१८५७ का स्वातंत्र्य समर ((भाग ३) – महारानी लक्ष्मीबाई और तात्याटोपे का बलिदान

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स्वातंत्र्य समर के ज्वालामुखी की अंतिम ज्वाला - महारानी लक्ष्मीबाई अपनी हड़प नीति के अनुरूप लार्ड डलहौजी ने झांसी में भी दत्तक पुत्र को...


स्वातंत्र्य समर के ज्वालामुखी की अंतिम ज्वाला - महारानी लक्ष्मीबाई

अपनी हड़प नीति के अनुरूप लार्ड डलहौजी ने झांसी में भी दत्तक पुत्र को मान्यता न देते हुए उसे हथियाना चाहा | लेकिन जब तक महारानी लक्ष्मीबाई के शरीर में रक्त की एक भी बूँद है, तब तक स्वातंत्र कौस्तुभ मणि उसके कंठ में ही शोभा पायेगी, झांसी, झांसी का राजप्रासाद, जरी पटका, राज सिंहासन, उसका सतीत्व, झांसी की रानी लक्ष्मी के साथ या तो स्वतंत्र रहेंगे या स्वाधीनता की यज्ञाग्नि में भस्म हो जायेंगे | अपनी बुलंद आवाज – मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी, जिसकी हिम्मत हो, वो आजमा ले, के साथ वीरांगना लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा लेने को तैयार हो गईं | सम्पूर्ण बुंदेलखंड धधकने लगा, सागर, नौगाँव, बान्दा, बानापुर, शाहगढ़ और कालपी में प्रतिशोध की भयंकर अग्नि प्रज्वलित हो उठी| 

पिछले अंकों में हम देख चुके हैं कि कैसे झांसी पूरी तरह महारानी के आधिपत्य में आई और कैसे वहां फिरंगियों का सफाया हुआ | १८५८ के प्रारंभ में एक बार फिर झांसी जीतने ह्यूरोज पांच हजार सैनिकों के साथ मऊ से झांसी की ओर रवाना हुआ | २० मार्च को इस सेना ने झांसी से दस किलोमीटर दूर अपना डेरा जमाया | उसके आगमन के पूर्व ही रानी की आज्ञा से पूरा क्षेत्र उजाड़ दिया गया था, छाया को बृक्ष नहीं बचे थे, खेतों में तिनका तक नहीं था | ऐसी उजाड़ भूमि में भूख प्यास का कष्ट उठाती अंग्रेज सेना को देशद्रोही टिहरी नरेश ने रसद और पानी पहुंचवाया | लेकिन इन सबसे बेपरवाह रानी युद्ध की तैयारियों में जुटी हुई थीं | वह निराश हृदयों में आशा का संचार करते हर बुर्ज पर, हर द्वार पर घूमती नजर आती थीं, चतुर तोपचियों का चुनाव करने में व्यस्त थीं | झांसी की जनता भीपूरे उत्साह से उनके साथ थी | कारीगर युद्ध सामग्री बनाने में व्यस्त थे | सैनिक बन्दूक थामते तो उनमें गोलियां भरने का काम आमजन करते, वे ही तलवारों पर धार देते | स्त्रियाँ कहाँ पीछे रहने वाली थीं, उन्होंने रसद और हथियार पहुंचाने की जिम्मेदारी बखूबी संभाली | २५ मार्च से युद्ध शुरू हो गया, दोनों तरफ की तोपें गरजने लगीं | शहर के अन्दर दिन रात पचास पचास पोंड के गोले आग बरसाते हुए गिर रहे थे | २६ तारीख को भारी फिरंगी गोलाबारी के चलते जब दक्षिणी द्वार पर झांसी के सैनिकों को तोपें चलाना मुश्किल हो गया तो पश्चिमी द्वार के तोपची गुलाम गौश खान ने अपनी घन गर्ज तोप का मुंह उस ओर कर दिया और उसके प्रहार से अंग्रेजों का मुख्य तोपची मारा गया | रानी ने तुरंत अपने हाथ का कड़ा निकालकर उसे इनाम में दिया | युद्ध के सातवें दिन सूर्यास्त के समय अग्रेजों के गोले से मुंडेर ढह गई, लेकिन सुबह अंग्रेज चकित रह गए, जब रातों रात बनकर पहले की तरह तैयार मुंडेर उन्हें नजर आई | 

