भारतीय सौम्य सम्पदा – डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे

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( विगत सात जुलाई को भोपाल स्थित नानाजी देशमुख पुस्तकालय के अंतर्गत 100 वें स्वाध्याय मण्डल में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व् मप्र भा...


( विगत सात जुलाई को भोपाल स्थित नानाजी देशमुख पुस्तकालय के अंतर्गत 100 वें स्वाध्याय मण्डल में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व् मप्र भाजपा के संगठन प्रभारी तथा भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के अध्यक्ष माननीय डॉ विनय सहस्त्रबुद्धे द्वारा " भारतीय सौम्य सम्पदा" विषय पर ओनलाइन दिए गए विद्वत्तापूर्ण उदबोधन के अंश )

सम्पदा अर्थात पॉवर और सौम्य अर्थात सॉफ्ट | ९० के दशक तक लोगों को यह अहसास होने लगा था कि अब सामरिक संघर्ष से बचा जाना चाहिए, क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारी जनहानि हुई | लोगों को यह भी ध्यान में आ गया कि अस्त्र शस्त्र इतनी प्रचुर मात्रा में निर्मित हो चुके हैं, जिनके चलते इस पद्धति का संघर्ष अगर होगा तो विश्व मानवता का ही विनाश हो जाएगा | इसीलिए अर्जेंटीना के साथ ब्रिटेन के छोटे मोटे संघर्ष अगर छोड़ दें तो कोई अन्य बड़ा युद्ध नहीं हुआ | अतः अब बौद्धिक युद्ध का युग है, किसी भूभाग को जीतने, युद्ध करने के स्थान पर, लोगों के मनोमस्तिष्क पर प्रभाव डालने, लोगों के दिमाग पर कब्जा करने का प्रयास होने लगा है | 

किसी के मनोमस्तिष्क पर प्रभाव तभी छोड़ा जा सकता है, जब आपके पास अच्छी वांग्मय सम्पदा हो, महाकाव्य हों, नाटक हों, आपके देश के बारे में अच्छी अच्छी पुस्तकें हों, तो आप प्रभाव डाल पायेंगे | यही सौम्य सम्पदा है | १९८९ में सोवियत रूस का अंत हुआ, तब तक रूस और अमरीका के मध्य जो शीत युद्ध चल रहा था, यह युद्ध उसके बाद समाप्त सा हो गया | उसके बाद विश्व मानस पर प्रभाव डालने के लिए विश्व में एक तरह की जीवन शैली की शुरूआत हुई | जैसे जैसे आर्थिक विकास बढ़ा, बैसे बैसे आर्थिक रूप से विक्सित देशों की छाया पूरे विश्व पर दिखाई देने लगी | हम देखते हैं कि आज विश्व का वेस्टर्नाईजेशन हो गया है | दूसरे शब्दों में कहें तो अमरीकिनाईजेशन हो गया है | आप कभी बीजिंग जाएँ, तो देखेंगे कि बीजिंग में भाषा के अलावा सब कुछ अमरीका जैसा है | या यूं कहा जाए कि बीजिंग शहर ऐसा प्रतीत होता है मानो मंडारिन अमरीका में आप आये हों | या आप तेल अबीब जाएँ तो वो भी एक हिब्रू अमेरिका है, ऐसा लगेगा | तो भाषा को अगर छोड़ दें तो अन्य सांस्कृतिक विशेषताओं को मिटाने का प्रयास चलता रहा, जिसके चलते थॉमस फ्राइडमेन नामक विचारक, लेखक, पत्रकार ने एक किताब लिखी द वर्ल्ड इज फ्लैट, अर्थात विश्व एक सरीखा बन गया, इसमें प्रादेशिक, भौगौलिक, सांस्कृतिक विशेषताओं का कोई अवसर ही नहीं रहा, कोई गुंजाईश ही नहीं रही, इस तरह का एक वातावरण बनता गया | ऐसी स्थिति में स्वाभाविक ही लोग अपनी अपनी संस्कृति के प्रति जागरुक हुए और उसकी विशेषताओं को बरकरार रखने हेतु सचेष्ट हुए | इसी प्रकार भारत की सॉफ्ट पॉवर के विषय में भी चर्चा आगे बढी | आज अगर यह कहा जाए कि भारत विश्व की सबसे बड़ी सौम्य सम्पदा रखने वाला देश है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी | दूसरे शब्दों में कहें तो सौम्य सम्पदा की दृष्टि से भारत विश्व की सुपर पॉवर है, यह आज की वास्तविकता है | 

