प्रथ्वीराज चौहान के वे जहरीले वाण

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रोमांचक बाल्यकाल और शब्दभेदी वाण प्रशिक्षण प्रथ्वीराज चौहान का नाम हर भारतीय जानता है, उन्होंने मुहम्मद गौरी को बार बार हराया, गिरफ्तार क़र ब...


रोमांचक बाल्यकाल और शब्दभेदी वाण प्रशिक्षण

प्रथ्वीराज चौहान का नाम हर भारतीय जानता है, उन्होंने मुहम्मद गौरी को बार बार हराया, गिरफ्तार क़र बार बार छोड़ा, लेकिन अंत में जब वे हारे, तो कैसे उनके साथ अमानुषिक व्यवहार हुआ, यह किस्सा तो हर एक को जबानी याद है, लेकिन इसके अलावा उनके विषय में विस्तार से अमूमन कम ही लोगों को ज्ञात है | प्रथ्वीराज का उल्लेख मुख्यतः तीन पुरातन ग्रथों में मिलता है | पहला है उनके मित्र कवि चंद वरदाई द्वारा लिखित प्रथ्वीराज रासो, दूसरा सूर्यमल्ल मीसण का वंश भास्कर और तीसरा आल्ह खंड | प्रथम दो में तो उन्हें नायक के रूप में वर्णित किया है, किन्तु तीसरे आल्ह खंड में उन्हें दुर्योधन का अवतार बताकर आलोचना की गई है | इतिहासकार तीनों ग्रंथों में कल्पना का मिश्रण मानकर उन्हें अमान्य करते हैं, किन्तु अगर वे ग्रन्थ सत्य और कल्पना का मिश्रण भी हैं, तो उनमें से ही सत्य को छानकर अलग करना होगा | तो आईये वही प्रयत्न करते हुए प्रतापी प्रथ्वीराज चौहान के विषय में कुछ विस्तार से चर्चा प्रारम्भ करते हैं | तो शुरूआत उनके पूर्वजों से –

जिन दिनों शहाबुद्दीन गौरी भारत पर आँख गडाए हुए था, उस दौर में भारत में चार प्रमुख शक्ति केंद्र थे – दिल्ली में तोमर, गुजरात के अनहिलबाड पाटन में चालुक्य, कन्नौज में राठौड़ और मरुभूमि में प्रथ्वीराज के पिता सोमेश्वर चौहान | किसी कारणवश दिल्लीश्वर अनंगपाल का कन्नौज नरेश विजयचंद से झगडा हो गया | सम्मुख युद्ध में सांभर नरेश सोमेश्वर ने अनंगपाल का साथ देते हुए कन्नौज नरेश को घायल कर दिया और वे पीछे हटने को विवश हुए | युद्ध में विजय भले ही मिल गई हो, किन्तु अनंगपाल फिर भी सशंकित थे | उन्हें लगा कि बार बार तो सोमेश्वर आयेंगे नहीं, और कन्नौज नरेश हार कर चुप बैठने वाले नहीं हैं | अतः उन्होंने युक्ति निकाली और कन्नौज नरेश के पुत्र जयचंद से अपनी बड़ी पुत्री सुरसुन्दरी का विवाह कर दिया तथा छोटी कमला से यशस्वी सोमेश्वर का | उन्होंने इस प्रकार स्वयं को निष्कंटक बना लिया |

कमलादेवी ने कुछ समय उपरांत सन ११६६ में पुत्ररत्न को जन्म दिया, यही थे हमारे कथानायक इतिहास प्रसिद्ध प्रथ्वीराज चौहान |

इनके बाल्यकाल का अत्यंत रोचक और रोमांचक वृतांत प्राप्त होता है | जब प्रथ्वीराज मात्र चार ही वर्ष के थे, तब एक बार अपनी ननिहाल दिल्ली गए | नाना अनंगपाल ने अपने राज ज्योतिषी से उनका भाग्य बताने का आग्रह किया | हस्तरेखा और कुण्डली का अध्ययन करने के बाद ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि यह बालक तो परम प्रतापी होगा और आपका उत्तराधिकारी भी यही होगा | इसकी जन्म पत्रिका में ननिहाल की धन सम्पदा प्राप्त करने का योग है | यह बात नाना अनंगपाल को नागवार गुज़री | संभव है उन्होंने जयचंद को अपना उत्तराधिकारी सोच रखा हो | जो भी हो वे आखेट के बहाने नन्हे प्रथ्वीराज को अपने साथ वन में ले गए और उसे जंगल में ही छोड़ आये | अपनी पुत्री से कुछ झूठा बहाना बना दिया, बेचारी मां रोती कलपती रह गई |

लेकिन जाको राखे साईयाँ मार सके न कोय, बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय | जंगल में वह हुआ, जिसने प्रथ्वीराज के व्यक्तित्व में चार चाँद लगा दिए | एक तपस्वी ने इस होनहार बालक की न केवल प्राण रक्षा की वरन उन्हें शस्त्र और शास्त्र दोनों का विज्ञ बना दिया, उन्हीं के मार्ग दर्शन में प्रथ्वीराज शब्दभेदी वाण चलाने में पारंगत हुए, जिसके लिए वे बाद में प्रसिद्ध भी हुए | समय चक्र घूमा और अनंगपाल एक बार फिर शिकार के लिए जंगल में गए और उनकी भेंट किशोर प्रथ्वीराज से हुई | एक शेर ने अनंगपाल का शिकार कर ही लिया होता, अगर प्रथ्वीराज ने उनकी प्राणरक्षा न की होती | स्वाभाविक ही अपने रक्षक के विषय में जानने की उत्कंठा से वे उसके पालक ऋषि के आश्रम भी गए और वहां उन्हें प्रथ्वीराज की वास्तविकता की जानकारी मिली | आत्मग्लानि और पश्चाताप के भाव ने उन्हें व्यथित कर दिया | कहने की आवश्यकता नहीं प्रथ्वीराज वापस महलों में आये, नाना ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो पिता सोमेश्वर का राज तो उनका था ही | जब अजमेर पहुंचे तो उनकी कीर्ति गाथा पहले ही क्षेत्र में पहुँच गई | आबू नरेश जैतसी ने अपनी सर्वगुण संपन्न और अतिशय सुन्दर कन्या इच्छनकुमारी का विवाह सम्बन्ध उनके साथ तय कर दिया | परमार राजा जैतसी जिन पाटन के चालुक्य नरेश भीम देव के सामंत थे, वे भी इच्छनकुमारी के सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर उससे विवाह का मंसूबा बाँधे हुए थे | अब विषय पर आगे बढ़ने के पूर्व थोडा सा वर्णन भीमदेव का भी |