३१ मार्च तक यह लड़ाई ऐसे ही चलती रही, दोनों पक्षों को काफी नुक्सान हुआ | तभी छबीली बहिन का भाई तात्या कानपुर में पराजित होने के बाद भी मदद के लिए झांसी आ पहुंचे | कानपूर से चले तब बमुश्किल उनके पास तीन हजार सेनिक बचे थे, लेकिन इस समय झांसी में उनके साथ बाईस हजार का सैन्य बल था | अंग्रेज हैरान थे, कि आखिर उनके पास सेना आ कहाँ से जाती है | अंग्रेज दोनों तरफ से घिर गए थे | लेकिन तात्या की ये सेना कोई प्रशिक्षित सेना नहीं थी | भीड़ और अनुशासित सैन्य बल में अंतर होता है | अंग्रेजों की तोपों के सामने नौसिखिया सेना टिक नहीं पाई और १ अप्रैल को केवल तात्या ही नहीं हारे, झांसी किले के अन्दर संघर्षरत सैनिकों की आशा भी टूट गई | ३ अप्रैल को अंग्रेजों का आखिरी हमला झांसी पर हुआ | रानी बिजली की तरह घूम रही हैं | किसी को सोने के कड़े तो किसी को पोशाक बाँट रही हैं | किसी की पीठ ठोकती तो किसी को मुस्कुरा कर निहाल करतीं | गुलाम गौश खां, कुंवर खुदा बख्श तोपों से आग बरसा रहे हैं | लेफ्टिनेंट माइकल जोहान, लेफ्टिनेंट बोनस, लेफ्टिनेंट फॉक्स ने सीढियों से प्राचीर पर चढ़ने का प्रयत्न किया कि तभी तोप के एक गोले ने उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी | अंग्रेजों ने पीछे हटने का बिगुल बजाया और सैनिकों ने भागकर चट्टानों की ओट ले ली | 

मुख्य द्वार पर अंग्रेज हार गए तो क्या, जब तक नीच विश्वासघाती देशद्रोही इस धरा पर हैं, शत्रुओं को चिंता करने की कहाँ आवश्यकता है | दक्षिणी द्वार से अंग्रेज बुर्ज पर चढ़ आये और उसके बाद तो झांसी में आगजनी और विध्वंस का बाजार गर्म हो गया | राजप्रसाद के पहरेदार मारे गए | राजमहल लूटा जाने लगा | परकोटे पर खडी रानी ने एक बार झांसी पर नजर डाली, और अपने बच्चे को बचाने जैसे कोई शेरनी झपट रही हो, हाथ में नंगी तलवार लिए फुरती से वह दक्षिणी द्वार की दौड़ पडीं | पन्द्रह सौ सैनिक उनके पीछे पीछे लपके | खनखन की आवाजों के साथ तलवारों से तलवारें भिड गईं | बहुत से गोरे मारे गए | लेकिन नगर तो जल ही रहा था, पांच साल का बच्चा हो या अस्सी साल का बूढा, जो फिरंगियों के सामने आया वह मारा गया | एक बूढ़े सरदार ने रानी को समझाया, सरकार अब यहाँ रुकना खतरनाक है, आपको किला छोड़कर शत्रुदल को चीरकर अब पेशवा की सेना में पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए | 

रानी ने स्थिति को समझकर कहा – मैं मैदान में लड़ते हुए मरना पसंद करती हूँ, किन्तु कोई विधर्मी मुझे स्पर्श करे, यह मुझे स्वीकार नहीं, मैं बस गिरफ्तार नहीं होना चाहती | 

सब सरदार एक स्वर से बोले – जब तक हममें से कोई भी जीवित है, आपके रोम को भी कोई स्पर्श नहीं कर पायेगा, उसके टुकडे कर दिए जायेंगे | उसके बाद पुरुष वेश में फौलादी कवच पहने रानी, पीठ पर रेशमी धोती से बंधा उनका दत्तक पुत्र दामोदर, कमर में लटकी तलवार, जब घोड़े पर सवार हुईं, तो साक्षात महामाया प्रतीत हो रही थीं | रानी दस पंद्रह घुड़सवारों के साथ घेरे से तो निकल तो गईं, किन्तु लेफ्टिनेंट वाकर ने उनका पीछा किया, मुठभेड़ हुई और वाकर को घायल कर रानी सुरक्षित कालपी पहुंच गईं | १०२ मील का लगातार सफ़र, रानी जैसे अमूल्य रत्न को अपनी पीठ से उतारते ही स्वामीभक्त घोड़े ने प्राण त्याग दिए | उसका विधिवत अंतिम संस्कार किया गया | इस बीच अन्य घुड़सवारों की अंग्रेजों से मुठभेड़ हुई | मोरोपंत ताम्बे घायल होते हुए भी दतिया तक पहुँच गए, किन्तु वहां के देशद्रोही दीवान ने उन्हें गिरफ्तार कर अंग्रेजों को सोंप दिया और वे फांसी पर चढ़ा दिए गए | 

बिना बांदा नरेश का उल्लेख किये तो यह कहानी अधूरी ही रहेगी | महान बाजीराव की प्रेयसी मस्तानी के वंशज इस राजा ने अपने राज्य में विदेशी दासता का कोई चिन्ह नहीं छोड़ा था | विटलोक ने बांदा पर धावा बोला और कई मुठभेड़ों के बाद हारकर बांदा के नबाब ने १९ अप्रैल को अपनी सेना के साथ कालपी की ओर कूच किया | विटलोक ने उसके बाद करवी के दस वर्षीय राजा को अकारण अपदस्थ कर उसका खजाना लूटा और फिर महोबा में डेरा जमाया | 

