कबीर के गुरू

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दक्षिण भारत में भक्ति मार्ग की दो संत परम्पराएँ हुईं | नायनमार संतों ने शिव भक्ति का तो अलवार परंपरा के संतों ने विष्णु भक्ति का प्रचार किया...




दक्षिण भारत में भक्ति मार्ग की दो संत परम्पराएँ हुईं | नायनमार संतों ने शिव भक्ति का तो अलवार परंपरा के संतों ने विष्णु भक्ति का प्रचार किया | अलवार संत परंपरा में संत रामानुज का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है | 

1017 में पेरांबूदूर में जन्मे रामानुज के पिता सोमैया जी का देहांत इन के बाल्यकाल में ही हो गया था। अतः इन का लालन पालन मुख्यतः इन की माता कांतिमती ने ही किया, जो अत्यन्त ही शुद्ध, सात्विक और धार्मिक विचारों की थी। थोड़े सयाने होने पर मां ने इन्हें वेदों के अध्ययन के लिए उस समय के अद्वैत दर्शन के आचार्य यादवप्रकाश के पास कांचीपुरम भेजा। किन्तु कहा जाता है कि छान्दोग्य उपनिषद की व्याख्या पर इन का अपने गुरु से मतभेद हो गया और रात्रि में ही ये उनके आश्रम से निकल गए। इस के पश्चात इन का संपर्क कांचीपुरम मठ के आचार्य कांचीपूर्ण से हुआ। कांचीपूर्ण का स्थान उस समय के संत समाज में सर्वोच्च माना जाता था। अतः इन्होंने उन को अपना गुरु बनाया। 

श्री कांची महापूर्ण स्वामी ने इन का दीक्षा संस्कार कोदंड राम मंदिर अर्थात वेंकटाचल तिरुपति में श्री विग्रह के समक्ष सम्पन्न किया था। उस समय इन की आयु 32 वर्ष थी। कांचीपूर्ण ने इन्हें नया नाम दिया – यति राज। उसके बाद एक विस्मय जनक घटना घटी, जब एक संत समागम में इन की भेंट अपने पूर्व गुरु आचार्य यादवप्रकाश जी से हुई और आध्यात्मिक ज्ञान में इनकी निपुणता देखकर यादवप्रकाश जी ने इन्हें अपना गुरु मान लिया। एक समय का शिष्य अपने पूर्व गुरू का गुरू बन गया | रामानुज ने उनसे वैष्णव प्रबंध लिखने का अनुरोध किया। अस्सी वर्षीय आचार्य प्रकाश ने ग्रंथ लिखा भी और उस का नाम रामानुज जी के तत्कालीन नाम पर रखा “यतिधर्मासम्मुच्चय”। 

उन दिनों श्रीरंगम मठ के तत्कालीन अध्यक्ष संत यमुनाचार्य काफी वृद्ध हो गए थे । उन्हें तलाश थी एक ऐसे विद्वान युवक की जो उनका स्थान ले सके और उन के विशिष्टअद्वैत मत का संवर्धन कर सके। उनकी रामानुज जी से भेंट कभी नहीं हुई थी, किन्तु उनकी विद्वत्ता के विषय में पर्याप्त सुन रखा था । अपना अंत समय समीप जान कर यमुनाचार्य जी ने रामानुज से बिना मिले ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया | यह सुन कर जब रामानुज उन से मिलने श्रीरंगम पहुँचे, तब तक संत यमुनाचार्य जी का निर्वाण हो चुका था। कहा जाता है कि जब रामानुज श्रीरंगम पहुँचे, तो उन्होने देखा कि मुनिवर यमुनाचार्य महाप्रयाण कर चुके हैं लेकिन उनके दाहिने हाथ की तीन उँगलियाँ मुड़ी हुई थी। रामानुज को आश्चर्य हुआ – उन्होने वहाँ उपस्थित शिष्यों से पूछा – क्या महा ऋषि की उँगलियाँ सदैव ऐसी ही थी। सभी ने एक स्वर से कहा – नहीं ऐसा कभी नहीं था। 

तब रामानुज ने निष्कर्ष निकाला कि महा ऋषि उन के लिए तीन निर्देश छोड़ गए हैं। (1) व्यास रचित ब्रह्म सूत्र का विशिष्टअद्वैत भाष्य तैयार करना। क्योंकि विशिष्टद्वैत दर्शन शिष्यों को अभी तक मौखिक पढ़ाया जाता था। (2) विशिष्टअद्वैत का दिग्विजई प्रचार । और (3) दिल्ली के सुलतान के यहाँ से भगवान राम की मूर्ति का उद्धार । उन्होने आचार्य का अंतिम संस्कार करने से पहले उन के निर्देश पालन करने की शपथ ली। आश्चर्य की बात थी कि जैसे जैसे रामानुज ने एक एक निर्देश पालन करने की शपथ ली उसी क्रम में ही उन के हाथ की उँगलियाँ सीधी होती चली गई। 

