कश्मीर के प्रतापी नरेश जयापीड़

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विश्वासघात से बने राजा से रंक, लिया प्रतिशोध जैसा कि पिछले कथानक में उल्लेख किया गया कि महान सम्राट ललितादित्य ने अपने अंतिम सन्देश में आमात...

विश्वासघात से बने राजा से रंक, लिया प्रतिशोध

जैसा कि पिछले कथानक में उल्लेख किया गया कि महान सम्राट ललितादित्य ने अपने अंतिम सन्देश में आमात्यों को निर्देशित किया था कि चूंकि उनके पौत्र जयापीड़ सर्वाधिक सुयोग्य हैं, अतः उनको सदा स्मरण कराते रहें कि वे अपने दादा ललितादित्य के समान बनने का प्रयत्न करें।महाराज ललितादित्य का पूर्वानुमान सही निकला और अंततः बेटों की असफलता के बाद पौत्र जयापीड़ के हाथों में ही कश्मीर के सत्तासूत्र आये। स्वाभाविक ही मंत्रियों द्वारा उन्हें लगातार ललितादित्य जैसा बनने की समझाईस भी मिली। नतीजा यह निकला कि उन्होंने भी दिग्विजय करने की ठानी और सेना संकलित करना प्रारम्भ किया। बहुत से मांडलिक राजाओं के साथ युद्ध के लिए प्रयाण करते समय राजा जयापीड़ ने अपने बुजुर्ग मंत्रियों से पूछा कि आप लोगों ने तो महाराज ललितादित्य की सेना भी देखी होगी, क्या वह मेरी इस समय की सेना से अधिक थी ?
वृद्ध मंत्री हँसे और उत्तर दिया - यह प्रश्न ही निरर्थक है। महाराज ललितादित्य की सेना में पालकियों की संख्या ही सवा लाख थी, जबकि आपकी कुल सेना ही पिचासी हजार की है।
लेकिन उत्साही जयापीड़ यह जानकार निराश नहीं हुए। वे अपनी सेना के साथ सुदूरवर्ती प्रदेशों को विजित करने रवाना हो गए। लेकिन जैसे ही वे गृह प्रदेश से दूर गए, उनके साथ विश्वासघात हुआ और उनके अपने साले ने ही बलपूर्वक सत्ता हथिया ली। यह समाचार जब जयापीड़ के साथ युद्धरत सैनिकों को प्राप्त हुआ, तो उनका मनोबल भी कमजोर पड़ गया और वे अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो वापस लौटने लगे। खिन्न होकर राजा ने अपने सामंत राजाओं को भी वापस अपनी अपनी राजधानी लौटने की आज्ञा देकर केवल कुछ सहायकों के साथ प्रयागराज पहुंचकर अपनी समस्त संपत्ति भी दान कर दी। इस अवसर पर उन्होंने "श्री जयापीड देवस्य" इस प्रकार की एक मुहर बनवाई और ब्राह्मणों को निर्देशित किया कि वे उनके माध्यम से निर्मल गंगाजल घर ले जाने वाले भक्तों के पात्रों पर यह मुहर लगाएं। जब कोई राजा उनसे अधिक दान दे तभी यह मुहर तोड़ी जाए। जानकर हैरत होती है कि कल्हण के काल तक कोई राजा ऐसा नहीं कर सका। यह घटना राज्यच्युत हो जाने के बाद भी जयापीड़ के स्वभाव में विद्यमान तेज को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।
प्रयागराज से एकाकी राजा जयापीड़ अनेक राज्यों में घूमते हुए गौड़ देश के राजा जयंत द्वारा शासित पौंड्रवर्धन नामक नगर में पहुंचे। उस समय वहां के एक मंदिर में संगीत सभा हो रही थी। नाट्य शास्त्र के महान प्रणेता भरत मुनि के प्रदेश कश्मीर के राजा जयापीड़ भला उसकी उपेक्षा कैसे करते ? वे भी संगीत सभा में पहुँच गए। उनकी तेजस्विता देखकर सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट हो गया। यहाँ तक कि राज नृत्यांगना कमला की नजर भी अपने कला कौशल का प्रदर्शन करते समय लगातार आगंतुक पर बनी रही । कमला ने देखा कि बीच बीच में आगंतुक अर्थात जयापीड़ का हाथ अपनी पीठ के पीछे जाता है। कमला को समझते देर नहीं लगी कि आगंतुक कोई राजपुरुष है, जिन्हें सभाओं में पान का बीड़ा देने कोई सेवक पीछे खड़ा रहता है और इसी आदत के चलते उनका हाथ बार बार पीछे जा रहा है। कमला के आदेश पर एक सेविका चुपचाप एक थाल में पान के बीड़े लेकर जयापीड़ के पीछे जाकर खड़ी हो गई। जैसे ही जयपीड़ का हाथ पीछे गया, और उन्हें पान हाथ लगा, तो वे अचंभित हो गए। पीछे घूमकर उन्होंने इशारे से सेविका का परिचय पूछा तो उसने भी इशारे से ही कमला की तरफ संकेत कर दिया।
