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राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता वैचारिक स्वाधीनता - कैलाश चन्द्र

 



भारत को समझने की सबसे बड़ी भूल शायद यह है कि हम उसे केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखने लगते हैं। संविधान, संसद, सीमाएँ, सरकार, सेना और नागरिकता आधुनिक भारतीय राज्य की आवश्यक संस्थाएँ हैं, लेकिन भारत की पहचान इन संस्थाओं से शुरू नहीं होती। भारत की सभ्यतागत स्मृति इनसे कहीं पुरानी है। यही कारण है कि भारत में राष्ट्र और राज्य को एक-दूसरे का पर्याय मानना हमारी ऐतिहासिक चेतना को सीमित कर देता है। आधुनिक यूरोप में Nation-State एक विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों से विकसित हुआ। मध्यकालीन यूरोप में सत्ता राजा, सामंत, चर्च और स्थानीय शक्तियों में विभाजित थी। धार्मिक युद्धों, राजसत्ताओं के केंद्रीकरण, आधुनिक प्रशासन और अंततः 1648 की Westphalia व्यवस्था ने संप्रभु क्षेत्रीय राज्य की अवधारणा को मजबूत किया। इसके बाद फ्रांसीसी क्रांति ने राष्ट्र को जनता की राजनीतिक संप्रभुता से जोड़ दिया। उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मनी और इटली के राजनीतिक एकीकरण ने आधुनिक nationalism को और बल दिया। इस प्रकार यूरोपीय अनुभव में राष्ट्र और राज्य का संबंध मुख्यतः आधुनिक राजनीतिक सत्ता, निश्चित भू-भाग, नागरिकता और संप्रभुता के इर्द-गिर्द विकसित हुआ। Benedict Anderson, Ernest Gellner और Eric Hobsbawm जैसे विद्वानों ने आधुनिक राष्ट्रवाद की इसी ऐतिहासिक निर्मिति का विश्लेषण किया है।


भारत का अनुभव इससे भिन्न है। यहाँ राजनीतिक सत्ता के अनेक रूप आए और गए, लेकिन भारत की सभ्यतागत चेतना समाप्त नहीं हुई। मौर्य, गुप्त, चोल, दिल्ली सल्तनत, मुगल, मराठा, सिख और ब्रिटिश शासन अपने-अपने राजनीतिक ढाँचे लेकर आए, लेकिन इन राजनीतिक परिवर्तनों के बीच भारत की सांस्कृतिक स्मृति निरंतर बनी रही। रामायण और महाभारत की कथाएँ विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में नए रूपों में प्रकट होती रहीं। तीर्थ-परंपरा ने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक लोगों को जोड़ने का काम किया। काशी, प्रयाग, गया, पुरी, द्वारका, बद्रीनाथ और रामेश्वरम् जैसे तीर्थ केवल धार्मिक स्थल नहीं रहे; उन्होंने भारतीय भूगोल को सांस्कृतिक अनुभव में बदलने का काम किया। राधाकुमुद मुखर्जी ने भारत की इसी अंतर्निहित एकता पर विचार करते हुए The Fundamental Unity of India जैसी महत्वपूर्ण कृति लिखी।


इसलिए भारतीय संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है—राज्य बदल सकता है, लेकिन राष्ट्र-चेतना उससे अधिक दीर्घजीवी हो सकती है। राज्य एक राजनीतिक संस्था है; राष्ट्र एक व्यापक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामूहिक चेतना भी हो सकता है। भारत को इसी दूसरे अर्थ में समझने पर उसकी सभ्यतागत निरंतरता का अर्थ स्पष्ट होता है। भारतीय राष्ट्र की अवधारणा को समझने के लिए "सनातन" शब्द भी महत्वपूर्ण है। सनातन का अर्थ केवल बहुत पुराना नहीं है। यह उस व्यापक जीवन-दृष्टि की ओर संकेत करता है जो किसी एक पैगंबर, एक पुस्तक, एक संस्था अथवा एक ऐतिहासिक घटना में सीमित नहीं होती। भारतीय परंपरा में वैदिक चिंतन के साथ उपनिषद, बौद्ध और जैन दर्शन, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त और चार्वाक जैसे विविध मत विकसित हुए। यहाँ प्रश्न करना भी परंपरा का हिस्सा रहा और प्रश्न के उत्तर से असहमति भी बौद्धिक जीवन का हिस्सा रही। शास्त्रार्थ की परंपरा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय सभ्यता में सत्य की खोज केवल आदेश से नहीं, बल्कि संवाद, तर्क और विमर्श से भी होती थी।


