लव जिहाद अर्थात सांप्रदायिक प्यार - श्री एस. गुरूमूर्ति

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लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पिछले दिनों न्यू इन्डियन एक्सप्रेस में प्रकाशित जाने माने चिन्तक और आर्थिक और राजनीतिक मामलों पर टिप्पणीका...



लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पिछले दिनों न्यू इन्डियन एक्सप्रेस में प्रकाशित जाने माने चिन्तक और आर्थिक और राजनीतिक मामलों पर टिप्पणीकार श्री एस. गुरूमूर्ति का शोधपूर्ण आलेख पढ़ने और समझने योग्य है |

एक हार्वर्ड मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट एपस्टीन ने विवाहों पर शोध किया और निष्कर्ष निकाला कि अमेरिकियों के प्रेम विवाह में "विवाह के पूर्व रोमांटिक प्रेम एक शर्त है", जबकि भारतीयों की अरेंज मेरिज में "विवाह पहले आता है, प्रेम बाद में"। आज के भारत में भी चाहे परंपरागत विवाह हो अथवा प्रेम विवाह यही स्थिति है। लेकिन आज जो लव मैरिज बनाम लव जिहाद का एक नया स्वरुप सामने आया है, वह इसके विपरीत है। एक दशक पहले केरल में शुरू हुआ यह कृत्य अब अखिल भारतीय है और यहां तक ​​कि वैश्विक हो रहा है। 

प्रारंभ में तो इसे हिंदूवादी कुप्रचार कहकर खारिज कर दिया गया, किन्तु अब यह एक हिंदू और पार्टी से इतर सबको प्रभावित करने वाला मुद्दा बन गया है। हालांकि कुछ लोग अब भी लव जिहाद के अस्तित्व को लेकर विवाद करते हैं। लेकिन अगर लव जिहाद मौजूद है, तो यह सबसे शक्तिशाली व्यक्तिगत मानव आग्रह, प्रेम और समान रूप से शक्तिशाली मानव की सामूहिक भावना, धर्म का घालमेल है। परिवार और ध्रुवीकृत समुदाय दोनों अलग अलग हैं, लेकिन लव जिहाद इसको मिलाता है। इस खतरनाक सम्मिश्रण के परिणाम घातक और विस्फोटक हो सकते हैं। यदि इसके बाद भी लव जिहाद अस्तित्व में है, और यदि ऐसा होता है, तो यह गैर-मुस्लिम महिलाओं के साथ मुस्लिम पुरुषों के सामान्य प्रेम विवाह से कितना अलग है, इसे समझाना धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 

लव मैरिज बनाम लव जिहाद 

एक दूसरे को प्यार करने वाले एक पुरुष और एक महिला ही प्रेम विवाह के मूल में होते है। लेकिन कथित लव जिहाद इसके विपरीत है। इसमें मुस्लिम पुरुष गैर-मुस्लिम महिलाओं से केवल इसलिए प्यार का दिखावा करते है, क्योंकि वह अपने धर्म से अधिक प्यार करते हैं। लव जिहाद लव मैरिज नहीं है, क्योंकि इसके केंद्र में धर्म के प्रति निष्ठा एक प्रमुख विचार है, प्यार नहीं । एक सार्वभौमिक प्रेम विवाह किसी भी पुरुष और महिला के बीच हो सकता है, उनकी आस्था समान हो अथवा न हो । लेकिन इस्लामिक लव जिहाद केवल मुस्लिम पुरुषों और गैर-मुस्लिम महिलाओं के बीच है। 

परिणाम: यह मुसलमानों और अन्य लोगों के बीच एक मुद्दा बन गया है, जिसमें ईसाई और बौद्ध भी शामिल हैं। कुछ लोग कहते हैं कि लव जिहाद इस्लामोफोबिक है। लेकिन इससे प्रभावित धर्मवादी इस पर जोर देते हैं कि ऐसा नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने मुस्लिम पुरुषों और गैर-मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रेम विवाह के 94 मामलों की जांच की और 23 को लव जिहाद के उदाहरण होने का संदेह किया। 

