वेदांत – एक गूढ़ विषय की रोचक और सरल व्याख्या

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आदि शंकराचार्य गंगा स्नान के पश्चात अपने शिष्यों के साथ बाबा विश्वनाथ के दर्शनों को जा रहे थे | तभी उनके सामने एक चांडाल अपने चार श्वानों के...


आदि शंकराचार्य गंगा स्नान के पश्चात अपने शिष्यों के साथ बाबा विश्वनाथ के दर्शनों को जा रहे थे | तभी उनके सामने एक चांडाल अपने चार श्वानों के साथ आ गया | परम्परा में पले होने के कारण उनके मुंह से अचानक निकल गया दूर हट, दूर हट | इस पर चांडाल ने विनम्रता पूर्वक प्रतिप्रश्न किया – 

ओ महात्मन आप किसको किससे दूर हटाना चाहते हैं ? यदि आप इस पञ्चभौतिक अन्नमय शरीर को दूर हटाना चाहते हैं, तो संसार में जितने भी शरीर हैं, सबके सब पञ्च तत्व से निर्मित हैं | किन्तु यदि आप चेतन को चेतन से दूर हटाना चाहते हैं, तो वह कैसे हटाया जा सकता है, आप ही बताएं ? 

किम गंगाम्बुनि बिम्बितेSम्बरमनौ चंडाल बाटी पय 
पूरे वाSतरमस्ति कांचनघटी-मृतकुम्भयोर्वाSम्बरे | 
प्रत्यग्वस्तुनि निस्तरंगसहजानन्दावाबोधाम्बुधौ 
विप्रोयम श्वपचोSयमित्यपि महान कोSयं विभेदभ्रमः || 

भगवान् भास्कर का प्रतिबिम्ब पवित्र गंगाजल में दिखाई दे अथवा घाट पर एकत्रित दूषित जल में, मिट्टी के घड़े में या स्वर्ण कलश में, इन जड़ वस्तुओं के संयोग से भगवान सूर्य को कोई दोष कैसे स्पर्श कर सकता है ? 

हे द्विज श्रेष्ठ | जो प्रज्ञानघन है, तरंगों से रहित सिन्धु के समान विक्षेपों से सर्वथा रहित परमानंद स्वरुप है, उसमें चांडाल और ब्राह्मण का भेद कैसा ? 

भगवत्पाद श्री शंकराचार्य ने चांडाल रूप में पधारे आदिगुरू भगवान साम्ब सदाशिव को प्रणिपात किया और उनकी अर्चना में पांच श्लोकों की अलौकिक मंजरिका समर्पित की जिसमें हर श्लोक के अंत में कहा गया – 

चांडालोSस्तु स तु द्विजोSस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम | 

वह चांडाल हो या ब्राह्मण, वही मेरा गुरू है | 

वह अर्थात हर प्राणी में विद्यमान ईश तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है, जैसे कि भगवान दत्तात्रय ने अपने गुरू बनाए | 

इसीलिए हमारे यहाँ कहा गया - 

सियाराम मय सब जग जानी, करहूँ प्रणाम जोर जुग पानी | 

यह भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है | यहाँ मनुष्य दूसरे से घृणा नहीं प्रेम करता है, अनेकता को नकारता नहीं, उसमें भी एकत्व की अनुभूति करता है | 

ज्ञानियों ने कहा कि वह परमात्मा किसी लोक में या सातवें आसमान में नहीं रहता, वह तो कण कण में है | सृष्टि का हर कण परमात्मा का ही रूप है| अर्थात वह परमात्मा हर रूप में अभिव्यक्त होता है | अतः हमारा व्यवहार दूसरों से ऐसा हो, जैसे स्वयं से होता है | कोई गिला शिकवा नहीं, शिकायत नहीं | 

किन्तु सवाल उठता है कि क्या बिना आत्मचिंतन व स्वाध्याय के यह अनुभूति संभव है ? लेकिन हम तो भागमभाग में लगे हुए हैं | 

एक बन्दा नई साईकिल लेकर आया | मंदिर दर्शन के लिए चला | तो एक हाथ से साईकिल पकड़कर उसे धकेलते हुए दौड़ा चला जा रहा था | 

किसी ने पूछा – क्या हुआ भाई साईकिल खराब है क्या ? 

उसने कहा कि आज ही खरीदी है, खराब कैसे होगी ? 