कीर्ति कौमुदी नामक संस्कृत ग्रन्थ में लिखा है –

घृत पार्थिव नेपथ्ये, निष्क्रान्तेSत्र शतक्रतौ |

जयंता भिनय चक्रे, मूलराजस तदंगजः ||

चापलादिव बालेन रिन्खता समरान्गणे |

तुरश्काधिपतेः येन विप्रकीर्णा वरूथिनी ||

यच्छिन्न म्लेच्छ कंकालस्थ मुच्चेर्विलोकयन |

पितु प्रालेय शैलस्य न स्मरत्य अर्बुदाचल ||

अर्थात अजयपाल रूपी इंद्र तो रंगभूमि पर अपना कार्य करके चले गए, उनके बाद उनके पुत्र मूलराज ने इंद्र पुत्र जयंत का अभिनय किया | उन्होंने रणभूमि में चपल बालक के समान क्रीडा करते हुए, तुर्कराज की सेना को छिन्नभिन्न कर दिया | युद्ध में मारे गए शत्रुओं के कंकालों का ढेर देखकर आबू पर्वत अपने पिता हिमालय को भी भूल गया |

कौन था वह म्लेच्छ तुर्क, जिसकी इतनी दुर्गति मूलराज ने की, इसका उत्तर मुस्लिम इतिहास लेखक फ़रिश्ता ने दिया और लिखा कि ११७८ ईसवी में मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी गजनी से रवाना होकर मुल्तान के रेतीले मैदानों के रास्त गुजरात पहुंचा था | सुल्तान का लश्कर बहुत दूर चलकर आया था, इसलिए काफी थका हुआ और पस्त था, उधर गुजरात के सैनिक एकदम तरोताजा थे और उन्होंने आक्रमण होने का इंतज़ार न करते हुए आगे बढकर खुद पहले हमला कर दिया और युद्ध में मुहम्मद गौरी की कितनी करारी शिकस्त हुई इसका वर्णन हमने किया ही है | फ़रिश्ता के अनुसार लौटते समय भी मार्ग में मुहम्मद गौरी की बहुत फजीहत हुई | इतिहासकार रणछोड़ जी दीवान भी लिखते हैं – मुसलमानों पर हिन्दू लोग बिजली के समान टूट पड़े, वायुवेग से बंदरों के समान उछलते कूदते, हिरन के छौनों के समान कुलांचें भरते वे मुसलमानों के पीछे दौड़े | कितने ही तो हिन्दुओं की तलवारों से मारे गए और कितनों ही के मस्तक राजपूतों की गदाओं से चकनाचूर हो गये | मुहम्मद शाह तो अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ, किन्तु उसके लश्कर में से बहुत से लोग पकड़ लिए गए | किन्तु दुर्भाग्य से गौरी को पराजित करने वाले पराक्रमी मूल्देव की दो ही वर्ष बाद मृत्यु हो गई और पाटन के नए राजा भीमदेव द्वितीय बने |

तो इन्हीं भीमदेव ने जब आबू के परमार राजा जैतसी को सन्देश भेजा कि वे उनकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं, तो आगे क्या हुआ ?

युद्ध भूमि में पिता ने पाई वीरगति

भीमदेव ने जब आबू के परमार राजा जैतसी को सन्देश भेजा कि वे उनकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं, तो आबू नरेश को उनकी यह बात सख्त नागवार गुज़री | राजपूतों में बैसे भी जबान का महत्व होता था | उन्होंने तुरंत यह समाचार अजमेर भेजा और मदद की गुहार लगाई |

दूसरी ओर उन्होंने भोला भीम के नाम से प्रसिद्ध चालुक्य नरेश को स्पष्ट सन्देश भेज दिया – अगर सांभरपति चौहान और मरुभूमि के नौ लाख योद्धा मिलकर भी मेरी रक्षा न कर सके तो जिस चक्र सुदर्शन धारी ने माता के गर्भ में परीक्षित की रक्षा की, जिसने जलते हुए जंगल में छोटे छोटे ग्वाल बच्चों को बचाया, जिसने अपने मामा का वध कर अपने माता पिता को त्राण दिलाया, जिसने गोवर्धन को उठाकर बृज की इंद्र के कोप से रक्षा की, वही गोकुल का स्वामी श्री कृष्ण मेरी रक्षा करेगा, क्योंकि वह सदा सत्य के साथ रहता है, वही मेरी जुबान की टेक रखेगा | मैं अपनी बात से नहीं फिर सकता | इच्छन कुमारी का वाग्दान कुवर प्रथ्वीराज के साथ हो चूका है, आपको अकारण हठ नहीं करना चाहिए | तो मुहम्मद गौरी के प्रथम आक्रमण को विफल कर उसके छक्के छुडाने वाले गुजराती वीरों और साम्भर के पराक्रमी राजपूतों के संघर्ष का परिणाम क्या हुआ,

