किस्से कहानियों के नायक धार अधिपति भोज

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वैरीसिंह परमार रची धार, असि-धार-बल, वहा सरस्वती धार, धारासार किये भोज ने, अर्थात वैरीसिंह परमार ने अपनी तलवार की दम पर धार को बसाया, वहां भ...



वैरीसिंह परमार रची धार, असि-धार-बल,

वहा सरस्वती धार, धारासार किये भोज ने,

अर्थात वैरीसिंह परमार ने अपनी तलवार की दम पर धार को बसाया, वहां भोज ने विद्वानों को सम्मानित कर सरस्वती की धारा प्रवाहित की | इसीलिए कहा गया -

जे नहीं होतो भोज, कविन मौज देतो कवन,

कालिदास को ओज, को बढ़ावतो चतुर्दिक,

अगर भोज नहीं होते तो कवियों को संपन्न कौन बनाता और कौन कालिदास का यश चारों और फैलाता | उनकी विदुषी पत्नी के लिए भी लिखा गया -

कठिन गणित व्यवहार, लीला कौन बनावतो,

पति सम विदुषी नारि, जो न होति लीलावती |

स्मरणीय है कि गणित की अद्भुत पुस्तक लीलावती, भोज की विद्वान पत्नी लीलावती ने ही लिखी थी, जिसका भाष्य करने में बड़े बड़े विद्वानों को भी पसीना आ जाता है | परमार और धार के सम्बन्ध को लेकर भी कहा गया -

होते नहिं परमार, धार कीर्ति किमि फैलती,

धार बिना आधार, बढ़तो किमि परमार यश,

जंह परमार तंह धार, धार जहाँ परमार तहं,

बिन पंवार नहिं धार, धार बिना परमार नहिं ||

कवी ने धार और परमार राजपूतों को एक दूसरे का पूरक बताया है |

भोज राजा बने और मुंज की ह्त्या का बदला तैलप से भरपूर लिया | उसकी भी वही गति हुई, जो उसने मुंज की की थी | इसके अतिरिक्त भोज ने चेदि देश के राजा गांगेयदेव को भी पराजित किया और गजब देखिये गांगेय गंगू हो गए व तैलप का अपभ्रंश तेली हो गया और कहावत प्रचलित हो गई कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली | इसी की पुष्टि करते हुए डॉ. प्राणनाथ शुक्ल ने एक लेख में उद्धृत किया है कि भोज की पाठशाला में एक श्लोक खुदा है, जिसका अर्थ है –

जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण गांगेय नामक शक्तिशाली राक्षस को और पांडव गंगापुत्र गांगेय भीष्म को पराजित कर संतुष्ट हुए, उसी प्रकार हे भोज तू भी त्रिपुरी के गांगेयदेव और तेलंगाना के चालुक्य नरेश को पराजित कर प्रसन्न हुआ |

भोज के पराक्रम का वर्णन करते हुए तबकाते अकबरी में लिखा है कि जब महमूद सोमनाथ विध्वंश कर वापस लौट रहा था, तब उसे ज्ञात हुआ कि परमदेव नामक एक राजा उससे दो दो हाथ करने आगे बढ़ रहा है | इससे भयभीत होकर महमूद सिंध के रास्ते मुल्तान की तरफ बढ़ गया | विद्वानों का मत है कि परमदेव से तात्पर्य परमार नरेश भोज से ही है |

लेकिन भोज की प्रसिद्धि उनके पराक्रम की तुलना में उनकी धर्मपरायणता, दान और विद्वत्ता को लेकर अधिक हुई है | राज तरंगिणी में उनकी प्रशस्ति में लिखा है–