फिर सवाल हुआ – तो क्या चलाना नहीं आता, जो धकेल कर ले जा रहे हो | 

झुंझलाकर बन्दे ने कहा – अरे भाई साईकिल भी बढ़िया है, चलाना भी बढ़िया आता है, लेकिन जल्दी में हूँ, बैठने की फुर्सत नहीं है | 

हमारे जीवन में विषाद की जड़ भी यही है | 

हमारा लक्ष्य क्या, उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग क्या, पहुँचने के साधन क्या, उस मार्ग में आने वाली वाधाओं को पार करने के लिए कौन सी सावधानी जरूरी है , यह जान लेना भी उपलब्धि नहीं, महापुरुषों को श्रवण कर लेना भी उपलब्धि नहीं, उसे जीवन में उतारना मुख्य है | प्यास लगी है, तो पानी पानी चिल्लाने से प्यास नहीं बुझती, पानी पीना ही पड़ता है | 

महापुरुषों ने कहा कि यह जीवन, यह दुनिया ईश्वर की लीला है, उसका खेल तमाशा है | इसे यूं समझें कि जब हम कोई नाटक या मूवी देखते हैं, तो अभिनेता के अभिनय का प्रभाव भी हम पर पड़ने लगता है | उनके दुःख में दुखी होकर रोने भी लगते हैं | इसी प्रकार उनकी खुशी में खुश होने लगते हैं | जब हम समझ जायेंगे कि क्या सत्य है, क्या असत्य, तो जीवन में बदलाव आएगा | 

जनक को विदेह कहा गया है | एक रात उनने स्वप्न देखा कि उनका सब कुछ चला गया है, हालत यह कि खाने को भी कुछ नहीं है | भूख से व्याकुल होकर दर दर पर भीख मांगते घूम रहे हैं | सोचिये कि सम्राट भिखारी बन गया | कोई उसे भीख भी नहीं दे रहा | एक गरीब महिला, झूठा बासी चावल फेंकने जा रही है, जनक ने उससे विनती की कि देवी फेंको मत मुझे दे दो | उसने कहा भी कि यह खाने योग्य नहीं है, जनक उससे आग्रह पूर्वक ले लेते हैं | जैसे ही वे खाने को उद्यत होते हैं कि तभी एक कुत्ता उनके हाथ से वह चावल भी छीन कर भाग जाता है | दुखी जनक निराशा में अपना हाथ सर पर पटकते हैं, कि हा दुर्भाग्य | और आँख खुल जाती है और देखते हैं कि अपने महल में हैं, अपने आरामदायक बिस्तर पर, सरहाने खडी दासी पंखा झल रही है | 

दूसरे दिन सभा में उन्होंने ऋषियों को आचार्यों को बुलाकर पूरा वृतांत सुनाया और पूछा – मैंने रात को सोते समय जो देखा वह सत्य था, या इस समय जो जागृत अवस्था में देख रहा हूँ, वह सत्य है ? 

अष्टावक्र जी ने जबाब दिया कि हे राजन न तो रात में जो स्वप्न देखा वह सत्य था और न ही वह सत्य है, जो आप इस समय देख रहे हैं | सत्य अगर कुछ है तो केवल आप हैं | केवल आप ही सत्य हैं | आपने ही स्वप्न देखा और आप ही जागृत अवस्था में देख रहे हो | 

यह परिपक्वता, हमारे होने की इस स्पष्टता का, इस जानकारी का नाम है वेदान्त | 

एक भिखारी जब मरा तो लोगों ने उसके घर की सफाई की | उसके बिस्तर के नीचे ही अकूत संपत्ति का खजाना गढ़ा हुआ मिला | हम अपने आप को अपूर्ण मानकर जीवन भर दुखी रहते हैं, सुख की तलाश करते रहते है | लेकिन वेदांत बताता है कि आप अपूर्ण नहीं पूर्ण हो, यह आभाष होते ही “आनंद ही आनंद” | 

बुद्ध से किसी शिष्य ने पूछा कि आप राजमहल छोड़कर जंगल में पहुँच गए, क्या कुछ मिला ? 

