कोहिनूर हीरा छीनकर शाही ब्रिटिश राजमुकुट में लगाने हेतु भेज दिया, जो कभी महाराज रणजीत सिंह के मुकुट की शोभा बढाता था । यह तो डलहौजी द्वारा की गई लूट की शुरूआत थी |

पंजाब के बाद उसका अगला निशाना बना महाराष्ट्र का सतारा | सन १८३९ में छत्रपति प्रताप सिंह को षडयंत्र पूर्वक हटाकर अप्पा जी को सतारा का महाराज अंग्रेजों ने ही घोषित किया था, किन्तु जैसे ही अप्रैल १८४८ में अप्पाजी का स्वर्गवास हुआ, उनके दत्तक पुत्र को मान्यता न देते हुए सतारा को डलहौजी ने अधिग्रहित कर लिया | वह सतारा जिसकी गद्दी पर सन १६७४ में गागाभट्ट द्वारा अभिषिक्त होकर स्वयं शिवाजी महाराज विराजमान हुए थे, जिसके सामने संताजी, घनाजी, निराजी बाजी जैसे शूरमा भी झुकते थे, उस पर डलहौजी जैसा एक अंग्रेज नुमाईन्दा कारिन्दा कब्ज़ा जमा बैठा | रंगों बापू जी इस अन्याय की शिकायत लेकर जिस समय लन्दन में लीडन हॉल स्ट्रीट की सीढियां चढ़ उतर रहे थे, उस समय डलहौजी नागपुर को भी अपने अधिकार में लेने का षडयंत्र रच रहा था | 

विदर्भ का राज्य अंग्रेजों के अधीन नहीं था, उससे अंग्रेजों के मैत्रीपूर्ण और बराबरी के सम्बन्ध थे | लेकिन यह दोस्ती ही उनके सर्वनाश का कारण बनी | नागपुर की गद्दी पर विराजमान राघोजी भोंसले मात्र सेंतालीस वर्ष की आयु में स्वर्ग सिधार गए, लेकिन बजाय राघोजी की पत्नी या उनके द्वारा दत्तक लिए गए पुत्र को नागपुर का शासक स्वीकार करने के, डलहौजी ने ७६,४३२ वर्ग मील का यह विस्तीर्ण प्रदेश हड़प लिया | राजपरिवार की कीमती वस्तुएं, हाथी, घोड़े ही नहीं तो बिलखती रानियों के वस्त्राभूषण भी बाजार में कौड़ियों के मोल नीलाम किये गए | महारानी अन्नपूर्णाबाई जीवन की अंतिम साँसें ले रही थीं, और उनका शयनकक्ष खोदा जा रहा था | अन्नपूर्णाबाई अपमान की आग में झुलसते हुए शरीर त्याग गईं, लेकिन एक अन्य कुल कलंकिनी रानी बांकाबाई अंग्रेजों की पिट्ठू बनकर उनकी चाटुकार बनने में गौरव की अनुभूति कर रही थी | बाद में १८५७ में भी उनकी यही देशद्रोही नीति जारी रही | 

अंग्रेजों की चाटुकारिता में अपने कुल के गौरव को भुलाने बाली बांका बाई अकेली नहीं थीं, हैरत होती है यह जानकर कि पेशवाओं की महान परम्पराओं में से भी एक ऐसे महाशय उत्पन्न हुए, जिन्होंने १८१८ में अपना महान साम्राज्य आठ लाख रुपये वार्षिक की पेंशन में अंग्रेजों के हाथों गिरवी रख दिया | इतना ही नहीं तो उस पेंशन में से बचाए हुए रुपयों में से भी जब अंग्रेजों को जरूरत पडी, मुक्त हस्त से उनकी आर्थिक मदद की | नाम जानकर तो और भी शर्म महसूस होती है | इनका नाम था बाजीराव | कहाँ वह महान बाजीराव जिन्होंने मराठा साम्राज्य को सुदूर उत्तर तक पहुँचाया, जिसके घोड़े की टापों के निशान दिल्ली तक पहुंचे, उसी के वंश में उसी की नाम राशि वाले एक अन्य बाजीराव ने उसी राज्य को अंग्रेजों के हाथों में सोंप दिया | अफगानिस्तान की लड़ाई में, जब अंग्रेजों को जरूरत पडी इस बाजीराव ने उन्हें पांच लाख रुपयों की मदद पहुंचाई | इतना ही नहीं तो बाद में जब पंजाब में सिक्खों से अंग्रेजों की लड़ाई शुरू हुई, तब शिवाजी महाराज के पेशवा के वंश में उत्पन्न इसी बाजी ने अपनी गाँठ का पैसा लगाकर एक हजार पैदल और एक हजार घुड़सवार सैनिक अंग्रेजों की सहायता हेतु भेजे | इस बाजीराव के पास अपना शनिवार बाड़ा बचाने के लिए सेना नहीं थी, किन्तु पंजाब अंग्रेजों के हाथों में पहुंचाने के लिए सेना थी | दुर्भाग्य देश का |

लेकिन अंग्रेज ठहरे तोता चश्म, वे कहाँ किसी का अहसान मानने वाले थे | सन १८५१ में जैसे ही बाजीराव परलोक सिधारे, अंग्रेजों ने अपने इस सहयोगी को दी जाने वाली पेंशन भी बंद कर दी | बहाना बही पुराना था, बाजीराव के दत्तक पुत्र पेशवा नाना साहब को पेंशन पाने का कोई अधिकार नहीं है | नाना साहब ने लिखा भी कि हमारे विख्यात राजवंश से आपका यह कृपण व्यवहार पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है | हमारा विस्तृत राज्य और राज्य शासन आपको श्रीमंत बाजीराव के साथ हुए उस समझौते के अनुसार प्राप्त हुआ था, कि आप उसके मूल्य के बदले आठ लाख रुपये प्रतिवर्ष देंगे | अगर यह पेंशन स्थाई नहीं है, तो राज्य पर आपका अधिकार कैसे और क्यूं रहना चाहिए | 

