दक्षिण भारत की ऐतिहासिक व पौराणिक कहानियाँ

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जिस समय इस्लामिक आंधी ने भारत में प्रवेश किया, उस समय उत्तर भारत के ही समान दक्षिण भारत में भी प्रमुख राजघराने आपसी संघर्ष में ही अपनी शक्त...





जिस समय इस्लामिक आंधी ने भारत में प्रवेश किया, उस समय उत्तर भारत के ही समान दक्षिण भारत में भी प्रमुख राजघराने आपसी संघर्ष में ही अपनी शक्ति नष्ट कर रहे थे | इतिहास का अध्ययन हमें दो प्रकार से लाभ पहुंचाता है | एक तो यह कि हमारी खूबियों की जानकारी हमारे आत्मगौरव को बढाकर हमें आत्मविश्वास प्रदान करती है, तो दूसरी हमारी कमियों को जानकर हम सचेत होते हैं | तो आईये इसी भाव से हम दक्षिण भारत के इतिहास पर भी नजर दौडाएं –

इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल अपनी पुस्तक इतिहास प्रवेश में लिखते हैं कि बृजभूमि में रहने वाली पांडु नामक जाति की एक शाखा ने सुदूर दक्षिण में जाकर एक नई मथुरा बसाई, जो बाद में मदुरा और अब मदुरई कहलाती है | वह नया राज्य पांड्य कहलाया | पांड्य के पश्चिमी समुद्र तट पर चेर और उत्तर दिशा में चोल राज्य थे | जिस चालुक्य राज तैलप का वर्णन हम मालवाधिपति मुंज व भोज के कथानकों में कर चुके हैं, उसके बेटे सत्याश्रय को चोल नरेश राजराज ने बुरी तरह पराजित किया | राजराज चोल ने चोल शक्ति को बहुत बढ़ाया | वेंगी के चालुक्य राजा विमलादित्य ने चोल सम्राट राजराज की अधीनता स्वीकार कर ली तो राजराज ने भी अपनी पुत्री के साथ उसका विवाह कर उसे अपना परम सहायक बना लिया और इस प्रकार अपनी उत्तरी सीमा सुरक्षित कर ली | अगली तीन पीढ़ियों तक बेंगी के राजाओं का विवाह चोलवंश की कुमारियों के साथ ही होता रहा और इन दोनों राजवंशों में बहुत अधिक घनिष्ठता हो गई | यहाँ तक कि जब चोल राजा अधि राजेन्द्र के संतान हीन मृत्यु हो जाने के बाद बेंगी के तत्कालीन राजा राजेन्द्र कुलोत्तुंग ने ही १०७० ईसवी में चोल राज्य के सत्ता सूत्र संभाले, क्योंकि वह भी चोल राजकुमारी का ही पुत्र था | इसके बाद राजेन्द्र कुलोत्तुंग के ही वंशज अगली दो सदी तक इन दोनों राज्यों पर शासन करते रहे |

यह तो हुआ सारांश आईये इसे विस्तार देते हैं | चोल वंश का उत्कर्ष ८६४ ईसवी में राजा विजयालय के समय से हुआ | उसके पूर्व उसकी स्थिति पल्लव वंश के सामंत जैसी थी | किन्तु विजयालय ने तंजावुर उपाख्य तंजोर को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्र सत्ता कायम की | उनके शरीर पर बने छियानवे घावों के निशान उनके शौर्य का बखान स्वयं करते थे | तंजावुर नगरी का निशुंभसूदनी मंदिर विख्यात है | विजयालय के पुत्र आदित्य भी अपने पिता के समान ही प्रतापी निकले और उन्होंने तो पल्लव राजा अपराजित वर्मा को पराजित कर कांची पर भी कब्ज़ा कर लिया | उनके बाद परान्तक प्रथम ने भी अपनी शक्ति और बढाई तथा पांड्य राज्य को भी जीतकर उनकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया | लेकिन उनकी जीत की खुशी अधूरी ही रही | क्योकि पांड्य राजा अपने कुछ दैवीय आभूषण व राजमुकुट लेकर पलायन कर गए | इन आभूषणों की प्रशंसा कवियों ने कुछ इस प्रकार की है –

पांड्य राजा के वक्ष पर स्थित कवच और चंदन के लेप से चित्रित मोतियों से गुंथा एक हार उन्हें देवराज इंद्र के समान शोभायमान करता है । उन दैवीय आभूषणों को लेकर दंतकथाएं भी प्रचलित थीं, जैसे कि – प्राचीन काल में राजा मलायात्तुवचन और उनकी पत्नी कांचनी को कोई संतान नहीं थी, अतः उन्होंने एक यज्ञ किया और यज्ञ की अग्नि से उन्हें एक तीन वर्षीया कन्या रत्न की प्राप्ति हुई, जो साक्षात जगदम्बा का स्वरुप प्रतीत होती थी | उस महादेवी के तीन स्तन थे | राजा ने उनका नाम तताकई रखा और अपने राजकाज को करने लगे | कालांतर में वह देवी भगवान शिव से प्रेम करने लगीं और इसके साथ ही उनका तीसरा स्तन भी लुप्त हो गया | भगवान शिव से विवाह के बाद उन्हें मीनाक्षी नाम से जाना गया और भगवान शिव भी सुन्दरेश्वर के नाम से विख्यात हुए |