बुद्ध ने कहा –नया कुछ नहीं मिला, जो पहले से मिला हुआ था, उसका पता चल गया | 

इसीलिए हमारे ऋषियों ने चिंतकों ने विचारकों ने खुद को जानने का ही प्रयास किया, आधुनिक विज्ञान सारी सृष्टि के रहस्यों को जानने की उधेड़बुन में लगा रहता है, बस खुद को जानने की फुर्सत नहीं | 

स्वामी रामतीर्थ का जीवन क्रम 1906 में पूर्ण हुआ, वह भी मात्र 33 वर्ष की आयु में | इतनी कम आयु में ही उन्होंने पूरे विश्व को अपनी विद्वत्ता से प्रभावित कर दिया | इस्लाम जो कि अपनी कट्टरता के लिए आज भी कुख्यात है, उन दिनों की स्थिति की तो सहज कल्पना ही की जा सकती है | स्वामी राम इकलौती शख्सियत हैं, जिन्होंने एक सन्यासी के रूप में काहिरा की जामा मस्जिद में उनकी भाषा में वेदांत पर व्याख्यान दिया | 

वेदान्त के माध्यम से अप्राप्त की प्राप्ति नहीं होती | क्योंकि जो अप्राप्त है, वह आज प्राप्त होने के बाद कल पुनः अप्राप्त हो सकता है ! जो हमारे पास है, किन्तु हमें उसका आभास नहीं है, अर्थात प्राप्त की प्राप्ति कराता है वेदान्त | वेदान्त हमारी आतंरिक स्थिति, विचारों को बदलता है | 

स्वामी राम तीर्थ गणित के विद्यार्थी थे | उनकी आदत थी कि वे परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र के सभी प्रश्न हल करते थे | प्रश्न पत्र पर ऊपर लिखा होता था कि आठ में से कोई पांच प्रश्न हल कीजिये, वे अपनी उत्तर पुस्तिका में परीक्षक के लिए ऊपर लिख देते थे कि आठ में से कोई पांच उत्तर जांच लीजिये | 

तो ऐसे उद्भट विद्वान ने वेदान्त की जो व्याख्या की उसे हमने कल भी समझने का प्रयत्न किया और आज भी कर रहे हैं | 

सूरज हमारे पीछे हो तो छाया आगे होती है | छाया को पकड़ना चाहो तो कुछ हाथ नहीं आने वाला | हाँ सूरज की और मुंह करके चलना शुरू करो, तो अवश्य परछाईं भी पीछे पीछे आने लगती है | DOG को उलटकर पढो तो GOD | यह परिवर्तन आता है, जब आप अपने अन्दर के बेशकीमती को जान जाते हो | 

तू एक दिन भी जी, शहंशाह बनकर जी | 
मत पुजारी बन, स्वयं भगवान बनकर जी || 

कबीरदास ने कहा – 

माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर, 
मनका मनका डार दे, मन का मनका फेर | 

नकारात्मक को मन जल्दी पकड़ता है | कबीर के कहे में से भी आधा ही पकड़ा | मन का मनका तो फेरा नहीं, कर का मनका भी छोड़ दिया | कहा गया है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा | मन चंगा होगा तोहि कठौती में गंगा होगी। जब तक कठौती मेँ गंगा नहीं आई, अर्थात मन चंगा नहीं हुआ, तब तक गंगा स्नान तो ना ही छोड़ें | और ना ही मनका फेरना छोड़ें ! एक मित्र ने कहा कि स्वामी दयानंद तो मूर्ति पूजा के विरोधी थे, वेद में भी मूर्ति पूजा का उल्लेख नहीं है | तो बन्धु पहले स्वामी दयानंद की ऊंचाई पर तो पहुँच जाओ, प्राणी मात्र में ब्रह्म देखने लगो, तब स्वतः ही मूर्ति पूजा की आवश्यकता नहीं रहेगी, जब सब और ईश्वर दिखने लगेंगे, तब मंदिर में ईश्वर की मूर्ति दर्शन की क्या आवश्यकता होगी | किन्तु जब तक यह स्थिति नहीं आई है, तब तक मूर्ति में ही सही, ईश्वर दर्शन तो करो | 

यज्ञोपवीत संस्कार के समय सबसे पहले गुरू शिष्य के कान में गायत्री मन्त्र का उपदेश करता है | क्या है गायत्री मन्त्र में ? हे जगत को प्रकाशित करने वाले सूर्य मुझे सद्बुद्धि दो | 

कहा जाता है कि शेरनी का दूध केवल स्वर्ण पात्र में टिकता है। आपका मन स्वर्णिम बने, सद्बुद्धि हो, तभी वहां आध्यात्म टिकेगा | 

