सह्याद्री के सिंह छत्रपति शिवाजी महाराज भाग 1

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पिता श्री शाह जी  चौदहवीं शताब्दी में जब मुसलमानों ने दक्षिण को जीता, तब यहाँ की योद्धा जातियों में अलग अलग नायकों के छोटे छोटे दल संगठित हो...


पिता श्री शाह जी 

चौदहवीं शताब्दी में जब मुसलमानों ने दक्षिण को जीता, तब यहाँ की योद्धा जातियों में अलग अलग नायकों के छोटे छोटे दल संगठित हो गए, जो कभी तो मुसलमानों से जूझते तो कभी धन लेकर उनकी सहायता करते | ऐसा ही एक घराना पूना प्रान्त के पाटस के मल्लू जी भोंसले का था | वे देशल ग्राम में रहते थे और दो गाँवों में पटेली करते थे, स्वयं की खेतीबाड़ी भी संभालते थे| मल्लू जी का विवाह एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ और उनका साला जयपाल अपने समय का बड़ा लडाका माना जाता था | मल्लू जी के ही बड़े पुत्र थे शाहजी | मल्लू जी एक बार अपने बेटे शाहजी के साथ अपने एक पुराने मित्र जादोराय से मिलने उनके निवास स्थान पर गए | जादोराय निजामशाही में दस हजारी जागीरदार थे | उसी समय जादोराय की बेटी शाहजी के पास आकर बैठ गई | जादोराय ने दोनों बच्चों को देखकर हंसकर कहा – “अच्छी जोडी है, क्यों बेटी इस लडके से शादी करेगी ?” 

यह सुनते ही मल्लू जी तपाक से वहां उपस्थित लोगों से बोले – देखो भाईयों जादोराय ने अभी अभी सबके सामने अपनी कन्या का वाग्दान मेरे पुत्र से कर दिया है, अब यह शाहजी की हुई | 

लेकिन इस बात पर जादोराय बिगड़ खड़े हुए, बोले हँसी मजाक की बात को इतनी गंभीरता से लेने की क्या जरूरत है | वे अपने मित्र की हैसियत को अपने बराबर नहीं मानते थे | इसके बाद दोनों दोस्तों के संबंधों में खटास आ गई | लेकिन कुछ समय बाद स्थिति बदल गई | मल्लू जी को अपने खेत में गडा धन मिल गया, जिससे उन्होंने कुछ घोड़े और हथियार खरीद लिए और वे भी निजामशाही में पांच हजारी मनसबदार बन गए | अब मल्लू जी और जादोराय दोनों ही मित्र अहमदनगर के दरबारी थे, अतः संबंध सामान्य होते गए और अंततः शाहजी का विवाह जादोराय की बेटी जीजाबाई से हो गया, और शीघ्र ही उनके यहाँ प्रथम संतान शम्भाजी का जन्म हुआ | 

मल्लू जी के स्वर्गवास के बाद शाह जी को अहमदनगर दरबार में अपने पिता के समान ही अधिकार व जागीर मिली | शीघ्र ही शाहजी ने अपनी हिम्मत और होंसले से अपना रुतबा और बढ़ा लिया | उन दिनों अहमदनगर दिल्ली की मुग़ल सल्तनत के अधीन नहीं था और बादशाह जहाँगीर दक्षिण विजय की धुन में था | एक एक कर अब्दुल रहीम खानखाना, शहजादा परवेज, गुजरात का सूबेदार अब्दुल्ला आये किन्तु बजीर मलिक अम्बर ने अपने मराठा सहायकों के साथ उन्हें पराजित कर वापस जाने को विवश किया | अंत में शहजादा खुर्रम ने १६२० में बड़ी सेना के साथ आक्रमण किया | शाहूजी और उनके श्वसुर लक्खू जी जादोराय ने मलिक अम्बर के नेतृत्व में इस युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई | मुग़ल सेनापति खानजहाँ ने समझ लिया कि अहमद नगर की असली ताकत शूरवीर मराठा सरदार हैं, अतः उसने उन्हें अपने साथ मिलाने की चेष्टा की | शाहू जी के श्वसुर जादोराय ने उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और उन्हें बदले में बड़ी जागीरें मिलीं किन्तु शाहजी अपनी पुरानी सरकार के साथ ही रहे | अब श्वसुर और जमाई युद्ध के मैदान में एक दूसरे के सामने थे | परिणाम यह हुआ कि शाहजी और उनकी पत्नी जीजाबाई के बीच भी दूरियां बढ़ने लगीं | ऐसी विषम परिस्थिति में १६२७ में जुन्नर शहर के पास शिवनेर के एक पहाडी किले में शिवाजी का जन्म हुआ | 

१६२८ में जहाँगीर के बाद शाहजहाँ बादशाह बना तो उसने दक्षिण में अपने सेनापति खानजहाँ को वापस बुलाना चाहा, किन्तु खानजहाँ ने निजाम की शरण ले ली | उसे पकड़ने आई सेना को शाहजी ने अपने हिन्दू सरदारों के साथ खदेड़ दिया | किन्तु जब क्रुद्ध बादशाह ने खुद दक्षिण पर चढ़ाई की, तो भयभीत खानजहाँ भाग खड़ा हुआ, तथा सेनापति मलिक अम्बर की भी मृत्यु हो गई, तो शाहजी ने भी अपनी सेवाएँ शाहजहाँ को समर्पित कर दीं | शाहजहाँ ने उन्हें नया मनसब और जागीरें प्रदान कर दीं | लेकिन जब कुछ समय बाद मलिक अम्बर के बेटे फतह खान ने निजाम को क़त्ल कर शाहजहाँ से संधि कर ली तो शाहजी का मन दोनों से खट्टा हो गया और उन्होंने शाहजहाँ और अहमदपुर दोनों को छोड़कर बीजापुर के आदिलशाह की अधीनता स्वीकार कर ली | आदिलशाह ने उनकी पूरी आवभगत की | अपनी पत्नी से प्रथक रह रहे शाह जी ने १६३० में दूसरा विवाह कर लिया | 