लव जिहाद के मुद्दे को खारिज करना अब ज्यादा आसान नहीं है। प्रेम आसानी से समझ में आता है, लेकिन यह लव जिहाद क्या है? जिहाद का अर्थ केवल युद्ध नहीं है, सच्चाई यह है कि इस्लाम में जिहाद का अर्थ इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए किया गया कोई भी प्रयास है। तो लव से जुडा जिहाद क्या प्रेम (विवाह) कहा जा सकता है? तटस्थ और इस्लामी स्रोतों दोनों का कहना है कि 'हाँ, यह जिहाद हो सकता है और है'। 

धर्म के लिए प्यार करना 

शोधकर्ता, जिनमें इस्लाम को मानने वाले भी शामिल हैं, दर्शाते है कि कैसे प्रेम विवाह का यह खेल खेला गया है, और खेलना जारी है, जो इस्लाम का विस्तार करने में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। "डेमोग्राफिक इस्लामीकरण: मुस्लिम देशों में गैर-मुस्लिम " शीर्षक वाले एक आलेख में, फिलिप फ़ार्गस बताते हैं कि कैसे इस्लामी राष्ट्र प्रेम और विवाह के माध्यम से इस्लामीकरण करते रहे हैं। फ़ार्गस का निष्कर्ष है: "प्रेम अब इस्लामीकरण की निरंतर विकास प्रक्रिया में वही भूमिका निभा रहा है, जो सुदूर अतीत में खेला गया था।" (पॉल एच. नीत्जे स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज [SAIS] रिव्यू, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी)। 

“How Islam Spread Throughout the World”(इस्लाम पूरे विश्व में कैसे फैल गया) शीर्षक से अपने सेमिनल पेपर में, हसाम मुनीर ने माना कि इस्लाम केवल तलवार से फैला है। मुनीर का यह पेपर यक़ीन इंस्टीट्यूट की साइट पर देखा जा सकता है, जिसका उद्देश्य वैचारिक आधार पर इस्लामोफोबिया और समुदाय पर इसके नकारात्मक प्रभाव का मुकाबला करना है। मुनीर कहते हैं कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अंतर-धार्मिक विवाह उन चार तरीकों में से एक था, जिनके द्वारा इस्लाम का प्रसार हुआ। मुनीर लिखते हैं: “कई संदर्भों में इस्लाम के प्रसार के लिए मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों के बीच अंतर्क्रिया ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। यह अनुसंधान का एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर केवल हाल ही में ध्यान आकर्षित करना शुरू किया गया है, क्योंकि इस प्रक्रिया के माध्यम से इस्लाम में सबसे अधिक धर्मान्तरित महिलाएं थीं। " 

मुनीर उन देशों को सूचीबद्ध करता है, जहां इस्लाम प्रेम से फैला है। मुनीर लिखते हैं कि स्पेन में प्रारंभिक मुस्लिम समुदाय की स्थापना के लिए अंतर्जातीय विवाह के माध्यम से धर्मांतरण प्रमुख था; प्रारंभिक आधुनिक ओटोमन साम्राज्य में भी अंतर्विवाह के कई उदाहरण है, जिसमें धर्मांतरण भी शामिल है; ब्रिटिश शासित भारत में, कई दलित महिलाओं के साथ मुस्लिमों के अंतरजातीय विवाह ने इस्लाम के विस्तार में भूमिका निभाई । वह कहते हैं कि "अंतर्जातीय विवाह ने हाल के दिनों में इस्लामी धर्मांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है" और वह इसके उदाहरण भी देते हैं। 

फिलिप फ़ार्गस का मत है कि, आज के दौर में इस्लाम को फैलाने के लिए जबरदस्ती की जगह प्रेम ने ले ली है और मुनीर ने भी इसकी ही पुष्टि की है। फ़ार्गस के साथ बातचीत में, मुनीर ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह प्रमाणित कर दिया है कि शादी केवल व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि देशों के इस्लामी धर्मांतरण की नींव थी। इन दोनों के ही समान क्रिश्चियन सी. साहनेर ने भी अपनी “क्रिश्चियन शहीद” शीर्षक पुस्तक (प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस) में लिखा है कि मुस्लिम वर्ल्ड का निर्माण करने के लिए धार्मिक हिंसा के अतिरिक्त, "इस्लाम बेडरूम के माध्यम से ईसाई दुनिया में फैल गया।" गैर-मुस्लिम महिलाओं के लिए मुस्लिम पुरुषों का प्यार धार्मिक भाव से भरा हुआ लगता है। निस्संदेह, गैर-मुस्लिम महिलाओं के साथ मुस्लिम पुरुषों का अंतर्जातीय विवाह धार्मिक एजेंडे का अभिन्न अंग रहा है। ए.के.ए. जिहाद — इस्लाम फैलाने के लिए। 