संगीत सभा के बाद कमला आग्रह पूर्वक जयापीड़ को अपने साथ ले गईं। जयापीड़ ने उनका प्रणय निमंत्रण तो यह कहकर ठुकरा दिया कि मैं एक संकल्प के साथ देशाटन पर निकला हूँ और जब तक वह संकल्प पूर्ण नहीं हो जाता, भोग विलास से दूर ही रहूँगा। किन्तु कमला के आग्रह पर कुछ दिन उनके घर रुकने को वे सहमत हो गए। इस दौरान वे प्रतिदिन संध्यावंदन के लिए नदी तट पर जाते थे। एक दिन उन्हें लौटने में विलम्ब हुआ तो देखा कि सब लोग अत्यंत चिंतित हैं। कारण पूछने पर ज्ञात हुआ कि इलाके में एक आदमखोर शेर का संकट है, इसलिए लोग रात होते ही अपने घरों में पहुँच कर दरवाजे बंद कर बैठ जाते हैं। जयापीड़ के अंदर का राजा जाग उठा और अर्ध रात्रि को वे बिना किसी को कुछ बताये घर से निकल कर वन में जा पहुंचे। एक विशाल बट वृक्ष के नीचे खड़े जयापीड़ को जैसे ही शेर ने देखा तो वह उन पर विकराल काल के समान झपटा। लेकिन उसे क्या पता था कि उसका सामना महाकाल से होने जा रहा है। जयापीड़ ने अपना बांया हाथ तो शेर के मुंह में डाला और दाहिने हाथ में थामे खंजर के एक ही वार से शेर का काम तमाम कर दिया। उसके बाद जैसे चुपचाप गए थे बैसे ही चुपचाप वापस अपने बिस्तर पर आकर सो गए।
सुबह जब लोगों ने शेर को मरा पाया तो उसकी सूचना राजा जयंत को भी दी। शेर के मुंह में से महाराज जयापीड़ का भुजबन्द मिला तो उसे समझते देर नहीं लगी कि परम प्रतापी अज्ञात वास करते उसके नगर में ही विद्यमान हैं। राजा जयंत के कोई पुत्र नहीं था केवल एक कन्या कल्याण देवी ही थीं। उनके हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने तय कर लिया कि वे महाराज जयापीड़ को अपना जामाता बनाकर उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाएंगे। राजा के आदेश पर खोजबीन शुरू हुई तो उनके नर्तकी कमला के आवास पर होने की जानकारी भी मिल गई। राजा ने आग्रह पूर्वक उन्हें अपने महल में सादर आमंत्रित किया और अपना प्रस्ताव उनके समक्ष रखा। जयापीड़ ने उनका प्रस्ताव स्वीकार किया और उसके बाद अपने श्वसुर को अपनी क्षमता का परिचय देते हुए शीघ्र ही उनके पांच विद्रोही मांडलिकों को पुनः उनकी शरण में आने को विवश कर दिया।
जयापीड़ की नवीन स्थिति की जानकारी मिलते ही उनके विश्वासपात्र सैनिक भी आमात्य देव शर्मा के नेतृत्व में उनसे आ मिले।
श्रोता मित्रों को अनुमान लग ही गया होगा कि आगे क्या होगा ? गौड़ देश और जयापीड़ की संयुक्त सेना ने कश्मीर की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में कन्नौज को सहज ही विजित कर जब जयापीड़ ने कश्मीर मंडल में प्रवेश किया तो आमजन उनके स्वागत और समर्थन में उमड़ पड़ा। जज्ज ने मुकाबला करने की कोशिश अवश्य की, किन्तु एक चांडाल श्रीदेव के गोफन से निकले पत्थर ने उसका मुंह ही कुचल दिया। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि समाज का हर वर्ग जयापीड़ के साथ था। जयापीड़ ने न केवल गौड़ नरेश जयंत की पुत्री कल्याण देवी बल्कि नृत्यांगना कमला को भी अपनी पत्नी स्वीकार किया और सुखपूर्वक राज्य सञ्चालन करने लगे। दोनों रानियों के नाम पर कल्याण पुर और कमालपुर नामक दो नए नगर बसाये गए। आमोद प्रमोद में तीन वर्ष बीत गए। समय फिर पलटा -

धर्मात्मा से बने दुष्ट 

