गुप्त साम्राज्य के महानायक

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समुद्रगुप्त जैसा कि हर महान व्यक्ति या साम्राज्य के साथ होता है, देश के कई समाज उन पर अपना दावा जताते हैं, तो बैसे ही गुप्त साम्राज्य को लेक...

समुद्रगुप्त

जैसा कि हर महान व्यक्ति या साम्राज्य के साथ होता है, देश के कई समाज उन पर अपना दावा जताते हैं, तो बैसे ही गुप्त साम्राज्य को लेकर भी विद्वानों के अलग अलग मत हैं | कोई उन्हें जाट, तो कोई शूद्र, तो कोई वैश्य, तो कोई क्षत्रिय मानते हैं | स्वाभाविक ही यह आत्म गौरव बढाता है, इसलिए इसे अन्यथा भी नहीं लेना चाहिए | हर महान व्यक्ति पूरे देश का होता है, यह मानकर ही क्रांतिदूत पर हम प्रत्येक गौरव पूर्ण आख्यान का बखान करते हैं | विवादों को एक किनारे रखकर आईये हम उस प्रख्यात गुप्त साम्राज्य का बखान करें, जिसे इतिहास कारों ने तीन भागों में विभक्त किया है – आदि काल, उत्कर्ष काल और अवनति काल | आदिकाल में प्रथम राजा हुए श्री गुप्त, जिनके सम्मान में ही शेष राजाओं ने अपने नाम के आगे गुप्त लगाया और जिनके नाम पर ही इसे गुप्त साम्राज्य कहा गया | इस काल के दूसरे दो राजा हैं घटोत्कच और चन्द्रगुप्त प्रथम | घटोत्कच के समय का सोने का सिक्का आज भी रूस के लेनिनग्राड स्थित अजायबघर में रखा है | चन्द्रगुप्त प्रथम का विवाह लिच्छिवी वंश की राजकुमारी कुमारदेवी के साथ क्या हुआ, मानो इनका भाग्यसूर्य भी उदय हो गया | इतिहास लेखक विन्सेंट स्मिथ का मत है कि उस समय तक मगध पर लिच्छिवियों का अधिकार रहा होगा, जो उन्होंने कुमारदेवी के विवाह में चन्द्रगुप्त को भेंट कर दिया | यह भी संभव है कि तब तक ये वंश सामंत रहा हो, क्योंकि गुप्त और घटोत्कच दोनों के नाम के साथ महाराज का ही विशेषण मिलता है, जबकि चन्द्रगुप्त प्रथम के साथ महाराजाधिराज का | यह लिच्छिवी वंश वही था, जिसका प्रजातांत्रिक राज्य भगवान बुद्ध के काल में वैशाली और आज के मुजफ्फरपुर बिहार में स्थित था | जैनधर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर से भी इस कुल का सम्बन्ध माना जाता है | तो स्वाभाविक ही इस कुल की राजकुमारी से विवाह ने गुप्त वंश की प्रतिष्ठा और शक्ति बढ़ा दी | यह अलग बात है कि बाद के राजाओं ने अपने बहुबल और प्रतिभा से इतिहास में गौरव प्राप्त किया | चन्द्रगुप्त प्रथम के समय इस वंश का शासन प्रयाग से पाटलीपुत्र तक था, किन्तु ईसा से चौथे शतक तक गुप्त वंश की प्रभुता सारे भारत में जम गई | मौर्यवंश के लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष बाद सम्पूर्ण भारत पर एकछत्र राज्य करने वाले गुप्तवंशी सम्राट हुए |

उत्कर्ष काल के चारों महान राजाओं को इतिहास सम्राट के रूप में वर्णित करता है | वे हैं – सम्राट समुद्रगुप्त, सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय उपाख्य विक्रमादित्य, सम्राट कुमार गुप्त प्रथम और सम्राट स्कंदगुप्त | तो आईये इन चारों सम्राटों में से सबसे पहले समुद्रगुप्त के कार्यकाल पर नजर डालें |