मुस्लिम शासकों में यह उठापटक का दौर था | फतह खां ने मुग़ल सेनापति महाबत खां के साथ मिलकर बीजापुर की राजधानी दौलताबाद पर चढ़ाई कर दी | शाहजी ने इस युद्ध में बड़ी वीरता प्रदर्शित की, अतः बीजापुर और फतहखां की संधि के बाद उनका कद और बढ़ गया | एक बात ध्यान देने योग्य है कि उत्तर में दिल्ली सल्तनत जहाँ तुर्क, तातार और पठान जैसे विदेशी ताकतों की दम पर थी, तो दक्षिण में आदिल शाही और क़ुतुब शाही स्थानीय मराठों के सहयोग पर स्थित थी | यही कारण है कि लगातार दिल्ली और दक्षिण के मुस्लिम शासकों में भी लगातार संघर्ष चलता रहा | इसी का उदाहरण है कि महत्वाकांक्षी फतह खां ने बीजापुर से संधि के बाद महाबत खां पर आक्रमण कर दिया | परन्तु फतह खां को मुंह की खानी पडी और महाबत खां ने उसे कैद कर अहमद नगर राज्य का मुग़ल साम्राज्य में विलय कर लिया | इतना ही नहीं तो शाहजी की पत्नी जीजाबाई और छः वर्षीय बालक शिवाजी को भी कब्जे में कर लिया | किन्तु शीघ्र ही मराठों ने इन दोनों को मुक्त करा कर कोंडाना दुर्ग में पहुंचा दिया | जिस उम्र में बालक खेलकूद में व्यस्त रहते हैं, बालक शिवाजी मुगलों की कैद में रहे, उनके मानस पर यह छाप आजीवन दिखाई देती है | इसी दौरान शाहजी ने मौका पाकर अहमदनगर के शाही खानदान के एक अल्पबयस्क बालक को गद्दी पर बैठाकर पूना से बालाघाट तक के सारे प्रदेश पर अधिकार कर लिया और जुन्नर शहर को राजधानी बनाकर बालक सुलतान के नाम पर शासन करना शुरू कर दिया | क्रुद्ध शाहजहाँ ने ४० हजार के सैन्यदल के साथ शाइस्ता खां और अलीबर्दी खां को दक्षिण भेजा | बीजापुर और शाहजी ने तीन वर्ष तक उनका प्रतिकार किया, किन्तु जब बीजापुर ने शाहजहाँ से संधि कर ली, तो शाहजी भी बालक सुलतान को मुगलों के हवाले कर पुनः बीजापुर के आदिल शाह के दरबार में पहुँच गए | अब उनके पास पूना के अतिरिक्त कुहार, रूसकटी, बंगलौर, बालापुर, सूबा भी उनके अधीन थे, बरार के २२ गाँवों की देशमुखी भी उन्हें मिल गई | बहुत सी जागीर और इलाका पाने के बाद शाहजी किसी राजा की तरह रहने लगे | 

इतना सब होने के बाद शाह जी ने पहली बार अपने दस वर्षीय पुत्र शिवाजी को देखा और प्रसन्न मन से उनका विवाह भी किया | लेकिन पत्नी जीजाबाई उपेक्षित ही रहीं, इसका प्रभाव उनके मन पर गंभीर हुआ और वे अंतर्मुखी होकर ईश आराधना में तल्लीन रहने लगीं | कुछ समय बाद ही बीजापुर की ओर से नए प्रदेश जीतने शाह जी बड़े पुत्र शम्भाजी और अपनी दूसरी पत्नी के साथ मैसूर की ओर प्रस्थान कर गए | मां जीजाबाई और दादा कोंडदेव ने ही शिवाजी की परवरिश कर उन्हें सुसंस्कारित और सामर्थ्यवान बनाया | घुड़सवारी, शिकार और युद्ध कला में निष्णात शिवाजी को पौराणिक कहानियाँ और धार्मिक आख्यान सुना सुनाकर मां जीजाबाई ने उन्हें एक कट्टर धर्मनिष्ठ बना दिया | सह्याद्री पर्वत श्रंखला की तलहटी में निवास करने वाले जो मावले किसान थे, उनके तरुण पुत्र ही अब शिवाजी के मित्र थे | धार्मिक भावना, कष्ट सहिष्णुता और चारित्रिक द्रढता के साथ स्वातंत्र्य प्रेम की भावना – यही थी जीजाबाई की छत्रछाया में परवान चढ़े बालक शिवा की पहचान | 

शिवाजी के प्रारंभिक पराक्रम और भवानी का प्रसाद 

शिवाजी के किशोरावस्था की दो घटनाएँ सर्वाधिक चर्चित हैं | पहली तो बीजापुर दरबार से सम्बंधित है और दूसरी उनकी गौ भक्ति की | हुआ कुछ यूं कि मुरारजी पन्त ने आकर माँ जीजाबाई को शाहजी की इच्छा बताई कि उनकी इच्छा शिवाजी को बीजापुर दरबार दिखाने और उन्हें शाह से मिलवाने की है | पहले तो शिवाजी तैयार ही नहीं हुए, किन्तु फिर मां जीजाबाई के और दादा कोंडदेव के समझाने पर दरबार में गए | लेकिन यह क्या ? दरबार में जाकर उन्होंने पहले तो अपने पिता को प्रणाम निवेदन किया और फिर हाथ जोडकर शाह को नमस्कार किया | दरबार में सनाका छा गया | एक बित्ते भर का छोकरा और इतनी हिमाकत | ना कोई कोर्निश और न कोई मुजरा, यह तो सरासर बादशाह सलामत की तौहीन है | 

बादशाह ने रोष पूर्वक शाह जी से कहा, शिवा से पूछो कि इसने दरबारी अदब से कोर्निश क्यूं नहीं की ? 