जिस प्रकार महर्षि कश्यप ने लुप्त हुई वितस्ता नदी को पुनर्जीवित किया, उसी प्रकार जयापीड़ ने देश भर के विद्वानों को अपने राज्य में बसाकर कश्मीर को पुनः विद्याओं का केंद्र बना दिया। व्याकरण महाभाष्य के पुनः प्रचार लिए उन्होंने क्षीरस्वामी नामक वैयाकरण को ससम्मान कश्मीर में बसाया। कुट्टिनीमत नामक कामशास्त्रीय ग्रन्थ के निर्माता दामोदर गुप्त तो मनोरथा, शंखदात्त, चटक एवं संधिमान नामक कवि उनके दरवार की शोभा बढ़ाते थे।
राज्य करते तीन वर्ष बीतते न बीतते एक बार फिर जयापीड़ ने दिग्विजय अभियान प्रारम्भ करने का निश्चय किया। भूधराकार हाथियों से सुसज्जित उनकी असंख्य सेना ने पूर्वी समुद्र तक का सम्पूर्ण प्रदेश विजित कर लिया और वहां अपना नया नाम विनयादित्य रखकर एक नगर विनयपूर बसाया। युद्ध में छलबल की भी आवश्यकता होती है उसी अनुरूप शत्रु का भेद लेने के लिए जयापीड़ ने एक साहस पूर्ण कदम उठाकर एक बार फिर स्वयं को संकट में डाल लिया। एक राजा भीमसेन के दुर्ग में अपने कुछ साथियों के साथ वे सन्यासी वेश में प्रविष्ट हुए, किन्तु पहचान लिए गए और बंदी गृह में पहुंचा दिए गए। राजा में होंसले की कमी तो थी नहीं, उसने एक युक्ति निकाली। उन दिनों भीमसेन के राज्य में लूता नामक एक संक्रामक रोग फैला हुआ था। उस रोग की घातकता को देखते हुए रोगी को दुर्ग से बाहर कर दिया जाता था। जयापीड़ ने गुप्त रूप से अपने सहयोगियों के माध्यम से कुछ पित्त बढ़ाने वाली औषधियां मंगवाईं, जिनसे उन्हें बुखार आ गया, ऐसे में थूहर पौधे का दूध शरीर में लगाकर उन्होंने ऐसा स्वांग रचा मानो उन्हें फोड़े फुंसी हो गए हों। कारागृह के सेवकों से समाचार पाकर राजा भीमसेन को लगा कि जयापीड़ को लूतारोग हो गया है, अब यह बचेगा नहीं, यह मानकर उन्हें दुर्ग से बाहर कर दिया गया।
इस प्रकार अपने बुद्धि कौशल से मुक्त होने के बाद शीघ्र ही जयापीड़ ने वह दुर्ग जीतकर भीमसेन को दण्डित किया। लेकिन उनकी सर्वाधिक रोमांचक विजय तो वह है उन्होंने नेपाल के राजा अरमुंडी पर प्राप्त की । जयापीड़ ने नेपाल पर धावा बोला तो स्थिति यह बनी कि राजा अरमुंडी किसी डरी हुई चिड़िया की तरह आगे आगे भाग रहा था और किसी बाज की तरह जयापीड़ उसका पीछा कर रहे थे । ऐसे में भागते भागते अरमुंडी पूर्वी समुद्र तट के उस स्थान पर पहुँच गया जहाँ एक महानदी समुद्र से मिलती थी। अब स्थिति यह थी कि नदी के एक तट पर अरमुंडी का शिविर लगा था तो दूसरे किनारे पर जयापीड़ का। जैसा की हम लगातार देख रहे हैं, जयापीड़ में साहस की मात्रा आवश्यकता से अधिक ही थी, और इसी कारण वे बार बार संकट में फंसते थे। इस बार भी अति उत्साह में वे ससैन्य नदी में प्रविष्ट हो गए। किनारे पर तो नदी ज्यादा गहरी नहीं थी, किन्तु जब मध्य में पहुंचे तभी अचानक समुद्र का जल भी नदी में भर गया और सेना के हाथी घोड़े सवार सब डूबने लगे। जल के प्रबल प्रवाह में फंसकर जयापीड़ भी बह कर दूर निकल गए और जब किनारे पहुंचे तो स्वयं को अरिमुंडी की कैद में पाया। उन्हें कालगंडिका नदी के तट पर बने एक दुर्ग में कड़े पहरे में रखा गया।
इस बार उन्हें बचाने आगे आये उनके विश्वस्त आमात्य देव शर्मा। देव शर्मा ने अरि मुंडी के पास जाकर कहा कि अपने विजय अभियान में राजा जयापीड़ ने अपार सम्पदा प्राप्त की है, जो उन्होंने कहीं छुपा दी है। मैं उन्हें प्रलोभन देता हूँ कि अगर वे वह सम्पदा आपको दे देंगे तो उन्हें मुक्त कर दिया जाएगा। आप कहेंगे तो वे विश्वास नहीं करेंगे, लेकि मेरी बात उनके गले उतर सकती है और आजादी की खातिर वे खजाने का पता बता सकते हैं। लालच बुरी बला है। अरिमुंडी देवशर्मा की बातों में आ गया और देवशर्मा को अकेले में जयापीड़ से मिलने का अवसर मिल गया। देवशर्मा ने मुस्कुराते हुए जयापीड़ से पूछा - महाराज बाक़ी तो सारी संगी साथी छूट गए, किन्तु अभी भी आपका साहस तो आपके साथ ही है ना ?