ईसा पूर्व के मौर्य, श्रंग, कुषाण साम्राज्यों के ह्रास के बाद २७५ ईसवीं सन से गुप्त साम्राज्य का अभ्युदय माना जाता है | मगध के इस प्रतापी हिन्दू राजवंश की ज्योति से समूचा भारत जगमगा उठा था | छोटे छोटे राज्यों में बंटा भारत एक बार फिर एक छत्र के नीचे आया, इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाई सम्राट समुद्रगुप्त ने | अपने जीवन काल में ही पिता चन्द्रगुप्त ने बड़े पुत्र के स्थान पर अपने छोटे किन्तु सुयोग्य पुत्र समुद्रगुप्त को उत्तराधिकारी नियत कर दिया था | यह उनके शौर्य, पराक्रम और योग्यता को देखते हुए ही किया गया था | पिता का आंकलन ठीक ही निकला | समुद्रगुप्त ने मगध की टिमटिमाती दीप शिखा को प्रचंड ज्वाला में रूपांतरित कर दिया | संस्कृत के तत्कालीन महाकवि हरिशेण ने उनकी दिग्विजय यात्रा का सविस्तार वर्णन लिखा, जो प्रयाग के किले में स्थित प्रस्तर स्तम्भ पर गद्य और पद्य दोनों में उत्कीर्ण है | यूं तो वह स्तम्भ मूलतः सम्राट अशोक का का है, किन्तु संभवतः बाद में उसी पर समुद्रगुप्त की प्रशस्ति भी अंकित करवाई गई |

उक्त आलेख के अनुसार समुद्रगुप्त ने सैकड़ों युद्धों में विजय प्राप्त की | उनका शरीर शस्त्रों से लगे हुए सैकड़ों घावों से शोभायमान था | भारत की तत्कालीन सभी शक्तियों ने उनके अधिपत्य को स्वीकार कर लिया था | राजाओं के राज्य छीनना समुद्रगुप्त की नीति नहीं थी, उनकी तो एक ही अभिलाषा थी कि देश के सभी राजा एक छत्र के नीचे रहें, उनके शासन को स्वीकार करें | उनका प्रखर प्रताप केवल उत्तर भारत में ही नहीं तो दक्षिण में लंका तक छा गया था | बंगाल, आसाम, नेपाल, कुमाऊँ, गढ़वाल के नरेश भी उन्हें कर देने लगे थे | पूर्व में ब्रह्मपुत्र से पश्चिम में चम्बल तक, तो उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा तक समुद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तृत था | श्रीलंका के राजा मेघवर्ण से उनके मैत्री सम्बन्ध थे | बहुधा रणविजई राजा स्वभाव से क्रूर हो जाते हैं, किन्तु समुद्रगुप्त के साथ ऐसा नहीं था | महान योद्धा होने के साथ साथ वे दानवीर, दयालु, मृदु ह्रदय और दीन दुखियों के सहायक भी थे | वे शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत थे | उनके राज दरवार में अनेक विद्वान शोभा पाते थे | वे स्वयं भी एक महान कवि व संगीत रसिक थे | वीणा बजाते हुए उनका चित्र उनके सिक्कों पर मिलता है तथा हरिशेण ने तो उनकी प्रशस्ति करते हुए वीणा वादन में देवर्षि नारद व गन्धर्व तुम्बरू के तुल्य ही लिख दिया था | आईये कल्पना के पंखों पर सवार होकर हम भी समुद्रगुप्त के राजदरवार में चलकर तत्कालीन समाज की शक्ति व समुद्रगुप्त की गुणीजनों के सम्मुख विनयशीलता को प्रदर्शित करते एक प्रसंग का अवलोकन करें –

सम्राट समुद्रगुप्त के दरवार में उपस्थित सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर नर्तकी मंजरी की नृत्यकला का अवलोकन कर रहे थे, जैसे ही नृत्य समाप्त हुआ तो मानो सब स्वर्ग से प्रथ्वी पर वापस आ गए | करतल ध्वनी से सभागृह गूँज उठा | महाराज ने स्वयं उठकर अपने गले से मोतियों की माला उतारकर पुरष्कार स्वरुप मंजरी को समर्पित कर दी | मंजरी ने आज पहली बार ही दरवार के रत्नों में सम्मिलित होने का आमंत्रण स्वीकार करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन किया था | सम्राट का उत्सुक स्वर गूंजा – मंजरी तुम भारतीय नृत्य कला की सजीव प्रतिमा हो, और मुझे गर्व है कि आज अपनी राज्यसभा के रत्न के रूप में मैं तुम्हारा सम्मान कर रहा हूँ | काश इस समय इस नृत्य के साथ आचार्य शशांक का गायन भी हो रहा होता तो सोने में सुहागा होता | कैसा विलक्षण दृश्य होता वह | हमने उन्हें आमंत्रित करने स्वयं अमात्य चंद्रसेन को भेजा है, वे भी आते ही होंगे |