इस दैवीय दंपत्ति से उक्किरापंड्या उत्पन्न हुए, जिन्हें भगवान मुरुगा के नाम से जाना जाता है, बड़े होने पर उनका विवाह राजकुमारी कान्तिमती के साथ हुआ | इस विवाह के बाद भगवान सुन्दरेश्वर ने अपने पुत्र से कहा कि इंद्र, वरुण और मेरु पर्वत हमारे शत्रु हैं | मैं तुम्हें तीन शस्त्र देता हूँ, इन्हें ठीक से उपयोग करना | इंद्र देव के लिए एक चक्र, समुद्र के लिए एक भाला और मेरु पर्वत को दबाने के लिए एक गदा |

उक्किरापंड्या के दौर में एक बार भीषण अकाल पड़ा | चोल चेर और पांड्य राजा ऋषि अगस्त्य की सलाह मानकर समुद्र के राजा इंद्र के पास प्रार्थना करने गए ताकि वह वर्षा के बादलों को मुक्त कर दे | चेर और चोल नरेशों ने तो देवराज इंद्र द्वारा इंगित किये गए नीचे आसन विनय पूर्वक स्वीकार कर लिए, किन्तु पांड्य राजा इंद्र के साथ ही जाकर बैठ गए | चेर और चोल राजाओं ने बहुमूल्य भेंट देकर इंद्र से वर्षा के लिए आग्रह किया, इंद्र ने उनकी प्रार्थना स्वीकार भी कर ली | उक्किरपंड्या ने इंद्र से कुछ नहीं माँगा पर इंद्र ने उन्हें एक कवच दिया | उद्देश्य यह था कि आये अतिथि को भेंट भी दिखाई दे और उन्हें नीचा भी दिखाया जा सके, क्योंकि यह कवच धारण करने के प्रयत्न में कई पर्वताकार कंधे असमर्थ रहे थे | किन्तु उक्किरपंड्या ने आसानी से उसे धारण कर लिया और इंद्र के साथ खड़े वे इंद्र के समान ही शोभा पाने लगे |

कुढ़े हुए इंद्र ने उनके राज्य में वर्षा नहीं होने दी | इस पर पांड्य राजा ने पोदिगैमलाई जाकर इंद्र के सभी बादलों को अपनी गिरफ्त में ले लिया | स्वाभाविक ही उसके बाद इंद्र और पांड्य का संग्राम हुआ, किन्तु पिता द्वारा दिए गए चक्र से पांड्य ने इंद्र का मुकुट तोड़ दिया, और उनकी सेना को भी भारी क्षति पहुंचाई | पराजित होने के बाद विवश होकर इंद्र ने उनके राज्य में वर्षा करवाई | इस गाथा को पढ़ सुनकर हम समझ सकते हैं कि उत्तर भारत में प्रचलित पौराणिक गाथाओं और दक्षिण भारत की गाथाओं में कुछ अंतर भले ही दिखाई दे, किन्तु उनके मूल भाव समान ही हैं | इस गाथा को हम शिव पार्वती और कार्तिकेय का दक्षिण भारतीय रूपांतर कह सकते हैं |

जिस प्रकार पांड्य राजा स्वयं को शिव के पुत्र मानते थे, उसी प्रकार चोल राजा स्वयं को महाराज शिवि के वंशज मानते थे, जिन्होंने शरण में आये एक कबूतर को एक बाज से बचाने के लिए स्वयं के शरीर का मांस बाज को खिलाया था | किन्तु पांड्य के दैवीय आभूषण की गाथा पांड्य को वैशिष्ट्य प्रदान करती थी | आभूषणों से सम्बंधित आख्यान पर कोई भले ही विश्वास न करे, किन्तु प्रतापी और ऐश्वर्यवान पांड्य राजागण वंशानुगत उन्हें धारण करते थे, इसे माना जा सकता है और हमारे यहाँ कहा भी गया है कि – झगड़े की जड़ तीन, जर, जोरू जमीन | तो शुरू हो गया संग्राम उन आभूषणों की खातिर और उन्हें प्राप्त करने के लिए चोल राजा परान्तक ने पांड्य राज्य पर आक्रमण कर दिया | लेकिन पांड्य राजा ने अपने मित्र सिंहल नरेश के पास वे आभूषण सुरक्षित रखकर स्वयं चेरि राज्य में शरण ले ली | परान्तक ने सिंहल द्वीप पर भी आक्रमण किया किन्तु उनकी नौसेना इतनी समर्थ नहीं थी, अतः उन्हें सफलता नहीं मिली | परान्तक के समय से ही चोलों की शक्ति क्षीण होने लगी, जब उन्हें राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय ने पराजित कर राजधानी तंजावुर पर भी अधिकार कर लिया | इस युद्ध में परान्तक के पुत्र राजादित्य ने भी वीर गति पाई | इसके आगे की कहानी अगले अंक में –