उधर झांसी को जमकर ध्वस्त करने के बाद ह्यूरोज की सेनायें, कालपी में एकत्रित नाना साहब के भतीजे राव साहब, तात्या टोपे, महारानी लक्ष्मीबाई, बांदा के नबाब को घेरने को बढीं | क्रांतिकारियों ने आगे बढ़कर कन्च गाँव में उसका डटकर मुकाबला किया | लेकिन पराजय हुई और उसके बाद राव साहब के नेतृत्व में कालपी में संघर्ष हुआ | इस बीच तात्या अपने पिता से मिलने के बहाने वहां से निकल गए | कालपी की इस लड़ाई में रानी का तेज देखते ही बनता था | २१ वर्षीय युवती के शरीर में मानो बिजली भरी हो, उसके घोड़े का वायु वेग से उड़ना, गाजर मूली की तरह अंग्रेजों को काटना, इसे देखकर सेना में अपूर्व उत्साह का संचार हुआ और शुरूआती धावे में अंग्रेजी तोपें क्रांतिकारियों के हाथों में आ गईं | लेकिन उसके बाद ह्यूरोज ने अपने ऊंटों के काफिले को आगे बढ़ाया और उनकी दम पर पेशवा की सेना को पीछे हटने पर विवश कर दिया | २४ मई को ह्यूरोज ने कालपी में प्रवेश किया किन्तु उसके पूर्व सारे क्रांतिकारी नेता वहां से सकुशल निकलकर किसी अज्ञात स्थान को चले गए | 

अब सवाल उठता है कि इस युद्ध के बीच तात्या को अपने पिता से मिलने की सनक क्यों उठी थी | सावरकर जी का अनुमान है कि वह ग्वालियर गए, वहां अपनी व्यूह रचना जमाकर वापस आये और गोपालपुर में आकर राव साहब से मिले | इसके तुरंत बाद ग्वालियर अभियान प्रारम्भ हुआ | २८ मई को अमीन महल पहुंचकर पेशवा राव साहब ने सिंधिया को पत्र लिखा कि पुराने आपसी संबंधों का स्मरण करते हुए, हमारी सहायता करो | लेकिन सिंधिया तो सेना और तोपें लेकर अपने नियुक्ति दाता पेशवा से ही दो दो हाथ करने आगे चल दिया | छेड़ी हुई नागिन से अधिक क्रोधातुर रानी लक्ष्मी उन पर टूट पडीं | महाद जी सिंधिया के वंशज अंग्रेज भक्त जयाजी और उसके मुसाहिब बगलें झांकने लगे | अब तात्या आगे बढे, उन्हें देखते ही ग्वालियर के सरदारों ने लड़ने से मना कर दिया | ग्वालियर नरेश का सिंहासन लडखडाकर गिर पड़ा और कायर जयाजी अपने मंत्री दिनकर राव राजबाड़े के साथ आगरा भाग गया | 

ग्वालियर पहुँचने पर ग्वालियर की जनता ने पलक पांवड़े बिछाकर इन वीरों का स्वागत किया | पेशवा राव साहब के सम्मान में तोपें दागी गईं, सिंधिया के खजांची अमर चंद बांठिया ने शिंदे के खजाने का सब कुछ पेशवा के चरणों में अर्पित कर दिया | ३ जून को फूलबाग में बड़े समारोह पूर्वक पेशवा का दरबार हुआ, जिसमें रामराव गोबिंद को प्रधान मंत्री तथा तात्या टोपे को सेनापति नियुक्त कर रत्नजडित तलवार प्रदान की गई | अष्ट प्रधानों का चुनाव हुआ और सैनिकों को बीस लाख रुपये बांटे गए | लेकिन दुर्भाग्य कि क्रांतिकारी अपनी मस्ती में मस्त थे उधर ह्यूरोज अपनी सेना के साथ चढ़ आया | अपने साथ वह देशद्रोही शिंदे को भी लाया था और भोली प्रजा को धोखा देने के लिए घोषणा की थी कि अंग्रेज अपने लिए नहीं जयाजी राव शिंदे के लिए लड़ने आये हैं | अंग्रेजों का मुकाबला करने को तात्या आगे बढे पर मुरार छावनी में पराजय हुई | 

रानी सैनिक वेश धारण किये कोटा की सराय पर मोर्चे बंदी कर रही थी | लक्ष्मीबाई की दो सखियाँ मुन्दर और काशी भी उनके साथ थीं | रानी के प्रबल पराक्रम के सामने उस दिन स्मिथ को पीछे हटना पड़ा | अगले दिन १८ तारीख को वह नई कुमुक के साथ झांसी की सेना पर टूट पड़ा | रानी की वीरता को जानने वाला ह्यूरोज भी आज उसके साथ था | असाधारण शौर्य से लड़ती रानी ने जब देखा कि विजई अंग्रेजी सेना चारों तरफ से हमला कर रही है, कुल पंद्रह बीस सैनिक ही साथ बचे हैं, तो उन्होंने अपनी दोनों सखियों के साथ घोड़े को एड लगाई और अगली पंक्ति में युद्ध कर रहे अपने लोगों के पास पहुँचने को बढीं | गोरे घुड़सवार शिकारी कुत्तों की तरह उनका पीछा कर रहे थे | तभी एक अंग्रेज द्वारा चलाई गोली ने उनकी सखी मुन्दर की जान ले ली | रानी ने पीछे आकर उस अंग्रेज के दो टुकडे कर दिए | घूमकर आगे बढीं तो सामने आये नाले पर नया घोडा अड़ गया | और फिर असंख्य अंग्रेजों तलवारों से एक अकेली तलवार कब तक सामना करती | एक ने पीछे से वार किया तो सर का दाहिना हिस्सा और एक आँख निकलकर बाहर लटकने लगी, दूसरा वार छाती पर हुआ, अपने ऊपर वार करने वाले को दो टुकडे कर रानी अंतिम सांस लेने लगीं | रानी के विश्वासपात्र रामचंद्र राव देशमुख ने उन्हें उठाया और पास की झोंपड़ी में ले गया | बाबा गंगादास ने उन्हें ठंडा पानी पिलाया और रक्त से लथपथ उस देवी के शरीर को बिछौने पर लिटा दिया | उनकी पावन आत्मा स्वर्ग सिधार गई | रामचंद्र राव ने अपनी स्वामिनी के अंतिम आदेश का पालन करते हुए, पराधीनता के अपवित्र स्पर्श से बचाने, घांस का ढेर लगाया और उनका अंतिम संस्कार कर दिया | बाबा गंगादास की झोंपड़ी के पास स्वातंत्र्य समर के ज्वालामुखी की अंतिम ज्वाला जल उठी | 

