रामजन्मभूमि को समस्या बनाने वाले भी नेहरू ही थे !

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के के नायर अर्थात कंडांगलथिल करुणाकरण नायर के संकल्प का नतीजा है राम मंदिर  राम मंदिर निर्माण करोड़ों लोगों की कड़ी तपस्या, मेहनत, चुनौती और...


के के नायर अर्थात कंडांगलथिल करुणाकरण नायर के संकल्प का नतीजा है राम मंदिर 

राम मंदिर निर्माण करोड़ों लोगों की कड़ी तपस्या, मेहनत, चुनौती और संघर्ष के कारण संभव हो पाया है | आईये आज हम उस इंसान को स्मरण करें, जिसने राम मंदिर निर्माण के लिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आदेश को भी ठेंगा दिखा दिया | जबकि वो महज एक जिला मजिस्ट्रेट था, एक शासकीय कर्मचारी नाम था के के नायर | जब पूरा देश श्री राम लला के जन्मभूमि मन्दिर शिलान्यास के जश्न में डूबा हुआ है, तब के.के नायर का नाम याद किए बिना नहीं रहा जा सकता । 

उस शख्सियत यानी के के नायर का संघर्ष वाकई अमूल्य है, क्योंकि केरल में पैदा होने वाले कंडांगलथिल करुणाकरण नायर ने राम मंदिर निर्माण के लिए वर्ष 1949 में ही पूरी कांग्रेस और देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से दुश्मनी मोल ली | अयोध्या के DM पद की नौकरी चली गई, लेकिन वो कभी रुके नहीं | 

राम मंदिर निर्माण के लिए कई कारसेवकों ने अपने प्राणों की आहूति दे दी | हर किसी की सिर्फ यही चाहत थी कि रामलला तंबू में नहीं, बल्कि भव्य मंदिर में विराजमान हों | यह सपना अब साकार होने जा रहा है | के के नायर ने इस सपने को साकार करने में काफी अहम भूमिका निभाई, उन्होंने राजनीतिक दबावों को ठेंगा दिखाते हुए अपनी नौकरी को त्याग दिया और काफी संघर्ष किया | 

11 सितंबर 1907 को केरल के एलेप्पी में जन्मे के के नायर मद्रास में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद इंग्लैंड चले गए और 1930 में महज 21 वर्ष की आयु में ही उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा क्लीयर कर ली | इसके बाद 1 जून सन् 1949 को उन्हें अयोध्या (फैजाबाद) के उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त किया गया | मानो राम लला ने उनको स्वयं फैजाबाद बुलाया हो। उनके कलेक्टर रहते हुए ही रात्रि में इस स्थान पर रामलला का प्राकट्य हुआ और अगले दिन शुभ प्रातः काल बड़ी संख्या में भक्तों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ तथाकथित बाबरी मस्जिद(वास्तविक राम जन्म भूमि) पर रामलला का दर्शन करने के लिए एकत्र होने लगी। वास्तव में उसी रात सबसे बड़ा शिलान्यास हुआ था । 

भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत और उप्र के गृह मन्त्री लाल बहादुर शास्त्री को कहा कि किसी भी स्थिति में रामलला की प्रतिमा उस स्थान से तत्काल हटा दी जानी चाहिए। और नतीजा यह हुआ कि नियुक्ति के तुरंत बाद के के नायर को यूपी सरकार की तरफ से एक पत्र मिला, जिसमें उन्हें राम जन्मभूमि मुद्दे पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था | कलेक्टर के रूप में नायर ने तथ्य जानने के लिए अपने सहायक को भेजा, जिनका नाम गुरु दत्त सिंह था | गुरु दत्त सिंह ने 10 अक्टूबर 1949 को अपनी रिपोर्ट के जरिए राम मंदिर निर्माण की सिफारिश कर दी | 

गुरु दत्त सिंह ने लिखा, "हिंदू समुदाय ने इस आवेदन में एक छोटे के बजाय एक विशाल मंदिर के निर्माण का सपना देखा है. इसमें किसी तरह की परेशानी नहीं है. उन्हें अनुमति दी जा सकती है. हिंदू समुदाय उस स्थान पर एक अच्छा मंदिर बनाने के लिए उत्सुक है, जहां भगवान रामचंद्र जी का जन्म हुआ था. जिस भूमि पर मंदिर बनाया जाना है, वह नजूल (सरकारी भूमि) है." 

