अफगानिस्तान का इतिहास - 2, मेडियाई साम्राज्य से तालिबान तक - संजय तिवारी

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  ईसा के कोई 600 साल पहले तक अफ़गान क्षेत्र मेडियाई साम्राज्य के अंग हुआ करते थे। इस समय मेडी लोग असीरीयाई लोगों के साथ जूडिया और मध्यपूर्व ...

 

ईसा के कोई 600 साल पहले तक अफ़गान क्षेत्र मेडियाई साम्राज्य के अंग हुआ करते थे। इस समय मेडी लोग असीरीयाई लोगों के साथ जूडिया और मध्यपूर्व पर आक्रमण में मदद करते थे। पार्स के लोग उनके अनुचर सहयोगी हुआ करते थे। पर सन् 559 ईसापूर्व में पार्स (आधुनिक ईरान का फ़ार्स प्रांत) के राजकुमार कुरोश ने मेडिया के खिलाफ विद्रोह कर दिया। कुरोश ने इस तरह हखामनी साम्राज्य की स्थापना की जो सिकन्दर के आक्रमण तक कायम रहा। उसके बाद उसने असीरिया पर भी अधिकार कर लिया। इसके बाद कुरोश का साम्राज्य बढ़ता ही गया और यह मिस्र से लेकर आधुनिक पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा तक फैल गया।

ईसापूर्व 230 में मौर्य शासन के तहत अफ़गानिस्तान का संपूर्ण इलाका आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। ईसा के 700 साल पहले इसके उत्तरी क्षेत्र में गांधार महाजनपद था जिसके बारे में भारतीय स्रोत महाभारत तथा अन्य ग्रंथों में वर्णन मिलता है। ईसापूर्व 500 में फ़ारस के हखामनी शासकों ने इसको जीत लिया। सिकन्दर के फारस विजय अभियान के तहते अफ़गानिस्तान भी यूनानी साम्राज्य का अंग बन गया। इसके बाद यह शकों के शासन में आए। शक स्कीथियों के भारतीय अंग थे। ईसापूर्व 230 में मौर्य शासन के तहत अफ़ग़ानिस्तान का संपूर्ण इलाका आ चुका था पर मौर्यों का शासन अधिक दिनों तक नहीं रहा। इसके बाद पार्थियन और फ़िर सासानी शासकों ने फ़ारस में केन्द्रित अपने साम्राज्यों का हिस्सा इसे बना लिया। सासनी वंश इस्लाम के आगमन से पूर्व का आखिरी ईरानी वंश था। अरबों ने ख़ुरासान पर सन् 707 में अधिकार कर लिया। सामानी वंश, जो फ़ारसी मूल के पर सुन्नी थे, ने 987 इस्वी में अपना शासन गजनवियों को खो दिया जिसके फलस्वरूप लगभग संपूर्ण अफ़ग़ानिस्तान ग़ज़नवियों के हाथों आ गया। ग़ोर के शासकों ने गज़नी पर 1183 में अधिकार कर लिया।

आज जो अफ़गानिस्तान है उसका मानचित्र उन्नीसवीं सदी के अन्त में तय हुआ। अफ़ग़ानिस्तान शब्द कितना पुराना है इसपर तो विवाद हो सकता है पर इतना तय है कि 1700 इस्वी से पहले दुनिया में अफ़ग़ानिस्तान नाम का कोई राज्य नहीं था। प्राचीन अफ़गानिस्तान पर कई फ़ारसी साम्राज्यों का अधिकार रहा। इनमें हख़ामनी साम्राज्य (ईसापूर्व 559– ईसापूर्व 330) का नाम प्रमुख है।