सचमुच तभी चंद्रसेन आ भी गए, किन्तु अकेले, उनके साथ आचार्य शशांक नहीं आये थे | सम्राट ने पूछा, क्या हुआ, आचार्य नहीं आये | हताश स्वर में अमात्य बोले – जी उन्होंने इनकार कर दिया | आश्चर्य से सम्राट ने कहा – हमने तो उन्हें सादर अपने दरवार का रत्न घोषित करते हुए आमंत्रित किया था, फिर उन्होंने आने से इनकार क्यों किया ? चंद्रसेन बोले – आचार्य का कहना था कि यह राजाज्ञा मेरा सम्मान नहीं है, अपने जीवन में सम्राट की राज्यसभा का रत्न बनने से बढ़कर दूसरा अपमान शशांक नहीं मानता | कला की साधना मेरी तपस्या है, इसका प्रदर्शन किसी के मनोविनोद के लिए नहीं किया जा सकता | सम्राट की राज्यसभा तक मेरी कला पहुंचे, इसके स्थान पर अगर सम्मान करना है, तो राजसभा को यहाँ मेरे आश्रम में आना चाहिए | आशा है सम्राट इस पद को अस्वीकार करने की मेरी ध्रष्टता को क्षमा करेंगे |

मैंने उनसे यह भी कहा कि इस प्रकार राजाज्ञा को ठुकराकर आप शासन व्यवस्था का अपमान कर रहे हैं | यह विद्रोह है, मुझे आपको बंदी बनाना होगा | वे आये हैं, लेकिन बंदी के रूप में अभी दरवार के बाहर ही हैं | सम्राट की आज्ञा से आचार्य शशांक को दरवार में लाया गया और एक बार फिर उन्होंने वही सब कहा, जो अमात्य पहले ही बता चुके थे | हैरत से सम्राट ने पूछा कि आचार्य आपको प्राणदंड दिया जा सकता है, आपको भय नहीं लगता | हंसकर शशांक बोले – सम्राट मृत्यु से भयभीत होना तो, जीवन देने वाले परमपिता परमेश्वर का अपमान करना है | सम्राट ने व्यवस्था दी, तो ठीक है, कल सूर्योदय के समय आपको पर्वत की चोटी से हाथ पैर बांधकर नदी में फेंक दिया जाएगा |

अगले दिन का सूर्योदय हुआ, विस्मित सम्राट उस स्थान पर पहुंचे जहाँ आचार्य को बंदी बनाकर रखा गया था | दूर कहीं कोयल कूक रही थी, पुरवाई अंगडाई ले रही थी, तो आसमान में अरुणिमा की छटा बिखर रही थी | और इसके साथ ही बंदीगृह की दीवारों को पारकर वातावरण में गूँज रहा था वह अलौकिक संगीत जो आचार्य के कंठ से फूट रहा था | सम्राट आत्मविस्मृत, मूक निश्चेष्ट खड़े न जाने क्या सोच रहे थे | तभी बंदीगृह का लौहद्वार खुला और दो सशस्त्र प्रहरियों के साथ गैरिक वस्त्र पहने आचार्य शशांक निर्भय मुद्रा में बाहर आये | सम्राट ने हठात आगे बढ़कर उन्हें आलिंगन कर लिया और रुंधे कंठ से कहा, आचार्य यह आपकी स्वर साधना थी या अमृत वर्षा | अमात्य आचार्य को ससम्मान उनके आश्रम में पहुंचा दो और अगर आचार्य अनुमति दें तो आज सायंकाल राजदरवार आश्रम के प्रांगण में ही लगे | नहीं नहीं राज दरवार नहीं संगीत सभा हो वहां, जिसमें सभी नागरिकों को भी आमंत्रित किया जाए |

तो यह है उस युग का एक चित्र | कितने निर्भीक और निस्वार्थ कलाकार | ऐसी प्रजा का राजा तो गुणों की खान होगा ही, स्वाभाविक ही ऐसी प्रजा पर राज करने वाले राजा को तो इनसे कहीं बेहतर होना ही होता रहा होगा |

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य

जिस प्रकार समुद्रगुप्त के पिता ने अपने छोटे पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाया था, उसी परिपाटी का निर्वाह करते हुए समुद्रगुप्त ने भी अपने छोटे पुत्र चन्द्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया | किन्तु उनकी मृत्यु के बाद बड़े पुत्र रामगुप्त ने अपने पिता की इच्छा का अनादर करते हुए स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया | चन्द्रगुप्त ने भी बड़े भाई का मान रखा और कोई विरोध नहीं किया | किन्तु स्वार्थी व्यक्ति कायर और भीरु भी होता है | सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने शासन काल में जिन शकों को भारत भूमि से खदेड़ दिया था, रामगुप्त द्वारा सत्ता संभालने के महज कुछ वर्षों बाद ही शकों ने सीधे मगध पर ही आक्रमण कर दिया | रामगुप्त ने थोडा बहुत प्रतिकार किया, किन्तु संभावित पराजय का अनुमान कर शकों से संधि की वार्ता चलाई | शकों ने संधि की बेहद अपमानजनक शर्त रखी | महारानी ध्रुवस्वामिनी सहित सभी सरदारों की कन्याएं भेजी जाएँ, यह मांग रखी | संभवतः शकों ने भी नहीं सोचा होगा कि रामगुप्त यह शर्त स्वीकार कर लेगा | वे तो युद्ध ही चाहते थे, ताकि राज्य हस्तगत हो जाएगा | लेकिन आश्चर्य कि कायर रामगुप्त ने यह शर्त स्वीकार कर ली | महारानी ध्रुवस्वामिनी को काटो तो खून नहीं | वे बेहद दुखी हो गईं और कातर भाव से उन्होंने चन्द्रगुप्त से अपनी रक्षा की प्रार्थना की | प्रजा में भी इस समाचार से असंतोष पैदा हो चुका था | लोग रामगुप्त से घृणा करने लगे थे |

