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क्या जनरल होना अपराध है? – दिवाकर शर्मा

 

भारत में जनरल श्रेणी वालों को क्यों रहना चाहिए यह सवाल अब किसी सनक या क्षणिक आक्रोश का नहीं, बल्कि उस मानसिक पीड़ा का प्रतिफल है जो वर्षों से चुपचाप भीतर ही भीतर जमा होती रही है। यह प्रश्न तब जन्म लेता है जब किसी बच्चे को बचपन से यह सुनना पड़े कि उसके पूर्वज शोषक थे, वह स्वयं शोषक है और उसके होने वाले बच्चे भी शोषक ही कहलाएंगे बिना उसके कर्म जाने, बिना उसके संघर्ष देखे, बिना उसकी गरीबी, उसकी मेहनत और उसके सपनों को समझे।

यह एक अजीब विडंबना है कि जिस देश में वसुधैव कुटुम्बकम् की बात की जाती है, वहीं एक पूरे वर्ग को जन्मजात अपराधी की तरह कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। कानूनों की किताबें पलटिए तो पाएंगे कि कई कानून ऐसे हैं जिनका भार केवल एक ही वर्ग के कंधों पर रखा गया है। गलती व्यक्ति की हो या न हो, पहचान ही पर्याप्त मानी जाती है। और जब अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस किया जाए, तो वही आवाज सामाजिक समरसता के लिए खतरा घोषित कर दी जाती है।

इस देश में कुछ महापुरुषों का अपमान करना वैचारिक स्वतंत्रता कहलाता है, लेकिन कुछ अन्य महापुरुषों के पक्ष में बोलना अपराध बन जाता है। कुछ धर्मों का मज़ाक प्रगतिशीलता है, और कुछ धर्मों की आस्था की रक्षा करना असहिष्णुता। यह दोहरा मापदंड धीरे धीरे उस भरोसे को खा रहा है जिस पर राष्ट्र की नींव टिकी होती है।

सबसे पीड़ादायक सच यह है कि जनरल श्रेणी का गरीब सबसे अदृश्य होता है। उसकी गरीबी सिस्टम के आंकड़ों में फिट नहीं बैठती। उसके बच्चे मेधावी हों, फिर भी छात्रवृत्ति की कतार में उनका नाम नहीं होता। वे प्रतियोगिता में भाग तो लेते हैं, लेकिन बराबरी की शर्तों पर नहीं। उनसे कहा जाता है तुम सक्षम हो, जबकि हकीकत यह है कि वे सिर्फ अकेले होते हैं।

समस्या आरक्षण या सहायता की नहीं है। पिछड़ों को आगे लाना कोई अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्र की आवश्यकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी एक वर्ग को निरंतर दोषी ठहराकर, उसे मानसिक रूप से कुचलकर, उससे चुप रहने की अपेक्षा करके सामाजिक एकता कायम रह सकती है। क्या एकतरफा प्रहार से समरसता जन्म लेती है या भीतर ही भीतर एक अदृश्य विभाजन तैयार होता है।

राष्ट्र आगे तभी बढ़ता है जब हर नागरिक खुद को उसका सहभागी माने, अपराधी नहीं। जब नीति न्यायसंगत हो, संवेदनशील हो और संतुलित हो। जब राजनीति इतनी निर्दयी न हो कि समाज की धमनियों में जहर भर दे। जब वोट की खेती इतनी उग्र न हो कि देश की जड़ें ही कमजोर पड़ने लगें।

जनरल श्रेणी इस देश से अलग नहीं है। यही वर्ग सीमा पर खड़ा है, कर देता है, सिस्टम चलाता है और सबसे ज्यादा चुप रहता है। उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी न समझा जाए। यह चुप्पी अब प्रश्न बन चुकी है और प्रश्नों को हमेशा दबाया नहीं जा सकता।

देश को आगे ले जाना केवल किसी एक वर्ग की जिम्मेदारी नहीं, यह सामूहिक उत्तरदायित्व है। यदि यह भावना टूटेगी, तो राष्ट्र केवल नक्शे में बचेगा, आत्मा में नहीं। अब समय है कि संतुलन लौटे, संवाद हो और न्याय भावनाओं के साथ खड़ा हो। क्योंकि एक वर्ग को लगातार कोसकर, किसी भी राष्ट्र की एकता को लंबे समय तक बचाए रखना संभव नहीं।

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