मालवाधिपतिर भोजः प्रहितैः स्वर्णसंचयेः,

अकारयद्येन कुण्डयोजनं कपटेश्वरेः |

मालवा नरेश भोज द्वारा दिए गये स्वर्ण से कश्मीर के कपटेश्वर में एक कुण्ड बनवाया गया | अपने राज्य में ही नहीं तो सुदूर कश्मीर में भी धार्मिक कार्यों के लिए धन देने का यह प्रसंग परिचायक है | यह पापसूदन कुण्ड आज भी कश्मीर के कोटेर गाँव के पास स्थित है, वहीं भोज द्वारा बनवाये गए शिव मंदिर के ध्वंसावशेष भी हैं | राजधानी धार में संस्कृत पठन पाठन के लिए बनवाई गई पाठशाला भी आज मस्जिद में रूपांतरित होकर स्थाई तनाव का कारक बनी हुई है | इसमें उनके द्वारा ही लिखित कूर्मशतक नामक काव्य और भर्तहरि की कारिका आदि ग्रन्थ पत्थर की शिलाओं पर खुदवाकर रक्खे गए थे | इसी के पास एक कुआ भी था, जिसे सरस्वती कूप कहा जाता था | लोगों की धारणा थी कि जो भी उस कुए का जल पी लेता है, वह विद्वान हो जाता है | वस्तुतः यह यश उस पाठशाला से निकले छात्रों की विद्वत्ता को देखकर हुआ होगा | भोज ही नहीं उनके वंशज नरवर्मा और अर्जुनवर्मा ने भी नागबन्ध चित्र और पारिजात मंजरी नाटिका को शिलालेखों के रूप में वहां स्थापित किया था, जिनमें से एक शिला वहां प्राप्त भी हुई |

लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि जब मालवा पर मुस्लिम आधिपत्य हुआ, तब सरस्वती का यह पावन मंदिर अर्थात पाठशाला तोड़कर मस्जिद बना दी गई | यह स्थान आजकल मौलाना कमालुद्दीन की कब्र के पास होने से कमाल मौला की मस्जिद के नाम से जानी जाती है | इसी प्रकार भोज के द्वारा बनवाये गए एक मठ को भी दिलावर खां गौरी ने मस्जिद में परिणित कर दिया | वहां आज भी लोहे की एक लाट ओंधे मुंह जमीन पर पड़ी है, जो कभी राजा भोज का विजय स्तम्भ रहा होगा |

खैर भोजशाला का यह विवाद तो अब न जाने कब शांत होगा | हम तो भोज पर ही ध्यान केन्द्रित करते हैं | मिस्टर विंसेट स्मिथ लिखते हैं कि भोज की सबसे श्रेष्ठ यादगार भोजपुर की वह बड़ी झील थी, जो भोपाल के दक्षिण पूर्व में गोलाकार में खडी पहाड़ियों के बीच के भाग को बड़े बांधों से बांधकर ढाईसौ वर्ग मील से भी अधिक स्थान के जल को इकठ्ठा करती थी, और जो भोज के समय के शिल्पियों की दक्षता को प्रदर्शित करती थी | किन्तु वह झील पंद्रहवीं शताब्दी में एक मुस्लिम शासक की आज्ञा से तोड़ दी गई | आज जो बड़ी झील भोपाल में देखी जाती है, वह तो उस झील का केवल छोटा सा भाग ही है, जिसे मांडू से सुलतान होशंगशाह ने तुड़वा दिया था | यह भी माना जाता है कि धार और मांडू के कोट भी भोज द्वारा ही बनवाये गए थे |

मुस्लिम लेखक फ़रिश्ता ने भोज के विषय में जो लिखा है, वह ध्यान देने योग्य है –

पंवार राजा भोज इन्साफ और सखावत में विक्रमादित्य के तरीके पर चलता था | वह रात को भेष बदलकर शहर में गश्त लगाता था, गरीबों और मजलूमों की खैर खबर लेता था, उसका बक्त अपनी रियाया की तरक्की और बैहबूदी में ही गुजरता था | भोज की लगभग यही तारीफ़ अकबर के मंत्री अबुल फजल ने भी अपनी आईने अकबरी में की है | वह लिखता है –