और उसके बाद चन्द्रगुप्त ने वह ऐतिहासिक निर्णय लिया, जिसके कारण वह इतिहास में सदा सर्वदा के लिए अमर हो गया | जो प्रसंग महारानी पद्मिनी और खिलजी का है, लगभग वैसा ही हुआ | अंतर केवल इतना है कि वहां खिलजी जीता था, यहाँ शकों का पराभव हुआ | यह जागृत समाज की शक्ति का जागरण था | क्या सेना क्या आमजन सभी आक्रोशित हो उठे थे | योजना पूर्वक चन्द्रगुप्त स्वयं महारानी ध्रुवस्वामिनी बनकर डोली में बैठा, तो अन्य सौ डोलियों में भी सशस्त्र सैनिक बैठे | डोलियाँ उठाने वाले कहार भी सब सैनिक ही थे, जिनके शस्त्र भी डोलियों में ही छुपे हुए थे | और इस प्रकार लगभग एक हजार सशस्त्र सैनिक शक राजा के शिविर में जा पहुंछे | फिर क्या था, जैसे ही असावधान शक राजा नजदीक आया, मारा गया | उसे मारने के तुरंत बाद युद्ध का शंख फूंक दिया गया | अन्दर से तो शिविर में प्रवेश कर चुके सैनिकों ने मारकाट मचा दी और शंख ध्वनि सुनते ही, बाहर से भी पहले से सन्नद्ध सेना टूट पड़ी | सेना ने तो शकों को धूल में मिलाया, जबकि जनता जनार्दन ने रामगुप्त को उसकी कायरता का दंड देते हुए, यमलोक पहुंचा दिया | शक सेना का ठीक बैसा ही विध्वंश हुआ, जैसा उसके पूर्व शकारी विक्रमादित्य ने किया था | चन्द्रगुप्त राजा बने तो इतिहास ने उन्हें भी चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से ही स्मरण रखा | जबकि आमजन ने उसके बाद रामगुप्त का नामकरण शर्मगुप्त कर दिया | यह युद्ध हिमालय की पर्वतीय श्रंखला में गोमती नदी की घाटी में हुआ था |

उक्त घटना का वर्णन करते हुए धार नरेश महाराज भोज ने स्वरचित श्रृंगार प्रकाश में लिखा –

स्त्रीवेश निन्ह तः चन्द्रगुप्तः शत्रोः स्कंधावार मलिपुर शकपति वधाया गमत |

चन्द्रगुप्त द्वितीय ने राज सिंहासन पर बैठने के बाद महारानी ध्रुवस्वामिनी से विवाह कर लिया, और साथ ही गुजरात, मालवा और बल्ख तक आक्रमण कर शकों का समूल विनाश कर दिया | उस समय के शिलालेखों से उनकी दिग्विजय यात्राओं का वर्णन मिलता है | मालवा में सांची के नजदीक उदयगिरी पर्वत की गुफा में ऐसा ही एक लेख मिला है =

कृत्स्न पृथ्वी जयार्थेन राज्ञे वेह सहागतः |

भक्त्या भगवतः शम्भोर्गुहा मेतामकारयत |

यह चन्द्रगुप्त के सेनापति वीरसेन लिखित है, जो उसने भगवान शिव की पूजा के लिए बनवाई गई गुफा में उत्कीर्ण करवाया | इसका अर्थ है – जिस समय राजा पृथ्वी जीतने आया, मैं भी उसके साथ था, भक्ति पूर्वक भगवान शंभू की पूजा के लिए यह गुफा बनवाई |