भारतीय सौम्य सम्पदा की पहली विशेषता है कि भारत के प्रति विश्व में एक प्रकार का आकर्षण या कौतुहल है | उसका एक कारण यह भी है कि भारत पर आक्रमण हुए, किन्तु भारत कभी भी एक आक्रान्ता देश नहीं रहा | यह पृष्ठभूमि भारत के प्रति अन्य देशों में सदइच्छा पैदा करने में महत्वपूर्ण कारण बनती है, और यही हमारी सौम्य सम्पदा का एक महत्वपूर्ण पहलू है | दूसरी बात है कि हम एक स्प्रिचुअल डेमोक्रेसी हैं | हमने हमारे देश में कभी यह नहीं कहा कि केवल किसी एक धर्म मत के आधार पर आगे बढ़ सकते हैं | हमने हमेशा यही कहा कि एकं सद विप्रा बहुधा बदंति | यह एक ऐसी भूमिका है जो यह दर्शाती है कि हर मजहब हर पूजा पद्धति का मार्ग एक ही गंतव्य तक ले जाता है | यही हमारी आध्यात्मिक जनतांत्रिक गणतंत्र की आधार शिला है | अतः हमारा आध्यात्मिक जनतंत्र होना दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है, जो हमें सॉफ्ट पॉवर के रूप में प्रस्तुत करने में अनुकूलता निर्माण करता है | तीसरा है कि भारत एक ज्ञान आधारित समाज रहा है | हमारे यहाँ महाकाव्य निर्मित हुए, सैद्धांन्तिक चर्चाएँ हुईं, चाणक्य से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज, या लोकमान्य तिलक या महात्मा गांधी जी तक, इतने सारे मनीषियों ने जो भी विचार धाराएं रखीं, उसके आधार पर हमारे यहाँ एक ज्ञान सम्पदा का भी विकास होता गया | यही कारण है कि आज बहुत सारी विदेशी कंपनियों के सी ओ भी भारतीय हैं | सॉफ्ट पॉवर ही नहीं तो सॉफ्ट वेयर में भी हमने अपना प्रभाव छोड़ा है | व्हेनसोंग, फाह्यान, अलबेरुनी जैसे अनेक प्रवासी भारत में आये थे, तो भारत की इसी ज्ञान परंपरा को समझने के लिए आये थे | तो नोलेज सोसायटी के रूप में हमारी जो पहचान है, वह बहुत पहले से है और यह भी एक महत्वपूर्ण बिंदु हमारी सौम्य संपदा में बनता है | 

हमारी परिवार पद्धति भी एक विशेषता है, जबकि कई अन्य देशों में परिवार व्यवस्था चरमरा सी गई है | हमारे यहाँ जिस प्रकार व्यक्ति का समाज के साथ रिश्ता बनाया जाता है, उसके प्रति हमारी जो धारणाएं हैं, वह भी विशिष्टता पूर्ण है | हमारे यहाँ कोई भी व्यक्ति अपने आप को अकेला महसूस नहीं करता | यहाँ तक कि लोक डाउन के दौर में अकेले रहते हुए भी, उस तरह का अकेलापन महसूस नहीं करते | हमारे यहाँ हर रिश्ते के लिए अलग नाम है, चचेरा भाई, ममेरा भाई, सब कजिन ब्रदर नहीं हैं, हमारे यहाँ सभी आंटी नहीं हैं, कोई मासी हैं, कोई मामी हैं, कोई भुआ है, इसी तरह कोई फूफा है, कोई मामा है, तो इस प्रकार हमारे यहाँ व्यक्ति की व्यक्तिगतता का भी महत्व है, तो समाज के साथ उसका रिश्ता जोड़ने की खूबी भी हमें ज्ञात है | हमारी सामाजिक और पारिवारिक पद्धति भी हमारी सौम्य सम्पदा का एक बिंदु है | पांचवा बिंदु है हमारी सस्टनेबल लाईफ स्टाइल | संस्कारों को हमने अपनी संस्कृति का हिस्सा ही बना दिया है | प्रकृति के साथ संघर्ष या प्रकृति पर विजय पाने की भावना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ भी हम रिश्ता जोड़ते हैं | बृक्षों की भी पूजा करते हैं, नदी नालों की भी पूजा करते हैं, पहाड़ों की भी पूजा करते हैं, इस प्रकार हमारी संस्कृति के अन्दर प्रकृति के प्रति एक कृतज्ञता का भाव है | तो इस प्रकार मदर प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता भी हमारी सौम्य सम्पदा की एक विशेषता है | 