एक तरफ़ा प्रवाह 

मुस्लिम और गैर-मुस्लिमों के बीच विवाह एकतरफा यातायात होने से बदतर प्रतीत होता है, क्योंकि इस्लाम मुस्लिम महिलाओं के गैर-मुस्लिमों से विवाह पर प्रतिबंध लगाता है और उन्हें धर्म के भीतर सीमित करता है। सबूत बताते हैं कि व्यवहार में इस प्रतिबंध का पालन किया जाता है। अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के एक अध्ययन से पता चलता है कि उच्च स्तर के मुसलमान अपने बेटों का गैर-मुस्लिमों से शादी करना तो स्वीकार करते हैं, किन्तु इसके विपरीत अपनी बेटियों का गैर-मुस्लिमों से शादी करना कम से कम पसंद करते हैं या बिलकुल पसंद नहीं करते हैं। 

भारत की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। 2012 में, केरल के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने कहा कि 2009 से 2012 के दौरान अन्य धर्मों की 2,667 युवा महिलाओं को इस्लाम में परिवर्तित किया गया, जिसके खिलाफ अन्य धर्मों में परिवर्तित होने वाली युवा मुस्लिम महिलाओं की संख्या सिर्फ 81 थी (इंडिया टुडे, 2012/04/09)। इस्लाम में विवाहित गैर-मुस्लिम महिलाओं की संख्या इस्लाम से बाहर विवाहित मुस्लिम महिलाओं की तुलना में 33 गुना अधिक है। 

केरल का 'लव जिहाद' वैश्विक हो गया है 

इस्लामी इतिहास की पृष्ठभूमि को देखते हुए, "लव जिहाद" शब्द केरल में 2009 में गढ़ा गया था, जो राज्य में धर्म के लिए प्यार और शादी करने के मामलों के लिए अनुपयुक्त नहीं है। मुहावरे को मान्यता तब मिली जब केरल उच्च न्यायालय ने पुलिस से गैर-मुस्लिम महिलाओं के साथ मुसलमानों के अंतरजातीय विवाह की जाँच करने को कहा। लव जिहाद को सिर्फ हिंदुत्व समूहों के एक अभियान के रूप में खारिज करने के शुरुआती प्रयासों को तब झटका लगा जब क्रिश्चियन एसोसिएशन फॉर सोशल एक्शन ने लव जिहाद को ईसाई महिलाओं के खिलाफ होने का आरोप लगाया। 

द यूनियन ऑफ कैथोलिक एशियन न्यूज (13.10.2009) ने केरल में धर्म के लिए प्रेम पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसका शीर्षक था "भारत: चर्च, राज्य 'लव जिहाद' को लेकर चिंतित ।" कर्नाटक सरकार ने भी लव जिहाद को गंभीरता से देखना शुरू कर दिया। 2010 में, CPM से संबंधित केरल के मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन ने यह कहकर कि पोपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया ने "पैसे और विवाह" का उपयोग करके 20 साल में केरल का इस्लामीकरण करने की योजना बनाई थी (टाइम्स ऑफ इंडिया, 26.7.2020), फिर से बहस को मुख्य धारा में ला दिया। अन्य समुदायों के साथ मुसलमानों के अंतर्जातीय विवाह पर ओमन चांडी के डेटा (2012) ने केरल में लव जिहाद संबंधी बहस को फिर से जन्म दिया। 