शाहजी पूछते इसके पहले ही शिवाजी बादशाह की तरफ उन्मुख होकर बोले – मैं जैसे अपने पिता को प्रणाम करता हूँ, बैसे ही मैंने आपको किया है, क्या आप मेरे पिता तुल्य नहीं हैं ? 

बादशाह हंस पड़े और शाह जी से बोले लड़का होनहार है | यह स्पष्ट है कि शिवाजी ने उस समय भले ही पिता की इच्छा का मान रखते हुए बादशाह के दरबार में हाजिरी दे दी हो, लेकिन वे बेमन से ही वहां गए थे | जल्द ही उनका एक और कारनामा सामने आ गया | हुआ कुछ यूं कि एक दिन जब शिवाजी बाजार में घूम रहे थे, उन्होंने देखा कि एक मुस्लिम कसाई एक गाय को बेदर्दी से खींचता हुआ बधशाला की ओर ले जा रहा था | गाय जोर जोर से रंभा रही थी, करूण निगाहों से चारों ओर देख रही थी, कि शायद कोई उसकी जान बचा ले | लेकिन मुस्लिम शासकों के राज्य में कौन उसकी मदद करता, आसपास के दुकानदार निगाहें नीची किये हुए देखकर भी अनदेखा कर रहे थे | शिवाजी आगे बढे और कसाई से कहा गाय छोड़ दो | कसाई क्यूं सुनने लगा, बोला – जा जा अपना काम कर | वह गाय को खींचते हुए आगे बढ़ता रहा और शिवाजी ने अपना काम कर दिया | शिवाजी ने म्यान से तलवार निकाली और मानो कोई बिजली चमकी हो, एक ही वार से कसाई का वह हाथ काट डाला, जिस से वह गाय को खींच रहा था | गाय मुक्त होकर वहां से भाग खडी हुई | 

समाचार बादशाह तक पहुंचा और उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया | पहले दरबार में बेअदबी और अब यह गुस्ताखी | शाहजी ने जैसे तैसे माफी मांगकर बादशाह का गुस्सा शांत किया और दादा कोंडदेव की सरपरस्ती में शिवाजी को अपनी जागीर पूना पहुंचा दिया | अब दादा कोंडदेव पर एक साथ तीन जिम्मेदारियां थीं | पहली जिजाबाई और शिवाजी की रक्षा, दूसरी जागीर का बंदोबस्त और तीसरी शिवाजी की उचित शिक्षा दीक्षा | दादा ने तीनों जिम्मेदारियां बखूबी निभाईं | उन्होंने जीजाबाई और शिवाजी के रहने के लिए भवन निर्माण करवाया, उसे नाम दिया लाल महल | दादा ने शिवाजी को राज्य प्रबंध, धर्मशास्त्र, युद्ध कौशल की अच्छी शिक्षा दी, वे कहा करते थे – हमारा शिव साक्षात शिव का अवतार है, भवानी का वरद पुत्र है | दादा और मां की शिक्षा दीक्षा का असर कहें या विधि द्वारा निर्धारित उनकी भूमिका कि युवा होते होते शिवाजी के दिलो दिमाग में लक्ष्य स्पष्ट होता गया, आँखों में बसता गया हिन्दवी स्वराज्य का सपना | उस समय घटित घटनाएँ भी इसमें प्रमुख कारण बनीं | उनके नाना अर्थात माँ जीजाबाई के प्रतापी पिता जाधोराय और उनके पुत्रों को एक दिन सुलतान ने भरे दरबार में क़त्ल करवा दिया, कुछ समय बाद एक अन्य बहादुर मराठा सरदार मुरार जगदेव की अकारण जीभ कटवा दी | इन अन्यायों और अत्याचारों ने माँ जिजाबाई और किशोर शिवाजी के मनो मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला और शिवाजी ने शुरू किया सुयोग्य साथियों का चयन | एक बानगी देखिये – 

एक बार अंधेरी रात में अपने सहयोगी के साथ जंगल के मार्ग से जाते समय किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी | नजदीक जाकर देखा तो एक नौजवान घायल पड़ा है और उसके आसपास आठ दस मुस्लिम सिपाहियों की लाशें पडी हैं | युवक को पानी पिलाया और पूछा तो मालूम हुआ कि अपनी बहिन को उसकी ससुराल से विदा कराकर युवक अपने गाँव लौट रहा था, तभी सौ से अधिक सिपाहियों ने इन्हें घेर लिया और बलपूर्वक बहिन का अपहरण कर ले जाने लगे | इन चार लोगों ने प्राणपण से उसे बचाने का प्रयास किया, कई सिपाहियों को मार भी दिया, किन्तु बहिन को नहीं बचा पाए, वे लोग उसे उठा ले गए | यह आये दिन की बात थी, हिन्दुओं की बहिन बेटियों की यही दुर्दशा थी | शिवाजी की आँखों में खून उतर आया, उस नौजवान से पूछा, अब आगे क्या सोचा है | नौजवान ने जबाब दिया, जब तक जियूँगा बदले की आग दिल में धधकती रहेगी, बहिन का बदला जरूर लूंगा | शिवाजी ने उसे पहले उसके गाँव उसके घर पहुँचाया और चलते चलते कहा, बात अकेली तुम्हारी बहिन की नहीं है, हर बहिन बेटी सुरक्षित होना चाहिए, यह तभी होगा जब मुस्लिम सल्तनत को उखाड़ फेंका जाए, यही हमारा लक्ष्य है | हम जानते हैं यह आसान नहीं है, लेकिन अगर सब हिन्दू संगठित हो जाएँ तो कुछ भी कठिन भी नहीं है | अकेले की दम पर कोई कुछ नहीं कर सकता | अगर बात जमे तो ठीक होने के बाद आकर मिलना | वह नौजवान न केवल वापस लौटा, बल्कि जीवन भर के लिए शिवाजी का हो गया, उसका नाम था तानाजी मौलसरे ! 