अब विषय आता है कि इस सौम्य सम्पदा के वाहक कौन ? यह सौम्य सम्पदा कैसे बढ़ती गई | पहले हैं हमारे महाकाव्य, रामायण, महाभारत आदि, जो विश्व के अन्य महाकाव्यों की तुलना में नाट्य व मानवीय संबंधों के गहन गंभीर चिंतन के कारण अधिक प्रभावी हैं | अतः हमारे ये महाकाव्य केवल भारत के ही नहीं बल्कि विश्व वांग्मय की धरोहर बन जाते हैं | दूसरा है हमारा इतिहास और हमारी परम्पराएं | हजारों वर्ष प्राचीन हमारी इस सभ्यता में कुछ तो ख़ास है - कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी | क्या है हममें जो कई अन्य सभ्यताएं नष्ट हो गईं, किन्तु भारतीय सभ्यता बनी रही | इसका मूल कारण है हमारी प्रथा, परम्पराएँ, आस्थाएं, विश्वास के विषय | इतिहास संस्कृति और परम्परा, ये हमारा दूसरा महत्वपूर्ण वाहक है, जिसके माध्यम से हमारी सौम्य सम्पदा विकसित होती रहती है | तीसरा महत्वपूर्ण विषय बस्तु है हमारा पारंपरिक ज्ञान | आयुर्वेद, योग, वैदिक गणित, संस्कृति, तो है ही आज तो इंडोलोजी नामसे एक शास्त्र ही विकसित हुआ है, जो प्राचीन भारत के विषय में अध्ययन करने वालों को एक ज्ञान की शाखा उपलब्ध करा देता है | 

जिस पद्धति से हम पहाड़े याद करते थे, उसके कारण हमारे यहाँ के लोगों का गणित, और गणित की पारंगतता किसी भी अन्य देश से अच्छी है | हमारे यहाँ का उच्चारण शास्त्र, व्याकरण शास्त्र, भी बहुत अलग किस्म का है, और इसलिए कई बार लोग कहते हैं कि भारत वासियों की अंग्रेजी भाषा पर पकड़ सबसे अच्छी रहती है | भाषा ज्ञान के बारे में, भाषा संरचना के बारे में, यह भी हमारी प्राचीन ज्ञान सम्पदा का अंग रहा है | इसलिए पारंपरिक ज्ञान सम्पदा हमारा तीसरा मुख्य वाहक है | 

चौथा है हमारे यहाँ की कलाएं | कलाओं में शास्त्रीय संगीत है, नृत्य में भरत नाट्यम – ओडिसी की विभिन्न मुद्राएँ – पदन्यास के पीछे भी एक सिद्धांत होता है – चिंतन धारा होती है, विभिन्न फाईन आर्ट्स – ललित कलाएं हैं, मूर्तिकला है, चित्रकला में मधुबनी चित्रशैली - राजस्थानी चित्रशैली - महाराष्ट्र के आदिवासियों की बारली पेंटिंग है, तो दक्षिण का अपना एक अलग ही अंदाज है | हमारी कलाओं को हम जीवन के साथ जोड़ते हैं, शिल्प कला, संगीत, नृत्य इन सबका सम्बन्ध हमने मनुष्य जीवन से जोड़ा है | इस तरह हमारी कलाएं भी एक प्रमुख वाहक हैं | 

पांचवा वाहक है हमारी पाक कला, हमारे व्यंजन | दुनिया में हर जगह भारतीय रेस्टोरेंट बहुत अच्छी तरह से बिजनेस करते दिखाई देते हैं | कहीं भी ऐसा नहीं होता कि भारतीय रेस्टोरेंट शुरू हुआ और चल नहीं पाया | मेक्सिको, मलेशिया, फिनलेंड, फिलीपींस, हर जगह भारतीय व्यंजन खिलाने वाले भारतीय रेस्टोरेंट मिल जायेंगे | इन व्यंजनों के प्रति लोगों का रुझान बढ़ता हुआ भी दिखता है | लोग भारतीय स्वाद और भारतीय खाद्य पदार्थों को बहुत पसंद कर रहे हैं, यह समझ में आता है | भारतीय खाद्य पदार्थों का आहार शास्त्र और पोषण तत्वों के साथ भी सम्बन्ध है, इस प्रकार एक परिपूर्ण आहार विज्ञान हमारे देश में विकसित हुआ था, यह पाक कला भी सौम्य सम्पदा का एक महत्वपूर्ण अंग है | 

