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बागेश्वर महाराज की कथा से शिवपुरी में राष्ट्रजागरण का नया अध्याय

 

बागेश्वर धाम के महाराज की शिवपुरी में चल रही सात दिवसीय कथा अब पांचवे दिन में पहुँच चुकी है, और इन पांच दिनों में शहर का माहौल इतना बदल गया है कि कुछ लोगों का मन ही नहीं, चेहरों पर भाव भी बदलते दिख रहे हैं। सुबह-शाम बढ़ती भीड़, चर्चा का नया तापमान, और हर चौराहे पर चल रही आध्यात्मिक बहसें यह साबित कर रही हैं कि यह कथा केवल मंच से सुनाई जाने वाली बातें नहीं, बल्कि पूरे शहर की धड़कन बन चुकी है। बाजारों से लेकर चाय की दुकानों तक, लोग अब राजनीति कम और प्रसंग ज्यादा सुनाते मिल रहे हैं, महाराज का हर वचन जैसे जन-जन तक पहुँचने लगा है।

सबसे दिलचस्प तो वे लोग दिख रहे हैं, जो कल तक धर्म और परंपरा को ‘पुराना फैशन’ बताकर चलते थे। अब वे भी कथा के प्रभाव में अपने-आप को सँभालते, गर्दन हिलाते और “बात तो सही कही” जैसे वाक्य बोलते देखे जा सकते हैं। जो पहले महाराज की आलोचना में सबसे आगे रहते थे, वे अब भीड़ की अनुशासनप्रियता और आयोजन की सहज भव्यता देखकर चुपचाप अपनी जगह बदलते हुए नजर आते हैं। लगता है कथा की रोशनी ने उनके तर्कों की ऊपर लगी धूल भी साफ कर दी है।

पांच दिनों में यह स्पष्ट हो चुका है कि जब किसी आयोजन में निष्ठा होती है, तो प्रशासन और जनता दोनों मिलकर उसे यादगार बना देते हैं। जिस तरह यातायात, सुरक्षा और व्यवस्था संभाली जा रही है, वह देखकर कई लोग मज़ाक में कह रहे हैं कि “यदि रोज़ ऐसे आयोजन हों, तो शहर हमेशा दुरुस्त ही दिखे।” स्वयंसेवकों का जोश और शासन का सहयोग एक साथ मिलकर कथा को ऐसा रूप दे रहे हैं, जिसने पुराने बड़े आयोजनों की यादें भी फीकी कर दी हैं।

महाराज की कथा में “कृष्ण-नीति” का जो सरल लेकिन तीक्ष्ण रूप सामने आता है, वह लोगों को खूब भा रहा है। यह नीति किसी पर उंगली उठाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को आईने में देखने का तरीका बताती है। इसीलिए लोग इसे न सिर्फ सुन रहे हैं, बल्कि अपने जीवन में ढूँढ़ने भी लगे हैं। महाराज जब आधुनिक चुनौतियों पर व्यंग्य मिश्रित उदाहरण देते हैं, तो कई श्रोता हँसते भी हैं और तुरंत गंभीर भी हो जाते हैं, जैसे किसी ने दिल पर हाथ रखकर सच बोल दिया हो।

हिंदुत्व को लेकर जो लोग पहले आँखें सिकोड़ लेते थे, वे भी अब इसे संस्कृति और आत्मसम्मान से जोड़ रहे हैं। कथा में उल्लिखित प्रत्येक लोक कथा, सामाजिक संदेश और आध्यात्मिक प्रसंग लोगों को भीतर तक छू रहे हैं। और इसका प्रमाण शाम की वह भीड़ है, जिसमें बच्चों की उत्सुकता, युवाओं का जोश, महिलाओं की श्रद्धा और बुज़ुर्गों का अनुभव, सब कुछ एक जगह एकत्र हो जाता है। यह दृश्य देखकर लगता है कि शिवपुरी सिर्फ सुन नहीं रही, बल्कि हर शब्द को अपने भीतर बसा रही है।

पांच दिन बीतते-बीतते यह आयोजन शिवपुरी का निजी उत्सव बन गया है। अब तो कई लोग मज़ाक में यह भी कहते दिख रहे हैं कि “कथा खत्म होने के बाद शहर कुछ खाली-खाली सा लगेगा!” और सच भी है—जिस शहर में चार दिनों में इतना परिवर्तन हो जाए, वहाँ अगले दो दिन और क्या रंग दिखाएँगे, यह सोचकर ही उत्सुकता बढ़ जाती है।

आने वाले दिनों में कथा और गहराई लेगी, नए प्रसंग आएँगे, और शायद कुछ चेहरे फिर से अपने विचार बदलते भी मिलें। जो अब तक विरोध में थे, वे शायद समर्थन में खड़े दिखें और जो पहले पंक्ति में बैठते थे, वे और आगे खिसक जाएँ।

शिवपुरी इन सात दिनों को केवल याद नहीं रखेगी, बल्कि बरसों तक सुनाएगी भी। पांच दिनों ने जो माहौल बनाया है, उससे इतना तो तय है कि यह कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं रही, यह शहर की सकारात्मक ऊर्जा, सामूहिक चेतना और नए सामाजिक संवाद का केंद्र बन चुकी है। आने वाले दो दिन इस अनुभव में और रंग भरेंगे।

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