शिवाजी ने तानाजी को प्रशिक्षण के लिए शस्त्र विद्या के प्रकांड आचार्य हरिनाथ स्वामी जी के आश्रम में भेजा, जहाँ स्वामी जी ने तानाजी को तराश कर प्रचंड योद्धा बना दिया | इसी प्रकार एक एक कर ध्येय निष्ठ व समर्पित साथियों की टोली बनती गई, बढ़ती गई | येशाजी कंक, बाजीप्रभु पारूलकर और तानाजी सहित सभी तरुणों के ह्रदय में भी शिवाजी ने अपने समान ही स्वतंत्रता की लौ प्रज्वलित की | मुस्लिम शासकों के अत्याचारों से त्रस्त लोगों की कमी नहीं थी, उन शोषित पीड़ित आमजनों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया शिवाजी ने | जीत के लिए जीत का भरोसा जरूरी है और यह भरोसा जगाया शिवाजी ने | उसके लिए जरूरी थी जयेशणा, हर हाल में जीत की दृढ इच्छा | हम देखते हैं कि राजस्थान के राजपूतों में वीरता की कमी नहीं थी, लेकिन उनका आत्माभिमान उन्हें विजय की अपेक्षा आत्माहुति की ओर प्रेरित करता था | हम पीठ नहीं दिखाएँगे भले ही जान चली जाए, हम शत्रु पर भी धोखे से वार नहीं करेंगे, भले ही शत्रु चाहे जितने छल फरेब करता रहे, इस नीति ने उन्हें व्यक्तिगत महान की पंक्ति में भले ही खड़ा कर दिया, विजेता नहीं बनाया | शिवाजी ने विजय को प्रमुखता दी और आम जन में जीत का भरोसा जगाया, उनकी सफलता का यही मूल मन्त्र था | 

उनका लक्ष्य था हिन्दवी स्वराज्य, इसके लिए पहले जरूरी लगा कोई किला हाथ में होना चाहिए, तो उन्नीस वर्षीय शिवाजी ने १६४६ में स्वतंत्रता की पहली हुंकार भरी और पुणे से बीस मील पश्चिम में स्थित तोरणा के किले पर कब्जा कर लिया | किले के खजाने में रखे बीस लाख हूण शिवाजी के हाथ लगे | सूझबूझ दिखाते हुए उन्होंने बीजापुर दरबार में बकील भेजा और कहलवाया कि यह कदम राज्य के हित में उठाया है और अब पहले से दो गुना लगान भेजा जाएगा | बुजुर्ग शाह खुश हो गया | इसके बाद प्राप्त धन से उन्होंने तोरणा से पांच मील पूर्व में पहाडी पर एक नया किला बनवाया, उसे नाम दिया राजगढ़ और वहीं से अपनी गतिविधियाँ संचालित करने लगे | लेकिन यह तो शुरूआत थी, जल्द ही उन्होंने कोंडाना किला भी अपने अधिकार में ले लिया, विरोध पर आमादा अपने सौतेले मामा को गिरफ्तार कर उससे सोमा जिला कब्जा लिया और सिंहगढ़, पुरंदर और कल्याण किले भी जीत लिए | रोग शैया पर पडा आदिलशाह अब आपे से बाहर हो गया और उसने शिवाजी के विरुद्ध अभियान शुरू किया | 

जिस समय बीजापुर की सेना तोरण दुर्ग पर धावा बोलने आ रही थी उस समय सेनापति तानाजी और महाराज शिवाजी के बीच वार्तालाप चल रहा था | दुर्ग की मरम्मत पूरी नहीं हुई है, पर्याप्त शस्त्रास्त्र भी नहीं है, सैनिकों को देने के लिए एक मुट्ठी चना भी नहीं है, कैसे होगा मुकाबला | यह चर्चा चल ही रही थी, कि उसी समय एक फ्रांसीसी मिलने आया और उसने प्रस्ताव रखा कि उसके पास पचास छोटी विलायती तोपें, पांच हजार बंदूकें और इतनी ही तलवारें हैं | वह दस लाख रुपये में इन सबको दे सकता है | 

महाराज ने कुछ विचार किया और फिर दूसरे दिन उत्तर देने का कहकर उसे अतिथि शाला में ठहरा दिया | तानाजी ने पूछा, लेकिन महाराज खजाना तो खाली है, इसे मूल्य देंगे कहाँ से ? महाराज भी चिंतित स्वर में बोले सुबह देखेंगे | सेना को तैयार होने का हुकुम दो, कल धावा बोलना है | 

दूसरे दिन सुबह जब तानाजी पूछने पहुंचे कि सेना तैयार है, धावा कहाँ बोलना है, उस समय महाराज शिवाजी धीर गंभीर स्वर में बोले – रात को माता भवानी का आदेश हुआ है, धावा बाद में, पहले मंदिर के पीछे खुदाई करवाओ | तत्काल आदेश का पालन हुआ | देखते ही देखते गहरा गड्ढा हो गया, बगल में मिट्टी का ढेर लग गया, एक बेलदार बोला – महाराज नीचे एक पटिया है, जिसमें लोहे का कुंदा लगा हुआ है | पटिया हटाई गई, सामने आईं नीचे जाने को सीढियां | ताना जी सबसे पहले नीचे उतरे | वापस आकर कपड़ों से धूल झाड़ते हुए घन गर्जना की – महाराज शिवाजी की जय | उपस्थित समूह ने भी स्वर में स्वर मिलाया | महाराज ने पूछा – क्या मिला ? उत्तर मिला भवानी का प्रसाद, चालीस देगों में भरे रत्न, मुहरें और चांदी के सिक्के | 

तानाजी ने एक बार फिर पूछा अब धावा कहाँ बोलना है, सेना तैयार है | 

महाराज मुस्कुराए अब कहीं नहीं, तैयारी तो फ्रांसीसी के जहाज पर हमले के लिए करवाई थी | बीजापुर की सेना का सामना करने को हथियार चाहिए ही थे, कीमत देने की स्थिति नहीं थी, तो छीनना ही एक मार्ग था | लेकिन अब जब भवानी ने कृपा कर दी है, तो कीमत चुका कर ही लेंगे | जब धर्म पथ पर कदम बढ़ें, उद्देश्य स्वार्थ न होकर परमार्थ हो तो देव भी सहायक हो जाते हैं | और फिर शिवाजी तो स्वयं ईश्वरीय कार्य ही कर रहे थे, जिसके लिए गीता में स्वयं श्री भगवान ने घोषणा की हुई है - धर्म की स्थापना, दुष्टों का विनाश | तो भवानी सहायक हुईं, इसमें आश्चर्य क्या ? 

