लेबल

गणतंत्र दिवस विशेष – संविधान सुरक्षित, श्रमिक असुरक्षित

 

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था, जिसने हर नागरिक को सम्मान, समानता और न्याय का अधिकार दिया। इसी संविधान की भावना के तहत श्रमिकों के अधिकार भी तय किए गए, क्योंकि देश की विकासशील इमारत जिस नींव पर खड़ी है, वह श्रमिक का श्रम ही है। इसके बावजूद यह एक ऐसा विरोधाभास है कि मध्यप्रदेश में विकास की इस इमारत को खड़ा करने वाला श्रमिक आज स्वयं को सबसे अधिक असुरक्षित महसूस कर रहा है।

कानूनों और अधिनियमों की पुस्तिकाएं स्पष्ट रूप से बताती हैं कि श्रमिक को न्यूनतम वेतन, समय पर भुगतान, सामाजिक सुरक्षा और गरिमापूर्ण कार्य परिस्थितियां मिलनी चाहिए। किंतु जमीनी स्तर पर देखने पर यह सामने आता है कि बड़ी संख्या में श्रमिक आज भी अपने ही अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। सरकारी कार्यालयों से लेकर निजी संस्थानों तक, आउटसोर्स और संविदा जैसी व्यवस्थाओं के तहत काम करने वाले श्रमिकों को लेकर अनेक व्यावहारिक समस्याएं बनी हुई हैं, जिन पर समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं।

कानून की दृष्टि से यह स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है कि जो व्यक्ति किसी संस्था, कार्यालय, फैक्ट्री या कंपनी के लिए मजदूरी के बदले कार्य करता है, वह श्रमिक की श्रेणी में आता है। चाहे उसका नाम संविदा कर्मचारी हो, आउटसोर्स कर्मी हो या अस्थायी कर्मचारी—उसकी कानूनी पहचान नहीं बदलती। नियम यह भी स्पष्ट करते हैं कि जहां कार्य कराया जा रहा है, वही प्रमुख नियोजक माना जाता है और उसी पर श्रमिक कानूनों के पालन की जिम्मेदारी होती है। इसके बावजूद व्यवहार में यह देखा जाता है कि कई संस्थान जिम्मेदारी को ठेकेदारी प्रणाली के हवाले कर स्वयं को अलग रखने का प्रयास करते हैं।

मध्यप्रदेश सरकार ने श्रमिकों को उनके कार्य की प्रकृति के आधार पर चार श्रेणियों—अकुशल, अर्द्धकुशल, कुशल और उच्चकुशल—में वर्गीकृत किया है। अकुशल श्रमिकों में सफाईकर्मी, कचरा संग्रहण करने वाले, माली, चौकीदार, हेल्पर तथा लोडिंग-अनलोडिंग करने वाले मजदूर शामिल हैं। सरकार द्वारा दिनांक 01 अक्टूबर 2025 से 31 मार्च 2026 की अवधि के लिए न्यूनतम वेतन दरें अधिसूचित की गई हैं, जिनमें मूल वेतन, परिवर्तनशील महंगाई भत्ता और कुल देय राशि स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई है। शासन के अनुसार इन दरों से कम भुगतान करना कानूनन प्रतिबंधित है।

अधिसूचना के अनुसार अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मूल वेतन 9,575 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है, जो प्रतिदिन 319.17 रुपये होता है। इसमें 2,575 रुपये प्रतिमाह अथवा 85.83 रुपये प्रतिदिन महंगाई भत्ता जोड़ने पर कुल न्यूनतम वेतन 12,150 रुपये प्रतिमाह या 405 रुपये प्रतिदिन बनता है। अर्द्धकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मूल वेतन 10,571 रुपये प्रतिमाह तय है, जो महंगाई भत्ता सहित 13,146 रुपये प्रतिमाह अथवा 438 रुपये प्रतिदिन होता है।

कुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मूल वेतन 12,294 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है, जो कुल मिलाकर 14,869 रुपये प्रतिमाह या 496 रुपये प्रतिदिन होता है। वहीं उच्चकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मूल वेतन 13,919 रुपये प्रतिमाह है, जो महंगाई भत्ता जोड़ने पर 16,494 रुपये प्रतिमाह अथवा 550 रुपये प्रतिदिन तक पहुंचता है।

इन निर्धारित दरों से यह स्पष्ट होता है कि शासन की मंशा श्रमिकों को न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने की है। किंतु विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त सूचनाओं और श्रमिकों से हुई बातचीत में यह बात सामने आती है कि अनेक स्थानों पर इन वेतन दरों का पूर्ण रूप से पालन नहीं हो पा रहा है। कई मामलों में श्रमिकों से पूरा कार्य लिया जाता है, लेकिन भुगतान कम किया जाता है या भुगतान में विलंब होता है।

मजदूरी भुगतान अधिनियम के अनुसार वेतन का भुगतान माह समाप्त होने के सात या दस दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। इसके बावजूद कुछ श्रमिकों का कहना है कि उन्हें दो से तीन माह तक वेतन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कानून यह भी निर्देश देता है कि वेतन का भुगतान बैंक खाते के माध्यम से किया जाए, जिससे पीएफ, ईएसआई जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं सुनिश्चित हो सकें। हालांकि व्यवहार में नगद भुगतान की प्रवृत्ति अभी भी कई स्थानों पर देखने को मिलती है, जिससे श्रमिकों का भविष्य असुरक्षित रह जाता है।

वेतन के अतिरिक्त कानून श्रमिकों को सुरक्षित कार्यस्थल, साप्ताहिक अवकाश, ओवरटाइम भुगतान, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, प्राथमिक चिकित्सा, ईपीएफ, ईएसआई, मातृत्व लाभ और शिकायत दर्ज कराने का अधिकार भी देता है। किंतु कई श्रमिकों का अनुभव है कि इन अधिकारों की जानकारी या मांग करने पर उन्हें असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

इस पूरे परिदृश्य में श्रम विभाग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। निरीक्षण, पंजीकरण और शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को लेकर समय-समय पर सुधार की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। कुछ मामलों में बिना लाइसेंस कार्य कर रही आउटसोर्स एजेंसियों और निरीक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न उठते हैं। विशेषज्ञों का मत है कि यदि निगरानी और मार्गदर्शन की प्रक्रिया और अधिक सक्रिय हो, तो श्रमिकों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह विषय आत्मचिंतन का है कि संविधान द्वारा प्रदत्त श्रमिक अधिकारों का लाभ व्यवहार में किस हद तक पहुंच रहा है। श्रमिक किसी विशेष सुविधा की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि केवल यह चाहता है कि उसे उसकी मेहनत का पूरा और समय पर मूल्य मिले, उसका भविष्य सुरक्षित रहे और कानून उसके साथ खड़ा दिखाई दे। प्रश्न यह है कि क्या हमारी व्यवस्था इस संवैधानिक संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए पर्याप्त रूप से सजग और सक्रिय है, या फिर विकास के दावों की चमक में श्रमिक का पसीना अनदेखा ही रह जाएगा।
एक टिप्पणी भेजें

एक टिप्पणी भेजें