रामानुज श्रीरंगम मठ के अध्यक्ष होने के बाद भी यही समझते रहे कि उन की शिक्षा अभी अधूरी है । अतः वे तिरुकोत्तित्यूर के संत नाम्बि उपाख्य गोष्ठीपूर्ण जी के पास दीक्षा लेने गए । नाम्बि इस के लिए तैयार नहीं थे। कहा जाता है कि रामानुज ने श्रीरंगम से मदुरै तक की इसी काम के लिए 18 बार पैदल यात्रा की और आचार्य नाम्बि से दीक्षा देने की प्रार्थना की | हर बार आचार्य ने उन्हें लौटा दिया। अंत में रामानुज की ज़िद्द देख कर आचार्य दीक्षा देने के लिए तैयार हुये लेकिन शर्त लगा दी – ‘रामानुज यह मंत्र किसी और को नहीं देंगे। यह मन्त्र जो सुनेगा, वह मुक्त हो जाएगा, अतः यह सिर्फ इन्हीं के लिए है। अगर गुरू आज्ञा का उल्लंघन किया तो नरकगामी होना पड़ेगा | रामानुज मान गए और दीक्षा ले ली। किन्तु दीक्षा लेते ही एक मंदिर की छत पर जा चढ़े | सामने जन समुदाय बढ़ता जा रहा था, आचार्य रामानुज ने घोषणा करवा दी थी कि वे आज सबको मुक्ति का मन्त्र देंगे | 

गुरू ने कहा था कि अगर मन्त्र किसी और को दोगे, तो नरक जाना पड़ेगा | लेकिन मन्त्र जिसको मिलेगा, वह तो मुक्त होगा, उसे तो आवागमन के दुःख से छुटकारा मिलेगा | दुनिया में हर व्यक्ति दुःखी है। किसी न किसी समस्या से ग्रस्त है। इन के दुखों को दूर करने का एक ही उपाय है – मुक्ति । अगर इतने लोगों की मुक्ति होती है, बदले में मुझे नरक जाना पड़ता है, तो सहर्ष स्वीकार है | 

बाद में रामानुज ने आचार्य से भी विनती की कि “गुरुदेव आप मुझे जो चाहें दंड दें, मुझे स्वीकार है परंतु यदि आप के बताए मंत्र से लाखों लोगों के दुखों का निस्तारण हो सकता है तो मैं आप का दंड बार बार स्वीकार कर सकता हूँ। यह सुन कर आचार्य नाम्बि प्रसन्न हुए और रामानुज को आशीर्वाद दिया। 

तो ऐसे रामानुज की शिष्य परंपरा में थे रामानंद जी, जिनका जन्म 1299 में इलाहाबाद में एक कान्यकुब्ज परिवार में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा काशी में हुई थी | इन्होंने रामानुजाचार्य की भक्ति परंपरा को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया और रामावत संप्रदाय का गठन कर राम मंत्र का प्रचार किया | संत रामानंद जी के गुरु का नाम राघवानंद था जिसका रामानुजाचार्य की भक्ति परंपरा में चौथा स्थान है | रामानंद अपने गुरु से दीक्षा लेकर देशाटन पर निकल गए और समाज में फैली जाति धर्म संप्रदाय आदि की विषमता को नजदीक से देखा | उन्होंने इन्हें समाज से दूर करने के लिए मन में दृढ संकल्प लिया | देशाटन के बाद जब रामानंद आश्रम में वापस गए तो उनके गुरु राघवानंद ने उन्हें आश्रम में नहीं आने दिया | उन्हें यह कह कर मना कर दिया कि तुमने दूसरी जाति के लोगों के साथ भोजन किया तुमने जाति का ध्यान नहीं रखा इसलिए तुम हमारे आश्रम में नहीं रह सकते | अपने गुरु के यह वचन सुनकर रामानंद को बहुत दुख हुआ और उसी समय उन्होंने अपने गुरु का आश्रम त्याग दिया कर अपनी उदार विचारधारा पर आधारित स्वतन्त्र सम्प्रदाय स्थापित किया। 

उसी समय में स्वामी रामानंद ने समाज को सन्देश दिया “”जात पात पूछे ना कोई हरि को भजे सो हरि का होई”” | काशी के पंचगंगा घाट पर अवस्थित श्रीमठ दुनिया भर में फैले रामानंद जी का मूल गुरु स्थान है 