दत्तक की आड़ में खेले गए लूट के खेल में झांसी भी कैसे निशाना बनी, यह सर्वज्ञात है | लेकिन डलहौजी की लूट नीति की इन्तहा तो हुई अवध के मामले में | ना तो वहां बारिस की कोई समस्या थी, ना ही नबाब बाजिद अली शाह ने अंग्रेजों से कोई आक्रामक या शत्रुता पूर्ण व्यवहार किया था | उलटे हर कठिन समय पर नबाब ने अंग्रेजों की मदद ही की थी | जब जरूरत हुई तब अंग्रेजों को उसने पैसा भी दिया और खाने के लिए अनाज भी मुहैया करवाया | फिर भी अंग्रेजों ने उसे नहीं बख्शा | डलहौजी ने अवध पर कब्जा करने के लिए जो आरोप मढ़े, उन्हें जानकर हँसी भी आती है और क्रोध भी | हद्द दर्जे की थी इन फिरंगी लुटेरों की बेशर्मी | सचाई यह है कि अवध राज्य की जमीन बेहद उपजाऊ और उसके कारण लोग बहुत धनी थे, और यही उनका सबसे बड़ा अपराध था | लेकिन डलहौजी के प्रशासन और नीति का वर्णन करते हुए आर्नोल्ड ने लिखा कि – नबाब अपने राज्य में सुधार नहीं कर रहा था, ओहो हो ईसा मसीह भी इस उदारता को देखकर नतमस्तक हो गए होंगे | अवध वासियों के तन पर स्वतंत्रता का जो अमूल्य वस्त्र था उसे भी इस बहाने छीन लिया, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के अंतर्गत भूख से बिलखते भारतवासियों का दर्द उन दिनों कौन सुन रहा था ? नबाब का दूसरा अपराध लिखा गया कि वह अपनी दासियों को जरी की साड़ियाँ भेंट करता था, उसने आतिशबाजी का जलसा किया, एक दिन उसने सुबह दबाई पी और शाही बेगम व ताज बेगम से भोजन का आग्रह किया | हैं न भयंकरतम अपराध ? लेकिन नबाब के सबसे बड़े अपराध का वर्णन तो अभी बाक़ी है - उसने अपने सामने कुछ घोड़ियों पर घोड़े छुडवाये | शायद अंग्रेज सरकार को उन घोड़ियों की पवित्रता भंग होने पर नहुत दया आई और उसे देखने वाले नबाब को राज्यच्युत कर दिया |

अंग्रेजों ने नबाब बाजिद अली शाह को तो कलकत्ता के किले में बन्द कर दिया, किन्तु सवाल यह है कि, अंग्रेजों के अनुसार, उसकी जो प्रजा नबाब से नाखुश थी, उसने शमशीर क्यों तानी ? जबाब एक ही है और वह यह कि लुटेरे डलहौजी की हड़प नीति ने समूचे हिन्दुस्तान को सुलगा दिया था | यह केवल चंद राज्यच्युत राजाओं का संघर्ष नहीं था, आम भारत वासी द्वारा लड़ा गया स्वाधीनता संग्राम था | आज का यह एपीसोड तो प्रस्तावना भर है, अगले अंकों में आप सुनेंगे नानासाहब पेशवा, महारानी लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे, अजीमुल्ला खान व अन्य अनेक क्रांतिवीरों की लोमहर्षक गाथाएँ | साथ ही तत्कालीन स्थिति परिस्थितियों का वर्णन !

नाना साहब पेशवा की व्यूह रचना से मंगल पांडे के बलिदान तक

देश का कैसा दुर्भाग्य है कि जिन महापुरुष ने हमारी ईश्वर प्रदत्त स्वतंत्रता का अपहरण करने वालों के विरुद्ध युद्ध छेड़ा, जिनकी हुंकार से अंग्रेज थर्राने लगे, उँ श्रीमंत नाना साहब पेशवा का, न किसी को वास्तविक जन्म दिवस ज्ञात है और नाही उनके स्वर्गवास के दिनांक की कोई अधिकृत जानकारी हमारे पास है | ज्ञात है तो बस इतना ही कि महाराष्ट्र की पुण्यभूमि में माथेरान गिरि शिखर की तलहटी में बसे, वेणुग्राम नामक एक छोटे से गाँव में सन १८२४ को एक दरिद्र ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ था | पिता माधवराव नारायण और माता गंगाबाई निर्धन अवश्य थे, किन्तु सदाचारी और ईश्वर परायण | 

जिन दिनों पुणे के अंतिम पेशवा राव बाजी ने अपनी पेशवाई महज आठ लाख रूपये वार्षिक में अंग्रेजों को सोंपकर, भागीरथी के किनारे बिठूर में अपना आवास बनाया, नाम रखा ब्रह्मावर्त | उनके साथ ही महाराष्ट्र के बहुत से परिवार भी उनके आश्रय में रहने पहुंचे | माधवराव नारायण भी उनमें से एक थे | ईश्वरीय विधान भी विचित्र है, जिन बाजीराव ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार की, उन्होंने ही उन नाना साहब को गोद ले लिया, जो आगे चलकर अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजाने वाले महान सेनानी बने | बाजीराव निसंतान थे, अतः ७ जून १८२७ को उन्होंने अपने सगोत्रीय माधवराव के ढाई वर्षीय इस तेजस्वी पुत्र को गोद लिया | और इस तरह एक निर्धन परिवार का यह बालक महाराष्ट्र राज्य के अधिपति की गद्दी का बारिस हो गया | प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ, महान योद्धा पेशवा बाजीराव के कुल में उनके पिता राव बाजी ने जिस पेशवा की गद्दी का सम्मान धुल धूसरित किया, उसे बहाल करने का उत्तरदायित्व अब इन नाना साहब के कन्धों पर था | 