उस काल में भारत तीन प्राकृतिक विभागों में बंटा हुआ था | हिमालय और विन्ध्य पर्वतमालाओं के बीच का प्रदेश आर्यावर्त या उत्तरापथ कहलाता था, तो नर्मदा और तुंगभद्रा नदियों के बीच का भाग दक्षिणापथ | सुदूर दक्षिण प्रांत को तमिल या द्रविड़ देश कहा जाता था | दक्षिण के राजवंशों में तीसरी से छठीं सदी तक वाकाटक वंश का प्रताप बहुत बढ़ा चढ़ा था | वे गुप्त सम्राटों के अधीन नहीं, बल्कि मित्र थे | चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती का तो विवाह ही वाकाटक वंशी रुद्रसेन से हुआ था | प्रभावती चन्द्रगुप्त की नागवंशी रानी कुबेरनागा से उत्पन्न हुई थीं | जबकि महारानी ध्रुवदेवी ने कुमार गुप्त और गोबिंदगुप्त नामक दो पुत्रों को जन्म दिया था, जिनमें से कुमार गुप्त चन्द्रगुप्त के बाद सिंहासन पर बैठे |

दिल्ली के नजदीक स्थित क़ुतुब मीनार के पास ही एक लौह स्तम्भ पर चन्द्रगुप्त का विजय वृतांत लिखा है –

उसके पराक्रम रूपी पवन से दक्षिणी समुद्र अब तक सुवासित हो रहा है | उसने एकाधिराज अपने भुजबल से प्राप्त किया और चिरकाल तक उसे भोगा | उस राजा ने भक्तिभाव से भगवान विष्णू का एक ऊंचा ध्वज स्तम्भ विष्णूपद नामक पहाडी पर स्थापित किया | भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू ने विश्व के महापुरुषों पर जो पुस्तक लिखी, उसमें उन्होंने भी इस लौह स्तम्भ को चन्द्रगुप्त का विजय स्तम्भ ही लिखा है | उन्होंने जो लिखा वह इस प्रकार है –

यह लाट कारीगरी का एक बढ़िया नमूना है | इसकी चोटी पर कमल का फूल है, जो गुप्त साम्राज्य का चिन्ह था | गुप्त युग में पुरातन आर्य संस्कृति और संस्कृत का व्यापक रूप से पुनरुत्थान हुआ | संस्कृत राजभाषा थी | संस्कृत के अद्भुत कवि कालिदास इसी जमाने में हुए थे | समुद्रगुप्त के बेटे चन्द्रगुप्त द्वितीय ने काठियाबाड और गुजरात को जीत लिया, जहाँ बहुत समय से शक या तुर्की राजवंश के शासन चले आ रहे थे | इसने अपना नाम विक्रमादित्य रखा और उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया |

इसी युग में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया उसने लिखा है कि राज्य में लोग खुशहाल और सुखी थे, न्याय का पालन उदारता से किया जाता था और मौत की सजा नहीं थी | संपन्न और विशाल बौद्ध बिहार बहुत थे | मुख्य सडकों पर धर्मशालाएं थीं, जहाँ मुसाफिर आकर ठहर सकते थे और जहाँ सरकारी खर्च पर खाना दिया जाता था | बड़े बड़े नगरों में निशुल्क दवाखाने भी थे | भारत भ्रमण के बाद फाह्यान तो समुद्री मार्ग से लंका गया, किन्तु उसके एक साथी ताओ चिंग को भारत इतना पसंद आ गया, की वह तो हमेशा के लिए भारत का ही हो गया |

तो कुल मिलाकर यह कि विदेशी पर्यटकों ने भी उस युग के राजा और प्रजा की उदारता का उल्लेख किया है | चन्द्रगुप्त की धर्मपरायणता को देखकर ही कई जगह उन्हें राजाधिराजर्षि भी लिखा गया है | निश्चय ही यह ऋषि पद बहुत मायने रखता है, और यह किसी को यूं ही नहीं मिल जाता | अजन्ता की दीवारों पर बने हुए सर्वोत्तम चित्र और विशाल उपासना गृह गुप्त काल की कला के उत्कृष्ट नमूने हैं |

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने तेईस वर्ष राज्य किया, उनके बाद उनके पुत्र कुमारगुप्त ने चालीस वर्ष तक राज्य किया | कुमार गुप्त के पुत्र स्कंदगुप्त सन 453 ईसवी में गद्दी पर बैठे |