लेकिन गुरुदत्त सिंह की वह सिफारिश रद्दी की टोकरी में डाल दी गई और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी तुष्टीकरण नीति के अनुरूप उत्तर प्रदेश के तत्कालीन CM गोविंद वल्लभ पंत को निर्देश दिया कि वे मूर्तियाँ पूजा स्थल से हटाई जाएँ | स्वाभाविक ही सीएम पंत ने हिंदुओं को राम मंदिर से बेदखल करने की कोशिश की | लेकिन के के नायर अड़े रहे और सीएम के फैसले को भी स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया | उन्होंने मूर्तियों को वहां से हटाने से ये कहकर मना कर दिया कि हिंदू उस स्थल पर पूजा कर रहे हैं | नायर के इस रवैये को देखते हुए सीएम गोविंद वल्लभ पंत ने उन्हें जिला मजिस्ट्रेट के पद से निलंबित कर दिया | 

जिसके बाद के के नायर ने उस वक्त की कांग्रेस सरकार के खिलाफ अदालत का रुख किया और इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरफ से सरकार को तगड़ा झटका लगा | कोर्ट ने नायर के पक्ष में फैसला सुनाया और नायर को उनका पद वापस मिला, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया | निश्चित तौर पर इसके पीछे की वजह नेहरू के खिलाफ नाराजगी थी. 

नेहरू के रवैये और के के नायर के साहस को देखते हुए लोग उनके मुरीद हो गए | हिन्दुओं की आस्था का सम्मान करने वाले के के नायर ने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया और वो देखते ही देखते वो लाखों लोगों के प्रिय हो गए | उनके व्यवहार के चलते लोग उन्हें "नायर साहब" पुकारने लगे | 

के के नायर ने उस वक्त ICS पद से इस्तीफा देने के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट से एक वकील के रूप में अभ्यास करना शुरू कर दिया | बाद में पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल जी के संपर्क में आने के बाद, नायर साहब और उनका परिवार अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जनसंघ में शामिल हो गए | वर्ष 1952 में उनकी पत्नी शकुंतला नायर ने उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्य के तौर पर चुनाव में विजय हासिल की | 1962 में वे स्वयं बहराइच से भारतीय जनसंघ के टिकट पर सांसद चुने गए और उनकी पत्नी शकुंतला नायर कैसरगंज से सांसद चुनी गई | यहाँ तक कि उनका ड्राइवर भी विधायक चुना गया। आपातकाल के काले दिनों के दौरान नायर साहब और उनकी पत्नी शकुंतला नायर को भी गिरफ्तार किया गया था | जब 1986 में राम जन्मभूमि का ताला खोला गया तब जिन लोगों ने भी रामलला के दर्शन किए, उन्हें स्मरण है कि रामलला की प्रतिमा के बगल में के के के नायर की एक फोटो रखी थी और दीवाल पर लिखा था जब तक राम लला का नाम रहेगा के के के नायर तेरा नाम इतिहास में अमर रहेगा। भगवान श्री राम के कट्टर भक्त जिसने अपनी आईसीएस की नौकरी तक की परवाह नहीं की ऐसे कृष्ण करुणा कर नायर को श्रद्धा सुमन और कोटिशः नमन। 

7 सितंबर 1977 को केके नायर ने दुनिया को अलविदा कह दिया | नायर साहब ने अपना पूरा जीवन राम मंदिर के लिए समर्पित कर दिया | नायर साहब ने जो कुछ भी किया उसके चलते ही आज ये राम मंदिर का सपना साकार हो रहा है | के के नायर रामजन्म भूमि आंदोलन के स्टार्टर थे, जिसे लालकृष्ण आडवाणी, अशोक कुमार, कल्याण सिंह, विनय कटियार और उमा भारती जैसे बड़े नेताओं ने बाद में गति दी | नायर साहब के योगदान को कभी भूला नहीं जा सकता है, क्योंकि उनके प्रारंभिक संघर्ष का ही नतीजा है कि सैकड़ों वर्षों बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का स्वप्न साकार होने जा रहा है | 

साथ ही यह भी स्मरणीय है कि जिस प्रकार कश्मीर समस्या के जन्मदाता के रूप में जवाहरलाल नेहरू को जाना जाता है, उसी प्रकार राम जन्म भूमि को अकारण समस्या बनाने वाले भी नेहरू ही थे, अन्यथा तो १९४९ के उस दौर में ही गुरुदत्त सिंह की रिपोर्ट के बाद रामजन्मभूमि मंदिर का मार्ग प्रशस्त हो गया होता |

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क्रांतिदूत: रामजन्मभूमि को समस्या बनाने वाले भी नेहरू ही थे !
रामजन्मभूमि को समस्या बनाने वाले भी नेहरू ही थे !
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