लेकिन भीम तो कामदेव के वाणों से पगला चुके थे | यद्यपि उन्हें उनके परामर्श दाताओं ने समझाया भी कि इस समय हिन्दू शक्तियों का आपस में लड़ना उचित नहीं है, क्योंकि गजनी का सुलतान मोहम्मद गौरी किसी भी समय दुबारा आक्रमण कर सकता है | किन्तु भीम ने किसी की एक न सुनी | और युद्ध के नगाड़े गूंजने लगे | महाप्रतापी भीम की सेनाओं ने पहले दौर में अचलेश्वर पर अधिकार कर लिया और परमारों को गढ़ छोड़कर मरुदेश की तरफ भागना पड़ा | वे पीछे हटते हुए भी लगातार लड़ते हुए धरा को शत्रुओं के रक्त से लाल करते गए |

तभी मौक़ा देखकर शहाबुद्दीन गौरी भी रणांगण में कूद पड़ा | इसके पूर्व कि गौरी और गुर्जर सेनाओं के बीच पिसकर आबू की सेना का सम्पूर्ण विनाश हो, चालुक्यों का मुकाबला करने सांभर से चौहान वीर कैमास के नेतृत्व में चौहान सैन्य दल वहां आ पहुंचा, तो स्वयं युवराज प्रथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी का मुकाबला कर उसे खदेड़ दिया | यद्यपि चालुक्यों की सेना लौह दुर्ग के समान दृढ थी, चारों ओर हाथी भी खड़े हुए थे, स्वयं भीम ने युद्ध में प्रबल पराक्रम दिखाया, हाथी के मर जाने के बाद, तलवार टूट जाने के बाद भी वह मात्र कटार से लड़ता रहा, किन्तु रात दिन अविश्रांत चले युद्ध में अंततः कैमास की ही विजय हुई | इस युद्ध का अत्यंत ही रोमांचक विवरण वंशभास्कर कार ने लिखा है –

जिस समय हाथी पर सवार चालुक्यराज भीम कुम्हार के अलाव की तरह धधकते नेत्रों से शत्रुदल को घूरते अपने योद्धाओं को रणभूमि में जूझने हेतु प्रेरित कर रहे थे, उसी समय जाजदेव यादव की तलवार के वार से हाथी की सूंड उसके दांतों सहित कटकर नीचे जमीन पर आ गिरी | हाथी ने चिंघाड़कर अपने अगले पैर जमीन पर टिकाए तो हाथ में तलवार थामे भीम भी नीचे आ गिरे | लेकिन वह संभलकर उठ खड़े हुए और तलवार के प्रहार से चौहान वीरों को देवलोक भेजने लगे | तभी चंद पुंडीर की गदा के प्रहार से हाथ की तलवार टूट गई | भीम ने तुरंत कमर से कटार निकालकर जूझते रहे, किन्तु तभी कैमास ने दौड़कर चालुक्य राज को अपनी कांख में दबा लिया | भीम के हाथ से कटार भी जाती रही |

अपने स्वामी को शत्रु की गिरफ्त में देखकर युद्धभूमि में घायल पड़े चालुक्य हम्मीर के मृतप्राय शरीर में भी मानो जान आ गई और उसने जमीन पर पड़े पड़े ही भीम को कैमास की पकड़ से छुडाने का प्राणपण से प्रयास किया और सफल भी रहा | तबतक अन्य चालुक्य योद्धा भी भीम को बचाने आ पहुंचे | हाथ में भाला थामे सांखला वीरमदेव ढाल बनकर उनके सामने जा डटे | अंततः सत्तर हजार गाँवों के अधिपति चालुक्यराज भीम को एक अरबी घोड़े पर सवार होकर पीछे हटना पड़ा और इच्छनकुमारी से प्रथ्वीराज का विवाह संपन्न हुआ | इस युद्ध में भीमदेव के काका सारंगदेव भी वीर गति को प्राप्त हुए | उनके सात पुत्रों का इतिहास भी बड़ा विचित्र है |

सारंग देव के सातों पुत्र प्रताप, अमर, गोकुल, गोबिंद, हरी, श्याम और भगवान भी अतुलित बलशाली वीर योद्धा थे | एक दिन आत्मरक्षा में प्रताप और अमर सिंह के हाथों, भीमदेव का एक प्रिय हाथी साहण श्रृंगार मारा गया | मदमस्त हाथी ने उन दोनों पर हमला कर दिया था, अतः प्रताप ने तलवार के वार से उसकी सूंड काट गिराई | राजा भीमदेव क्रोधित हुए तो जान बचाकर ये सातों अजमेर नरेश सोमेश्वर की शरण में जा पहुंचे, जिन्होंने उनका बहुत आदर सत्कार किया, उन्हें गाँवों के पट्टे और शिरोपाव आदि प्रदान किये | किन्तु एक दिन राजदरवार में बड़ा ही अप्रिय प्रसंग घटित हुआ | दरवार में उस समय महाभारत का प्रसंग चल रहा था और योद्धाओं के शौर्य का बखान हो रहा था | जोश में प्रताप सिंह ने अपनी मूछों पर ताव दिया | उन्हें प्रथ्वीराज के काका और महाराज सोमेश्वर के भाई कन्ह चौहान की उस प्रतिज्ञा का ज्ञान नहीं था कि उनके सामने अगर कोई मूछों पर ताव देगा, तो वे उसे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे | कन्ह के सामने जैसे ही प्रताप ने मूंछ मरोड़ी बैसे ही कन्ह ने तलवार का इतना ताकतवर वार किया कि प्रताप सिंह का शरीर जनेऊ के आकार में तिरछा कंधे से कमर तक दो टुकडे हो गया | यह दृश्य देखकर प्रताप के शेष छहों भाई भी कन्ह पर टूट पड़े और सभा भवन युद्ध क्षेत्र में बदल गया | महाराज सोमेश्वर हक्के बक्के रह गए | उनके दरवार में शरणागतों का खून बह रहा था और वे असहाय थे | वे दुखी मन से महल में चले गए | सभी सातों सोलंकी भाई सभा भवन की इस विभीषिका में स्वर्ग सिधारे | उस घटना के बाद सम्पूर्ण अजमेर में तीन दिन तक शोक मनाया गया |