स्कंदगुप्त

अपने दादा समुद्रगुप्त व पिता चन्द्रगुप्त द्वारा स्थापित विशाल साम्राज्य के उत्तराधिकारी कुमारगुप्त को कोई विशेष पुरुषार्थ का प्रदर्शन नहीं करना पड़ा | राज्य में शांति थी, तो प्रजा भी समृद्ध थी | अपने तिरतालीस वर्ष के शासन काल में कुमारगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ किया और पुष्यमित्रों से युद्ध करना पड़ा | सामंतों की मदद से उनका साम्राज्य व्यवस्थित रहा |किन्तु कुमार गुप्त की मृत्यु के बाद बड़े पुत्र पुरगुप्त का शासन प्रारंभ होते ही, गुप्तों का बंगाल से सौराष्ट्र तक का एकछत्र शासन ढहने लगा | हूणों का आक्रमण हुआ, साथ ही आतंरिक सत्ता संघर्ष भी चला |

पांचवी शताब्दी के अंत में हूणों का एक दल रोम साम्राज्य पर आक्रमण करने गया, तो दूसरा दल खिंगिल और तोर्मान के नेतृत्व में भारत की ओर बढ़ा | यह बर्बर जाति निर्दयतापूर्वक अत्याचार करती हुई आई, नगर के नगर जला दिए गए, पुरुष वर्ग कुचल डाला गया और स्त्रियाँ दासी बना ली गईं | इनकी पाशविक क्रूरताओं से गुप्त साम्राज्य का पश्चिमी प्रांत त्राहि त्राहि कर उठा |

ऐसी स्थिति में स्कन्दगुप्त शुद्ध कर्तव्य बुद्धि से प्रेरित होकर इस महा विपत्ति से निबटने को तत्पर हुए, तो पुरगुप्त केवल षडयंत्रों का ताना बाना बुनता रहा | उस समय की स्थितियों परिस्थितियों का बहुत सुन्दर वर्णन भारत के मूर्धन्य साहित्यकार स्व. जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक “स्कंदगुप्त” में किया है, जिसे पढ़कर नसों में बिजली दौड़ जाती है | साम्राज्य का एकछत्र आधिपत्य अपने सौतेले भाई पुरगुप्त के लिए छोड़ देना और स्वयं आजन्म अविवाहित रहकर राष्ट्र रक्षा के लिए स्वयं को होम देना, जैसे प्रसंग किसे मुग्ध नहीं कर देंगे | भीतरी और जूनागढ़ से प्राप्त शिलालेखों से स्कंदगुप्त के अलौकिक पराक्रम के अतिरिक्त मानवीय संवेदनाओं का पता चलता है | शक्ति के साथ विनय, वीरता के साथ करुणा, विजय के साथ लोक संरक्षण, उनकी उदारता, त्याग और कष्ट सहिष्णुता का भान होता है | तो आईये स्कंदगुप्त के कथानक पर द्रष्टि डालते हैं –

कुमारगुप्त के जीवन काल में ही मालवा पर हूणों का आक्रमण हुआ और मालवाधिपति बन्धुबर्मा ने मदद की गुहार लगाई | यह वह समय था, जब गुप्त साम्राज्य की सेना पुष्यमित्रों से भी संघर्ष में व्यस्त थी | अतः मालवा की मदद का जिम्मा अकेले स्कंदगुप्त ने अपने कन्धों पर लिया | इधर स्कंदगुप्त शत्रुओं से मुकाबला कर रहे थे, तो राजधानी में पुरगुप्त, उनकी मां अनंत देवी और सेना नायक भटार्क के षडयंत्रों के चलते सम्राट का निधन हो गया और सत्ता सूत्र पुरगुप्त ने हाथ में ले लिए | यह दुर्दशा देखकर साम्राज्य के परम हितैषी महामात्य प्रथ्वीसेन और प्रधान सेनापति पर्णदत्त ने आहत होकर आत्महत्या कर ली | सम्राट कुमार गुप्त के भाई गोबिंदगुप्त इस पारिवारिक स्थिति से दुखी होकर मालवा की ओर प्रस्थान कर गए | जानकारी मिलने के बाद भी कौटुम्बिक कलह के स्थान पर स्कंदगुप्त ने मालवा से शत्रुओं को खदेड़ने को ही प्राथमिकता दी और हूणों का मुकाबला करने को सैन्य बल संगठित करते रहे | इस कार्य में चाचा गोबिंदगुप्त ने उनकी भरपूर मदद की |

मालवा को निरापद बनाने और हूणों को सिंध के पार धकेलने के बाद स्कन्द मगध की राजधानी कुसुमपुर वापस लौटे, और बिमाता अनंत देवी को देश की परिस्थिति के प्रति आगाह भी किया, साथ ही यह भी कहा कि मुझे राज्य का कोई लोभ नहीं है, आर्यावर्त पर अभी भी संकटों के बादल मंडरा रहे हैं, यह समय परस्पर लड़ने का नहीं है | मुझे सैनिक बनकर संघर्ष करने दें, राज्य पुरगुप्त करते रहें | उसके बाद स्कंदगुप्त अपनी मां को साथ लेकर उज्जयिनी चले गए | मालवाधिपति बन्धुबर्मा ने भी उनका स्वागत ही किया, क्योंकि वे भी जानते थे कि हूणों का आक्रमण दुबारा होगा ही और उनसे कोई रक्षा कर सकता है, तो केवल स्कन्दगुप्त ही | साम्राज्य की सुव्यवस्था के लिए, आर्य राष्ट्र के त्राण के लिए स्कन्दगुप्त उज्जयनी में रहें, इसी में सबकी भलाई है |