अब सवाल यह है कि इस सौम्य सम्पदा का प्रभाव निर्माण करने के लिए हमें क्या करना चाहिए | यूं तो यह काम सरकार के माध्यम से होता है, सरकार के संस्कृति विभाग, भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद द्वारा कई छात्रों को छात्रवृत्तियाँ दी जाती हैं, वे चाहें बांगलादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान के हों, भारत में आकर पढ़कर जाते हैं, तो अपने देश में एक प्रभाव निर्माण करते हैं | इनमें से कई लोग अपने देशों में राष्ट्राध्यक्ष, प्रधान मंत्री, या अन्य किसी महत्वपूर्ण पद पर भी पहुंचे हैं | तो इस प्रकार अपने यहाँ की सौम्य सम्पदा का प्रभाव इस प्रकार हम निर्माण कर सकते हैं | सरकारी तौर पर तो इस प्रकार चलता रहता है, लेकिन नागरिक के नाते हमें क्या सोचना और करना चाहिए | तो सबसे महत्वपूर्ण है भारत में आने वाले पर्यटकों विदेशी छात्रों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए | वे लोग भारत के विषय में एक अच्छी छवि लेकर अपने देश में वापस जाएँ, इसकी हमें कोशिश करनी चाहिए | उनके प्रति हमारा व्यवहार अच्छा, नम्रतापूर्ण और उनको सम्मान देने वाला होना चाहिए | क्योंकि वे अपने देश में भारत की छवि लेकर जायेंगे, मत बनाकर जायेंगे | वह मत बुरा न हो, नकारात्मक न हो, बल्कि सकारात्मक हो, अच्छा हो, इसको सुनिश्चित करने का काम केवल सरकार के भरोसे रहकर नहीं हो पायेगा | कई बार टूरिस्टों को अन्याय अत्याचार का सामना भी करना पड़ता है, कभी उनका सामान चोरी हो जाता है, महिलाओं को तकलीफ होती है, यह सारी चीजें न हों, इसकी चिंता करना, समाज में इसके लिए एक आग्रह पैदा करना, यह सब हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है | दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि हमारे विदेश में रहने वाले भाई बहिन, उनमें भी इसके प्रति एक आग्रह निर्माण करने की आवश्यकता है | ये एनआरआई जैसा व्यवहार उस देश में करेंगे, उसके आधार पर भारत के प्रति वहां के लोगों का आंकलन बनेगा | इसलिए विदेश में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोगों पर भी यह दायित्व है कि वे अपने स्तर पर भारतीय सौम्य सम्पदा की वृद्धि में अपना योगदान दें | कमसेकम हानि न करें, अगर बढ़ा न सकें तो | 

२०१४ के बाद नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने कई सारे कदम उठाये हैं, जिनके कारण भारतीय सौम्य सम्पदा में लगातार वृद्धि होती दिखाई देती है | जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की स्थापना हुई, सभी देशों ने उसे स्वीकारा व उसे मनाना शुरू किया, वह उल्लेखनीय सफलता है | रामायण गीता आदि महाकाव्य, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्र नाथ टैगोर, महात्मा गौतम बुद्ध, जेसे मनीषियों के प्रभाव की स्थिति भी भारतीय सौम्य संपदा के लिए अनुकूल बन जाती है | इन सारी बातों को समझाने की क्षमता हमारे अन्दर आनी चाहिए, ताकि किसी विदेश के व्यक्ति के मन में अगर इसके प्रति कौतुहल हो, तो उसका समाधान करने की स्थिति में हम आयें | हमारी भूमिका बसुधैव कुटुम्बकम की है | हम तो पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हैं, मगर यह भावना हमारे व्यवहार में अभिव्यक्त भी होना चाहिए | विश्व में जो कुछ चल रहा है, एक कार्यकर्ता के नाते उसका अध्ययन भी होना चाहिए, हमें पता होना चाहिए कि अन्य देशों में क्या हो रहा है, हमारे पडौसी देश, जिनमें जनतंत्र नहीं है, बहां पर क्या हो रहा है, यूनाईटेड नेशंस में क्या हो रहा है, इन सब बातों का आंकलन करने की अगर आदत डाल ली, तो हम भी अपने स्तर पर सौम्य सम्पदा में योगदान दे पायेंगे | दुनिया भर के पत्रकारों या बुद्धिजीवियों को भारत के बारे में बहुत कम जानकारी है - सतही तो होती है, लेकिन गहराई से नहीं होती | भारत के लोगों की प्रथा, परंपरा, प्रकृति प्रवृति का आंकलन जो होना चाहिए, वह नहीं होता | इसे बढाने का काम केवल सरकार नहीं कर सकती | इसमें भी हमें योगदान देना चाहिए | सोशल मीडिया के माध्यम से, अपने लेखों के माध्यम से, अपनी वाणी और विचारों के माध्यम से, हमें भारत के विषय में विश्व समुदाय का आंकलन बढाने का प्रयास करना चाहिए | भारत के प्रति कौतुहल रखने वाला बहुत बड़ा समुदाय है, सदिच्छा रखने वाला भी लगभग उतना ही बड़ा समुदाय है, लेकिन भारत को समझने वाले वैश्विक समुदाय की संख्या सीमित है और इसलिए भारत के प्रति उनकी समझ विकसित करना हम सबका दायित्व बनता है | जितना और जैसा अपने स्तर पर हम कर पायेंगे, उतना ही भारतीय सौम्य संपदा में अपना भी छोटा बड़ा योगदान हो पायेगा | 

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