प्रथ्वीराज ने काका कन्ह को बहुत कुछ कहा कि यह आपने क्या किया | घर आये मेहमानों का वध कर डाला | दुनिया क्या कहेगी ? सोमेश्वर ने भी व्यवस्था दी कि भविष्य में कन्ह सदा आँखों पर पट्टी बांधकर रखें, न देखेंगे और ना ही इस प्रकार का जघन्य कृत्य दुबारा होगा | उधर जैसे ही यह समाचार भीमदेव चालुक्य ने सुना वह क्रोध और शोक से विव्हल हो गए | भले ही उनके क्रोध से डरकर ही वे सातों भाई अजमेर गए हों, लेकिन थे तो उनके ही चचेरे भाई | भीमदेव ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी | कनक कुमार, राणिकराज, चूडासमा जयसिंह, वीर धवलांगदेव और सारंग मकवाणा जैसे योद्धाओं को आमंत्रित किया और जोश भरते हुए कहा – जिस प्रकार युवा हाथी प्रथ्वी पर से धूल उड़ाता है, जिस प्रकार भील लोग चूहों के बिलों को नष्ट कर देते हैं, आओ हम लोग भी इस सांभर देश को मटियामेट कर दें | हमें जीवन का मोह छोड़कर युद्ध करना है, यह अपने कुल गौरव की रक्षा का प्रश्न है | विजई हुए तो प्रथ्वी पति होंगे, और वीरोचित मृत्यु का वरण किया तो अक्षय कीर्ति के साथ देवलोक गमन करेंगे |

रणवाद्य बजने लगे, मानो महाप्रलय का समय नजदीक आ गया हो | बदले की आग में जलते हुए चालुक्यों के जोश के सामने इस बार चौहान कमजोर पड़ गए | संभवतः उनके मन में भी ग्लानि थी | नतीजा यह निकला कि सच्चे शूरवीर सोमेश्वर युद्ध भूमि में लड़ते हुए खंड खण्ड होकर धराशाई हो गए | इस असार संसार से मुक्त हो गए | उनके वीरगति पाते ही चालुक्य सेना ने भी अपने हाथ रोक लिए | युद्ध बंद हो गया |

गौरी को बनाया बंदी, बने दिल्लीश्वर

पिता के अंतिम संस्कार के बाद प्रथ्वीराज ने पिता की मौत का बदला लेने की ठानी | उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक बदला नहीं ले लेते पगड़ी नहीं बांधेंगे | पहले तो उनका राज्याभिषेक हुआ, इच्छ्नी देवी के साथ प्रथ्वीराज इंद्र और शची के समान शोभा पा रहे थे | काका कन्ह ने सबसे पहले तिलक किया और एक हाथी भेंट किया | इसी प्रकार सभी सामंतों और सरदारों ने तिलक कर विभिन्न भेंटें दीं | अगले दिन फिर दरवार लगा | बज्र के समान देह वाले, आँखों पर पट्टी बांधे नरव्याघ्र कन्ह सांकलों से जकडे सिंह के समान प्रतीत हो रहे थे | तेजस्वी लंगरी राय सहित अन्य छोटे बड़े सरदारों ने अपना अपना स्थान गृहण किया | प्रथ्वीराज ने सभी को युद्ध निमंत्रण दिया और रणभेरी बज उठी | इस तैयारी का समाचार सुनकर भीमदेव ने भी अपनी सेना को सन्नद्ध कर दिया | और वह समय भी आ गया जब प्रथ्वीराज की सेना पट्टन के प्रवेश द्वार पर जा पहुंची | युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व प्रथ्वीराज ने अपने सैन्य दल का उत्साह वर्धन किया, निर्डर राय को अपने गले का बहुमूल्य हार तो कन्ह को अपना अश्व समर्पित किया | युद्ध शुरू हुआ तो मानो शिव मुंडमाल बनाने में व्यस्त हो गए, काली खप्पर भर भर कर रक्तपान करने लगीं, स्वर्ग के मार्ग पर शूरवीरों की भीड़ बढ़ने से यातायात अवरुद्ध हो गया | रणभूमि में वीरोचित मृत्यु का वरण कर योद्धागण स्वर्ग पथ पर ही तो जा रहे थे | जिस प्रकार बादलों में चमचम बिजली चमकती है, उसी तरह कन्ह की तलवार चमक रही थी | सामना करने गुजरात के वीर सारंग मकवाणा सामने आये | दोनों मतवाले सिंहों के समान जूझे, किन्तु अंत में सारंग ने स्वर्ग का मार्ग पकड़ा, कन्ह विजई हुए | साबरमती नदी के दोनों किनारों पर रक्त की बाढ़ आई हुई थी | क्रोधित प्रथ्वीराज के घोड़े की टापों से प्रथ्वी और शत्रु सेना काँप रही थी | जो भी सामने आता खंड खंड हो जाता | अंत में चालुक्य सेना भाग खडी हुई | इसके आगे का प्रसंग बहुत ही दुखदाई है |

जिस समय मुहम्मद गौरी पृथ्वीराज के हाथों पहली पराजय का स्वाद चखकर वापस जा रहा था, उस दौरान उसका चचेरा भाई मीर हुसैन मार्ग से एक गणिका चित्र रेखा को भी अपने साथ ले गया | चित्ररेखा बहुत ही गुणी और सुन्दर थी | गजनी पहुंचने के बाद गौरी का मन उस पर आसक्त हो गया | और उसने हुसैन को आदेश दिया कि चित्ररेखा को उसके हरम में पहुंचा दिया जाए | लेकिन यह बात न हुसैन को पसंद आई और न ही चित्ररेखा को | नतीजा यह निकला कि दोनों ही गजनी छोड़कर भारत आ गए | भारत में आकर वे सीधे पृथ्वीराज के पास पहुंचे और उनसे शरण मांगी | भला पृथ्वीराज जैसे पराक्रमी राजपूत राजा शरण में आये व्यक्ति को न कैसे कहते | उन्होंने न केवल मीर हुसैन को शरण दी, बल्कि उसे हांसी और हिसार के परगने भी जागीर में दे दिए |