गीता में कहा गया – युक्तियुक्त कर्म योग है | योग की परिभाषा है – योगः कर्मसु कौशलम | अब यह कुशल क्या है ? कुशल शब्द बना है है कुश से | जो कुश जैसी तीखी घांस को भी बिना हाथ कटे उखाड़ लाये वह कुशल | अर्थात कर्मों की कुशलता योग है | कर्म ही बंधन कारक हैं तो कर्म ही मुक्ति प्रदाता | बिना कर्म किये कोई नहीं रह सकता | हम सांस भी लेते हैं तो वह भी कर्म ही है | कृष्ण कहते हैं – एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रह सकते | शुभ करेंगे तो शुभ होगा, अशुभ करेंगे तो अशुभ होगा | अतः यज्ञ के लिए कर्म करें | कृष्ण के कथन के मर्म को समझें | 

यज्ञ का अर्थ केवल हवन करना नहीं है । 
यज्ञ का एक अर्थ विष्णु भी है । 
विष्णु वह जो व्यापक है । 
जो कण कण में है, रोम रोम में है । 

समष्टि के लिए कुछ करना यज्ञ है । 
अपने लिए करेंगे तो फंसेंगे, अपनों के लिए करेंगे तो तरेंगे । 
अपना कौन ? 
जब सबमें वही विद्यमान है तो सभी अपने । 
अपनों के लिए करना ही सबसे बड़ा सुख । 

भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं तीन चीजें – अर्पण, तर्पण, समर्पण | 
समष्टि के लिए जो किया जाए वह अर्पण, अपने बुजुर्गों पूर्वजों के लिए तर्पण, और अभिमान शून्य होकर ईश्वर के सम्मुख आत्म समर्पण | जब तक ईगो है, समर्पण संभव नहीं | 

राजी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रजा है | 

दुनिया में तीन तरह के लोग हैं – योग्य नहीं हैं, फिर भी चाहते हैं, योग्य हैं और चाहते भी हैं, योग्य हैं किन्तु कुछ नहीं चाहते | सार्वभौम सिद्धांत है कि प्रकृति योग्य को देती ही है | इच्छा की जरूरत ही क्या है | 

काम, क्रोध, मद, लोभ आदि दुर्गुण डायविटीज की तरह हैं, जिन्हे समाप्त तो नहीं किया जा सकता, किन्तु उचित दवा और परहेज से इन्हें कंट्रोल में अवश्य रखा जा सकता है । 

दवा है सत्संग और स्वाध्याय 
और परहेज है कुसंग । 

देवत्व और पापत्व का हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपू से संग्राम हुआ | हिरण का अर्थ है स्वर्ण और अक्ष का अर्थ है आँख, तो हिरण्याक्ष का अर्थ हुआ – सदा स्वर्ण पर नजर रखने वाला, अर्थात धन लोलुप | 
इसी प्रकार 
इसी प्रकार कश्यपू का अर्थ है बिस्तर | अगर आज की भाषा में हिरण्यकश्यपू का अर्थ करें तो नोटों के बंडल पर सोने वाला | हिरण्यकश्यपू के विषय में कहा जाता है कि वह चलता था तो धरती हिलती थी और उसका मुकुट बादलों को स्पर्श करता था | इसे रूपक मानें तो भी यह अहंकार का वर्णन है | 

जबकि प्रहलाद का अर्थ है अतुलनीय आनंद | धनलोलुप और अहंकारी राक्षसों के घर में आनंद का जन्म हुआ क्योंकि वे शत्रु भाव से ही सही, भगवान का सतत स्मरण तो करते ही थे | 

जो समग्रता में ईश्वर को देखता है वह भक्त, जो अपना पराया देखता है वह विभक्त, और जो केवल खुद को देखता है वह अभक्त | भक्ति का अर्थ है, स्वयं को परमात्मा के साथ जोड़ना | उप माने समीप और आसना अर्थात बैठना – समीप बैठना उपासना | जिसके साथ बैठे हैं, उसके अस्तित्व का अहसास, यह है उपासना | ईश्वर का सदा सामीप्य, यह है उपासना की पराकाष्ठा | 

जब भाव और विचार दोनों मिल जाते हैं, तब आपके जीवन की आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ हो जाती है | चावल परिपक्व होकर भात बनता है | जब आप सबके लिए मुलायम हो जाएँ, तब वह भक्ति की पराकाष्ठा |

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