यह वही श्रीमठ है जहां पर रामानंद जी ने शिक्षा ग्रहण की थी | वह भक्ति मार्ग के ऐसे सोपान थे जिन्होंने वैष्णव भक्ति साधना को नया आयाम दिया | उन्होंने इस मार्ग को अधिक उदार और समता मूलक* बनाया और भक्ति के द्वार धनी-निर्धन, नारी-पुरुष, ब्राह्मण सबके लिए खोल दिए | उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे छुआछूत ऊंच नीच और जात-पात का विरोध किया था, जाति प्रथा का विरोध करते हुए उन्होंने सभी जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाया | 

लेकिन यह सब कैसे हुआ, क्यूं हुआ, इसकी भी एक कहानी है | 

काशी लहरतारा बस्ती में ही बसता था एक जुलाहा तरुण | एक पीढी पहले ही उसके पुर्वज मुसलमान हुए थे, अतः मन में हिन्दू धर्म के प्रति सहज अपनत्व था | रामानंद जी की प्रशंसा सुनकर उसने उनसे मिलने का प्रयत्न किया | उसे भरोसा था कि रामानंद जी भेदभाव से परे हैं, उसे अपना शिष्य बनाकर गुरूमंत्र दे ही देंगे | किन्तु शिष्यों ने यह होने नहीं दिया | एक मुसलमान कैसे उनके गुरू के दर्शन पा सकता है भला ? जुलाहा बालक भी धुन का पक्का था, उसने ठान लिया था कि मन से जिसे गुरू मान लिया, उससे गुरूमंत्र लेकर ही मानूंगा | 

रात का अंतिम प्रहर है, मन्दिरों में सुबह की आरती की तैयारी चल रही है | गंगा घाट पर इक्का दुक्का माली आकर अपनी जगह बैठने लगे हैं, इस मुंह अँधेरे में एक सन्यासी तेजी से गंगा की ओर बढ़ रहे हैं | उनके पीछे पीछे है उनकी शिष्य मंडली | कुछ तो शिष्टाचार और कुछ सन्यासी की तेज गति के कारण एक भी शिष्य आगे नहीं है | आचार्य की खडाऊं की खटखट सन्नाटे को चीर रही है | 

आचार्य तेजी से गंगा घाट की सीढियां उतरने लगे, अचानक खडाऊं सहित उनका पूरा पाँव एक किशोर पर पड़ा | वह जोर से चिल्लाया, रोने लगा | महात्मा चोंक पड़े, क्या हुआ बेटा, क्या हुआ, रो मत, अरे तू रास्ते पर क्यों पड़ा था, चोट तो नहीं लगी, राम राम कह, राम राम कह बच्चा | स्वामी जी ने उसके सर पर हाथ रखा, मानो आशीर्वाद दिया | किशोर कबीर ने आचार्य के चरणों में मत्था टेक दिया, मेरा शरीर सद्गुरू के चरणों का स्पर्श पाकर धन्य हो गया | बहुत दिनों की साध पूरी हुई | आपने मुझे राम नाम का मन्त्र दे दिया | आज से यह कबीर अपने आप को गर्व से आचार्य रामानंद जी का शिष्य कह सकेगा | अब किसी उपदेश या आशीर्वाद की औपचारिक आवश्यकता नहीं, गुरू द्वारा दिया गया राम नाम का मन्त्र पर्याप्त है | 

उसके बाद तो रामानंद जी के जो बारह शिष्य प्रसिद्ध और लोकमान्य हुए उनमें जुलाहे कबीर के अतिरिक्त धन्ना जाट, सेना नाई, रैदास चर्मकार, पीपा राजपूत शामिल थे | पीपा राजस्थान की प्रसिद्ध खीची रियासत गागरोन के राजवंश में पैदा हुए थे | अन्य प्रसिद्ध शिष्य हुए -अनंत ,सुखानंद, सुरसुरा नंद, नरहरयानंद,भावानंद, पद्मावती और सुरसरि | 

वे प्रथम भक्ती सुधारक थे जिन्होंने ईश्वर की आराधना का द्वार महिलाओं के लिए भी खोल दिया तथा महिलाओं को अपने शिष्यों के रूप में स्वीकार किया, पद्मावती और सुरसरी उनमें से ही थी | 

रामानंद जी के ये सभी बारह शिष्य द्वादश महाभागवत के नाम से जाने गए | इसमें कबीर, रैदास, सेनदास तथा पीपा के उपदेश आदि ग्रंथ में भी संकलित हैं | इनमें से कबीर और रविदास ने निर्गुण राम की उपासना की थी | क्यों की, इसे समझा जा सकता है | मंदिरों के द्वार उनके लिए बंद थे, लेकिन मन राम की भक्ति से सराबोर था, मन मंदिर में बैठे राम को पूजा और अनुयाईयों को भी उसी रामनाम का मन्त्र देते रहे आजीवन | ऐसे महान रामभक्तों की जय |

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