जिन दिनों नाना साहब का विद्याभ्यास और शस्त्राभ्यास शुरू हुआ, उनके साथ ही अटक अटक कर एक छोटी सी छबीली मनुबाई भी पढ़ना सीख रही थी | श्री क्षेत्र काशी में १९ नवंबर १८३५ को मोरोपंत ताम्बे और उनकी सुशीला पत्नी भागीरथी के घर जन्मी मनुबाई भी अपने माता पिता के साथ ब्रह्मावर्त आकर बाजीराव के आश्रय में पल बढ़ रही थी | लक्ष्मीबाई और नाना साहब के लिए देव ने जो भूमिका निर्धारित कर रखी थी, उसका यह प्रारंभ था | राजपुत्र नाना साहब और मनोहारिणी छबीली की आयु में भले ही ग्यारह वर्ष का अंतर था, किन्तु इस दिव्य जोडी को साथ साथ पढ़ते खेलते बाल सुलभ क्रीडाएं करते देखकर किसे अंदाज रहा होगा कि यह जोडी भविष्य में देश और समाज के लिए क्या कुछ करने वाली है | घोड़े पर बैठे नाना, और नीचे मनुहार करती छबीली – दादा मुझे भी बैठाओ ना घोड़े पर, नाना साथ बैठने को कहते तो हठ करती, नहीं मुझे तो अलग दूसरे घोड़े पर अकेले ही बैठना है | और फिर अठारह वर्षीय नाना और महज सात वर्षीय छबीली अलग अलग घोड़ों पर पहले धीमे धीमे चलने शुरू हुए, और फिर कब छबीली घुड़सवारी में सिद्धहस्त बन गई, ज्ञात ही नहीं हुआ | भावी धर्मयुद्ध का यह पूर्वाभ्यास था | 

सदियों में एकाध शाला ही ऐसी खुलती है, जिसमें नाना साहब, उनके भाई बाबा साहब एवं बाला साहब, भतीजे राव साहब, तात्या टोपे और छबीली जैसे बालक एक साथ राष्ट्रधर्म की शिक्षा लेते हों, साथ साथ खेलते, हंसते, मुस्कुराते हों | और किसी एक सदी में एकाध ही परीक्षा ऐसी होती है, जिसमें ये सभी महानुभाव बालक संग्राम पत्रिका पर अपने वीर चरित्र की अद्भुत यशगाथा लिखते हैं | ऐसी असाधारण शाला और ऐसी असाधारण परीक्षा का सम्मान ब्रह्मावर्त के राजमहल को प्राप्त हुआ | 

आईये इस पावन हिन्दूभूमि की अक्षय कोख को नमन करें, जिससे १८१४ में शिव छत्रपति के अखाड़े का अंतिम जवांमर्द मराठा तात्याटोपे पैदा हुआ | पिता पांडुरंग भट के आठ पुत्र थे, उनमें से दूसरे पुत्र रघुनाथ ही आगे चलकर हिन्दुस्तान के इतिहास में चमकते सितारे तात्या टोपे के नाम से प्रसिद्द हुए | पांडुरंग राव टोपे देशस्थ ब्राह्मण थे तथा अंतिम बाजीराव के पास ब्रह्मावर्त में दानाध्यक्ष के पद पर थे | साथ साथ पढ़ते खेलते नाना साहब और तात्या टोपे में प्रीत गाढी होती गई | दोनों ने साथ साथ रामायण महाभारत के पारायण किये, मराठों की जवांमर्दी का इतिहास पढ़ा और उस वीर रस का पान कर दोनों के बाल बाहु साथ साथ ही फडके | 

तभी झांसी के महाराज गंगाधर राव के साथ छबीली मनु का विवाह हुआ और वे बन गईं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई | १८५१ में पेशवा राव बाजी ने अंतिम सांस ली और नाना साहब के संघर्ष की शुरूआत हुई | यद्यपि बाजीराव ने मृत्युपूर्व ही मृत्युपत्र लिखकर नाना साहब को अपना बारिस घोषित करते हुए, पेशवाई के सारे अधिकार सोंप दिए थे, किन्तु अंग्रेजों ने उनकी पेंशन जारी रखने से स्पष्ट इनकार कर दिया | नाना साहब के बकील के रूप में अजीमुल्ला खान इस अन्याय की शिकायत करने विलायत गए | अब आगे बढ़ने से पहले, थोडा इन अजीमुल्ला खान के विषय में दो शब्द |

१८५७ के क्रांति युद्ध में अजीमुल्ला खान का स्मरणीय योगदान रहा है | एक निर्धन परिवार में जन्म लेकर अपने बुद्धिबल से उन्नति करते हुए वे ख्यातनाम बकील हो गए | पहले एक अंग्रेज के यहाँ अतिशय साधारण नौकरी करते हुए उन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा सीखी | उसी दौरान शिक्षा का महत्व समझ में आया तो एक विद्यालय में साथ साथ ही अध्ययन भी किया | पढाई पूरी करके अपनी प्रतिभा की दम पर उसी स्कूल में शिक्षक बन गए | उनकी बुद्धिमत्ता की कीर्ति जन नाना साहब के कानों तक पहुंची तो पारखी नाना साहब ने उन्हें अपने दरबार में स्थान दिया | ये ही अजीमुल्ला खान १८५४ में नाना साहब की और से बकील बनकर इंग्लेंड गए | चूंकि अंग्रेजों के रहन सहन रीति रिवाजों की इन्हें अच्छी जानकारी थी, अतः शीघ्र ही इंग्लेंड में उनके प्रियपात्र बन गए | आकर्षक व्यक्तित्व के कारण अंग्रेज ललनायें तो विशेष रूप से इन पर लट्टू हो गईं | यहाँ तक कि भारत लौट आने के बाद भी उनके प्रेमपत्र आते रहे | बाद में हैवलोक की सेना ने जब ब्रह्मावर्त जीता तब वह खुद भी इन पत्रों को देखकर हैरत में पड़ गया | 