दक्षिण भारत की ऐतिहासिक व पौराणिक कहानियाँ भाग 2 – इतिहास प्रसिद्ध चोल राजा राजराज और उनके द्वारा निर्मित बृहदेश्वर मंदिर

चोल राज्य की दुर्दशा अधिक समय तक नहीं रही और ९८५ ईसवी में राजराज प्रथम ने राज्य की बागडोर संभाली | उन्होंने पांड्य और केरल राज्यों को जीतकर अपनी सीमा कन्याकुमारी तक बढ़ा ली | राष्ट्रकूटों, चालुक्य और पल्लवों को भी हराया | लेकिन उनके मन में एक कसक बनी रही | वे उन दैवीय आभूषणों को नहीं पा सके, जिनके लिए उनके पूर्वजों ने पांड्य राज्य पर धावा बोला था और विजय श्री प्राप्त की थी | चोल वंश के राजा यह मानते थे कि चूंकि वे विजेता थे, अतः उन आभूषणों पर उनका ही अधिकार था | उन आभूषणों को प्राप्त करने के लिए ही राजराज चोल ने अपनी नौसेना की शक्ति बढाई और उसके बाद समुद्र पार कर उन्होंने सिंहल द्वीप, लक्ष द्वीप,और मालदीव तक धावा बोला | लेकिन आभूषण उन्हें फिर भी नहीं मिले |सिंहल राज उत्तर के प्रदेश छोड़कर दक्षिण के घने जंगलों में जाकर रहने लगे, जहाँ पहुँचने में राजराज असफल रहे |

राजराज चोल ने पांड्य और केरल को अपने अधीन किया, चालुक्यों और कलिंग पर आधिपत्य जमाया, कर्णाटक पर चढ़ाई कर तैलप के बेटे सत्याश्रय को चार वर्ष के युद्ध के बाद पराजित किया | इतना ही नहीं तो अपनी जल सेना की मदद से आज की श्रीलंका और तब के सिंहल को भी जीत लिया, मालदीव पर भी अधिकार कर लिया | लेकिन वे इतिहास में प्रसिद्ध हुए अपने राज्यारोहण के पच्चीसवें वर्ष में अर्थात 1010 ईसवीं में अपनी राजधानी तंजावुर में तमिल इतिहास के महानतम "वृहदेश्वर मंदिर" (पेरिया कोविल) के निर्माण से। राज राज एक असाधारण योद्धा होने के साथ साथ, भगवान शिव के अनन्य भक्त और कला व वास्तुकला के भी जानकार थे। वृहदेश्वर का अर्थ है - ब्रह्मांड के स्वामी। यह उस सर्वशक्तिमान के लिए एक भक्त राजा की विनम्र श्रद्धांजलि थी ।

एक किले के अन्दर सात सौ पचास फीट लम्बाई और चार सौ फीट की चौडाई में यह भव्य मंदिर बना हुआ है, जबकि किला एक खाई से घिरा हुआ है। उस प्राचीन काल की तकनीक को देखकर आज के बड़े बड़े इंजीनियर भी दांतों तले उंगली दबाने को विवश हो जाते हैं । इस मंदिर की कुल ऊँचाई 216 फीट है। आखिर कैसे इतनी ऊंचाई पर लगभग अस्सी टन वजनी पत्थर पहुंचाया गया होगा, जबकि उस युग में आधुनिक मोर्टार और क्रेन आदि भी नहीं थी।

यह मंदिर राजराजेश्वर मंदिर और बृहदेश्वर मंदिर, दो अलग-अलग नामों से जाना जाता है । विशालकाय पत्थरों से बना यह भव्य मंदिर ऐसी जगह में बना हुआ है जहाँ दूर-दूर तक न कोई पत्थरों का पहाड़ है और ना ही कोई पत्थरों की खदान है। अतः इस मंदिर को बनाने के लिए विशालकाय पत्थर लाने के लिए तीन हजार हाथियों का उपयोग किया गया था।

यह विश्व का प्रथम और एकमात्र मंदिर है, जो पूरी तरह ग्रेनाइट पत्थर से बना हुआ है। इस विशालकाय मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है। बृहदेश्वर मंदिर में एक विशाल शिवलिंग और विशाल अखंड नंदी की प्रतिमा विराजमान है।

मंदिर की आकृति भगवान शिव के निवास स्थल कैलाश पर्वत का आभास देती है। इस मंदिर की एक विशेष खूबी यह है कि इतने विशाल होने के बावजूद इनकी परछाई धरती पर नहीं पड़ती। विश्व की विशाल संरचनाओं में इस मंदिर का नाम आता है। इसका आकार पिरामिड की तरह त्रिकोण है।

क्या इसे महज संयोग कहें कि शिवलिंग की ऊंचाई 12 फीट है और तमिल भाषा में स्वरों की संख्या भी 12 ही है। शिवलिंग का आधार अठारह फीट है और तमिल भाषा में व्यंजनों की संख्या भी अठारह ही है। मंदिर का शिखर जिसे विमान कहा जाता है, उसकी कुल ऊंचाई दो सौ सोलह फीट है और तमिल के संयुक्त अक्षरों की संख्या भी दो सौ सोलह ही है। शिवलिंग से नंदी प्रतिमा की दूरी 247 फीट है और तमिल में कुल शब्द भी इतने ही हैं, अर्थात बारह स्वर, अठारह व्यंजन और दो सौ सोलह संयुक्त अक्षर का योग।