अवध में क्रांति की इतिश्री 

सन १८५७ के स्वातंत्र्य समर की केन्द्रीय भूमिका में उत्तरी भारत ही रहा, उसमें भी पंजाब काफी हद तक असहयोगी तो राजपूताना तटस्थ रहा | राजपूताना की जन सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी, यहाँ तक कि अंग्रेजों की और से युद्ध करने वाले सैनिकों को आमजन के अपशब्दों का भी सामना करना पड़ता था | महाराष्ट्र के देश वान्धवों ने भले ही कानपुर, कालपी, झांसी में प्रचंड रणगर्जना की हो, नाना साहब, तात्याटोपे,लक्ष्मीबाई ने अतुलनीय शौर्य का प्रदर्शन किया हो, सतारा के सचिव रंगोजी बापू ने पूरे देश में संपर्क किया हो, किन्तु शेष महाराष्ट्र व दक्षिण ने साथ में कदम से कदम नहीं मिलाये | वह परिणाम की प्रतीक्षा करते रहे | कोल्हापुर नरेश के छोटे भाई चिमाजी अप्पा की प्रेरणा से कोल्हापुर में १५ दिसंबर को सैनिकों ने विद्रोह किया, किन्तु सूचना मिलते ही जैकब ने पहुंचकर कड़े संघर्ष के बाद उस प्रयत्न को असफल कर दिया | अनेक लोगों को तोप के सामने खड़ा कर उड़ा दिया गया | रंगोजी बापू के एक पुत्र को भी फांसी पर चढ़ा दिया गया | सतारा के दो राजपुत्रों को निष्कासित कर दिया गया, किन्तु रंगोजी बापू अंग्रेजों के हाथ नहीं चढ़े, उसके बाद वे कहाँ गए, किसी को नहीं पता | 

हैदराबाद में भी वहां के निजाम अफजलउद्दौला और वजीर सालारजंग पूरी तरह अंग्रेज निष्ठ ही बने रहे, नतीजतन क्रान्ति के प्रयत्न वहां भी असफल ही हुए, क्रांतिकारी नेता तोराबाज खां मारे गए तो एक अन्य नेता अलाउद्दीन को अंडमान की जेल में भेज दिया गया | लेकिन पास ही जोहरापुर में एक तरुण हिन्दू राजा भी था जिसने अपना सर्वस्व स्वतंत्रता हेतु समर्पित कर दिया | वह अन्ग्रेजों के विरुद्ध खड़ा हुआ किन्तु निजाम और अंग्रेजों की संयुक्त शक्ति का सामना नहीं कर सका | फरबरी १८५८ में वह भागकर हैदराबाद पहुंचा तो उसे बजीर सालारजंग ने बंदी बना लिया और अंग्रेजों को सोंप दिया | जब उसे कालापानी की सजा सुनाई गई, तो उसने एक अंग्रेज सिपाही की बन्दूक छीनकर स्वयं को गोली मार ली | उसके अंतिम शब्द थे, कालापानी से तो मृत्यु श्रेयस्कर है, मेरा तो एक साधारण सा प्रहरी भी बंदीशाला में नहीं रहेगा, फिर मैं तो उनका राजा हूँ | 

जोहरापुर नरेश के आत्मोत्सर्ग से प्रेरित होकर नरगुंद के नरेश भास्कर राव बाबा साहब ने २५ मई १८५८ को अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिए | जब अंग्रेज अधिकारी मैनसन आक्रमण करने आया तो नगर के बाहर जंगलों में उसे घेर लिया व उसे मारकर उसका सर नरगुंद नगर के प्रवेश द्वार पर टांग दिया | किन्तु नरगुंद नरेश का सौतेला भाई ही अंग्रेजों से जा मिला और फिर वही पुरानी कहानी, बाबा साहब पराजित हुए, और १२ जून १८५८ को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया | उनकी परम सुन्दरी पत्नी ने अपनी सास के साथ मलप्रभा नदी में कूदकर अपनी जान दे दी | 