उसके वक्त में चुने हुए आलिमों और अक्लमंदों का जोर रहा | उसके दरबार में पांच सौ चुने हुए आलिम इन्साफ व क़ानून की तरक्की करते थे |

राजा भोज की दानशीलता को लेकर एक बड़ा रोचक विवरण प्राप्त होता है | भोज अपने दरबार में आने वाले हर याचक को संतुष्ट करते थे | यह देखकर मंत्री को चिंता हुई कि इस तरह तो खजाना ही खाली हो जायेगा, किन्तु सीधे भोज से कहने की हिम्मत नहीं हुई, अतः एक दिन उसने सभा मंडप की दीवार पर खड़िया से लिख दिया –

आपदार्थे धनं रक्षेत – अर्थात विपरीत परिस्थितियों के लिए धन बचाना चाहिए |

दूसरे दिन भोज की नजर उस पर पडी, पूछने पर भी किसी ने नहीं बताया कि किसने लिखा है, सो भोज ने उसके नीचे लिख दिया –

भाग्यभाजः क्वचापदः अर्थात भाग्यशाली पुरुष को विपत्ति कहाँ आती है ?

अगले दिन फिर लिखा मिला – दैवं हि कुप्यते क्वापि, शायद कभी देव ही विपरीत हो जाएँ, तो भोज ने भी लिख दिया –

संचितोपी विनश्यति | अगर ऐसा होगा तब तो संचित भी नष्ट हो जाएगा |

प्रबंध चिंतामणि में भोज की इसी मान्यता का विवरण मिलता है –

जब तक स्वभाव से चंचल यह संपत्ति मौजूद है, तब तक ही उपकार करने का अवसर भी प्राप्त है | विपत्ति तो अवश्य ही आती है, उसके बाद उपकार करने का मौक़ा नहीं मिलने वाला |

ए पूनम के चाँद तू अपनी किरणों से दुनिया को उजली कर ले यह दुष्ट भाग्य बहुत समय तक अच्छी हालत नहीं सह सकता | अर्थात बुरा समय आने से पहले जितना हो सके भला कर ले |

इसके विपरीत भी लिखा है – ए तालाब प्यासों के लिए रात दिन भलाई करने का यही मौका है, वर्षाकाल में तो आसानी से पानी मिलने लगेगा | अर्थात आने वाला समय बुरा आये या और समय और अच्छा – वर्तमान में भलाई करने का मौक़ा हाथ से कभी मत जाने दो |

अंत में चलते चलते एक स्पष्टीकरण – हमारा उद्देश्य भारतीय शौर्यगाथाओं का बखान कर समाज में आत्मविश्वास और आत्मगौरव बढ़ाना भर होता है | भारत में बसने वाली एक भी जाति ऐसी नहीं, जिसमें कोई श्रेष्ठ महापुरुष अवतरित न हुआ हो | इसलिए हम बिना किसी भेदभाव के सभी का गुणगान करते हैं | लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में ऐसे लोग भी होते रहे हैं जो परकीयों के प्रति ही भक्ति रखते हैं | एक उदाहरण देखिये –

दमोह के नजदीक बटियागढ़ में सम्बत १३८५ अर्थात सन १३२८ को संस्कृत में लिखा गया एक शिलालेख मिला है –

असित कलियुगे राजा शकेंद्रो वसुधाधिपः,

योगिनीपुरमास्थाय, यो भुक्ते सकलां महीम |

सर्व सागर पर्यंत वशी चक्रे नराधिपान,

महमूद सुरत्राणो नाम्ना शूरोभिनंदतु |

जिसका हिन्दी अर्थ है –

कलियुग में प्रथ्वी का मालिक शकेंद्र (मुस्लिम राजा) है, जो योगिनीपुर (दिल्ली) में रहकर तमाम प्रथ्वी का भोग करता है और जिसने समुद्र पर्यंत समस्त राजाओं को अपने वश में कर लिया है, उस शूरवीर सुल्तान महमूद का कल्याण हो |

तो ऐसे लोग तो हमारे आलोचक होंगे ही |

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