जब यह समाचार मुहम्मद गौरी को मिला तो उसका खून खौल उठा और उसने अपना सन्देश वाहक अजमेर भेजा | सन्देश वाहक दूत पहले तो मीर हुसैन से मिला और उससे कहा कि अब भी बख्त है, चित्ररेखा सुलतान को सौंप दो और चैन से अपने देश गजनी में ही रहो | जब हुसैन ने दूत की बात अस्वीकार कर दी तो उसके बाद वह सन्देश वाहक पृथ्वीराज के दरवार में पहुंचा और गौरी का सन्देश दिया | या तो हुसैन और चित्ररेखा को हमारे हवाले कर दो, अन्यथा परिणाम भुगतने को तैयार रहो | भला क्षत्रिय वीर भी कहीं युद्ध की धमकी से डरते हैं ? एक मत से जबाब दे दिया गया, हम नहीं डरते, गौरी से जो करते बने कर ले | गौरी के मन में पहली पराजय की कसक थी ही, उसने एक बड़ी सेना तैयार की और चढ़ दौड़ा भारत पर | अब यह कोई एक दिन का काम तो था नहीं, उसने ११७५ में मुल्तान पर अधिकार जमाया तो ११७८ में अनहल वाड को जीता | मैंने जिस दुखदाई प्रसंग का उल्लेख पूर्व में किया था उसका वर्णन वंश भास्कर कार ने कुछ इस प्रकार किया है –

उनके अनुसार जिस समय गौरी की विजय दुंदुभी चारों तरफ गूँज रही थी, उस समय बदले की आग में जलते हुए चालुक्य राज भीम ने अपना दूत बनाकर सारंगदेव झाला को गजनी भेजा | झाला ने गौरी को सन्देश दिया कि अगर आप चौहानों को सबक सिखाना चाहते हैं, तो चालुक्य राज भीम आपका साथ देने को तत्पर हैं | जीत के बाद आपको नागौर का इलाका उपहार स्वरुप दिया जायेगा |

गौरी ठहाका मार कर हंसा और क्रोध से बोला - जिस गुजरात को महमूद गजनवी ने बुरी तरह रोंदा, उसका गीदड़ शासक आज शेर को दावत दे रहा है कि आओ हाथी का शिकार करो और बदले में हाथी की पूँछ तुम रखो और शेष हाथी उसका है | इतनी हिमाकत | अब आखिर झाला का राजपूती खून भी खौल गया और उसने कहा जिस महा प्रतापी भीम को तुम घमंड में गीदड़ कह रहे हो, वह अकेला ही तुम्हारे म्लेच्छ साम्राज्य को धूल में मिलाने की सामर्थ्य रखता है |

यह सुनते ही बादशाह के इशारे पर एक सामंत ने सारंगदेव झाला पर तीर छोड़ दिया | दूसरे ही क्षण घायल सारंगदेव की तलवार के वार से हुजाब हैजम का सर कटकर भूमि पर आ गिरा | जिस समय झाला का शरीर गौरी के दरवार में खंड खंड होकर गिरा, उसके पूर्व उसने अनेक यवनों को धराशाई कर दिया | स्वाभाविक ही इसके बाद मुहम्मद गौरी ने अनहिल वाड पाटन की और अपनी सेना को कूच का आदेश दिया | पाटन को जीतने के बाद भी शहाबुद्दीन गौरी सीधा चौहानों से नहीं भिड़ा, उसने पहले सिंध लाहौर और सियालकोट पर कब्जा मजबूत किया | इस दैरान अनेक स्वार्थी हिन्दू राजा भी उससे मित्रता गांठने अपनी सेना सहित उससे जा मिले | अंत में ११८४ में जब वह अजमेर की ओर बढ़ा, तब अपने वीर धीर सामंतों कन्ह, कैमास, मंद और पुंडीर के साथ पृथ्वीराज ने सारूड़ा नामक स्थान पर मुकाबले के लिए डेरा जमाया | हुसैन खान भी अपने एक हजार यवन सैनिकों के साथ उनसे आ मिला | इतना ही नहीं तो जब युद्ध के नगाड़े बजे तो वह पृथ्वीराज के अहसान का बदला चुकाने की इच्छा मन में बसाये, सबसे आगे बढ़कर अपने चचेरे भाई शहाबुद्दीन गौरी की सेना से भिड़ गया | उसके मुकाबले को गौरी का सेनापति तातार खां आगे बढ़ा | दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ | अंत में तातार खां की सेना के पाँव उखड़ गए | स्वयं तातार अपने पांच हजार सैनिकों के साथ मारा गया | अपने तीन सौ साथियों के साथ मीर हुसैन ने भी शहादत पाई |

तातार के मारे जाते ही खुरासान खां आगे बढ़ा, लेकिन उसका सामना करने को चामुण्डराय सामने थे | अनेक सैनिकों के साथ वह भी यमपुरी रवाना हुआ | दो यवन सेनापतियों की दुर्गति ने पृथ्वीराज की सेना का मनोबल बहुत बढ़ा दिया | वे प्रबल वेग से मुसलमानी सेना पर टूट पड़े | घबराई हुई शत्रु सेना के पाँव उखड गए | शहाबुद्दीन गौरी ने उन्हें भरसक रोकने की कोशिश की | इसी दौरान जाम चौहान ने आगे बढ़कर उसके घोड़े को काट डाला | घबराया हुआ गौरी जब एक हाथी पर चढ़ने का प्रयास कर रहा था, तभी चामुंड राज ने झपट कर अपने धनुष की प्रत्यंचा गौरी के गले में फंसाकर उसे नीचे खींच लिया | गौरी को इस प्रकार घिरा देखकर थोड़े से यवन योद्धाओं को छोड़कर शेष सब म्लेच्छों ने जान बचाकर भागने में ही अपनी कुशल समझी | गौरी के पांच अमीर ज्यान खान, जमाम, कमाम, आरब खां और गाजी खां ने प्राणपण से अपने सुलतान को बचाने की कोशिश की, किन्तु जान देकर भी वे उसे बचा नहीं पाए | गौरी पकड़ा गया | इस युद्ध में दोनों पक्षों के लगभग बीस हजार योद्धा मारे गए | इसके बाद चौहान सेना ने शत्रुदल के डेरों को लूट लिया | शहाबुद्दीन को पांच दिन अपनी कैद में रखने के बाद उसे कारा गार से निकालकर स्नान करवाया गया, नए वस्त्र और आभूषण पहनाये गए | उसके बाद अभय देकर उसे उसके देश भेज दिया, यह कहकर कि फिर कभी भूलकर भी इधर का मुंह न करना |