इंग्लेंड के अंग्रेज पुरुष व महिलायें भले ही अजीमुल्ला से प्रभावित हो गए हों, किन्तु ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्ताधर्ता इनके प्रति तनिक भी उदार न हुए | उनका अंतिम उत्तर रहा – बाजीराव के दत्तक नाना साहब का पेंशन पर तिनके बराबर भी अधिकार नहीं है | अजीमुल्ला असफल होकर फ्रांस होते हुए भारत वापस आये | 

जो स्थिति नाना साहब के सामने थी, वही उनकी बहिन छबीली के सामने भी आ गई | सन १८५३ में उनके पति गंगाधर राव अकस्मात स्वर्ग सिधार गए और उनके दत्तक प्रिय पुत्र दामोदर राव को मान्यता न देते हुए अंग्रेजों ने झांसी के अधिग्रहण का फरमान जारी कर दिया | परन्तु झांसी क्या ऐसे फरमानों से कब्जे में आ सकती थी भला | झांसी के जमीन आसमान में वह इतिहास प्रसिद्ध स्वर गूँज उठा, मानो बिजली कडकडाई हो – अपनी झांसी मैं नहीं दूँगी, जिसमें हिम्मत हो वह लेकर दिखाए |

अंग्रेजों का उद्देश्य महज भारत पर राजनैतिक प्रभुत्व जमाना भर नहीं था, वे तो भारत को पूरी तरह अपने रंग में रंगना चाहते थे | पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली, अवध और अन्य रियासतों पर कब्जा करने भर से उन्हें संतोष नहीं था, उनकी इच्छा तो अफ्रीका की तरह भारत को भी एक ईसाई राष्ट्र बना देने की थी | यहाँ प्राचीन हिन्दू धर्म तथा ईसाईयत की पीठ पर नृत्य करते इस्लाम की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका उन्हें रत्ती भर भी आभास नहीं था | १८५७ तक उनके यह प्रयत्न, सफलता की पूरी आशा के साथ पूरे जोर शोर से चलते रहे | १२ अक्टूबर को १८३६ को मैकाले ने अपनी मां को लिखे पत्र में यही आशा जताई – अपनी यह शिक्षा प्रणाली ऐसी ही बनी रही, तो अगले तीस वर्ष में पूरा बंगाल ईसाई हो जाएगा | यही थी मैकाले की उस शिक्षा व्यवस्था की मूल धारणा, दुर्भाग्य से जो आज आजाद भारत में भी बदस्तूर जारी है | मिशनरियों के तहत चल रहे स्कूलों को मिलती अथाह आर्थिक मदद के अतिरिक्त जो भारतीय अंग्रेज सेना में भर्ती होते थे, उन्हें भी ईसाई बनाने का पुरजोर प्रयत्न होता था | बंगाल रेजीमेंट के एक कमांडर ने बड़े घमंड से लिखा भी – मैं गत बीस वर्षों से यह शुभ कार्य निरंतर कर रहा हूँ | इन काफिर लोगों की आत्मा को शैतान से बचाना भी एक फ़ौजी कर्तव्य ही है | 

ये धर्मांध सैन्य अधिकारी और सेना में विचरण करते पादरी धर्मान्तरण करने वाले सिपाहियों को पदोन्नति का खुला वचन देते थे | सिपाही अपना धर्म छोड़े तो हवलदार और हवलदार धर्म छोड़े तो सूबेदार, मेजर बन जाता था | इन कार्यों को देखकर हिन्दुस्तानी लश्कर अन्दर ही अन्दर धधक रहा था | ऐसे में इस धधकती आग में घी डालने का काम किया गाय और सूअर की चर्बी लगे उन कारतूसों ने, जिनके खोल को उपयोग करते समय मुंह से खोलना पड़ता था | अंग्रेजों के इस विश्वासघात की कल्पना भारतीय सिपाहियों को जरा भी नहीं थी, और धड़ल्ले से १९५३ से ही इस प्रकार उन्हें धर्म भ्रष्ट करने का कार्य सतत जारी था | दमदम और मेरठ में इन कारतूसों को बनाने के कारखाने थे | एक दिन एक मेहतर ने एक ब्राह्मण सिपाही से एक लोटा पानी माँगा तो पंडित ने इनकार करते हुए कहा, मेरा लोटा भ्रष्ट हो जाएगा | मेहतर ने व्यंग से कहा कि जब गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस को दांत से तोड़ोगे तब क्या तुम्हारा मुंह भ्रष्ट नहीं होगा | इसके बाद जंगल में आग की तरह यह चर्चा सब ओर फ़ैल गई | क्या हिन्दू क्या मुसलमान सभी आक्रोशित हो उठे | अंग्रेज अधिकारियों ने बरगलाया भी कि आगे से कारतूसों में कोई भी चिपचिपी चीज आप लोग खुद लगा लिया करना, लेकिन अविश्वास की खाई खुद चुकी थी |

अब मोर्चा संभालने की बारी थी भारत की आध्यात्मिक विभूतियों की | अंग्रेजी सत्ता के अंतर्गत स्वराज्य और स्वधर्म की कैसी छीछालेदर होती जा रही है, अपने प्राणप्रिय हिन्दुस्तान की कैसी बर्बादी हो रही है, यह सब स्पष्ट और मार्मिक रीति से जनता के मन में भरने हेतु, क्या साधू सन्यासी तो क्या मौलवी, अलख जगाते पूरे देश में घूमने लगे | सिपाहियों के शिविरों, गाँव देहातों में, मंदिरों मस्जिदों में, इनके व्याख्यान होने लगे | कुछ लोग पकडे भी गए | देशभक्त मौलवी अहमद शाह को लखनऊ में फांसी पर चढ़ा दिया गया | स्वतंत्रता के बिना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म समझकर जिस प्रकार धर्मगुरू आगे आये, वह हिन्दुस्तान के इतिहास में सदा सर्वदा के लिए अभिमान की बात है | उधर नाना साहब पेशवा के पत्र भी सभी राजे रजबाड़ों को लगातार जा रहे थे | १८५६ में अवध का राज्य जैसे ही अकारण अधिग्रहण हुआ, गुलामी की दुर्गन्ध पूरा देश महसूस करने लगा | दिल्ली के राजमहलों में भी स्वतंत्रता की मंत्रणाएं शुरू हो गईं | इसी समय अंग्रेजों की ईरान से लड़ाई शुरू हुई | १८५६ में ईरान के शाह ने दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफ़र को एक पत्र लिखा, जिसमें सहायता का वचन था | बहादुर शाह ने भी माकूल जबाब भेजा, यहाँ तक कि सुन्नी पंथ छोड़कर, ईरान के शाह का शिया मत स्वीकारने की भी घोषणा की | दिल्ली की मस्जिदों में सार्वजनिक घोषणायें होने लगीं कि फिरंगियों के कब्जे से हिन्दुस्तान को मुक्त कराने ईरान की सेना जल्द ही आने वाली है, इसलिए क्या बूढ़े, क्या जवान, हर कौम के लोग रणांगन में कूद पड़ें | 