शिवाजी और हिन्दवी स्वराज्य 

सुलतान ने शिवाजी से निबटने के लिए फ़तेह खां के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी, लेकिन वह उन पर आक्रमण करता इसके पहले ही उसकी छावनी पर रात में छापा मारा गया और सुलतान की सेना का भारी विनाश हुआ | यह उनकी छापामार युद्ध शैली का प्रथम प्रयोग था | यह खबर बीजापुर पहुंची तो कुटिल सुलतान ने मुस्तफा खां और बाजी घोरपडे को काम सोंपा कि वह कर्नाटक में शाह जी को गिरफ्तार कर ले | लेकिन यह क्या इतना आसान था ? उस समय शाह जी मद्रास के दक्षिण में जिन्जी को जीतने के लिए प्रयास रत थे | बाजी घोरपडे ने उन्हें भोजन पर आमंत्रित किया और फिर धोखे से गिरफ्तार कर बीजापुर पहुंचा दिया | 

स्वाभाविक ही शिवाजी और माँ जीजाबाई को इससे बड़ी चिंता हुई, किन्तु इस संकट का मुकाबला, शिवाजी ने जिस चतुराई से किया, वह दर्शाता है कि उस कम उम्र में ही वे कितने चतुर सुजान और कूटनीतिक थे | उस समय दिल्ली में शाहजहाँ गद्दी पर था, और उसकी इच्छा दक्षिण में भी साम्राज्य विस्तार की थी, अतः शिवाजी ने उसके एक सूबेदार के माध्यम से सन्देश पहुंचाया कि वे तो मुगलों की सेवा करना चाहते हैं, किन्तु उनके पिता को बीजापुर के सुलतान ने अन्याय से बंदी बना लिया है | अब सुलतान पर दोतरफा दबाब बन गया | उधर दक्षिण में शाहजी के बड़े बेटे शम्भाजी ने पिता की गिरफ्तारी के बाद बीजापुर की सेनाओं का कचूमर निकालना शुरू कर दिया, इधर दिल्ली की मुगलिया सल्तनत शिवाजी की सहयोगी हो गई | उसने शाहजी को मुक्त करने में ही अपनी भलाई समझी, किन्तु उनके बेटों पर अंकुश रखने के लिए उन्हें रखा बीजापुर में ही | अतः विवश शिवाजी कुछ वर्षों तक शांत रहे | किन्तु इस दौरान ही उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की, अष्ट प्रधानों की नियुक्ति हुई, मुस्लिम शासकों के दरबारों में जो ओहदे थे, उनका संस्कृत नामांतरण हुआ, कागज पत्रों पर जो मुहर लगती थी, उसमें लिखा था – 

प्रतिपद च्चन्द्र रेखेव --- वर्धिष्णुर विश्व वन्दिता. 

शहा सूनोः शिव श्यैषा ---मुद्रा भद्राय राजते ! 

अर्थात शाह के पुत्र शिव की यह मुहर कल्याणकारी कार्य हेतु लगाई जाती है, शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह इसकी वृद्धि होगी और सारे संसार में इसका आदर होगा | 

धीरे धीरे अधिकाँश देश्मुखों ने शिवाजी के छत्रपति पद को स्वीकार कर लिया, किन्तु एक ही अपवाद थे, जावली के चंद्रराव मोरे | वे बीजापुर के सुलतान के प्रति ही बफादार थे | जावली सामरिक द्रष्टि से महत्वपूर्ण स्थल था | दुर्गम जंगल और ऊंचे पहाड़ मानो किसी आक्रमणकारी से बचाव के लिए ही बनाए गए थे | साथ ही कोंकण को जाने का भी वही मार्ग था | अतः शिवाजी ने उनसे मित्रता कर उन्हें स्वराज्य के लिए प्रेरित करने का प्रयत्न किया, किन्तु असफलता ही हाथ लगी | शिवाजी को अपने ही बांधवों के विरुद्ध तलवार उठाना उचित नहीं लग रहा था, किन्तु विवशता थी | अतः जैसे ही सुलतान ने शाहजी को पुनः कर्णाटक भेजा, निश्चिन्त शिवाजी ने १६५६ में जावली पर धावा बोल दिया | शिवाजी ने समझौते का अंतिम प्रयास करते हुए राघो बल्लाल अत्रे व शम्भाजी कावजी नामक दूत चंद्रराव के पास भेजे, किन्तु उसने दूतों का अपमान किया | बात इतनी बढी कि राघो बल्लाल ने चंद्रराव के कलेजे में कटार भोंक दी | तहलका मच गया, बाहर से शिवाजी की सेना भी बाज की तरह टूट पड़ी | लेकिन युद्ध आसान नहीं था, छः घंटे मारकाट चली | शिवाजी की पारखी निगाहों ने युद्धभूमि में भी अपने काम के रत्न को ढूंढ लिया, जिसका नाम था मुरार बाजी देशपांडे | जावली की ओर से लड़ रहे इस योद्धा को उन्होंने जीत के बाद भरपूर सम्मान दिया | उन्हें अपना विराट लक्ष्य समझाया और उसके बाद बाजी शिवाजी के अनुयाई बन गए | उनकी शौर्य गाथा का वर्णन हम आगे करेंगे | 