५ जून १८५८ को मौलवी अहमदशाह का सर पावेन के राजा ने काट लिया था, इस समाचार ने समूचे अवध और रूहेलखंड को धधका दिया | निजाम अली खान पीलीभीत जा पहुंचे, खान बहादुर खान, विलायत शाह, अलीखान मेवाती के साथ साथ पेशवा नाना साहब भी उस देशद्रोही राजा को सबक सिखाने चढ़ आये | घाघरा नदी के तट पर बेगम हजरत महल और हेमू खान डेरा डाले हुए थे तो राजा रामबख्श, बाहुनाथ सिंह, चाँद सिंह, हनुमंत सिंह व अन्य बड़े बड़े सरदार भी अवध की स्वतंत्रता के लिए अंतिम संघर्ष को तत्पर हो गए | उधर १३ जून को हॉप ग्रांट भी लखनऊ के समीप नबाब गंज की और बढ़ चला, जहाँ ये सभी स्वतंत्रता योद्धा एकत्रित हुए थे | और फिर सम्पूर्ण अवध में घमासान मुठभेड़ें प्रारंभ हो गईं | अपनी पुरानी शमशीरों और तोड़ेदार बंदूकों से ही अवध वासी प्रबल अंग्रेज सत्ता को चुनौती दे रहे थे | शंकरपुर के राजा वेणीमाधव को अंग्रेजों ने घेर लिया और सन्देश भेजा कि यदि तुम युद्ध का हठ छोड़ दो, तो तुम्हें क्षमा कर दिया जाएगा, और तुम्हारी सारी संपत्ति भी लौटा दी जायेगी | वेणीमाधव ने उत्तर दिया कि दुर्ग की तो मैं रक्षा नहीं कर पा रहा, इसलिए यहाँ से तो मैं जा रहा हूँ, लेकिन तुम्हारी शरण में हरगिज नहीं आउंगा | किला तुम्हारे हाथ आ जाएगा, किन्तु वेणीमाधव नहीं | क्योंकि यह देह तो स्वराज्य की दास है | 

इस भीषण संघर्ष की ज्वाला ने इंग्लेंड में भी हायतौबा मचा दी और अंततः नवम्बर १८५८ को भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के स्थान पर सीधे ब्रिटेन की साम्राज्ञी का शासन कायम हो गया | महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की कि जो भी शस्त्र रख देगा, उसे सार्वजनिक क्षमादान दे दिया जाएगा, राजा महाराजाओं को दत्तक पुत्र लेने का अधिकार होगा, जनता के धार्मिक अधिकारों और रूढ़ियों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा | देशी नरेशों के अधिकार, सम्मान और पद की प्रतिष्ठा का विचार करते हुए हम उनके साथ आदरपूर्ण व्यवहार करेंगे | निसंदेह इस घोषणा पत्र का एकमेव उद्देश्य क्रांति की आग पर पानी डालना था, किन्तु अवध की बेगम ने इसे स्वीकार नहीं किया और अप्रैल १८५९ तक अपना संघर्ष जारी रखा | किन्तु इसके बाद लार्ड क्लाईव के भीषण आक्रमणों के चलते इन क्रांतिवीरों को नेपाल में प्रविष्ट होना पड़ा | पत्र द्वारा नाना साहब ने नेपाल के हिन्दू नरेश से शरण और सहायता देने की प्रार्थना की | राजा जंगबहादुर ने अपने एक सरदार कर्नल बलभद्र को चर्चा के लिए भेजा | क्रांति वीरों ने उनसे पेशकश की कि हमारे पास अभी साठ हजार जवान हैं, अगर नेपाल हमें पचास हजार गोरखा सैनिक प्रदान कर दे, तो हम अंग्रेजों को कलकत्ता तक धकेल देंगे और इस प्रकार जो क्षेत्र प्राप्त होगा, उसके शासक भी नेपाल नरेश ही होंगे और हम उनकी प्रजा | किन्तु बात बनी नहीं, उलटे नेपाल नरेश ने अंग्रेजों को अनुमति प्रदान कर दी कि वह अपने इन विद्रोहियों पर कार्यवाही हेतु नेपाल में प्रवेश कर सकते हैं | 

सर्वथा निराश होकर अनेक क्रांति योद्धा अपने शस्त्रास्त्र छिपाकर घरों को लौटने लगे, अंग्रेजों ने भी उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की | ब्रिटिश सेनापति ग्रांट हॉप को लिखा, नाना साहब का अंतिम पत्र इतिहास के पन्नों में सुरक्षित है जिसमें लिखा गया है - व्हाट राईट हेव यू - टू ओक्यूपाई इंडिया - एंड डिक्लेयर मी - एन आउट लॉ ? हिन्दुस्तान पर राज्य करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया, तुम विदेशी हमारे राजा हो, तो क्या मैं चोर हूँ | बालाजी विश्वनाथ के पेशवाई सिंहासन के इस अंतिम उच्छ्वास के उपरांत नाना साहब का क्या हुआ, इस विषय में इतिहास मौन है | घनघोर कठिनाईयां झेलते उनके भाई बाला साहब का वनों में ही स्वर्गवास हुआ | अवध की बेगम और तरुण राजकुमार को नेपाल में रहने की अनुमति मिल गई और इस प्रकार पराजय के साथ अवध में क्रान्तियुद्ध की इति श्री हो गई | 