नाना साहब पेशवा, उनके बकील अजीमुल्ला, अवध के बजीर अली नक्की खान, कोल्हापुर के रंगों बापू जी के प्रयत्नों से, १८५७ आते आते सिपाही गंगाजल लेकर या कुरआन हाथ में लेकर कसम खाने लगे और ठेठ मद्रास तक क्रन्तियुद्ध की ज्वालायें भड़कने लगीं | बैरकों में रक्त कमल घूम रहा था तो गाँव शहरों में रोटी | एक दूत लाल कमल किसी भारतीय टुकड़ी के मुखिया को देता और वह अपने अधीनस्थ सिपाहियों को, सबके हाथों में होते हुए कमल वापस आता और दूत अगली छावनी के लिए बढ़ जाता | एक शब्द भी नहीं बोला जाता किन्तु उस कमल के स्पर्श मात्र से सिपाहियों के मन में भावनाओं का ज्वार उठ आता | इसी प्रकार गांवों में रोटियाँ घूम रही थीं | गाँव के मुखिया के पास गेंहू, ज्वार, बाजरा से बनीं वह रोटीयां पहुंचती, वह एक टुकड़ा खाता और शेष पूरे गांव को प्रसाद की तरह वितरित करता, फिर उस गाँव में रोटियाँ बनकर दूसरे गाँव पहुंचतीं | गहरी घाटियाँ, विराट नदियाँ, भयानक वन, सबको पार करते हुए, यह राष्ट्र सन्देश, तीर की गति से, फैलता चला गया | 

गुप्त समिति के नेताओं ने संघर्ष प्रारंभ करने की तारीख तय की ३१ मई, लेकिन बैरकपुर की १९ वीं पलटन ने जैसे ही संदिग्ध कारतूस लेने के लिए इन्कार किया, अंग्रेज अधिकारियों ने मार्च के प्रारम्भ में फिरंगी पलटन बुला ली, और १९ वीं पलटन को निशस्र्त्र करने का आदेश जारी हो गया | चतुर क्रांति नेता कह रहे थे,धैर्य रखो, निर्धारित दिनांक को ही एक साथ रणभेरी बजेगी, लेकिन अपनी आँखों के सामने ही अपने साथियों को दण्डित होते कैसे देखा जाए ? मंगल पांडे की तलवार को धीरज कौन बंधाये ? स्वदेश बंधुओं का अपनी आँखों के सामने अपमान हो, मंगल पांडे इस पीड़ा को सहन नहीं कर पा रहा था | उसने लपक कर अपनी बन्दूक उठाई और गरजा – जो मर्द हो वो साथ आये | भाईयो आओ टूट पड़ो, तुम्हें तुम्हारे धर्म की सौगंध है | 

यह देखते ही सार्जेंट ह्यूसन ने सिपाहियों को आदेश दिया – पकड़ो इसे | लेकिन एक भी सिपाही आगे नहीं बढ़ा | मंगल पांडे की बन्दूक से सांय सांय करते गोली निकली और ह्यूसन का शव भूमि पर गिर पड़ा | लेफ्टिनेंट बा आगे बढ़ा तो पांडे की बन्दूक से चली दूसरी गोली ने उसके घोड़े का पेट फाड़ दिया | नीचे गिरते गिरते लेफ्टिनेंट ने पिस्तौल निकला ली, बदूक दोबारा भरने के स्थान पर मंगल पांडे ने तलवार का उपयोग किया और बा जमीन सूंघने लगा | मंगल पांडे की तरफ एक दूसरा अंग्रेज सैनिक बढ़ा, तो एक अन्य हिन्दुस्तानी सैनिक ने बन्दूक के दस्ते से उसका सर फोड़ दिया | सिपाहियों की बुलंद आवाज गूंजी – खबरदार कोई पांडे जी को हाथ लगाने की जुर्रत न करे | 

यह समाचार पाकर जनरल होर्से अंग्रेज सैनिकों के साथ वहां पहुँच गया | पकडे जाने की अपेक्षा मृत्यु श्रेयस्कर है, यह मानकर मंगल पांडे ने बन्दूक का रुख अपने सीने की ओर किया और धांय की आवाज से वह वीर देशभक्त जमीन पर गिर पड़ा | घायल पांडे को अस्पताल पहुँचाया गया और इस प्रकार निर्धारित तारीख के दो माह पूर्व ही २९ मार्च १८५७ को स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हो गया | घायल मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल हुआ, अन्य षडयंत्रकारियों के नाम पूछने के भरसक प्रयत्न हुए, किन्तु अडिग मंगल पांडे की जुबान खुलना संभव ही कहाँ था | अंततः आठ अप्रैल फांसी का दिन तय हुआ, किन्तु बैरकपुर शहर का कोई जल्लाद फांसी देने को तैयार नहीं हुआ तो कलकत्ता से चार जल्लाद बुलाये गए | फांसी के तख्ते पर उनसे अंतिम बार पूछा गया, अन्य षडयंत्रकारियों के नाम बताओ, जैसे ही उन्होंने कहा - मैं किसी के नाम नहीं बताऊंगा, पैर के नीचे से तख्ता खींच लिया गया और मंगल पांडे का नाम इतिहास में सदा सर्वदा के लिए अमर हो गया |

दिल्ली अभियान और हिन्दू मुस्लिम सिक्ख समीकरण !