इसी संदर्भ में धर्म और Religion के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। भारतीय भाषाओं में धर्म को केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक समुदाय के अर्थ में समझना उसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है। "धर्म" का संबंध धारण करने से जोड़ा गया है। वह व्यक्ति के कर्तव्य, आचरण, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और व्यापक व्यवस्था से संबंधित हो सकता है। दूसरी ओर आधुनिक पश्चिमी संदर्भ में Religion शब्द प्रायः विश्वास, धार्मिक सिद्धांत, उपासना और धार्मिक समुदाय जैसी अवधारणाओं से जुड़ा है। "मजहब" भी सामान्य भारतीय प्रयोग में किसी विशिष्ट धार्मिक faith या परंपरा के लिए प्रयुक्त होता है। इसलिए धर्म, Religion और मजहब को पूरी तरह समान मान लेना भारतीय धर्म-अवधारणा के साथ न्याय नहीं करता। लेकिन इनके बीच कृत्रिम दीवार खड़ी करना भी उचित नहीं होगा। सही दृष्टि यह है कि उनके ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भों को समझा जाए।


भारतीय संस्कृति की शक्ति इसी व्यापकता में दिखाई देती है। संस्कृति केवल भोजन, वस्त्र, नृत्य और संगीत का नाम नहीं है। संस्कृति वह गहरी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से कोई समाज यह तय करता है कि वह जीवन को किस प्रकार समझेगा, अपने संबंधों को कैसे व्यवस्थित करेगा, ज्ञान को कैसे ग्रहण करेगा और आने वाली पीढ़ियों को क्या विरासत देगा। परिवार, भाषा, दर्शन, कला, उत्सव, लोकस्मृति, प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण, शिक्षा और नैतिक मूल्य—ये सभी संस्कृति के अंग हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक उसकी विविधता के भीतर निरंतरता है। तमिल और कश्मीरी अलग भाषाएँ बोलते हैं, पंजाब और केरल की भोजन-पद्धतियाँ अलग हैं, उत्तर और दक्षिण की अनेक लोकपरंपराएँ अलग हैं, लेकिन विविधता के बावजूद सांस्कृतिक संवाद का एक विशाल इतिहास मौजूद है। भारतीय सभ्यता ने समानता थोपने के बजाय विविधताओं को समाहित करने की क्षमता दिखाई है। इसलिए भारतीय एकता को "Uniformity" के बजाय "Unity" के रूप में समझना अधिक उचित होगा।


यहाँ से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—यदि भारतीय सभ्यता के पास इतनी व्यापक दार्शनिक परंपरा थी तो आधुनिक भारत पश्चिमी राजनीतिक और आर्थिक विचारों के पीछे क्यों चला? इसका उत्तर औपनिवेशिक इतिहास में मिलता है। ब्रिटिश शासन ने भारत की शिक्षा, प्रशासन, कानून और बौद्धिक संस्थाओं को गहरे रूप से प्रभावित किया। अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों को आधुनिक विज्ञान, उदारवाद, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र से परिचित कराया, लेकिन साथ ही यूरोपीय categories के माध्यम से भारत को देखने की प्रवृत्ति भी मजबूत हुई। परिणाम यह हुआ कि कई बार हम अपने ही प्रश्नों के उत्तर पश्चिमी शब्दावली में खोजने लगे।


आज भारतीय राजनीतिक विमर्श में Left, Right, Centre, Liberal, Conservative, Socialist और Capitalist जैसी श्रेणियाँ सामान्य हो गई हैं। इनमें से प्रत्येक का अपना ऐतिहासिक संदर्भ और बौद्धिक महत्व है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन्हीं श्रेणियों से भारतीय समाज की संपूर्ण वास्तविकता को समझा जा सकता है? क्या भारत के लिए व्यक्ति और समाज का संबंध केवल Individualism और Collectivism के बीच का चुनाव है? क्या अर्थव्यवस्था को केवल Capitalism और Socialism के बीच चुनना होगा? क्या मनुष्य केवल उत्पादक और उपभोक्ता है?


यहीं भारतीय चिंतन अपनी स्वतंत्र भूमिका प्रस्तुत करता है। दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद व्यक्ति को केवल आर्थिक इकाई नहीं मानता। व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठी की अवधारणा के माध्यम से व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परम सत्य के बीच संबंध को समग्र रूप से देखने का प्रयास किया गया। मनुष्य केवल शरीर नहीं है; उसकी मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक आवश्यकताएँ भी हैं। इसी कारण एकात्म मानववाद आधुनिक राजनीतिक विचारधाराओं के बीच भारतीय दृष्टि से संवाद स्थापित करने का प्रयास करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत को पश्चिम की प्रत्येक अवधारणा को अस्वीकार कर देना चाहिए। लोकतंत्र, आधुनिक विज्ञान, संवैधानिक शासन, मानवाधिकार और आधुनिक संस्थाओं के विकास में पश्चिम का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रश्न पश्चिम को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का नहीं, बल्कि बौद्धिक आत्मनिर्भरता का है। भारत को दुनिया से सीखना चाहिए, लेकिन अपने मूल प्रश्नों के उत्तर खोजने की क्षमता भी स्वयं में विकसित करनी चाहिए।