ईसाई, कांग्रेस और सीपीएम ने इस मुद्दे पर मोहर लगाते हुए अपने अपने ढंग से जोर दिया। 2017 में, केरल उच्च न्यायालय ने डीजीपी केरल को लव जिहाद के मामलों की जांच करने का निर्देश दिया। बाद में, एनआईए ने लव जिहाद के मामलों के अस्तित्व को लेकर सूचना दी। 2019 में, केरल अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को ईसाई महिलाओं के न केवल इस्लाम में, बल्कि आतंकवाद में रूपांतरण के विषय में लिखा - "लव जिहाद चालू है" । 

2020 में, सिरो-मालाबार चर्च ने लव जिहाद के बढ़ते मामलों पर चिंता व्यक्त की। केरल में गढ़ा गया मुहावरा तब से वैश्विक हो गया है। बर्मा और थाईलैंड के बौद्धों का कहना है कि लव जिहाद व मिश्रित विवाह धर्मांतरण के लिए एक उपकरण है, जो बौद्ध धर्म के अस्तित्व के लिए एक खतरा हैं। (बौद्ध इस्लामोफोबिया: अभिनेता, ट्रॉप्स, प्रसंग) 

प्रतिगामी विचार 

इस ज्वलंत समस्या का समाधान खोजना समय की मांग है। इन प्रतिगामी विचारों से 20 वीं शताब्दी की दुनिया बिगड़ रही है। संगठित रूप से धर्मों को समाप्त करने का प्रयत्न करना दकियानूसी है। नई वास्तविकता यह है कि धर्म एक शक्तिशाली अभिनेता के रूप में उभर रहा है। समकालीन उदारवादियों को याद हो सकता है कि उनके आइकन, मैक्स वेबर ने 1918 में क्या कहा था। उन्होंने कहा था कि विज्ञान, धर्म और अंधविश्वास के साथ साथ इन दोनों पर मुग्ध दुनिया को तो नष्ट कर देगा, लेकिन मूल्यों और नैतिकता से सम्बंधित सभी सवालों का जवाब देने में सक्षम नहीं होगा। । विज्ञान और धर्म की अपर्याप्तता को लेकर उनकी दूरद्रष्टि आधुनिक दुनिया में एक बुनियादी बहस का कारण बनी। 

इतना ही नहीं तो वेबर ने सोचा था कि पुरानी शैली के धर्म में कोई भी वापसी एक हीन समाधान है, उसके सौ साल बाद, जिससे वह डरता था वह सच हो रहा है। दुनिया आश्चर्यजनक रूप से धार्मिक हो रही है। धार्मिक जनसंख्या 2050 में 2.3 बिलियन बढ़ने का अनुमान है, और केवल 0.1 बिलियन नास्तिक हैं ! जबकि 1970 में 5 में से 1 नास्तिक थे, यह 2050 में 7 में से 1 के आसपास होगा - जो कि नास्तिक लोगों के प्रतिशत में गिरावट को दर्शाता है। 

इसका हवाला देते हुए, वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम कहता है: “धार्मिक समूहों की मौत की रिपोर्ट अतिरंजित है। हाल के शोध के अनुसार, 2050 में दुनिया की धार्मिक आबादी 2010 की तुलना में 23 गुना अधिक होने का अनुमान है। "क्लेश ऑफ़ सिविलाईजेशन” को लेकर सैमुअल हंटिंगटन की थीसिस और 1995 का हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्लुरलिज़्म प्रोजेक्ट, दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का हवाला देते हुए धर्म के पुनर्जागरण पर आधारित है। 

एक ऐसी दुनिया में जहां धार्मिकता बढ़ रही है और वेबरनिज्म कम हो रहा है, समकालीन उदारवादी विचार, धर्म के लिए प्यार जैसे खतरनाक मुद्दों से निपटने में पुराने और अक्षम प्रतीत होते हैं। समकालीन उदारवाद की तुलना में एक अलग विचार, जो अतीत में बढी हुई असमानता का उत्पाद है, पाया जाना चाहिए। उभरती स्थिति एक ईमानदार, खुली और साहसिक बहस का आह्वान करती है। क्या विकृत भारतीय धर्मनिरपेक्षता यह सवाल उठाने की अनुमति देगी। 

- एस. गुरुमूर्ति 

संपादक, तुगलक, और आर्थिक और राजनीतिक मामलों पर टिप्पणीकार 

स्रोत: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

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