देशवीर मंगल पांडे के बलिदान उपरांत, १९ वीं बटालियन के सूबेदार को भी फांसी दे दी गई | तलाशी के दौरान उनके पास से जो कागज़ पत्र मिले उनसे यह माना गया कि १९ वीं बटालियन और ३४ वीं बटालियन ने मिलकर विद्रोह का षडयंत्र रचा था | इसलिए इन दोनों बटालियनों से शस्त्र रखबाकर सभी को नौकरी से निकाल दिया गया | अंग्रेजों के हिसाब से यह एक दंड था, किन्तु सिपाहियों ने उसे अपना सम्मान माना | हजारों की संख्या में सेना की टोपियाँ हवा में उड़ती दिखाई दीं | अब वे दिन लद चुके थे, जब कोई विदेशी आकर हिन्दुस्तानियों को अपनी टोपी पहनाये | सबने फेंक दी दासता की टोपियाँ | मंगल पांडे के बलिदान से केवल बंगाल में ही नहीं, पूरे देश में चेतना की लहर का प्रभाव दिखाई देने लगा | अम्बाला में रात के अँधेरे में विदेशियों और उनके सहयोगी देश्द्रोहोयों के घर जलने लगे | उससे भी बड़ी बात यह कि आग लगाने वाला कोई पकड़ में ही नहीं आता, हजारों रुपये का इनाम घोषित करने के बाद भी नहीं | यद्यपि ३१ मई को एक साथ पूरे देश में क्रान्ति की ज्वाला भड़के, यह बात सबको स्वीकार थी, किन्तु तेजस्वी सिपाहियों को अपनी भावनाएं काबू में रखना मुश्किल हो रहा था | 

मेरठ में छः मई को घुड़सवार पलटन को विवादास्पद कारतूस देने का प्रयास हुआ, किन्तु नब्बे सैनिकों में से पांच ने भी उन्हें नहीं छुआ | उन सभी का कोर्ट मार्शल कर दस दस वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सूना दी गई | इतना ही नहीं तो ९ मई को तोपखाने की मार के पहरे में इन पिच्यासी सिपाहियों को ऊंचाई पर खड़ा कर शेष देशी सिपाहियों की आँखों के सामने उन लोगों के कपडे उतरवाए गए और उनके हाथों पैरों में भारी भारी हथकड़ी बेड़ियाँ ठोक दी गईं | तोपों के सामने बेबस शेष सिपाही अपनी बैरकों में लौटे | गुस्से से तो उबल ही रहे थे, ऊपर से शहर के बाजार में जेल भेजे गए सिपाहियों के परिवार की महिलायें उन पर फब्तियां कसने लगीं | वे तो जेल भेजे गए और तुम मक्खियाँ मारते फिर रहे हो, थू है तुम्हारी जिन्दगी पर | मर्द हो तो कारागृह के वीरों को छुडाकर लाओ | 

सिपाहियों को रात गुजारना मुश्किल हो गया | गुप्त समिति के नेता समझा रहे थे, ३१ मई का इन्तजार करो, लेकिन सब्र का बाँध टूट चुका था, दिल्ली खबर भेज दी गई, आप लोग तैयार रहो, हम ग्यारह या बारह को आ रहे हैं | सुबह कोई भारतीय नौकर अंग्रेजों के यहाँ नहीं पहुंचा, तब तक अंग्रेजों को कानों कान खबर नहीं थी कि पूरे देश में क्या होने जा रहा है | इतने गोपनीय ढंग से सारी व्यूह रचना बनाई गई थी | जबकि मेरठ के नागरिक, आसपास के ग्रामों से ठट्ठ के ठट्ठ ग्रामीण, जो जिसके हाथ लगा, वह हथियार लेकर शाम होते होते आ पहुंचे | फिर जैसे ही चर्च में शाम पांच बजे का घंटा बजा हर हर महादेव और अल्लाहो अकबर के युद्ध घोष के साथ स्वर गूंजने लगे – मारो फिरंगी को | सबसे पहले कारावास में पड़े धर्मवीरों की बेड़ियाँ काटी गईं, उसके बाद कटने की बारी आई रविवार की प्रार्थना के लिए चर्च में इकठ्ठा हुए अंग्रेजों की | कर्नल फिलीस घोड़े पर बैठे हमेशा की तरह डपटता सामने आया, तो एक सैनिक की गोली ने उसे व उसके घोड़े को मौत के आगोश में पहुंचा दिया | उसके बाद तो जो अंग्रेज मिला, वह गारद किया गया | पूरा शहर हाथ में तलवारें, भाले, लाठियां, छुरियाँ लिए सडकों पर था | और अंग्रेज इतिहासकार कहते हैं १८५७ में कुछ राजे रजबाड़ों ने विद्रोह किया था | जिस किसी भवन पर अंग्रेजी हुकूमत के निशाँ थे, वे सब आग के हवाले कर दिए गए | बंगले कार्यालय जल रहे थे, आसमान धुएं से स्याह और लपटों से प्रकाशित हो रहा था साथ ही वातावरण में समवेत नाद गूँज रहा था – मारो फिरंगी को |

दो हजार सिपाही तो पूर्व योजनानुसार दिल्ली की जाने वाले तार तोड़कर, अंग्रेजों के रक्त से रंगी अपनी तलवारें उठाये, दिल्ली की ओर कूच कर गए, लेकिन मेरठ से अंग्रेजों का नामोनिशान ख़तम करने का जिम्मा संभाला मेरठ वासियों ने | अंग्रेज इतिहासकारों ने बड़ी शर्म से लिखा है कि मेरठ में नेटिव सिपाही संख्या में कम थे, गोरे सिपाहियों की राईफलमेंस बटालियन भी थीं, उत्तम तोपखाना भी उनके पास था, इसके बावजूद इस आकस्मिक हमले ने उनमें भारी अव्यवस्था पैदा कर दी | 