मंदिर के शिखर पर स्थित कलश की ऊंचाई चौदह दसमलव चार फीट है तथा इसके निर्माण में ताम्बे और स्वर्ण का प्रयोग किया गया है। ताम्बे का प्रयोग इसे आकाशीय बिजली गिरने के खतरे से बचाता है। कलश के अन्दर वरगु जिसे उत्तर भारत में कोदों कहा जाता है, वह भरा रहता है। इसके पीछे का विचार यह माना जाता है कि जल प्रलय काल में यदि सृष्टि समाप्त हो जाये, तब बचे हुए लोग इसे बीज के रूप में प्रयोग कर प्रथ्वी पर पुनः अन्न उत्पादन कर सकें। स्मरणीय है कि कोदों का बीज बारह वर्ष तक जर्मिनेट हो सकता है। इसीलिए हर बारह वर्ष में होने वाले कुम्भाभिशेक उत्सव में इस वरगु को बदल दिया जाता है। किसे हमारे पूर्वजों की इस धरोहर पर गर्व नहीं होगा।

उत्तर दिशा में स्थित मुख्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही मानो आदिकाल का स्मरण हो आता है। एक पैर उठाये, गदा पद्मधारी चतुर्भुज मुकुटधारी द्वारपाल, भगवान विष्णू के वामनावतार और राक्षसराज महाराज बली की कथा का स्मरण कराते हैं। मंदिर के चारों ओर परिक्रमा का गलियारा है, जिसकी चौडाई सात फीट है। गलियारे की दीवारों पर भगवान शिव के दरबार की सुन्दर झांकियां चित्रित हैं। इस गलियारे की दीवारों को चूने के साथ प्लास्टर कर चित्रों के लिए एक बड़े कैनवास के रूप में इस्तेमाल किया गया था। दक्षिणामूर्ति, नटराज शिव, त्रिपुर संहार, नृत्यांगनाओं, संतों, योद्धाओं के चित्र चोल चित्रकला के अद्भुत उदाहरण हैं। सुंदरमूर्ति नयनार के सफेद हाथी पर बैठकर कैलाश तक पहुँचने की कहानी को एक अन्य दीवार पर दर्शाया गया है। इन सबमें उल्लेखनीय है, अपने गुरु करुवुर देवर के साथ राजराजा का चित्रण। करुवुर देवर ही मंदिर निर्माण के प्रमुख प्रेरक और निर्देशक थे, मंदिर के बाहरी प्रांगण में उन्हें समर्पित एक विशेष मंदिर भी है। इस गलियारे में बनी शिव प्रतिमाएं रंगीन हैं, और उनमें शिव के इक्यासी नृत्य मुद्राएँ दर्शाई गई हैं, जो तमिल नाट्य शास्त्र के शानदार चित्र कहे जा सकते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार सी. शिवराममूर्ति ने भगवान शिव की इन नृत्य मुद्राओं को अद्वितीय कहा है ।

यह चोल चित्रकला और मूर्तिकला का अद्भुत संग्रहालय है, यद्यपि इसकी सुरक्षा की द्रष्टि से इसे दर्शनार्थियों के लिए बंद कर दिया गया है। गर्भगृह के बाहर स्थित हॉल में भी शिव पार्वती के विवाह आदि के सुन्दर भित्ति चित्र अंकित हैं, जो एक हजार साल बीत जाने के बाद भी अपनी चमक से श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

शायद इस मंदिर का सबसे रोमांचक पहलू इसकी दीवारों पर अंकित विशाल शिलालेख हैं जो राजा के शासनकाल और साथ ही उनके उत्तराधिकारियों का विवरण प्रस्तुत करते हैं। वे बताते हैं कि राजा ने मंदिर के रखरखाव, दैनिक पूजा, त्योहारों, भक्ति गीतों के गायन और नृत्य के लिए बड़ी संख्या में गाँव, धन और मवेशियों को दान में दिया। उन्होंने और उनकी रानियों ने मंदिर में शानदार सोने और मणि के गहने प्रस्तुत किए। राजा, उनकी प्रिय रानी लोकमहादेवी और उनकी बहन कुंदावई के दान विवरण को गर्भगृह के करीब एक शिलालेख में दर्ज किया गया है। शिलालेखों में सबसे उल्लेखनीय विवरण चार सौ देवदासियों को दी गई दो गलियों का मिलता है । उनके नाम, उत्पत्ति के स्थान, उनके घरों के दरवाजों पर अंकित संख्या का भी विवरण इस शिलालेख में है। शिलालेखों से राजा, उसकी रानियों, उनके रिश्तेदारों, प्रमुख व्यापारियों, सैनिकों के अतिरिक्त सिंचाई के लिए बनी नहरों, अस्पतालों, स्कूलों की जानकारी मिलती है।




दक्षिण भारत की ऐतिहासिक व पौराणिक कहानियाँ भाग 3 – तमिल इतिहास के महानायक राजेन्द्र चोल के बंगाल विजय अभियान का प्रारम्भ

