प्रतिहार उपाख्य परिहार राजवंश

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नागभट्ट और तक्षक यह गाथा है परिहार राजपूतों की, पुराण जिन्हें महर्षि वशिष्ठ के सहायकों के रूप में वर्णित करते हैं | पौराणिक आख्यानों के अनुस...

नागभट्ट और तक्षक

यह गाथा है परिहार राजपूतों की, पुराण जिन्हें महर्षि वशिष्ठ के सहायकों के रूप में वर्णित करते हैं | पौराणिक आख्यानों के अनुसार एक बार राजा विश्वामित्र शिकार के दौरान रास्ता भटककर भूखे प्यासे महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जा पहुंचे | महर्षि ने उनका यथोचित सत्कार किया, वे पकवान उन्हें उपलब्ध कराये, जो उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं खाए थे | विश्वामित्र चकित हुए और पूछताछ की कि आखिर इस जंगल में यह राजसी भोजन कहाँ से आया, तो नंदिनी गाय के चमत्कार की जानकारी मिली | यह ज्ञात हुआ कि वह कामधेनु की पुत्री है और हर कामना को पूर्ण करने वाली है, जो मांगो वह देने में समर्थ है | राजा विश्वामित्र की मान्यता थी कि राज्य में जो भी कुछ श्रेष्ठ है, उस पर राजा का अधिकार है | इसी सोच का नतीजा था कि जब उन्हें महर्षि वशिष्ठ की नंदिनी गाय के विषय में ज्ञात हुआ, तो उसे हथियाने के लिए उन्होंने साम दाम दंड भेद सभी नीतियों का प्रयोग किया और अंततः नंदिनी को बलपूर्वक ले ही गए |

पुराण तो कहते हैं कि क्षुब्ध वशिष्ठ जी ने यज्ञकुंड से एक तेजस्वी पुरुष को उत्पन्न किया, लेकिन इतिहासकार तो इसे कोरी गप्प ही मानेंगे, अतः हम भी मान लेते हैं कि स्थानीय गुर्जर समाज ने संगठित होकर राजसत्ता का मुकाबला किया और विजय प्राप्त की | जो भी हो, विश्वामित्र का मान मर्दन करने वाले उक्त तेजस्वी युवक को महर्षि वशिष्ठ ने परिहार या प्रतिहार संबोधन दिया | यह भी संभव है कि प्रतिहार का अपभ्रंश परिहार हो गया हो | जो भी हो वही तेजस्वी युवक इस वंश के प्रथम राजा हुए |

आठवीं शताब्दी में भारत पर अरबों के आक्रमण शुरू हुए | सिन्ध व मुल्तान पर अपना अधिकार जमाने के बाद जुनैद के नेतृत्व में उनकी सेनायें मालवा पर हमले के लिये बढ़ी, तब अवंती अर्थात आज के उज्जैन पर परिहार वंशी नागभट्ट प्रथम ने उन्हैं खदैड़ दिया। संभवत वे भडौच के गुर्जर प्रतिहार शासक जयभट्ट के राजकुंवर थे | अजेय अरबों की सेना को हराने से नागभट्ट का यश चारो ओर फैल गया। अरबों को खदेड़ने के बाद नागभट्ट वहीं न रुकते हुए आगे बढ़ते गये। और उन्होंने अपना नियंत्रण पूर्व और दक्षिण में मंडोर, ग्वालियर, मालवा और गुजरात में भरूच के बंदरगाह तक फैला दिया। उन्होंने मालवा में अवंती अर्थात उज्जैन को अपनी राजधानी बनाकर अरबों के विस्तार को रोके रखा, जो सिंध में स्वयं को स्थापित कर चुके थे। अरबों से यह युद्ध ७३८ ई॰ में हुआ |

हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद जब ललितादित्य मुक्तपीड ने यशोवर्मन को कमजोर कर दिया, तो कन्नौज साम्राज्य पर नियंत्रण के लिए त्रिकोणीय संघर्ष विकसित हुआ, जिसमें पश्चिम और उत्तर क्षेत्र से गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य, पूर्व से बंगाल के पाल साम्राज्य और दक्षिण के राष्ट्रकूट साम्राज्य शामिल थे। परिहार वंशी वत्सराज ने प्रारंभ में तो कन्नौज पर नियंत्रण पाने में सफलता पाई, किन्तु बाद में न केवल कन्नौज बल्कि मालवा से भी राष्ट्रकूट शासक ध्रुव धारवर्ष ने लगभग ८०० ई० में पराजित कर दिया और वत्सराज को राजस्थान में शरण लेने को मजबुर होना पड़ा । बाद में कुछ समय तक पाल नरेश धर्मपाल ने कन्नौज पर शासन किया ।

वत्सराज के बाद उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय राजा बना और उसने अपनी शक्ति इतनी बढाई की न केवल मालवा बल्कि आन्ध्र, सिन्ध, विदर्भ और कलिंग के राजाओं को भी हरा कर अपने अधीन कर लिया। एक बार फिर कन्नौज इस वंश की राजधानी हो गई | उसने प्रतिहार साम्राज्य को गंगा के मैदान में आगे ​​पाटलिपुत्र (बिहार) तक फैला दिया। उसने पश्चिम में पुनः अरबो का प्रवेश रोक दिया। उसने गुजरात में सोमनाथ के महान शिव मंदिर को पुनः बनवाया, जिसे सिंध से आये अरब हमलावरों ने नष्ट कर दिया था। कन्नौज, गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य का केंद्र बन गया । नागभट्ट तो प्रतापी थे ही, लेकिन उनके अंगरक्षक की कहानी भी जगत विख्यात है | आईये हम भी उस पर नजर डालते हैं –

इस कथा का मुख्य पात्र है - "तक्षक" । तक्षक के पिता सिंधु नरेश दाहिर के सैनिक थे जो मुहम्मद बिन कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति पा चुके थे। लूटती अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से "खींच खींच" कर उनकी देह लूटी जाने लगी। भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें "भय" से कांप उठी थीं। तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचकर अपनी दोनों बेटियों का "सर" काट डाला। उसके बाद बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली और तलवार को अपनी "छाती" में उतार लिया।

आठ वर्ष का बालक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भागा। पचीस वर्ष बीत गए, तब का अष्टवर्षीय तक्षक अब बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी, उसकी आँखे सदैव अंगारे की तरह लाल रहती थीं।

उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम, विशाल सैन्यशक्ति और अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे "अरब" कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे, पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के "सनातन नियमों" का पालन करते नागभट्ट कभी उनका "पीछा" नहीं करते, जिसके कारण बार बार वे मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे, ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।

एक बार फिर गुप्तचर ने सुचना दी कि अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की "सीमा" पर होगी। इस सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने सभा बुलाई । सभा में सभी सेनानायक अपना विचार रख रहे थे, तभी तक्षक भी उठ खड़ा हुआ और बोला -"महाराज, हमे इस बार वैरी को उसी की शैली में उत्तर देना चाहिए"

महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- अपनी बात खुल कर कहो तक्षक ।

तक्षक का धीर गंभीर स्वर गूंजा - महाराज, अरब सैनिक महा बर्बर हैं, हम उनसे हर बार सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध करते हैं, लेकिन सच पूछा जाए तो यह हम अपनी प्रजा के साथ "घात" ही करते हैं । राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा।

देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना "अत्याचार" किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह महाराज जानते हैं।"

महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए। अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।

आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी।

अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए। इस भयावह निशा में तक्षक का शौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था। वह अपनी तलवार चलाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।

विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था। सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया।

युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-

"आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक.... भारत ने अब तक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।"