सिकन्दर का आक्रमण 328 ईसापूर्व में उस समय हुआ जब यहाँ प्रायः फ़ारस के हखामनी शाहों का शासन था। उसके बाद के ग्रेको-बैक्ट्रियन शासन में बौद्ध धर्म लोकप्रिय हुआ। ईरान के पार्थियन तथा भारतीय शकों के बीच बँटने के बाद अफ़ग़निस्तान के आज के भूभाग पर सासानी शासन आया। फ़ारस पर इस्लामी फ़तह का समय कई साम्राज्यों के समय रहा। पहले बग़दाद स्थित अब्बासी ख़िलाफ़त, फिर खोरासान में केन्द्रित सामानी साम्राज्य और उसके बाद ग़ज़ना के शासक। गज़ना पर ग़ोर के फारसी शासकों ने जब अधिपत्य जमा लिया तो यह गोरी साम्राज्य का अंग बन गया। मध्यकाल में कई अफ़ग़ान शासकों ने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया या करने का प्रयत्न किया जिनमें लोदी वंश का नाम प्रमुख है। इसके अलावा भी कई मुस्लिम आक्रमणकारियोंं ने अफगान शाहों की मदद से भारत पर आक्रमण किया था जिसमें बाबर, नादिर शाह तथा अहमद शाह अब्दाली शामिल है। अफ़गानिस्तान के कुछ क्षेत्र दिल्ली सल्तनत के अंग थे।

अहमद शाह अब्दाली ने पहली बार अफ़गानिस्तान पर एकाधिपत्य कायम किया। वह अफ़ग़ान (यानि पश्तून) था। 1751 तक अहमद शाह ने वे सारे क्षेत्र जीत लिए जो वर्तमान में अफगानिस्तान और पाकिस्तान है। थोड़े समय के लिए उसका ईरान के खोरासान और कोहिस्तान प्रान्तों और दिल्ली शहर पर भी अधिकार था। 1761 में पानीपत के तृतीय युद्ध में उसने मराठा साम्राज्य को पराजित किया। 1772 में अहमद शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र तिमूर शाह दुर्रानी गद्दी पर बैठा। उसने अफगान साम्राज्य की राजधानी कन्दहार से बदलकर काबुल कर दी। 1793 में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका बेटा ज़मान शाह गदी पर बैठा। धीरे-धीरे दुर्रानी साम्राज्य निर्बल होता गया। अन्ततः सिखों ने महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में दुर्रानी साम्राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया। सिखों के अधिकार में जो क्षेत्र आये उनमें वर्तमान पाकिस्तान (किन्तु बिना सिन्ध) शामिल था।

ब्रितानी भारत के साथ हुए कई संघर्षों के बाद अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश भारत और अफ़गानिस्तान के बीच सीमा उन्नीसवीं सदी में तय की। 1933 से लेकर 1973 तक अफ़ग़ानिस्तान पर ज़ाहिर शाह का शासन रहा जो शांतिपूर्ण रहा। इसके बाद कम्यूनिस्ट शासन और सोवियत अतिक्रमण हुए। 1979 में सोवियतों को वापस जाना पड़ा। इनकों भगाने में मुजाहिदीन का प्रमुख हाथ रहा। 1997 में तालिबान जो अडिगपंथी सुन्नी कट्टर हैं, ने सत्तासीन निर्वाचित राष्ट्रपति को बेदखल कर दिया। इनको अमेरिका का साथ मिला पर बाद में वे अमेरिका के विरोधी हो गए। 2001 में अमेरिका पर हमले के बाद यहाँ पर नैटो की सेना बनी हुई थी।

उन्नीसवीं सदी में आंग्ल-अफ़ग़ान युद्धों के कारण अफ़्ग़ानिस्तान का काफी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अधीन हो गया जिसके बाद अफगानिस्तान में यूरोपीय प्रभाव बढ़ता गया। उधर उत्तर में रूसी साम्राज्य का विस्तार दक्षिण की तरफ होता जा रहा था। अंग्रेज़ों को डर था कि यदि वे अफ़गानिस्तान में घुस आते हैं तो उनके भारतीय अधिकार पर खतरा हो सकता है। इस लिए ब्रिटेन और रूस दोनों ने अफ़ग़ानिस्तान में दखल देना आरंभ किया। इस घटना को महाखेल का नाम दिया जाता है जिसमें दक्षिणी खोरासान (यानि अफ़गानिस्तान और पूर्वोत्तर ईरान) में दोनों देश अपने सहयोगियों के साथ अपने हित साधने में लगे थे।