चोल नरेश राज राज स्वयं शिवभक्त थे, किन्तु उन्होंने भगवान विष्णू के भी मंदिर बनवाये, इतना ही नहीं तो नागपट्टनम में चूड़ामणि विहार नामक बौद्ध केंद्र को भी अनुमति दी | राज्य के लोग स्वतंत्रता पूर्वक अपने धर्मों का पालन कर सकते थे | यहाँ तक कि उनकी बेटी मदेवादिगल ने भी बौद्ध मत स्वीकार कर लिया था और नागापट्टिनम के चूड़ामणि विहार में रहने लगी थीं |

राजराज के बाद १०१२ ईसवी में राजेन्द्र चोल राजा बने, तो उनका सबसे पहला लक्ष्य था पांड्य वंश के उन दैवीय आभूषणों को प्राप्त करना, जो विगत साठ वर्षों से हर चोल राजा की महत्वाकांक्षा रही थी | यहाँ तक कि उनके प्रतापी पिता ने भी लंका के उत्तरी तट पर, यहाँ तक कि राजधानी अनुराधापुरम पर भी अधिकार कर लिया था, किन्तु सिंहल नरेश महिंदा लंका के दक्षिणी छोर के घने जंगलों में पहुंचकर उनकी पहुँच से दूर हो गए थे | अब उनके बेटे राजेन्द्र प्रथम अपने शासन काल में सिंहल द्वीप को पूरी तरह चोल साम्राज्य में सम्मिलित कर वे दैवीय आभूषण प्राप्त करना चाहते थे, जिसे उनके पूर्वज नहीं पा सके थे |

इस बार अनेक कठिनाईयों को झेलते हुए चोल सेना ने सिंहल द्वीप के दक्षिणी हिस्से के घने जंगलों में बने उस रोहना दुर्ग पर भी कब्जा कर लिया जहाँ राजा महिंदा छुपे हुए थे | महिंदा व उनका पूरा परिवार बंदी बना लिया गया | अब समूचा सिंहल चोल राज्य में सम्मिलित हो चुका था, किन्तु वे आभूषण अभी भी पहुँच से दूर ही रहे | राजा ने उनका पता बताने से इनकार किया तो उन्हें उनके परिवार के सामने ही यातनाएं दी जाने लगीं | उनकी चीख पुकार सुनकर पत्नी का धैर्य जबाब दे गया और उसने बता दिया कि वे आभूषण तो पांड्य राजा के निर्देश पर राजा महिंदा ने गुप्त रूप से बंगाल के पाल राजा महिपाल के पास पहुंचा दिए हैं | उसी दौरान समाचार मिला कि महिपाल के सहयोग से कल्याणी के चालुक्यवंशी राजा जयसिंह ने अपने ही वंश के बेंगी नरेश नरेंद्र पर आक्रमण कर बेंगी को अपने अधीन करने के बाद अपने एक विश्वासपात्र विजयादित्य को वहां का सामंत नियुक्त कर दिया है | पूर्व में राजराज के समय ही बेंगी से चोल वंश के पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे व महाराज राज राज ने अपनी पुत्री कुन्दावई का विवाह वहां के तत्कालीन राजा विमलादित्य के साथ कर दिया था |

अतः अपने भानजे नरेंद्र को संकट में देखकर राजेन्द्र कैसे चुप बैठ सकते थे | अब उनकी नजर में चालुक्य नरेश जयसिंह और उनके सहयोगी बंगाल के महीपाल दोनों समान रूप से शत्रु थे | प्रतापी चोल नरेश राज राज के समय से ही राज्य की भावी पीढी में से योग्य सैन्य अधिकारी निर्माण के लिए एक सैन्य विद्यालय प्रारंभ कर दिया गया था | इस विद्यालय में केवल राज परिवार के, सेनानायकों के व सामान्य जन में से चुने गए कुछ प्रतिभाशाली बच्चों को ही प्रवेश मिलता था तथा यहाँ शिक्षक के रूप में बुजुर्ग पूर्व सेनानायक ही इन चुनिन्दा विद्यार्थियों को भविष्य के लिए शिक्षित प्रशिक्षित करते थे | छः वर्ष की आयु से लेकर अपने युवा होने तक इन विद्यार्थियों को शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ और राजभक्त बनाया जाता था | राजेन्द्र चोल के साहसिक विजय अभियानों में इन प्रशिक्षित नौजवानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा |

अब जबकि चालुक्य और पाल वंशी बड़े राजाओं के खिलाफ मुहिम चालू होनी थी तो भावी रणनीति बनाने हेतु दरवार लगा | मुख्य सेनानायक ने अपनी कार्ययोजना प्रस्तुत करते हुए कहा कि महाराज बंगाल के मार्ग में अनेक छोटे बड़े राजा हैं, इनमें से कुछ तो महीपाल के घनिष्ठ मित्र हैं, तो कुछ हमारे और उनके प्रति समान भाव रखते हैं | अतः हमें उनसे अकारण का टकराव टालते हुए आगे बढ़ना उचित होगा, ताकि हमारी शक्ति व्यर्थ क्षय न हो और समय भी बर्वाद न हो | यहाँ तक कि हमें उस जयसिंह से भी कूटनीतिक ढंग से निबटना चाहिए, जिसने बेंगी के राजा और आपके भानजे नरेंद्र व उनके परिवार को बंदी बना लिया है | सीधे आक्रमण से हमें विजय भले ही मिल जाए, किन्तु आपके भानजे नरेंद्र व बहिन कुन्दावई के प्राण भी संकट में पड़ सकते हैं |