जावली विजय की खुशी ठीक से मना भी नहीं पाए थे, कि एक दुखदाई समाचार आ गया | उनके बड़े भाई शम्भाजी कर्णाटक के कनकगिरि के घेरे में काम आये | वे बीजापुर की ओर से ही लड़ रहे थे, किन्तु एक अन्य सरदार अफजल खां ने उन्हें जानबूझकर समय पर मदद नहीं की और मरने के लिए छोड़ दिया | शिवाजी और जीजाबाई बहुत दुखी हुए | इसके कुछ समय बाद १४ मई १६५७ को शिवाजी की पत्नी सई बाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, बड़े भाई शम्भाजी की याद में उसका नाम रखा गया शम्भाजी | इसी दौरान भाग्य ने एक और अवसर शिवाजी को प्रदान किया | बीजापुर का सुलतान मोहम्मद आदिल शाह बे औलाद मर गया और उसकी जगह उसका दत्तक अल्पबयस्क अली आदिलशाह गद्दी पर बैठा | दक्षिण में इस समय मुग़ल सूबेदार था शाहजहाँ का बेटा औरंगजेब | उसने यह कहकर कि अली गद्दी का बारिस नहीं है, बीजापुर पर हमला कर दिया | इन दोनों को आपस में उलझा देखकर शिवाजी ने अचानक मुगलों के कब्जे वाले जुन्नर और अहमदनगर पर धावा बोल दिया | यहाँ की लूट में उन्हें अपार धन मिला | औरंगजेब कुछ कर पाता इसके पहले ही शाहजहाँ की बीमारी की खबर आ गई और औरंगजेब को आगरा की ओर कूच करना पड़ा | किन्तु जाने से पहले वह बीजापुर और शिवाजी दोनों से संधि कर गया | 

अब शिवाजी ने अपनी सीमाएं समुद्र तट तक ले जाना तय किया और उत्तर कोंकण की राजधानी कल्याण को जीत लिया | इस युद्ध की एक घटना इतिहास प्रसिद्ध है | कल्याण विजय के दौरान वहां के मुस्लिम सूबेदार का पूरा परिवार गिरफ्तार हो गया | सूबेदार की पुत्रवधू अत्यंत ही सुन्दर थीं | उस प्रदेश के शिवाजी द्वारा नियुक्त सूबेदार आबाजी सोनदेव भेंट स्वरुप उस महिला को लेकर शिवाजी के पास पहुचे | उन्होंने शिवाजी को भी अन्य शासकों की तरह ही समझा था | लेकिन यहाँ तो मामला ही उल्टा हो गया | हर पराई स्त्री को मां के समान समझने वाली भारतीय संस्कृति के मूर्तिमंत स्वरुप शिवाजी के मुंह से निकले शब्द सदा सदा के लिए अमर हो गए – अगर मेरी मां भी इतनी सुन्दर होतीं, तो मैं भी ऐसा सुन्दर होता | शिवाजी आबाजी पर बहुत नाराज हुए और सूबेदार की पुत्रवधू को ससम्मान उसके परिवार के पास पहुंचा दिया | समुद्र तट पर बने विजय दुर्ग, सुवर्ण दुर्ग और सिंधुदुर्ग निर्माण को देखकर १६५९ में गोवा के पुर्तगाली गवर्नर ने अपने राजा को लिखा – शिवाजी ने वसई और वाल के इलाके पर कब्जा कर लिया है तथा भिवंडी, पनवेल और कल्याण में उनके युद्धक जहाज तैनात हैं | 

मुगलों से संधि हो जाने के बाद बीजापुर के नए शासक और उसकी अभिभावक मां बड़ी साहिबा ने अपना ध्यान शिवाजी पर केन्द्रित किया | उस समय बीजापुर दरबार में एक सरदार था, नाम तो उसका अब्दुल्ला था, किन्तु कर्नाटक में वीरता दिखाने के बाद उसे अफजल खां का खिताब दिया गया था | बड़ी साहिबा ने उसे ही पांच हजार घुडसवार और सात हजार पैदल सेना के साथ शिवाजी को कुचलने हेतु रवाना किया | चलने के पूर्व अफजल खां ने बड़े घमंड से कहा – उस पहाडी चूहे को तो मैं पिंजरे में बंद करके लाऊंगा | सितम्बर १६५९ में अफजल खां ने दक्षिण सीमा से शिवाजी के राज्य में प्रवेश किया और सबसे पहला आक्रमण तुलजापुर के किले पर किया | उसने शिवाजी की कुलदेवी तुलजा भवानी का मंदिर ध्वस्त किया, एक गाय का मारकर उसका रक्त पूरे मंदिर में छिड़का | उसके आने के पूर्व ही पुजारी मूर्ति को लेकर भाग गए थे | शिवाजी को सूचना मिली तो वे जावली के सुरक्षित क्षेत्र में पहुँचकर तैयारी में जुट गए | अफजल खां को जब मालूम पड़ा कि शिवाजी ने अपना स्थान बदल दिया है, तो खूब हंसा, बोला भाग चूहे कहाँ तक भागता है | उसने शिवाजी को चिढाने के लिए भीमा नदी पारकर पंढरपुर के बिट्ठल मंदिर को भ्रष्ट किया, भगवान पुण्डरीक की मूर्ती को नदी में फेंक दिया और एक लोहे का पिंजरा बनवाया और घोषणा की कि वह इस पिंजरे में पहाडी चूहे को कैद कर बीजापुर ले जाएगा | 