तात्या टोपे का अंतिम संघर्ष 

२० जून को ग्वालियर के रणांगण में हुई पराजय के बाद घायल मराठा शेर तात्या टोपे मध्यभारत के जंगलों में प्रविष्ट हो गया | उसके पास न सेना थी, न तोपें और ना ही धन | अपनी बची खुची सेना को लेकर तात्या और राव साहब पेशवा ने सरमथुरा नामक ग्राम में पहुंचकर अपनी भावी रणनीति पर विचार किया, और प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर छापामार युद्ध जारी रखने का निश्चय किया | अब सवाल था सेना के लिए रसद और शस्त्रास्त्र का, तो उसके लिए इतने राजे रजबाड़े थे ही | राजी नहीं तो गैर राजी | यत्र तत्र बिखरे इन राजाओं के पास नाम मात्र की सेना होती थी, जो थी वह भी क्रांतिवीरों के प्रति सहानुभूति रखने वाली, अतः राजाओं पर, युद्ध कर लादने में कहाँ कठिनाई आने वाली थी | बस इसी रणनीति पर चलते हुए संघर्ष जारी रहा | फिर तो मध्य हिन्दुस्तान के वन, गुफाएं, ग्राम, नगर, सभी और से तात्या टोपे की प्रचंड रण गर्जनाओं के स्वर सुनाई देने लगे | भरतपुर जयपुर से तो आसानी से मदद मिल गई, टोंक के नबाब ने आनाकानी की भी, किन्तु उसकी सेना तात्या से लड़ने को तैयार ही नहीं हुई और नबाब का तोपखाना लेकर तात्या आगे दक्षिण की तरफ बढ़ गए | होम्स की सेना लगातार पीछे लगी हुई थी | सामने बाढ़ से उफनती चम्बल आई तो तात्या राह बदलकर बूंदी पहुँच गए | वहां से नीमच, भीलबाड़ा के पास सरवर नामक ग्राम में ७ अगस्त को अंग्रेज सेना से मुठभेड़ भी हुई, किन्तु तात्या उन्हें झांसा देकर नाथद्वारा में श्रीनाथ जी के दर्शन करने पहुँच गए | 

१४ अगस्त को हुई मुठभेड़ में तात्या के हाथ से तोपखाना निकल गया लेकिन चम्बल पारकर तात्या अंग्रेजों की आँख में धूल झोंककर साफ़ बचकर झालरापाटन में दिखाई दिये | यहाँ भी टोंक की कहानी दोहराई गई और राजा ने हेकड़ी दिखाने की कोशिश की | लेकिन नतीजा टोंक जैसा ही निकला, उसकी सेना ने भी तात्या को ही स्वामी मान लिया और राजा से पंद्रह लाख दंड स्वरुप लेकर, उसकी सेना को अपनी सेना बनाकर, बत्तीस तोपें ले तात्या आगे बढ़ गए | तात्या का अगला लक्ष्य इंदौर था, किन्तु मार्ग में राजगढ़ के पास अंग्रेजों ने एक बार फिर उन्हें घेर लिया | तात्या को तोपखाना फिर छोड़ना पड़ा | लेकिन उससे उन्हें क्या फर्क पड़ता था, जंगलों में होते हुए वे सिरोंज पहुँच गए, जहाँ फिर से उन्हें चार तोपें मिल गईं | 

इस स्थिति का वर्णन करते हुए एक अंग्रेज लेखक ने लिखा – उसने ऐसे पराजित एशियावासियों की सेना को संगठन सूत्र में बांधा था, जिनसे उसका कोई सम्बन्ध भी नहीं था | वह लगातार हारता गया, पीछे हटता गया, लेकिन पराजय का उपहास उड़ाते लगातार लड़ता गया | उसका नाम यूरोप भर में अनेक एंग्लो इंडियन सेनापतियों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध हो गया | उसने जनता में से ही अपने ऐसे स्वयंसेवक तैयार किये, जिन बेचारों को प्रतिदिन ही उसके साथ साठ सत्तर मील पैदल दौड़ना पड़ता था, आर्थिक लाभ कुछ नहीं, ऊपर से फांसी पर लटका दिए जाने का डर, इसके बावजूद गरमी सर्दी बरसात से टकराते कभी दो हजार तो कभी पंद्रह हजार सैनिक उसके साथ अंग्रेजों से टकराते दिखे | 

१७ जनवरी १८५९ को लन्दन टाईम्स ने भी तात्या की प्रशंसा करते हुए लिखा – 

अवर वेरी रिमार्केबल फ्रेंड तात्या टोपे इज टू ट्रबलसम एंड क्लेवर एन एनेमी टू एडमायर्ड | सिंस लास्ट जून ही हेज केप्ट सेन्ट्रल इण्डिया इन ए फेवर | ही हेज सेकड स्टेशन्स, प्लन्डर्ड ट्रेजरीज एम्प्टीड आर्सेनल्स, कलेक्टेड आर्मीज, लॉस्ट देम, फोट बेटल्स, लॉस्ट देम, टेकन गन्स फ्रॉम नेटिव प्रिंसेस, लॉस्ट देम, देन हिज मोशंस वेअर लाइक फोर्कड लाइटनिंग, एंड फॉर वीक्स, ही हेज मार्चड ३० एंड ४० माइल्स ए डे | ही हेज क्रोस्ड द नर्मदा टू एंड फ्रो | ही हेज मार्चड अप माउंटेन्स, ओवर रीवर्स, थ्रू रेविंस एंड वेलीज, एमिडस्ट स्वम्प्स, ओन ही गोज, बेकवर्ड्स एंड फॉरवर्ड्स, साइडवेज़ एंड जिगजेग वेज, बिटबीन अवर कोलम्स, बिहाइंड देम, एंड बिफोर देम | 