खैर मेरठ के क्रांतिवीर यमुना का पुल पारकर दिल्ली की प्राचीर से भिड गए | ५४ वीं पलटन को लेकर कर्नल रिप्ले उनका सामना करने निकला | लेकिन यह क्या ? जैसे ही मेरठ के सैनिकों ने नारा बुलंद किया – फिरंगी राज्य का नाश हो, बादशाह की जय हो, दिल्ली की सेना ने भी जबाबी गर्जना की – मारो फिरंगी को | कर्नल रिप्ले कुछ समझ पाता उसके पहले ही गोलियों से बिंधा उसका शरीर भूमि पर गिर पड़ा, और देखते ही देखते उसके साथ आये अंग्रेज सैनिकों का भी काम तमाम हो गया | दिल्ली के कश्मीरी दरबाजे और कलकत्ते दरबाजे से बेरोकटोक स्वतंत्रता का यह हरावल दस्ता दीन दीन के नारों के साथ दिल्ली में प्रवेश कर गया | 

उसके बाद तो दरियागंज के यूरोपीय बंगले जलाकर शस्त्रधारी सिपाही और सहस्त्रों शहरवासियों का हुजूम घर घर में गोरे रक्त को सूंघने लगा | जहाँ भी गोरा सिर मिला, भाले की नोंक पर टांगा गया | यह हुजूम जब दिल्ली के राजमहल में बादशाह का जयघोष करते घुस रहा था सीढियों पर कमिश्नर फ्रेजर सीढियों पर खड़ा दिखाई दिया, मुग़ल बेग नामक सिपाही ने उसे एक थप्पड़ रसीद किया, उसके बाद तो कब उसका क्षत विक्षत शरीर भीड़ के पैरों तले कुचला गया, पता ही नहीं चला | दिल्ली के राजमहल में कैप्टिन डगलस, कलेक्टर, जेनिंग और उनकी युवा कन्या, सहित फिरंगी सत्ता का नामलेवा भी कोई शेष नहीं रहा | तब तक मेरठ का तोपखाना भी वहां आ पहुंचा और उसने राजमहल के सामने इक्कीस तोपों की सलामी दी | उस घनगर्जना को सुनकर वृद्ध बादशाह का राजतेज भी मानो जाग उठा | बाबर से अकबर तक की पुरानी स्मृतियाँ उसके सामने सजीव हो उठीं, लेकिन संकोच अभी शेष था | सिपाहियों के नेता से उसने कहा – मेरे पास खजाना भी नहीं है, तुम्हें वेतन भी कहाँ से मिलेगा ? 

सिपाहियों ने जबाब दिया, हम अंग्रेजों का खजाना लूटेंगे और आपका खजाना भरेंगे | उधर दिल्ली में अंग्रेज जान बचाते भाग रहे थे | हर दिल्लीवासी उनका दुश्मन बन चुका था, चर्चों के घंटे और क्रास जमींदोज हो रहे थे | लेकिन अंग्रेज कर्तव्य परायणता का एक अद्भुत नमूना भी उस दिन नजर आया | राजमहल के एक और अंग्रेजों का बारूदखाना था, जिसमें कमसेकम एक लाख कारतूस, आठ दस हजार बंदूकें, तोपें और सीजट्रेन भरी हुई थीं | क्रांति के सिपाहियों ने वहां के अंग्रेज रक्षक के पास बादशाह की शरण में आने का पैगाम भेजा | लेफ्टिनेंट बिलोमी ने उस प्रस्ताव का जबाब देने की भी जहमत नहीं उठाई | गुस्साए हजारों सैनिक उस बारूदखाने की दीवार पर चढ़ने लगे | लेकिन यह क्या ? हजारों तोपें एक साथ छूटने जैसी जंगी आवाज के साथ, प्रचंड लौ आसमान चूमने लगी | सैकड़ों लोगों के चिथड़े उड़ गए | उन नौ अंग्रेज सिपाहियों ने अपने आपको मारकर हथियारों का यह जखीरा क्रांतिकारियों के हाथों में नहीं पड़ने दिया, जनहानि हुई सो अलग | लेकिन इससे एक लाभ भी हुआ | कुछ देशी सिपाही जो अभी तक तोपखाने की शक्ति से आशंकित होकर तटस्थ दर्शक भर थे, निर्भय होकर साथ आ गए | लोग इतने गुस्से में थे कि बादशाह ने लगभग पचास अंग्रेजों की जान बचाने के लिए उन्हें अपनी कैद में सुरक्षित कर दिया था, किन्तु १६ मई को वह विवश हो गया, उन्हें बचा नहीं पाया, लोगों ने एक सार्वजनिक मैदान में उनके टुकडे टुकडे कर दिए | कोई महिला या बच्चा गिडगिडाने लगता, तो लोग चिल्लाते – मेरठ की बेड़ियों का बदला, बारूदखाने का बदला | ११ मई से सोलह मई तक अंग्रेजों का कत्ले आम होता रहा | बचने को जो लोग दिल्ली से बाहर भी भागे, उनमें से भी अधिकाँश आसपास के गाँवों में मार दिए गए | इसे राजाओं का विद्रोह कौन कह सकता है, यह तो वह हिंसक छटपटाहट थी, जो गुलामी के दंश ने पैदा की थी | यह आमजन पर अंग्रेज जुल्मो सितम का प्रतिकार था, जो मौक़ा पाते ही उन्होंने लिया | बादशाह तो केवल नाम मात्र का शासक था, यह युद्ध तो आमजन ही लड़ रहा था | 