आईये हम भी इस गुमनाम योद्धा को सादर श्रद्धांजलि प्रदान करें |

मिहिर भोज का काल खंड जब भारत था सोने की चिड़िया

८३३ ई० में नागभट्ट के जलसमाधी लेने के बाद, उसका पुत्र रामभद्र या राम गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का अगला राजा बना। रामभद्र के बाद उसके पुत्र मिहिरभोज या भोज प्रथम ने गुर्जर प्रतिहार की सत्ता क्या संभाली, मानो प्रतिहार साम्राज्य का स्वर्णकाल ही आ गया । अरब लेखकों ने भी मिहिरभोज के काल को सम्पन्न काल माना हैं। यही वह काल था, जब भारत दुनिया में सोने की चिड़िया कहा जाने लगा | मिहिरभोज का राज्य उत्तर-पश्चिम में सतुलज, उत्तर में हिमालय की तराई, पूर्व में पाल साम्राज्य कि पश्चिमी सीमा, दक्षिण-पूर्व में बुन्देलखण्ड और वत्स की सीमा, दक्षिण-पश्चिम में सौराष्ट्र, तथा पश्चिम में राजस्थान के अधिकांश भाग में फैला हुआ था। मिहिर भोज ने 836 ईस्वीं से 885 ईस्वीं तक 49 साल तक राज किया। मिहिरभोज के साम्राज्य का विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल तक और कश्मीर से कर्नाटक तक फैला हुआ था। ये धर्म रक्षक सम्राट शिव और विष्णू दोनों के परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण मिलता है। मिहिर भोज के पास ऊंटों, हाथियों और घुडसवारों की दूनिया कि सर्वश्रेष्ठ सेना थी । इनके राज्य में व्यापार,सोना चांदी के सिक्कों से होता है। इनके राज्य में सोने और चांदी की खाने भी थी | भोज ने सर्वप्रथम कन्नौज राज्य की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त किया, प्रजा पर अत्याचार करने वाले सामंतों और रिश्वत खाने वाले कामचोर कर्मचारियों को कठोर रूप से दण्डित किया। व्यापार और कृषि कार्य को इतनी सुविधाएं प्रदान की गई कि सारा साम्राज्य धनधान्य से लहलहा उठा। मिहिरभोज ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को धन, वैभव से चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। अपने उत्कर्ष काल में इन्हे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की उपाधि मिली थी। अनेक काव्यों एवं इतिहास में उसे गुर्जर सम्राट भोज, भोजराज, वाराहवतार, परम भट्टारक, महाराजाधिराज आदि विशेषणों से वर्णित किया गया है। विश्व की सुगठित और विशालतम सेना भोज की थी-इसमें आठ लाख से ज्यादा पैदल करीब नब्बे हजार घुडसवार, हजारों हाथी और हजारों रथ थे। मिहिरभोज के राज्य में चोरी-डकैती का भय किसी को नहीं था। उसका कारण यह था कि सभी संपन्न थे । गुर्जर प्रतिहारो ने अरबों से 300 वर्ष तक लगभग 200 से ज्यादा युद्ध किये और भारत की रक्षा की ।

अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण के दौरान लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तवारीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है, साथ ही मिहिरभोज की महान सेना की तारीफ भी की है | इसने भी मिहिर भोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमाओं को छूती हुई बतायी है।

915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल-मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल जुहाब में भी मिहिर भोज की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना के बारे में लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था, जो कि भगवान विष्णू के वराहअवतार का प्रतीक था | मुस्लिमों के मन में वराह यानि सूअर को लेकर जो नफरत आज भी दिखाई देती है, कौन जाने उसके मूल में मिहिर भोज से हुए संघर्ष ही हों क्योंकि मिहिर भोज के नेतृत्व में सभी वर्ग एवं जातियों के लोगो ने राष्ट्र की रक्षा के लिए हथियार उठाये और इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी। हालत यह थी कि मुस्लिम आक्रमणकारी मिहिर भोज के नाम से ही थरथराने लगे थे उन दिनों |

अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध के उस इलाके पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था। किन्तु मिहिर भोज ने इमरान बिन मूसा को बुरी तरह पराजित कर समस्त सिन्ध को, प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। इसके बाद कुछ समय के लिए केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज प्रतिहार के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने के लिए अनमहफूज नामक गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।

लेकिन सम्राट मिहिर भोज नही चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रहें और आगे संकट का कारण बने, इसलिए उसने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह को जीत कर अपने प्रतिहार साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पहुंचा दी, और इसी प्रकार भारत को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से राँची व असम तक, हिमालय से नर्मदा नदी व आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी। ५० वर्ष तक राज्य करने के पश्चात वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति के लिए वन में चले गए थे।

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