इस विजय अभियान ने पृथ्वीराज का यश बहुत बढ़ा दिया | दिल्ली के अधिपति और पृथ्वीराज के बुजुर्ग नाना ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी तो पहले ही घोषित कर दिया था, अब बुलाकर विधिवत दिल्ली का राज्य सौंप दिया और स्वयं तीर्थाटन को चले गए |

आपसी संघर्ष, विलासिता और अहंकार ने निमंत्रित किया मुहम्मद गौरी को

गुजरात के भीम के बाद पृथ्वीराज का संघर्ष महोबा के परमार राजा के पराक्रमी योद्धा आल्हा ऊदल से भी हुआ और नतीजा यह निकला कि भारत के अनेकों शूरवीर योद्धा पारस्परिक संघर्ष में हताहत हुए | इसे अवसर मानकर मुहम्मद गौरी ने कई बार पृथ्वीराज से युद्ध किया, किन्तु बार बार पराजित हुआ | पृथ्वीराज ने भी मानो इसे खेल ही समझ लिया था, वे बार बार उसे हराते, पकड़ते, वह बार बार फिर गलती न करने की सौगंध खाता और पृथ्वीराज उसे फिर छोड़ देते | लेकिन समय सदा एक सा नहीं रहता, उनका भी भाग्य रूठा और जब उनके पराक्रमी सेनापति कैमास रात के समय अँधेरे में गश्त कर रहे थे, पृथ्वीराज ने उन्हें कोई शत्रु समझकर शब्दभेदी वाण चलाकर मार दिया | उसके बाद आत्मग्लानि तो हुई, किन्तु मन में शंका का भूत भी घर कर गया और चुगलखोरों के बहकावे में आकर, यह मानकर कि कैमास के पराक्रमी भाई चामुंडराज बदला लेने का प्रयत्न करेंगे, उन्हें भी हथकड़ी बेड़ी पहनाकर कारागृह में डाल दिया |

यूं तो 16 वर्ष की आयु से ही पृथ्वीराज के अनेकों विवाह हुए, किन्तु सर्वाधिक चर्चित है 36 वर्ष की आयु में उनके द्वारा किया गया जयचंद की पुत्री संयोगिता का अपहरण | बैसे तो यह प्रसंग भी सर्वज्ञात है कि कैसे जयचंद ने पृथ्वीराज को संयोगिता के स्वयम्बर में आमंत्रित नहीं किया और उन्हें अपमानित करने के लिए द्वार पर उनका पुतला द्वारपाल के रूप में खड़ा कर दिया और संयोगिता ने उस पुतले को ही वरमाला पहना दी | उसके बाद जब तक जयचंद सावधान होते पृथ्वीराज संयोगिता को अपने साथ घोड़े पर बैठाकर रवाना हो गए | स्वाभाविक ही जयचंद ने अपनी सेना सहित उनका पीछा किया, किन्तु पृथ्वीराज की सेना भी संनद्ध थी | भीषण युद्ध हुआ, जिसमें पृथ्वीराज के भाई हम्मीर और गंभीर ने प्रबल पराक्रम दिखाते हुए वीरगति पाई तो जयचंद की ओर से लड़ते हुए काशी नरेश परलोक सिधारे |

इस प्रकार भारत के अनेकों शूरवीर अकारण लड़ते हुए अपना बल क्षीण कर रहे थे, तो मुहम्मद गौरी लगातार मौके की ताक में था | उसे अवसर भी जल्द ही मिल गया | संयोगिता से विवाह के बाद पृथ्वीराज पूरी तरह उसके मोहपाश में बंध गए | स्वयं संयोगिता भी उनके और अपने बीच अब किसी को नहीं आने देना चाहती थी | यहाँ तक कि उसने अपने महल के द्वार पर पांच सौ युवतियों को वीर वेश में तैनात कर दिया | जो भी पृथ्वीराज से मिलने आता, उसका स्वागत वे युवतियां लाठियों से करतीं | राजकाज ठप्प सा हो गया | यह स्थिति एक दो दिन नहीं महीनों तक चलती रही | दिल्ली में मत्स्य न्याय जैसी स्थिति निर्मित हो गई, हर बड़ी मछली अपने से छोटी मछली को खाने लगी | जिसकी लाठी उसकी भैंस | अफरातफरी मच गई | ऐसे में पृथ्वीराज के एक श्वसुर कांगड़ा नरेश हम्मीर यादव उन्हें समझाने आये, तो उनका भी वही हश्र हुआ, योद्धा महिलाओं की लाठियों के प्रहार से उनकी पगड़ी भी जमीन पर गिर गई | वे यह प्रतिज्ञाकर कि अब कभी दिल्ली नहीं आएंगे अपनी राजधानी लौट गए | उस समय तो हद्द ही हो गई, जब पृथ्वीराज के बहनोई और परम सहायक रावल समरसिंह भी उनसे भेंट के इंतज़ार में बीस दिन निगम बोध घाट पर डेरा जमाये बैठे रहे, पर पृथ्वीराज से नहीं मिल पाए |