यह अलग बात है कि इस आकस्मिक विद्रोह से क्रांति के स्थान पर अंग्रेजों को अधिक लाभ हुआ | यदि ३१ मई को ही एक साथ पूरे देश में स्वतंत्रता की दुन्दुभी गूंजती तो अंग्रेज उसके सामने टिक नहीं पाते, क्योंकि उस समय बैरकपुर से आगरा के बीच केवल एक अंग्रेज रेजिमेंट थी, दानापुर में | मेरठ के क्रन्तिनाद ने अंग्रेजों को सतर्क कर दिया, जबकि क्रान्ति के योद्धा असमंजस में पड़ गए कि आन्दोलन शुरू कर दिया जाए, या ३१ मई तक रुका जाए | इस स्तब्धता का लाभ लेकर अंग्रेजों ने चीन की और जाने की मुहिम रोक दी, रंगून की गोरी रेजीमेंट कलकत्ता आ गई, ईरान से भी लड़ाई ख़तम कर सेना वापस बुला ली गई | इसके अतिरिक्त जिस अधिकारी ने सबसे बड़ा काम किया, उसका नाम था जॉन लारेंस | उसने सिक्खों को समझाया, उन्हें याद दिलाया कि मुस्लिम शासकों ने उनके गुरुओं के साथ क्या किया था, अंग्रेज राज हटाकर मुस्लिम बादशाह का राज्य लाना क्या उनके लिए उचित होगा ? फूट डालो और राज्य करो की यह नीति एक बार फिर कारगर हुई | इस स्वाधीनता संग्राम में हिन्दू मुसलमान एक साथ आकर जूझे, लेकिन सिक्ख अधिकांशतः न केवल अलग रहे, बल्कि अंग्रेजों का साथ देते दिखाई दिए | पंजाब अन्याय पूर्वक हड़पा, महाराज रंजीत सिंह की धरोहर कोहिनूर छीना, इसके बाद भी देश का दुर्भाग्य कि उसकी यह शक्तिशाली भुजा, १८५७ में शत्रु के साथ रही | पटियाला, नाभा और जीन्द रियासतों को जब बादशाह की तरफ से क्रांति में साथ आने का निमंत्रण भेजा गया, तो उन सन्देश वाहकों को ही मार दिया गया | इन तीनों रियासतों ने अंग्रेजों की हर तरह से मदद की | यह ध्यान देने योग्य है कि इन तीनों रियासतों को गुरूओं द्वारा दिए गए आशीर्वाद के रूप में जाना जाता है | परिणाम स्वरुप जब दिल्ली पर वापस कब्जा करने हेतु अंग्रेज सेना अम्बाला से दिल्ली की तरफ बढी तो सिख सैनिक उनके सबसे प्रमुख सहयोगी थे |

लेकिन इसी दौरान एक और घटना घटी, जिसका वर्णन सावरकर जी ने अपनी इसी पुस्तक में किया है, जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे लगता है कि उस घटना ने भी १८५७ की क्रान्ति ज्वाल को सबसे अधिक क्षति पहुंचाई | उधर अंग्रेज दिल्ली वापस पाने को प्रयत्न कर रहे थे, इधर देश के अन्य भागों में अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने का अभियान जारी था | पंजाब में माउंट गुमरी और जॉन लोरेन्स ने अत्यंत चतुरता का परिचय देते हुए, मियाँ मीर, लाहौर, गोबिंदगढ़ और पेशावर की देशी टुकड़ियों को योजना पूर्वक निःशस्त्र कर दिया लेकिन होती मरदान की ५५ वीं रेजीमेंट पर बहां के मुख्य सैनिक अधिकारी कर्नल स्पोटिस बुड को पूरा भरोसा था | लेकिन २४ मई को जब उसे ज्ञात हुआ कि पेशावर से अंग्रेज सेना इस टुकड़ी के विरुद्ध कार्यवाही करने आ रही है, तो उसने ग्लानिवश आत्महत्या कर ली | इस घटना से आहत सभी सिपाही भी खजाना लूटकर वहां से दिल्ली की और रवाना हो गए | लेकिन निकल्सन के नेतृत्व में अंग्रेज टुकड़ी ने उनका पीछा किया | दोनों ओर के सैकड़ों लोग मारे गए, किन्तु शेष लड़ते लड़ते सरहद के पार निकल गए | बहां की मुस्लिम जमातों ने उनका स्वागत बहुत ही भयानक ढंग से किया | उन सेनानियों में से जो हिन्दू थे, उन्हें छांट छांट कर अलग किया गया और बलपूर्वक मुस्लिम बनने के लिए विवश किया गया | वे अभागे सिपाही किसी तरह जान बचाकर भागे और यह सोचकर कि कश्मीर का हिन्दू राजा गुलाब सिंह उनकी मदद करेगा, वहां पहुंचे | लेकिन जानकर आँखें नम हो जाती हैं कि कश्मीर के उस राजपूत कुलोत्पन्न गुलाब सिंह ने अपना धर्म बचाने की खातिर शरण में आये हुए उन हजारों अनाथों का न केवल अपने राज्य में प्रवेश वर्जित कर दिया, बल्कि अगर कोई किसी तरह राज्य में प्रवेश कर जाए, तो उसे काट दिया जाए, ऐसी स्पष्ट आज्ञा प्रसारित कर दी | उसने अपना यह सुकृत्य अंग्रेजों के दरबार में बड़े गर्व से सूचित भी कर दिया | अब उन हिन्दू सैनिकों के सामने दो ही मार्ग थे | धर्मांतरण करें या मृत्यु का वरण करें | अंग्रेजों ने कदम कदम पर इन वीरों का निष्ठुरता से क़त्ल किया | जब वध स्तंभों पर एक साथ इतने लोग फांसी पर नहीं चढ़ाए जा सके तो तोपों के मुंह खोल दिए गए | एक हजार हिन्दू वीर पलक झपकते मार डाले गए | देश और धर्म हित में ५५ वीं रेजीमेंट का यह बलिदान आजाद भारत में भी नई पीढी को शायद ही कभी बताया जाए | आईये हम और आप तो उन्हें अश्रु श्रद्धांजलि प्रदान कर ही दें |

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क्रांतिदूत: १८५७ का स्वातंत्र्य समर (भाग - १) – पृष्ठभूमि और युद्ध का प्रारम्भ
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