1826 में दोस्त मोहम्मद काबुल की गद्दी पर बैठा। उसने अपने क़िज़िलबश कबीले के लोगों की मदद से अपनी स्थिति मजबूत की और अपने भाइयों के खतरे से अपने को ऊपर किया। उसके उपर जो सबसे बड़ी विपत्ति उस समय थी वो ये थी कि खाइबर के पूर्व में पश्तून इलाकों पर सिक्ख सेना अपना अधिकार जमा रही थी। 1834 में पूर्व शाह शुजा दुर्रानी को दोस्त ने हरा दिया। शाह शुजा की मदद का बहाना बना कर अंग्रेज़ों ने काबुल पर हमला किया। 16 हजार की सेना में केवल एक अंग्रेज़ बटालियन थी और बाकी भारतीय सेना और उनके परिवार वाले थे। पर इनमें से केवल एक अंग्रेज़ वापस लौटकर जलालाबाद पहुँच सका। बाकी भारतीय कहां गए इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नही है।

शाहशुजा के काबुल से दूर रहने के कारण सिक्ख पश्चिम की ओर और आगे बढ़ गए। रणजीत सिंह की सेना ने पेशावर पर अधिकार कर लिया। पेशावर के पश्चिम में वो इलाके थे जिसपर काबुल का सीधा नियंत्रण बनता था। अब स्थिति चिंतनीय हो गई थी। 1836 में जमरूद में दोस्त मोहम्मद की सेना ने उसके बेटे अकबर खान के नेतृत्व में सिक्खों को हरा दिया पर वे सिक्खों को पूर्णतः पीछे नहीं धकेल सके। पेशावर पर दुबारा आक्रमण करने की बजाय उसने ब्रिटिश भारत के नवनियुक्त गवर्नर लॉर्ड ऑकलैंड से सिक्खों के खिलाफ़ एक मोर्चे के लिए संपर्क किया। इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपीय हस्तक्षेप का सिलसिला शुरु हुआ।

ब्रिटेन और फ्रांस के बीच 1763 में हुए पेरिस की संधि के बाद अंग्रेज भारत में एक मात्र यूरोपीय शक्ति बच गए थे। उधर रूसी साम्राज्य कॉकेशस से दक्षिण की तरफ बढ़ रहा था। जिस बात से ब्रिटिश साम्राज्य को सबसे अधिक चिंता हो रही थी वो थी ईरानी दरबार में बढ़ता हुआ रूसी प्रभाव। 1837 में रूस ने ईरान के शाह को हेरात पर नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित किया। हेरात पर ईरानी नियंत्रण के बाद अंग्रेज़ों को रूस की साम्राज्यवादी नीति से डर सा लगने लगा। ऑकलैंड ने दोस्त मुहम्मद से रूसियों तथा ईरानियों के साथ सभी सम्पर्क तोड़ लेने को कहा। इसके बदले में ऑकलैंड ने ये वादा किया कि वे रणजीत सिंह के साथ अफ़गानों की मित्रता बहाल करेगा। पर जब ऑकलैंड ने ये लिखित रूप से देने से मना कर दिया तब दोस्त मुहम्मद ने मुँह फेर लिया और रूसियों के साथ वार्ता आरंभ कर दी।

1919 में अफ़ग़ानिस्तान ने विदेशी ताकतों से एक बार फिर स्वतंत्रता पाई। आधुनिक काल में 1933 से 1973 के बाच का काल अफ़ग़ानिस्तान का सबसे अधिक व्यवस्थित काल रहा जब ज़ाहिर शाह का शासन था, पर पहले उसके जीजा तथा बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्तापलट के कारण देश में फिर से अस्थिरता आ गई। सोवियत सेना ने कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग के लिए देश में कदम रखा और मुजाहिदीन ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और बाद में अमेरिका तथा पाकिस्तान के सहयोग से सोवियतों को वापस जाना पड़ा। 11 सितम्बर 2001 के हमले में मुजाहिदीन के सहयोग होने की खबर के बाद अमेरिका ने देश के अधिकांश हिस्से पर सत्तारुढ़ मुजाहिदीन (तालिबान), जिसको कभी अमेरिका ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने में हथियारों से सहयोग दिया था, के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

फरवरी 2007 से देश में नैटो (NATO) की सेनाएं बनी थीं और देश में लोकतांत्रिक सरकार का शासन था जो आज समाप्त हो गया।

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क्रांतिदूत: अफगानिस्तान का इतिहास - 2, मेडियाई साम्राज्य से तालिबान तक - संजय तिवारी
अफगानिस्तान का इतिहास - 2, मेडियाई साम्राज्य से तालिबान तक - संजय तिवारी
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