दिल्ली की इस स्थिति की जानकारी, पल पल की खबर मुहम्मद गौरी तक दो अधिकारी धर्मायन कायस्थ और नीतिराव खत्री पहुंचा रहे थे | परिणाम यह निकला कि गौरी एक बार फिर अपनी सेना सज्जित कर दिल्ली की ओर रवाना हो गया | व्यापार के सिलसिले में गजनी गए एक वणिक कर्मशाह ने गौरी के आक्रमण की पूर्व सूचना दिल्ली भेजी, जिसे पाते ही सभी सरदार इकट्ठे भी हुए और राजगुरू रामदेव व चंद वरदाई के साथ संयोगिता के महल पहुंचे, उनके साथ भी वही व्यवहार हुआ, किन्तु लाठियां खाते हुए भी इन लोगों ने रोते हुए रक्षक युवतियों से गुहार लगाई, हमें भले ही पीट लो, किन्तु कमसेकम अपनी स्वामिनी तक यह बात तो पहुंचा दो कि राज्य पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं | मुहम्मद गौरी एक बार फिर चढ़ा चला आ रहा है | दासियों को भी स्थिति की गंभीरता समझ में आ गई और यह सन्देश पहले संयोगिता तक और उनके माध्यम से पृथ्वीराज तक पहुँच गया |

स्थिति जानकर राजा दुःख और निराशा से भर गया | पृथ्वीराज सबसे पहले निगम बोध घाट पर जाकर अपने बहनोई समर सिंह से मिले और आँखों में आंसू भरकर कहा कि मैं कितना हतभागी हूँ कि आप बीस दिन तक यहाँ मेरा इंतज़ार करते रहे और मैं रागरंग में डूबा रहा | अब मेरी प्रार्यना मानकर आप वापस चित्तौड़ पधार जाएँ | रावल समरसिंघ ने वीरोचित उत्तर दिया, बोले - गौरी के आक्रमण का समाचार सुनने के बाद आपको अकेला छोड़कर चला जाऊं, ऐसा कायर मैं नहीं हूँ | अब तो जीना आपके साथ और मरण भी आपके साथ |

उसके बाद वीर मल्हण, राम बडग़ुज्जर, प्रसंग खीची, जैत परमार, कैमास के पुत्र प्रताप, जी हाँ वही कैमास, जो पृथ्वीराज के हाथों मारे गए थे, जाम यादव, चाचा कन्ह के पुत्र ईश्वरदास, चंद भाट आदि वीरों के साथ एक ही थाल में पृथ्वीराज ने भोजन किया और कहा मैं स्त्री के वशीभूत होकर अपने कुल के गौरव को कलंकित कर चुका हूँ | अब प्रायश्चित स्वरुप रणांगण में उतरूंगा, आपमें से किसी से साथ आने का कोई आग्रह नहीं है | अब भला इन राजपूतों में कौन ऐसा निकलता जो साथ न देता | बंदीगृह से चामुंड राज भी मुक्त होकर सहयोग हेतु तत्पर हो गए | देर से ही सही युद्ध की तैयारी शुरू हो गई |

पृथ्वीराज का प्राणोत्सर्ग और आजाद भारत के इतिहासकार

हमारे सेक्यूलर इतिहासकार भी अद्भुत हैं, जिनमें से कुछ तो पृथ्वीराज को दिल्ली का अधिपति भी नहीं मानते, उनकी नजर में तो पृथ्वीराज केवल अजमेर के शासक थे, जो गौरी के आक्रमण में मारे गए | इनकी बात तो जाने दें, महान तो हमारे आम हिन्दू भी है, जो मुहम्मद गौरी के ही एक सेना नायक मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को ईश्वर की तरह पूजते हैं | यह मैं नहीं कह रहा मुस्लिम इतिहास कार जनाब एस. ए. ए. रिजवी अपनी पुस्तक "ए हिस्ट्री ऑफ सूफीज्म इन इंडिया" में क्या लिखते हैं जरा उस पर गौर कीजिये -

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती भी बारहवीं सदी में मध्य एसिया से शहाबुद्दीन घूरी के सैन्य आक्रमण के साथ ही अजमेर आए थे। उन के बीच सहयोग पूर्ण संबंध थे। चिश्ती की मदद से ही शहाबुद्दीन घूरी ने पृथ्वीराज चौहान को अंततः हराया और मार डाला था। खुद मोइनुद्दीन चिश्ती के शब्दों में, “हम ने पिथौरा (पृथ्वीराज चौहान) को जीवित पकड़ा और उसे इस्लामी सेना के सुपुर्द कर दिया।”

इसके बाद भी जो हिन्दू अजमेर की मजार पर चादर चढ़ाते हैं, उन्हें अक्ल के अंधे न कहा जाए तो क्या कहा जाए ? हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान का हत्यारा हिन्दुओं का देवता है, है न कमाल की बात |

कुछ इतिहासकार ऐसे भी हैं, जिनका मानना है कि ठीक है दिल्ली पर पृथ्वीराज काबिज थे और उनका गौरी से संघर्ष भी हुआ, किन्तु वे युद्ध भूमि में ही मारे गए, उनकी महानता के जो किस्से प्रचारित हैं, वे मनगढंत और झूठे हैं | तो आईये उस कथानक को याद करते हैं जो आम तौर पर अधिकाँश भारत वासी पहले से ही जानते हैं |

विक्रम सम्वत ग्यारह सौ पचपन, श्रावण मास की अमावस्या के दिन मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज का यह युद्ध प्रारम्भ हुआ | भीषण संघर्ष के उपरांत जब पृथ्वीराज घायल होकर धरा पर गिरे, तब गौरी के सेना नायकों ने उन्हें ढालों से दबाकर विवश कर दिया और गिरफ्तार कर गजनी ले गए | उनकी पराजय का समाचार एकादशी के दिन दिल्ली पहुंचा तो सभी बारह रानियों ने अपने आप को जौहर की ज्वालाओं के सुपुर्द कर दिया | युद्ध में वीरगति पाने वाले वीर रण बाँकुरे राजपूत योद्धाओं की पत्नियों ने भी पृथ्वीराज की बहिन पृथा सहित बड़ी संख्या में जौहर मार्ग का अनुशरण किया |