खतरनाक और चतुर शत्रु तात्या टोपे की प्रशंसा करनी होगी, जिसने विगत जून से मध्य भारत को अपने पक्ष में कर रखा है | उसने हमारे केंद्र, खजाने और शस्त्रागार लूटे, सेना खडी की, फिर उसे खोया, युद्ध लडे, किन्तु पराजित हुआ, स्थानीय राजाओं से बंदूकें छीनीं, लेकिन वह भी उसके पास नहीं रहीं, इसके बाद भी उसकी गतिविधि बिजली की तरह चमकदार हैं | कई हफ़्तों से वह प्रतिदिन ३०-४० मील चल रहा है, कभी नर्मदा के इस पार तो कभी उस पार, पहाड़, नदियाँ, नाले और घाटियाँ, भीषण दलदल कोई उसका रास्ता नहीं रोक सका, कभी आगे तो कभी पीछे, कभी साइड से तो कभी लहराते, वह हमारे केन्द्रों में या उनके आगे पीछे ही रहा | 

अंग्रेज भले ही तात्या को धन्य धन्य कह रहे हों, लेकिन समय उसके पक्ष में नहीं था | अक्टूबर १८५८ आते आते क्रांति की ज्वाल मद्धिम पड़ चुकी थी | उनका अपना महाराष्ट्र, उनका अपना नागपुर, साथ आने में संकोच कर रहा था | तात्या महाराष्ट्र से निजाम की ओर बढे, किन्तु अंग्रेजी सेनायें भी दक्षिण प्रवेश बाधित करने आगे बढीं, तात्या का नर्मदा किनारे कर्गूण गाँव में मेजर संडरलेंड से डटकर संघर्ष हुआ | युद्ध जब अपने पूरे यौवन पर था, अचानक तात्या ने अपने सैनिकों को गोलियां बरसाना बंद कर नर्मदा में कूदने का आदेश दे दिया | अंग्रेजों को समझ में ही नहीं आया कि यह क्या हो रहा है, तब तक पूरी सेना अंग्रेजों को मुंह चिढाते हुए नर्मदा पार पहुँच गई | अब तात्या बडौदा की ओर बढे, किन्तु तात्या का पीछा करते पार्क भी छोटा उदयपुर पहुंच गया और तात्या को बडौदा पहुंचने का विचार छोड़ना पड़ा | ये लोग बांसबाडा के जंगलों में थे, तभी अब तक साथ में जूझ रहे बांदा के नबाब ने महारानी द्वारा की गई आम माफी की घोषणा को सुनकर आत्म समर्पण का निर्णय लिया | राव साहब तथा तात्या भी वही मार्ग अपना सकते थे, किन्तु फिर आज इतिहास उन्हें कैसे याद रखता | 

तात्या उदयपुर की ओर बढे किन्तु अंग्रेजों की सजगता के चलते अंततः वनों में ही छुपना पड़ा | उसी समय अवध का प्रख्यात वीर शहजादा फीरोज शाह भी अतुलनीय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, गंगा जमुना पार कर, उनकी मदद को अपनी सेना लेकर आ गया | 13 जनवरी १८५९ को फिरोजशाह, तात्या टोपे और पेशवा राव साहब की इंद्रगढ़ में भेंट हुई | उस समय शिंदे का एक दरबारी मान सिंह भी वहां था | तभी अंग्रेज सेना के पहुँचने की सूचना पर इन लोगों को प्रस्थान करना पड़ा | अंग्रेज किसी भी कीमत पर इन लोगों को फंदे में लेने के लिए प्रयत्नशील थे | १६ जनवरी १८५९ को देवास के पास ये लोग एक बार पुनः घेर लिए गए | किन्तु पकड़ना इतना आसान थोड़े ही था | २१ जनवरी को अलवर के पास सीकर में क्रांति की इस अंतिम टोली ने अपनी आख़िरी लड़ाई सेनापति होम्स की सेनाओं से लड़ी, किन्तु उसके बाद तात्या और राव साहब ने अपनी सेनाओं से विदा ले ली और खुद भी अलग अलग हो गए | विजय की संभावना तो शेष थी नहीं, अब छापामार लड़ाई के नाम पर लगातार के पलायन से भी सब ऊब और थक चुके थे | 