योजना सबको पसंद आई और पूरे मार्ग में गुप्तचरों को सक्रिय कर दिया गया, जो पंडित, नाई, प्रवचनकार, व्यापारी, गायक, नर्तक पशुपालक आदि के भेष में तंजावुर से बंगाल तक के मार्ग में बिखर गए और पल पल की खबर प्रशिक्षित पक्षियों के माध्यम से सेनानायक तक पहुँचाने लगे |

इसके साथ ही एक नौजवान को प्रतिनिधि बनाकर बेंगी में जयसिंहा के पास भेजा गया, जिसने अपनी भूमिका का बखूबी निर्वाह करते हुए चोल नरेश राजेन्द्र का सन्देश उसे दिया जिसमें लिखा था – श्री जयसिंहा, मैं अकारण युद्ध नहीं चाहता, अतः मेरा आग्रह है कि मेरी बहिन व भानजे को मुझे सोंप दिया जाए और बदले में मैं बेंगी पर आपके प्रभुत्व को स्वीकार कर लूँगा | आप वहां निश्चिन्त होकर राज्य करते रहें | मैं अपने शत्रु बंगाल के महीपाल से युद्ध करने जा रहा हूँ, उसके लिए आप मेरी सेना को अपने राज्य में से गुजरने दें |

जयसिंह ने हंसकर कहा – मैं राजेन्द्र की बातें क्यूं मानूं ? क्या मैं जानता नहीं कि जब तक उनकी बहिन व भानजे मेरे कब्जे में हैं, तभी तक मैं सुरक्षित हूँ | एक बार वे मेरे कब्जे से निकले नहीं कि राजेन्द्र सेना सहित मुझ पर टूट पड़ेगा | और रहा सवाल सेना को मार्ग देने का तो बंगाल नरेश महीपाल मेरे मित्र हैं, मैं उन पर आक्रमण में सहयोग क्यों दूं ?

सन्देश वाहक नौजवान ने भी तुर्कीबतुर्की जबाब देते हुए कहा – महाराज, क्या आप नहीं जानते कि बेंगी की जनता आपको आक्रमणकारी मानकर आपके विरुद्ध है, उनका राजपरिवार आपके कब्जे में रहेगा तो आज नहीं तो कल वह विद्रोह करेगी ही | इसलिए आप विचार करें कि चोल नरेश का प्रस्ताव मानकर राजा नरेंद्र को मुक्त करना आपके हित में ही है | रहा सवाल सेना को मार्ग देने का तो केवल पचास हजार सैनिक ही आपके राज्य से निकलेंगे और उसकी सूचना भी आप अपने मित्र बंगाल के राजा महिपाल को दे कर सतर्क कर सकते हैं | वे भी आपके शुक्रगुजार होंगे | और रहा सवाल आप पर आक्रमण का तो उनकी नौ लाख की सेना के सामने आपकी बिसात ही क्या है ? बेशक आप बेंगी के उनके रिश्तेदार राजा नरेंद्र व उनके परिवार को मार सकते हैं, लेकिन उसके बाद आपका क्या होगा, आप स्वयम सोच लें | नौजवान की बेधड़क बातों ने जयसिंह को हिलाकर रख दिया | उसने विचार के लिए दस दिन का समय माँगा, जोकि स्वयं चोल के रणनीतिकार भी चाहते थे |

इन दस दिनों में चोल गुप्तचरों व बेंगी के उनके सहयोगियों ने नरेंद्र व उनके परिवार को कैद से मुक्त कर लिया और चोल सेना ने जयसिंह के मंसूबों को मटियामेट करते हुए आक्रमण कर बेंगी पर पुनः अधिकार कर लिया | जयसिंह बेंगी छोड़कर अपने चित्रदुर्ग में जा पहुंचा | राजा नरेंद्र पुनः बेंगी नरेश हुए तथा चोल राजकुमारी महाराज राजेन्द्र की पुत्री अनुमंगा का विवाह उनके साथ संपन्न हुआ | चोल और साम्राज्य की उत्तरी सीमा पर स्थित बेंगी के चालुक्य और भी अधिक निकट संबंधी हो गए | बंगाल नरेश महीपाल और चालुक्य जयसिंहा को राजेन्द्र चोल ने कैसे जीता इसका वर्णन अगले अंक में -




दक्षिण भारत की ऐतिहासिक व पौराणिक कहानियाँ भाग 4 – राजेन्द्र चोल द्वारा बंगाल विजय