उधर पृथ्वीराज को शहाबुद्दीन गौरी ने गजनी में कड़े पहरे के बीच एक तहखाने में बंद कर दिया | पूरे बावन दिन उस कैदखाने में निराहार रहने के बाद भी जब गौरी उनसे मिलने पहुंचा तो उनकी दहकती आँखों ने ही उसे भयभीत कर दिया | उसके बाद उस क्रूर अत्याचारी गौरी ने पृथ्वीराज की आँखें निकालने का आदेश दे दिया |

जैसा कि अधिकाँश भारतीय जानते हैं कि प्रथ्वीराज के कविमित्र चंद वरदाई ने सन्यासी वेश में गजनी पहुंचकर मोहम्मद गौरी को बताया कि प्रथ्वीराज शब्दभेदी वाण चला सकते हैं | गौरी को भरोसा नहीं हुआ और उसने उनकी इस क्षमता की परीक्षा लेने की ठानी | प्रथ्वीराज के हाथों में धनुष वाण थमा दिए गए और एक घंटे पर प्रहार कर ध्वनी उत्पन्न की गई | प्रथ्वीराज के वाण ने उसे तुरंत ही बींध दिया | सुल्तान के मुंह से बेशाख्ता निकल पडा “वाह” |

और यही उसके जीवन के अंतिम शब्द बन गए | कवि चंद वरदाई ने भी बिना देर किये अपने जीवन की अंतिम काव्य पंक्तियाँ पढीं –

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण,

ता ऊपर सुलतान है, मत चुके चौहान !

चौहान नहीं चूके, सुलतान की “वाह” और कवि के मार्गदर्शन से उनका अगला तीर सीधे गौरी की छाती को बींध गया और गजनी का वह लुटेरा सुलतान जहन्नुम रसीद हुआ |

चंद वरदाई और प्रथ्वीराज ने भी एक दूसरे को कटार मारकर अपना जीवन समाप्त कर लिया !


लेकिन लेकिन लेकिन आजाद भारत के सेक्यूलर इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के इस शौर्य पृष्ठ को सिरे से नकार दिया और लिखा कि मोहम्मद गौरी की मृत्यु कुछ वर्षों बाद बीमारी से हुई | उन्होंने यह जहमत भी नहीं उठाई कि अफगानिस्तान में गजनी से गारबेज जाने वाली सड़क पर स्थित उस छोटे से गाँव देयक पहुंचकर मोहम्मद गौरी का मकबरा ही देख आते | इस मकबरे के बाहर ही एक छोटी सी कबर और बनी हुई है, जिस पर बोर्ड लगा हुआ है – यहाँ दफ़न है दिल्ली का काफिर राजा |

यह काफिर राजा और कोई नहीं, बल्कि हमारे महानायक प्रथ्वीराज चौहान ही हैं |

हम भूल गए, लेकिन गजनी वाले नहीं भूले और उन्होंने अपने सुलतान मोहम्मद गौरी के मकबरे के बाहर ही प्रथ्वीराज और उनके कवि मित्र चंदवरदाई को भी दफना दिया | इतना ही नहीं तो यह नियम भी बना दिया कि जो भी कोई जियारत करने या सालाना उर्स के मौके पर गौरी की कबर पर जाता है, तो वह पहले प्रथ्वीराज की कबर पर चप्पल मारता है | वे 900 साल से इस परंपरा को जारी रखे हुए हैं |

पहली बार यह तथ्य तब सामने आया जब भारतीय हवाईजहाज को आतंकी अपहरण कर कंधार ले गए और तत्कालीन विदेशमंत्री जसबंत सिंह यात्रियों को छुडाने वहां गए | उस समय यह घटना अखबारों की सुर्खियाँ बनी, किन्तु राजनेताओं में कोई चेतना जागृत नहीं हुई |

इसके अलावा भी बहुत कुछ हुआ है मित्रो, आप जो फोटो देख रहे हैं, उसकी बड़ी ही ह्रदयविदारक गाथा है, किसी का भी कलेजा फट सकता है, उस कहानी को जानकर।


मोहम्मद गौरी ने भारत पर सत्रह हमले किये और लगभग चार लाख हिन्दु महिलाओं को पकड़ कर गजनी उठा ले गया।

अफगानिस्तान के गजनी मैं शहर के बाहर एक बड़ा चौक है। उसी चौक में बने एक चबूतरे पर उन हिन्दु औरतों की नीलामी हुई थी। उसी स्थान पर इस याद को एक स्तम्भ बनाकर आज भी संजोकर रखा है। जिसमे लिखा है-

‘दुख्तरे हिन्दोस्तान, नीलामे दो दीनार’

अर्थात इस जगह हिन्दुस्तानी औरतें दो-दो दीनार में नीलाम हुई।

पृथ्वीराज को हराने के बाद गौरी दिल्ली की सल्तनत अपने एक गुलाम कुतुबुद्दीन को सौंप कर गया, शायद भारत वासियों को यह दर्शाने कि देखो तुम लोग मेरे गुलाम के भी गुलाम हो | इस कुतुबुद्दीन ने 1194 में कन्नौज पर आक्रमण किया, निश्चित पराजय देखकर जयचंद ने गंगा में अपने विसर्जन किया | उसके आगे की कहानी हम मारवाड़ का इतिहास श्रंखला में वर्णित कर चुके हैं | 1215 में भीमदेव का देहांत हुआ, उसके बाद भी तेरहवीं शताब्दी के अंत तक गुजरात पर कुतुबुद्दीन या उसके बाद गयासुद्दीन बलबन भी पूर्ण अधिकार नहीं कर सके | अलाउद्दीन खिलजी के समय में ही यह संभव हुआ |

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क्रांतिदूत: प्रथ्वीराज चौहान के वे जहरीले वाण
प्रथ्वीराज चौहान के वे जहरीले वाण
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