तात्या के साथ अब केवल दो अश्व, एक टट्टू, दो ब्राह्मण रसोईये और एक सेवक ही था | अपने इस परिवार के साथ वे पारौन के जंगलों में ग्वालियर के सरदार मानसिंह के पास पहुंचे | जल्द ही अंग्रेजों को सूचना मिल गई कि तात्या अब मानसिंह के पास रह रहे हैं | अंग्रेज चूंकि कई बार तात्या को पकड़ने का प्रयत्न कर असफल हो चुके थे, अतः उन्होंने मानसिंह को मोहरा बनाया | उसके पास प्रस्ताव भेजा कि अगर वह तात्या को पकड़वा देगा, तो उसे न केवल क्षमादान मिलेगा, वरन शिंदे से नरवर का राज्य भी उसे दिलवा दिया जाएगा | मानसिंह उस प्रलोभन में आ गया और उसने तात्या को बताया कि वह अंग्रेजों के समक्ष आत्म समर्पण करने जा रहा है | साथ ही उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर रहने का सुझाव दिया और कहा कि वह तीन दिन बाद आकर उनसे भेंट करेगा | मानसिंह तात्या का पुराना सहयोगी था, वह धोखा देगा, यह कल्पना भी तात्या को नहीं थी | शायद उन्होंने यह भी सोचा हो कि अगर इसके मन में कोई खोट होता तो आत्म समर्पण की बात भी क्यों बताता | जो भी हो मानसिंह ने अंग्रेजों को उस स्थान की जानकारी दे दी, जहाँ तात्या छुपे हुए थे | तीन दिन बाद ७ अप्रैल १८५९ अर्धरात्रि को मानसिंह तात्या के पास पहुंचा जरूर पर अंग्रेज सैनिकों के साथ | तात्या उस समय सोये हुए थे | जब उनकी नींद खुली तो स्वयं को अंग्रेजों के बंदी रूप में पाया | 

दूसरे दिन प्रातः काल जनरल मीड की सैनिक छावनी शिवपुरी में अदालत का नाटक हुआ | अपने ऊपर लगाए गए विद्रोह के आरोप के जबाब में तात्या ने कहा कि मैंने जो कुछ भी किया, अपने स्वामी पेशवा के आदेशानुसार किया, मैंने या मेरे स्वामी ने भी युद्ध के अतिरिक्त किसी भी यूरोपियन पुरुष, स्त्री, अथवा बालक की निरर्थक हत्या नहीं की | इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं कहना | अदालत के विशेष अनुरोध पर तात्या ने क्रान्ति के पुनीत प्रारम्भ से लेकर अंत तक की सारी घटनाओं की सिलसिलेवार जानकारी भी दी | लिपिक ने वह सम्पूर्ण विवरण लिखा, जिसके नीचे तात्या ने अपने हस्ताक्षर भी किये | 

जांच पड़ताल और पूछताछ का नाटक ख़तम हुआ और तात्या टोपे को फांसी का दंड सूना दिया गया | १८ अप्रैल दोपहर चार बजे उन्हें तीसरी बंगाल गोरी सेना के कड़े पहरे में वध स्तम्भ के समीप लाया गया | तात्या ने अंग्रेजों से एक ही आग्रह किया कि ग्वालियर में रह रहे उनके वृद्ध पिताजी को किसी प्रकार त्रस्त न किया जाए | तात्या के पैरों में पडी बेड़ियाँ काट दी गईं | वह नर पुंगव तीव्र गति से सीढियां चढ़ गया | जब वधिक उनके हाथ पैर बांधने पहुंचे तब हंसते हुए तात्या ने कहा, इसकी क्या आवश्यकता है और अपने हाथ से फांसी का फंदा अपने गले में डाल लिया, मानो कोई पुष्पमाल पहन रहे हों | अगले ही पल तख्ता खींच लिया गया और पेशवा के राजनिष्ठ सेवक, स्वातंत्र समर के महा नायक, हिन्दुस्तान के निर्भीक और कुशल सेनापति तात्या टोपे का निर्जीव शरीर हवा में झूलने लगा | वध मंच रक्त से भीगा, तो यह आख्यान पढ़ते सुनते वर्षों से असंख्य देशप्रेमियों की, हमारी आपकी आखें अश्रुकणों से भीगती आ रही हैं | 

तात्या के महाप्रयाण के बाद भी पेशवा राव साहब पूर्ण वीरता से जूझते रहे, किन्तु जब कोई विकल्प नहीं रह गया तो जंगल की ओर निकल गए | तीन वर्ष के अज्ञात वास उपरांत उन्हें भी बंदी बना लिया गया और २० अगस्त १८६२ को फांसी पर चढ़ा दिया गया | केवल फिरोजशाह अंग्रेजों के हत्थे नहीं चढ़े, वे भेष बदलकर घूमते रहे और अंत में ईरान पहुंचकर करबला में रहने लगे | दिल्ली के अंतिम बादशाह और शायर बहादुरशाह जफ़र का क्रान्ति युद्ध प्रारंभ होने तक मानना था कि – 

दम्दमे में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की, 

ए जफ़र ठंडी हुई, शमशीर हिन्दुस्तान की | 

लेकिन उसी बादशाह ने बाद में कहा – 

गाजियों में बू रहेगी, जब तलक ईमान की, 

तख्ते लन्दन तक चलेगी, तेग हिन्दुस्तान की | 

विनायक दामोदर सावरकर जी लिखित १८५७ के स्वातंत्र समर की गाथा का यह समापन एपीसोड है | जिन लोगों ने भी इसे पढ़ा सुना है, क्या उनमें से भी कोई उन्हें साम्प्रदायिक कह सकता है ? क्या कोई उन्हें मुस्लिम हेटर मान सकता है ? विचार कीजिए |

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क्रांतिदूत: १८५७ का स्वातंत्र्य समर ((भाग ३) – महारानी लक्ष्मीबाई और तात्याटोपे का बलिदान
१८५७ का स्वातंत्र्य समर ((भाग ३) – महारानी लक्ष्मीबाई और तात्याटोपे का बलिदान
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