बेंगी में अपने एक लाख सैनिकों को वहां की सुरक्षा हेतु छोड़कर अपने आठ लाख के विशाल सैन्य दल के साथ चोल नरेश राजेन्द्र चित्रदुर्ग की ओर बढे, जहाँ चालुक्य जयसिंह के होने की सूचना उन्हें मिली थी | चित्रदुर्ग पर कब्जा तो आसानी से हो गया, किन्तु जयसिंह तुंगभद्रा नदी पारकर अपने मासुंगी किले में सुरक्षित हो गया | चित्रदुर्ग में चोल सेना जश्न मना रही थी कि इतनी आसानी से सफलता उन्हें मिल गई और उनके मात्र दस सैनिक ही मारे गए, जबकि चालुक्यों के लगभग एक हजार सैनिक हताहत हुए, लेकिन सुबह होते होते उनके होश उड़ गए, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि चित्रदुर्ग के कुछ जलाशयों के पानी में जहर मिला हुआ है, जिसके कारण तीन महत्वपूर्ण सेनापतियों सहित सौ से अधिक सैनिक अकाल मृत्यु के ग्रास बन गए हैं |

राजेन्द्र चोल गुस्से से आगबबूला हो उठे और उन्होंने बंगाल के पहले चालुक्य जयसिंह को सबक सिखाने की ठान ली | लेकिन मार्ग की सबसे बड़ी बाधा तो तुंगभद्रा नदी थी, जिसमें सुरक्षा की द्रष्टि से चालुक्यराज ने कई कुए खुदवा दिए थे, जिसके कारण हाथियों की मदद से भी उसे पार करना कठिन था | इसका उपाय यह निकाला गया कि एक संकरा स्थान देखकर वहां बड़ी बड़ी चट्टानें डालकर एक बाँध जैसा बनाकर कुछ समय के लिए तुंगभद्रा का प्रवाह रोक दिया गया, जिससे तली में बने कुए सामने आ गए और उनसे बचकर सारी सेना नदी पार कर गई | यद्यपि जयसिंहा ने आशा नहीं की थी कि इतनी जल्दी चोल सेना उसके सर पर पहुँच जायेगी, फिर भी उसने रणनीति के साथ प्रतिकार किया | चोल सैन्य बल को बिना प्रतिकार के आगे बढ़ने दिया गया और फिर अकस्मात छुपकर चारों और से जहर बुझे तीरों की मार से उन्हें हडबडा दिया | चोल नरेश राजेन्द्र के सबसे छोटे और प्रिय पुत्र सुन्दर केरलन सहित उनके कई सैनिक मारे गए | सुन्दर केवल नाम से ही सुन्दर नहीं थे, बल्कि सचमुच उनकी छवि मनमोहक थी | राजेन्द्र के दुःख का पारावार नहीं रहा, अपने आप को दोष देने लगे कि क्यों उसे युद्ध में लेकर आये, अब उसकी मां से कैसे नजरें मिलायेंगे | लकिन जल्द ही उन्होंने अपने दुःख और शोक पर काबू पा लिया और सेनाओं ने मासुंगी दुर्ग की ओर प्रयाण किया |

चट्टानों द्वारा निर्मित यह विशाल दुर्ग तीन ओर तो पहाड़ों से और पीछे की तरफ एक विशाल झील से घिरा हुआ था | इसकेप्रवेश द्वार बेहद छोटे और सकरे थे, जिससे एक बार में केवल एक ही शत्रु अन्दर प्रवेश कर सके, और भीतर उसका सफाया किया जा सके | चालुक्य सेनाओं ने सोचा था की हमला प्रातःकाल होगा, अतः वे निश्चिन्त थे | किन्तु अर्ध रात्री में ही चोल सेनाओं ने दुर्ग की घेराबंदी कर दी | कुछ गोताखोर सैनिक झील की तरफ से दुर्ग में प्रवेश कर गए, क्योंकि वहां नींव कमजोर होने से आसानी से प्रवेश मार्ग बन गया | जबकि कुछ सैनिक गोह की मदद से दुर्ग की प्राचीर पर पहुँच गए | इन सभी ने तीरों में तेल से भीगे कपडे बांधकर और उन्हें जलाकर चारों ऑर फेंकना चालू कर दिया | भीषण आग की लपटों सेदुर्ग के अन्दर कोहराम मच गया | इस अफरा तफरी का फायदा लेकर चोल सेना किसी सुनामी की तरह दुर्ग में धंस गई और देखते ही देखते चालुक्य सैनिक या तो मारे गए या बंदी बना लिए गए | राजेन्द्र चोल को एक बड़ा खजाना तो हाथ आया किन्तु जयसिंहा एक बार फिर निकल भागने में सफल रहे और सकुशल अपनी राजधानी मान्यखेट पहुँच गए | इतना ही नहीं तो बेंगी पर कब्जा करने वाले विजयादित्य भी महीपाल के पास बंगाल पहुँच गए | तू डाल डाल तो मैं पात पात जैसा चूहे बिल्ली का खेल चल रहा था चालुक्य नरेश और चोल नरेश के बीच |

