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विश्वगुरु भारत - जो मार्गदर्शन करे वही तो है गुरू।


क्या आपने उस समाचार पर ध्यान दिया है -

जापान के शीर्ष व्यापार वार्ताकार रयोसेई अकाज़ावा ने 28 अगस्त, 2025 को होने वाली अपनी अमेरिका यात्रा अकस्मात् रद्द कर दी।🔥

आखिर इसके पीछे कारण क्या था ?

अमेरिका की अनुचित व्यापार मांगों से असहमति।

ट्रम्प की सौदेबाज़ी की शैली कौन नहीं जानता ?

👉 खुद के लिए रियायतों की माँग

👉 न मानने पर टैरिफ़ की धमकी

👉 और फिर अपमानजनक समझौतों के लिए मजबूर करना

वियतनाम पहले ही इसका सामना कर चुका है।

यूरोप, ताइवान, दक्षिण कोरिया भी।

और अब... जापान।

मूल मुद्दा यह है...

ट्रंप चाहते हैं कि जापान अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 550 अरब डॉलर का निवेश करे...

👉 जापान को इस निवेश के लिए ऋण लेना होगा।

भुगतान करने के बाद भी, जापान को अपने निर्यात पर 15% टैरिफ का सामना करना पड़ेगा।

नतीजा यह होगा कि मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका को जाएगा।

लेकिन अब जापान ने अकस्मात सोचना शुरू कर दिया -

आखिर जापान को उधार लेकर अमेरिका में अरबों डॉलर क्यों लगाने चाहिए... सिर्फ़ उन्हें टैरिफ़ देने और मुनाफ़ा गँवाने के लिए?

नतीजा यह निकला कि जापान के दूत ने अपनी अमेरिका यात्रा सीधे रद्द ही कर दी।

👉 और यह एक बड़ा संकेत है: यह सौदा टूट सकता है।

स्मरणीय है कि जापान और अमेरिका कई महीनों से एक बड़े व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे थे।

लेकिन टोक्यो के मुख्य वार्ताकार ने अचानक अपनी वाशिंगटन यात्रा रद्द कर दी।

इससे पश्चिमी मीडिया में हलचल मच गई है।

समाचार का निचोड़ यह है कि दुनिया धीरे-धीरे अमेरिका के सामने न झुकने वाले भारत से प्रेरित हो रही है...

भारत की प्रति व्यक्ति आय कम है, उसके सामने और भी कई चुनौतियां हैं..... 

इसके बावजूद, भारत ने अमेरिका से कहा:

👉 हम कोई अनुचित व्यापार समझौता नहीं करेंगे।

👉 हम इंतज़ार करेंगे।

👉 हम "मेक इन इंडिया" को मज़बूत करेंगे।

भारत ने अमरीकी दबाब के सामने झुकने से इंकार कर दिया, एक मिसाल पेश की, और दुनिया ने देखा, समझा और उसके साथ कदमताल शुरू कर दी ।

— अगर भारत अमेरिकी दबाव का सामना कर सकता है, तो जापान क्यों नहीं?

— यूरोप क्यों नहीं?

— अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ क्यों नहीं?

👉 ट्रम्प की "समझौता या धमकी" की रणनीति उल्टी पड़ रही है।

जापान की जनता पहले से ही आर्थिक राष्ट्रवाद के चलते केवल जापानी ब्रांड ही खरीदती है।

देखना है कि क्या भारतवासी भी इस मानसिकता को अपना सकेंगे?

👉 भारतीय खरीदें

👉 भारतीय ब्रांडों का समर्थन करें

👉 अमेरिकी बाजारों पर निर्भरता कम करें

जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में कहा था:

“भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ के बाद, हमें आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।”

अगर जापान अभी पीछे हट जाता है, तो इससे एक श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है... और भी देश ट्रम्प की धौंस-धमकी का खुलकर विरोध कर सकते हैं।

और इस बार, भारत का उदाहरण एक मिसाल होगा। 🇮🇳

👉 यह वाकई हमारे लिए विश्वगुरु क्षण होगा 🔥

वैश्विक व्यापार बदल रहा है।

दशकों में पहली बार, देश चुपचाप अमेरिकी हुक्म नहीं मान रहे हैं।

नई दिल्ली से टोक्यो तक, एक नया संदेश फैल रहा है:

👉 "बुरे सौदे से बेहतर है कोई सौदा न होना।"

विश्व व्यवस्था हमारी आँखों के सामने बदल रही है।


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