इसीलिए वैचारिक स्वाधीनता का अर्थ पश्चिम-विरोध नहीं है। वैचारिक स्वाधीनता का अर्थ है—अपने बौद्धिक स्वत्व को पहचानना, विभिन्न सभ्यताओं से सीखना और फिर अपने समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप ज्ञान का पुनर्सृजन करना। कोई भी परिपक्व सभ्यता केवल नकल करके महान नहीं बनती। वह दूसरों से ग्रहण करती है, लेकिन ग्रहण किए हुए ज्ञान को अपनी परिस्थितियों में रूपांतरित भी करती है। भारत के लिए यह प्रश्न आज इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि 15 अगस्त 1947 को राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुए लगभग आठ दशक हो चुके हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, लेकिन वैचारिक स्वतंत्रता कोई एक तारीख को प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। आज भी हमें यह तय करना है कि विकास का अर्थ क्या है, शिक्षा का उद्देश्य क्या है, अर्थव्यवस्था किसके लिए है, व्यक्ति और समाज का संबंध कैसा हो, प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार कैसा हो और राष्ट्र को केवल राजनीतिक सीमा के रूप में समझा जाए या एक व्यापक सभ्यतागत चेतना के रूप में भी।


भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता भी इसी संदर्भ में सामने आती है। इसका अर्थ अतीत की प्रत्येक बात को बिना परीक्षण स्वीकार करना नहीं है। भारतीय परंपरा में स्वयं प्रमाण, तर्क, प्रत्यक्ष, अनुमान, संवाद और शास्त्रार्थ जैसी पद्धतियाँ रही हैं। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा का आधुनिक पुनर्जागरण अतीत की अंधी पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसके बौद्धिक उपकरणों का आधुनिक शोध-पद्धति के साथ संवाद होना चाहिए।


भारत की वैचारिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा अवसर यही है कि वह "प्राचीन बनाम आधुनिक" की कृत्रिम लड़ाई से बाहर निकले। हमें न तो अतीत में लौटना है और न पश्चिम की नकल में भविष्य तलाशना है। हमें अपनी सभ्यतागत स्मृति के आधार पर आधुनिकता को समझना है। आधुनिक विज्ञान को स्वीकार करते हुए भी मनुष्य को केवल उपभोक्ता नहीं मानना है। लोकतंत्र को स्वीकार करते हुए भी उसे केवल चुनाव तक सीमित नहीं रखना है। आर्थिक विकास को स्वीकार करते हुए भी प्रकृति और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को भूलना नहीं है। भारत को एक करने का अर्थ भी विविधताओं को मिटाना नहीं है। भारत को एक करने का अर्थ है कि विविध भाषाओं, जातीयताओं, क्षेत्रों और परंपराओं के बीच एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद और साझा नागरिक चेतना मजबूत हो। सांस्कृतिक एकात्मता, संवैधानिक समानता, आर्थिक अवसर, सामाजिक समरसता और शिक्षा में भारतीय सभ्यतागत दृष्टि—इन सबका संतुलन ही आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद को अधिक स्वस्थ आधार दे सकता है।


अंततः प्रश्न यह नहीं है कि भारत पश्चिम जैसा बने या पश्चिम से अलग बने। असली प्रश्न यह है कि भारत स्वयं को समझकर आधुनिक विश्व के साथ किस आत्मविश्वास से संवाद करता है। जो समाज अपने इतिहास को नहीं समझता, वह दूसरों द्वारा दी गई परिभाषाओं में स्वयं को खोजता है। लेकिन जो समाज अपनी सभ्यतागत स्मृति को समझता है, वह अतीत का कैदी नहीं बनता; वह भविष्य का निर्माता बन सकता है। भारत की वैचारिक स्वतंत्रता का अर्थ इसलिए पश्चिम से दूरी नहीं, बल्कि बौद्धिक समानता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम विश्व से कुछ न सीखें, बल्कि यह कि हम सीखते समय अपने विवेक को न खोएँ। भारत को विश्व से संवाद करना है, लेकिन अपनी आवाज़ में। उसे आधुनिक होना है, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं। उसे वैश्विक होना है, लेकिन सांस्कृतिक रूप से निराधार होकर नहीं।


शायद इसी में भारतीय राष्ट्र की उस दीर्घ सभ्यतागत चेतना का आधुनिक अर्थ छिपा है—विविधता में एकात्मता, ज्ञान में विनम्रता, परंपरा में गतिशीलता और आधुनिकता में आत्मबोध। भारत की अगली स्वतंत्रता राजनीतिक स्वतंत्रता की नहीं, बल्कि अपने विचारों को स्वयं परिभाषित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।



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