अफजल खां का वध, वाजी प्रभु का बलिदान 

तुलजा भवानी और पंढरपुर में बिठोबा का मंदिर ध्वस्त करने के पीछे अफजल खां का एक ही उद्देश्य था, शिवाजी राजे को युद्ध के लिए ललकारना | लेकिन महाराज शिवाजी जानते थे कि सम्मुख युद्ध में अफजल खां को हराना बहुत कठिन है, इसलिए वे चाहते थे कि कूटनीति से काम निकले या अगर लड़ाई हो भी तो उनकी मनमाफिक जगह पर हो, इसलिए वे दुर्गम जावली के घने जंगलों में बने प्रतापगढ़ के किले में पहुँच गए | अफजल खां भी समझ गया कि प्रतापगढ़ जीतकर महाराज शिवाजी को जिन्दा पकड़ना लगभग असंभव है, अतः उसने कृष्णा जी भास्कर को अपना दूत बनाकर, उनके माध्यम से शिवाजीराजे के पास सन्देश भेजा कि सारा प्रदेश लौटा दो, तुम्हारे पिता शाहजी मेरे मित्र हैं, मैं सुलतान से सिफारिश कर तुम्हें माफी दिलवा दूंगा और पहले की तरह तुम्हारी जागीर तुम्हारे पास रहेगी | लेकिन महाराज शिवाजी भी जानते थे कि इसने जिस तरह मेरे बड़े भाई शम्भाजी को दक्षिण में मरवा डाला था, वही हालत मेरी भी करना चाहता है, अतः उन्होंने कृष्णा जी का बहुत आदर सत्कार किया, उन्हें भेंट आदि देकर संतुष्ट किया और रात्रि विश्राम की भी व्यवस्था अपने महल में ही की | 

आधी रात को कृष्णा जी की नींद टूटी और उन्होंने देखा कि महाराज उनकी छाती पर तलवार की नोंक टिकाये हुए हैं | बेचारे कृष्णा जी की घिघ्घी बंध गई, कंपकंपाते हुए बोले, अरे महाराज इस गरीब ब्राह्मण को मारकर ब्रह्म हत्या का पाप क्यों सर पर लेना चाहते हो ? 

शिवाजी बोले –आप जिन खां साहब के दूत बनकर आये हैं, उन्होंने तुलजा भवानी के मंदिर में गौ हत्या की, लेकिन आप उसका साथ दे रहे हैं, क्या आपका कर्म ब्राह्मणोचित है ? आप तो ब्राह्मण है ही नहीं, आप तो म्लेच्छों के दास हैं, आपको मारूंगा तो ब्रह्म हत्या कैसी ? 

शिवाजी महाराज आगे बोले – हे ब्राह्मण देव, हजारों वर्षों से ब्राह्मण हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करते आये हैं, आपको तो मेरा मार्गदर्शन करना चाहिए, अफजल खां का सहयोग नहीं | 

कृष्णा की आँखों से झर झर आंसू बहने लगे, रुंधे कंठ से बोले, मुझसे क्या चाहते हो ? 

महाराज ने कहा केवल एक सहयोग कि आप जाकर खान को बताएं कि शिवाजी बहुत डरा हुआ है, अधीनता स्वीकार करना चाहता है, लेकिन मैं उनसे जावली में ही मिलूंगा, मैं दो अनुचरों सहित निशस्त्र आऊंगा और वे भी केवल दो लोगों के साथ ही आयें, उनमें से भी एक आप रहें | 

कृष्णा जी आये थे अफजल खान के दूत बनकर और गए शिवाजी महाराज के दूत बनकर, यह थी उनकी चतुरता, कृष्णा जी बफादार बीजापुर के ही थे, आगे भी रहे, लेकिन शिवाजीराजे ने उस समय उन से ही अपना काम निकलवा लिया, और फिर सब कुछ उनकी योजनानुसार ही हुआ | भेंट की तारीख तय हुई १० नवम्बर १६५९ | प्रताप गढ़ के नीचे बने शामियाने में शिवाजी और अफजल खां के साथ केवल दो दो लोग रहने वाले थे | शिवाजी महाराज ने रात भर जागकर भवानी की आराधना की, सुबह सभी मंत्रियों को बुलाकर निर्देश दिया कि अगर मैं मारा जाऊं तो नेताजी पालकर पेशवा के रूप में राज्य भार संभालेंगे, पुत्र शम्भाजी राज्य का उत्तराधिकारी होगा | उन्होंने सर पर शिरस्त्राण के ऊपर पगड़ी बांधी, सारे शरीर पर जजीरी कवच धारण किया, उसके ऊपर सुनहरे काम का अंगरखा पहना, बाएं हाथ की उँगलियों में बघनख और दाहिनी आस्तीन में बिछुआ छिपा लिया, मां जीजाबाई की चरण धूलि सर से लगाकर, वे प्रताप गढ़ दुर्ग से निकलकर अपने दोनों सहयोगियों जीवा महाला और शम्भूजी कावजी के साथ उस शामियाने की तरफ बढे, जिससे पांच सौ गज पीछे शत्रु की सेना सन्नद्ध थी | शामियाने में ही अफजल खान अपने सहयोगी सैयद बंदा के साथ बैठा था | साढ़े छः फुट ऊंचे पूरे भीमकाय सैयद बंदा को तलवार लिए देखकर शिवाजी महाराज डरने का नाटक करते हुए दरबाजे पर ही रुक गए | कहला भेजा इस आदमी से मुझे बहुत डर लग रहा है, इसे दूर कीजिए | अफजल ने बंदा को दूर खड़े होने का निर्देश दिया, तब शिवाजी राजे ने आगे बढ़कर खान को सलाम किया | खान खड़ा हो गया और दोनों हाथ फैलाकर उन्हें गले लगाने आगे बढ़ा | 

शिवाजी राजे का सर मुश्किल से उसके कन्धों तक आ रहा था | खान ने उनकी गर्दन अपनी बाईं कांख में दबाकर दाहिने हाथ से खंजर निकालकर महाराज की बगल में घोंप दिया | पलक झपकते ही यह काम हो गया | खंजर तो जिरह बख्तर पहना होने की बजह से कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाया, लेकिन गर्दन उसने इतनी कसकर दबाई हुई थी कि उनका दम घुटने लगा | लेकिन देखते ही देखते बाजी पलट गई, खान जिबह होते बकरे की तरह जोर से चीख उठा | शिवाजीराजे ने बाएं हाथ के बघनखे से खान का पेट चीर कर आतें बाहर खींच ली थीं | पकड़ ढीली पड़ते ही शिवाजीराजे ने अफजल खान के चंगुल से निकल समूचा बिछुआ उसकी छाती में घोंप दिया | दगा दगा, मार डाला काफिर ने, पकड़ो पकड़ो, चिल्लाते हुए अफजल खान जमीन पर लुढ़क गया | यह नजारा देखकर सैयद बंदा ने तलवार से शिवाजीराजे पर प्रहार करना चाहा, लेकिन तभी चपलता से जीवा महाला ने आगे बढ़कर उसका उठा हुआ हाथ ही काट डाला, वह संभल पाए इसके पहले जीवा के दूसरे वार से उसका सर भुट्टे की तरह कटकर जमीन पर जा गिरा | कृष्णा जी भास्कर की स्वामी भक्ति जागी, वे तलवार लेकर लपके तो उनका हश्र भी बही हुआ | 