उसके बाद गोबिंद गुप्त और बन्धुबर्मा ने आग्रह पूर्वक स्कंदगुप्त को सम्राट घोषित कर सिंहासन पर बैठा दिया | शक और हूणों को परास्त करने वाले स्कन्दगुप्त को विक्रमादित्य का विरुद प्राप्त हुआ | मालवानरेश बन्धुबर्मा इस साम्राज्य के प्रधान सेनापति घोषित हुए | लेकिन षडयंत्र तो इसके बाद भी रुके नहीं, चलते रहे | हूण सेनापति खिंगिल ने पुरगुप्त को सम्राट बनाने का लालच देकर अपने साथ मिलाया और एक बार फिर आक्रमण किया | मगध की सेना भी दिखाबे के लिए भटार्क के नेतृत्व में स्कंदगुप्त का साथ देने आई | कुभा के रणक्षेत्र में उनका सामना करने को स्कन्दगुप्त के नेतृत्व में सेना आगे बढ़ी, तो नासीर में बंधूवर्मा ने हूणों का मुकाबला किया | योजनाबद्ध रूप से भटार्क ने हूणों का तो मार्गदर्शन किया और कुभा नदी पर बना बाँध ठीक उस समय तोड़ दिया, जब सेना सहित स्कन्द नदी पार कर रहे थे | उसने सोचा था कि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी | स्कन्द बाढ़ में डूबकर मर जाएगा और उसके स्वामी पुरगुप्त निष्कंटक हो जायेंगे | उसकी यह कुटिल नीति कारगर रही, भीषण युद्ध में बन्धुबर्मा वीरगति को प्राप्त हुए, तो स्कंदगुप्त सहित सेना का बड़ा भाग उफनती कुभा नदी में बह गया |

पंचनद पंजाब हूणों के अधिकार में पहुँच गया और वे काश्मीर पर भी अधिकार जमाने को आगे बढे | यह शर्मनाक स्थिति थी कि तत्कालीन बौद्ध श्रमणों ने भी हूणों का साथ दिया | क्योंकि उनको भय था कि स्कन्दगुप्त के शासन में ब्राह्मणों का बर्चस्व रहेगा | उधर किसी प्रकार तैरकर स्कंदगुप्त किनारे पर आये तो उन्हें देखते ही हूणों के अत्याचारों से त्रस्त जनसमुदाय ने उन्हें सर माथे लिया | यह अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद था | आसुरी वृत्तियों के नाश को, सोया समाज जाग उठा | और तो और भटार्क भी अपनी भूल समझ गया और स्कंदगुप्त के सम्मुख आकर प्रायश्चित स्वरुप आत्महत्या को उद्यत हुआ | स्कन्द ने उसे रोका और कहा –

तुम वीर हो और इस समय देश को वीरो की आवश्यकता है | तुम्हारा सच्चा प्रायश्चित यही होगा कि रणभूमि में प्राण देकर जननी जन्मभूमि के लिए समर्पित हो | आत्महत्या के लिए जो अस्त्र तुमने उठाया है, उसे शत्रु के लिए सुरक्षित रखो | मैं भी साम्राज्य के लिए नहीं, जन्मभूमि के उद्धार के लिए जरूरत हुई, तो अकेला युद्ध करूंगा |

भटार्क ने स्कंदगुप्त के सामने घुटने टेककर प्रणाम किया और तलवार ऊपर उठाकर उच्च स्वर से बोला – सम्राट स्कंदगुप्त विक्रमादित्य की जय | आपकी जो आज्ञा होगी, वही करूंगा | तत्कालीन कवियों ने लोक जागरण करते हुए घूमघूम कर आमजन से आग्रह किया –