राजा हँसे और कहा है तो साथ ही, लेकिन यहाँ क्या काम आएगा ?
देवशर्मा ने खिड़की की तरफ इशारा किया और कहा क्या आप एक मशक के सहारे खिड़की से बाहर नदी में कूद सकते हैं? नदी के दूसरे तट पर आपकी सेना आपका इंतज़ार कर रही है।
राजा ने पूछा मशक कहाँ है, इस पर देवशर्मा ने कहा, किसी बहाने मुझे अकेला छोड़कर बाहर जाईये, लौटकर आएंगे तो मशक तैयार मिलेगी।
राजा बंदीगृह के रक्षक से अनुमति लेकर शौच के बहाने बाहर गए और जब लौटे तो पाया कि देवशर्मा ने फांसी लगा ली है। उनके हाथ में एक पत्र था, जिसमें लिखकर उन्होंने अपने शरीर को ही मशक के रूप में अपने प्रिय राजा को समर्पित कर दिया था। स्वामीभक्ति और समर्पण की यह पराकाष्ठा थी। जयापीड़ आँखों में आंसू लिए अवरुद्ध कंठ से बोले मित्रवर यह क्या किया ? फिर सोचा इस समय अगर मैंने स्वयं को मुक्त नहीं किया तो यह देवशर्मा के इस प्राणोत्सर्ग का अपमान होगा और दिल पर पत्थर रखकर वे उनके शव के सहारे खिड़की के रास्ते नदी में कूद पड़े। तैरकर वे नदी पार अपनी सेना से जा मिले और इसके पूर्व कि अरमुंडी को उनके मुक्त होने का समाचार मिलता उसका राज्य छिन गया। नेपाल जीत लिया गया।
राजा जयापीड़ अपार धन सम्पदा के साथ वापस कश्मीर लौटे। दुर्भाग्य तो देखिये कि देवशर्मा के बलिदान से जीवन दान पाए जयापीड़ में भी राजमद आ गया। तृष्णा जो न करादे वह थोड़ा है। सलाहकार भी ऐसे ही मिल गए जिन्होंने समझाया संपत्ति के लिए युद्ध भूमि में जाकर जीवन संकट में क्यूँ डाला जाए, जबकि धन तो प्रजा से भी बसूला जा सकता है। बस हो गई शुरू लूट खसोट। स्थिति यह बनी कि अत्याचारों से तंग आकर प्रजाजनों ने आत्महत्या करना शुरू कर दिया। राजा ने तुलमूल्य नायक ग्राम का अधिग्रहण किया तो दुखी होकर निन्यानवे ब्राह्मणों ने एक साथ नदी में डूबकर प्राण त्याग दिए। राजा थोड़ा संभला किन्तु किसी पीड़ित को राहत पहुँचाने का कार्य फिर भी नहीं किया। ईश्वर के यहाँ देर है अंधेर नहीं, अंततः पुण्यात्मा से पापी बने इस राजा के सर पर छत का फानूस टूट कर गिर गया, उसे उसकी करनी का फल मिला और सर के घाव में कीड़े पड़ गए। तड़प तड़प कर मनुष्य जीवन में ही नारकीय यातना भोगते हुए जयापीड़ की मृत्यु हुई।

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