खान को पालकी में डालकर ले जाने का प्रयत्न हुआ तो शम्भूजी कावजी ने पालकी उठाने वालों की टाँगे तलवार से काट डालीं | और पालकी में सवार अफजल का सर काटकर शिवाजी महाराज के सम्मुख उपस्थित किया | जीवा महाला ने तत्क्षण शंख फूंक दिया और शंख ध्वनि सुनते ही प्रतापगढ़ से तोप गरज उठी | आसपास की झाड़ियों में छुपे हजारों मावले वीर दुश्मनों पर टूट पड़े | असावधान शत्रु सेना गाजर मूली की तरह काटी गई | 

यह समाचार बीजापुर पहुंचा तो वहां मातम छा गया, लेकिन जल्द ही बड़ी साहिबा के निर्देश पर हब्शी गुलाम सिद्दी जौहर और अफजल खान के बेटे फजल खान के साथ पंद्रह हजार सवारों ने पन्हाला दुर्ग में शिवाजीमहाराज को घेर लिया | सर नौबत नेताजी पालकर ने बाहर से बहुत कोशिश की कि घेरा तोड़कर उन्हें सुरक्षित निकाल लिया जाये, लेकिन सिद्दी जौहर की व्यूह रचना ने यह होने नहीं दिया | यह घेरा पांच महीने तक चला | हालत यह हो गई कि किले में न पानी की बूँद बची न अन्न का दाना | उस समय शिवाजीराजे के साथ स्वामीभक्त बाजी प्रभु देशपांडे और केवल छः सौ सैनिक भर थे | ऐसे में एक साहसपूर्ण योजना बनाई गई और सिद्दी जौहर के पास संधि प्रस्ताव भेजकर युद्ध बंद करने की प्रार्थना की गई | शिवाजी समर्पण को तैयार हैं, यह समाचार पाकर वे लोग बेहद खुश हुए, रंगरेलियों में डूब गए और शत्रु के असावधान होते ही भयानक अंधेरी रात में मुट्ठी भर वीर मराठे हाथ में तलवार लेकर किले से निकले और तेजी से भाग निकले | बीजापुरी सैनिक संभलते, तब तक ये लोग काफी आगे निकल गए | 

पीछा करने वालों को एक और भुलावे में भी डाला गया | सिद्दी के दामाद मसूद को कुछ मराठे एक पालकी ले जाते दिखाई दिए | पालकी कीमती थी और उसमें बैठा शख्स भी बहुमूल्य परिधान धारण किये हुए था | मसूद ने उससे पूछा क्या नाम है तुम्हारा ? जबाब मिला – शिवाजी | सबकी बाछें खिल गईं, शिवाजी को लेकर वह बीजापुर छावनी में लौटा, पर जल्द ही उसकी खुशी काफूर हो गई, जब उसे पता चला कि गिरफ्तार व्यक्ति छत्रपति शिवाजी नहीं, शिवाजी नामका नाई है | तो इस प्रकार चकमा देकर शिवाजी राजे और उनके साथी गजपुर घाटी तक पहुँच गए | इस संकरे स्थान पर कुछ सौ सैनिक भी हजारों का सामना कर सकते थे | वीरवर वाजी प्रभु ने शिवाजीमहाराज को आगे भेजकर स्वयं पलटकर पीछा करने वालों का सामना किया | तय हुआ कि विशालगढ़ पहुंचकर पांच तोपें दागकर संकेत दिया जाएगा, तब तक शत्रुदल को इस संकरी घाटी में रोका जाएगा | उसके बाद तो इन मुट्ठी भर मराठों की छातियाँ मानो अभेद्य दीवार बन गईं | वे जानते थे कि छत्रपति शिवाजी महाराज के पकडे जाने का अर्थ है, स्वराज्य का खात्मा | अतः तीन सौ सैनिक तीन हजार की सेना के सामने अड़ गए, इस दृढ निश्चय के साथ कि जान दे देंगे, पर शत्रु को दर्रे से आगे नहीं जाने देंगे | मारे गए शत्रुओं की लोथों पर इनकी भी देह गिरती रही, वाजी प्रभु के शरीर के रोम रोम से रक्त बह रहा था, शरीर दर्रे में था, लेकिन मन अपने महाराज के पास था, कान तरस रहे थे, तोप के पांच संकेत सुनने के लिए | जिस समय शिवाजी महाराज ने विशालगढ़ पहुंचकर किले के बुर्ज से तोप के गोले छोड़कर अपने सकुशल पहुँचने का संकेत दिया, उस समय की परिस्थिति को लेकर कवियों ने गाया, शीस कटा पर देह लड़ी थी | जब तक तोप का संकेत नहीं मिल गया, वाजी प्रभु की तलवार घूमती ही रही, मानो संकेत को सुनने के लिए जीवित हों, वे मातृभूमि की पावन गोद में चिर विश्राम के लिए सो गए | इस युद्ध में जिस समय महाराज शिवाजी विशाल गढ़ पहुंचे, उनके साथ उनका घोडा और भवानी तलवार ही थी, शेष सभी शूरवीर उस मुहिम में खेत रहे | 

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क्रांतिदूत: सह्याद्री के सिंह छत्रपति शिवाजी महाराज भाग 1
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