स्थिति को समझकर राजेन्द्र ने अपनी सेना के चार भाग किये | वे स्वयं तो दो लाख सैन्य बल के साथ मासुंगी ही रुके क्योंकि किसी भी समय जयसिंह के आक्रमण का अंदेशा था, और दुर्ग को अरक्षित छोड़ना खतरे से खाली नहीं था और शेष सेना तीन भागों में बंटकर तीन तरफ से महिपाल को घेरने बंगाल की तरफ रवाना हुई | इस अभियान का यह लाभ हुआ कि चोल नरेश राजेन्द्र की शक्ति को समझकर और उन्हें उगता सूर्य मानकर ओद्धा और कौशल देश के राजाओं ने खुद होकर संधि कर ली और लड़ाई से तटस्थ हो गए | पहले ये लोग महिपाल के साथ थे | इससे चोल युद्ध वाहिनी को दो तरह से लाभ हुआ | एक तो यह कि उन्हें मार्ग में किसी से कोई युद्ध नहीं करना पड़ा, मुख्य शत्रु महिपाल के खिलाफ उनकी सैन्य शक्ति यथावत बनी रही और दूसरा बड़ा लाभ यह कि महीपाल को उनके अभियान की जानकारी नहीं मिल पाई, वह इस गफलत में रहे कि जब भी कोई आक्रमण होगा, तो संधि के अनुसार पहले कौशल देश और ओद्धा अर्थात आज के उडीसा में उसका प्रतिकार भी होगा और उन्हें पूर्व सूचना भी मिल जायेगी | किन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं, उलटे ओद्धा के राजा इन्द्रदत्त ने तो यह सूचना भिजवाई कि केवल पचास हजार चोल योद्धा डंडाभुक्ति के रास्ते बंगाल की ओर बढ़ रहे है | कौशल देश के कमजोर राजा गोबिंदचन्द्र ने भी चुप्पी साधे रहने में ही अपनी भलाई समझी | अतः जब समुद्र सहित तीन ओर से चोल सेना ने महीपाल को घेरा तो उस समय वह पूरी तरह असावधान थे अतः न केवल आसानी से पराजित हो गए, बल्कि उन्हें बंदी भी बना लिया गया |

बहुमूल्य सम्पदा, गंगा जल के विशालकाय पात्रों व बंदी राजा महिपाल के साथ जब चोल सेनानायक तुंगभद्रा के किनारे इंतज़ार कर रहे राजेन्द्र चोल के पास पहुंचे, तो उनका शानदार स्वागत हुआ | महाराज राजेन्द्र ने महिपाल से सीधे सवाल उन दिव्य आभूषणों को लेकर ही किये, लेकिन महीपाल ने गंगाजल हाथ में लेकर कसम खाकर कहा कि उसने उन आभूषणों को श्री विजय द्वीप के राजा विजयोत्तुंग वर्मन के पास पहुंचा दिए हैं | श्री विजय द्वीप अर्थात आज के मलाया सुमात्रा जावा | उसके बाद जब महीपाल ने खुद होकर उनके करदाता सामंत बनने की इच्छा जताई, तो राजेन्द्र ने उन्हें मुक्त कर दिया | लूट की अपार सम्पदा और दिग्दिगंत व्यापी यश के साथ राजेन्द्र वापस अपनी राजधानी तंजावुर पहुंचे | उसके बाद उन्होंने श्रीविजय द्वीप पर भी धावा बोला और उसे अपने अधिकार में लिया, जहाँ अंततः उन्हें आभूषण भी मिल गए और श्रीविजय द्वीप के राजकुमारी से उनका विवाह भी हुआ |

मेरी तरह आपके भी दिमाग में सवाल उठ रहा होगा कि क्या वास्तव में राजेन्द्र चोल के उक्त सभी अभियान कतिपय तथाकथित दिव्य आभूषणों की खातिर हुए होंगे ? यह वह दौर था जब महमूद गजनवी उत्तर भारत में लूट खसोट कर रहा था, मंदिरों का ध्वंश कर रहा था | क्या यह सम्भव नहीं है कि ये सब अभियान दक्षिणावर्त को एक सूत्र में बांधने के लिए हुए हों ? क्योंकि जिस प्रकार उन्होंने जीतने के बाद महिपाल को मुक्त किया, बेंगी के राजा के साथ अपनी पुत्री का विवाह किया, श्री विजय द्वीप की राजकुमारी के साथ स्वयं विवाह कर उस राजपरिवार के साथ भी आत्मीयता विक्सित की, उससे तो मुझे यही लगता है | आपको इस श्रंखला का दूसरा विडियो भी स्मरण होगा जिसमें राजराजेश्वर उपाख्य वृहदेश्वर मंदिर का उल्लेख था, जहाँ के कलश में हर बारह वर्ष बाद कोंदों के बीज सुरक्षित किये जाते हैं, ताकि अगर जल प्रलय हो तो शेष बचे मानवों के लिए बीज सुरक्षित रहें | भविष्य का इतना चिंतन करने वाले लोगों ने क्या महमूद के नेतृत्व में आई इस्लामी आतंक की आंधी के संकट को महसूस नहीं किया होगा ? यह भी स्मरण रखना होगा कि बाद में चोल साम्राज्य भले ही कमजोर या समाप्त हो गया हो, किन्तु आगामी अनेक वर्षों तक वहां हिंदुत्व की जय पताका ही फहराती रही |

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