देश की दुर्दशा निहारो,

डूबते हुओं को उबारो,

हारते ही रहे न बचा कुछ हारने को,

अब अपने आप को तो न हारो |

जो दे सकता हो प्राण,

जन्मभूमि के लिए कर सके उत्सर्ग जान,

बैसे वीर चाहिए,

दे सकें भिक्षा यही, तो सामने आईये |

उसके बाद दोबारा सैन्य बल संकलित होने में देर नहीं लगी | नागरिकों में से ही बहुत से युवक इस आव्हान पर निकल उठे | हूणों की हिंसा वृत्ति देखकर बौद्ध भी उनसे विरत हो गए, अतः जो स्थानीय मदद उन्हें मिल रही थी, वह बंद हो गई | और उसके बाद तो यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आर्यावर्त हूणों से निरापद हो गया | हूण सेनापति खिंगिल को परास्त कर बंदी बना लिया गया |

स्कंदगुप्त सफल हुए, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि मैं कुछ नहीं हूँ, परमात्मा के हाथ का अमोघ अस्त्र हूँ | मुझे उसके संकेत पर केवल अत्याचारियों के विरुद्ध प्रेरित होना है | किसी से मेरी शत्रुता नहीं है, क्योंकि मेरी निजी कोई इच्छा आकांक्षा नहीं है | शक और हूणों को परास्त करने के बाद स्कंदगुप्त ने साम्राज्य की स्थिति सुद्रढ़ करने पर ध्यान दिया और विभिन्न प्रान्तपाल बनाये | सौराष्ट्र के गिरनार में बनी सुदर्शन झील आज भी स्कन्दगुप्त का यशगान करती है | संभवतः भारत की रक्षा करते करते किसी युद्ध में ही ४६७ ईसवी में उन्होंने वीरगति पाई | अविवाहित थे, अतः उनके बाद पुरगुप्त व उसके वंशजों ने ही लगभग १०० वर्ष और गुप्त साम्राज्य का नाम जीवित रखा | आईये जयशंकर प्रसाद जी द्वारा गाये गए भारत भक्ति गान के साथ इस कथानक का समापन करें –

हिमालय के आँगन में उसे,

प्रथम किरणों का दे उपहार |

उषा ने हंस अभिनन्दन किया,

और पहनाया हीरक हार ||

जगे हम, लगे जगाने विश्व,

लोक में फैला फिर आलोक |

व्योम तम पुंज हुआ तब नष्ट,

अखिल संसृति हो उठी अशोक ||

विमल वाणी ने वीणा ली,

कमल कोमल कर में सप्रीत |

सप्तस्वर सप्त सिन्धु में उठे,

छिड़ा तब मधुर साम संगीत ||

बचाकर बीज रूप से सृष्टि,

नाव पर झेल प्रलय का शीत |

अरुण केतन लेकर निज हाथ,

वरुण पथ में हम बढे अभीत ||

सुना है दधीचि का वह त्याग,

हमारी जातीयता विकास |

पुरंदर ने पवि से है लिखा,

अस्थि युग का मेरा इतिहास ||

सिन्धु सा विस्तृत और अथाह,

एक निर्वासित का उत्साह |

दे रही अभी दिखाई भग्न,

मग्न रत्नाकर में वह राह ||

धर्म का ले लेकर जो नाम,

हुआ करती बलि करदी बंद |

हमीं ने दिया शांति सन्देश,

सुखी होते देकर आनंद ||

विजय केवल लोहे की नहीं,

धर्म की रही धरा पर धूम |

भिक्षु होकर रहते सम्राट,

दया दिखलाते घर घर घूम ||

यवन को दिया दया का दान,

चीन को मिली धर्म की द्रष्टि |

मिला था स्वर्ण भूमि को रत्न,

शील की सिंहल को भी सृष्टि ||

किसी का हमने छीना नहीं,

प्रकृति का रहा पालना यहीं |

हमारी जन्मभूमि थी यहीं,

कहीं से हम आये थे नहीं ||

जातियों का उत्थान पतन,

आंधियां झडी प्रचंड समीर |

खड़े देखा, झेला हंसते,

प्रलय में पीला हुए हम वीर ||

चरित थे पूत, भुजा में शक्ति,

नम्रता रही सदा संपन्न |

ह्रदय के गौरव में था गर्व,

किसी को देख न सके विपन्न ||

हमारे संचय में था दान,

अतिथि थे सदा हमारे देव |

बचन में सत्य, ह्रदय में तेज,

प्रतिज्ञा में रहती थी टेव ||

वही है रक्त, वही है देश,

वही साहस है, बैसा ज्ञान |

वही है शान्ति, वही है शक्ति,

वही हम दिव्य आर्य संतान ||

जियें तो सदा उसी के लिए,

यही अभिमान रहे यह हर्ष |

निछावर करदें हम सर्वस्व,

हमारा प्यारा भारत वर्ष ||

हमारा प्यारा भारतवर्ष ||


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क्रांतिदूत: गुप्त साम्राज्य के महानायक
गुप्त साम्राज्य के महानायक
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