शिवपुरी कांग्रेस में घमासान: झंडा ऊंचा, कार्यकर्ताओं का हौसला नीचा!
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“झंडा ऊँचा रहे हमारा” यह गीत स्वतंत्रता दिवस पर खूब गाया गया होगा, लेकिन शिवपुरी कांग्रेस में इन दिनों सवाल यह है कि झंडा किसका ऊँचा रहे और किसका पद नीचे गिर जाए? 15 अगस्त का दिन देश की आजादी का पर्व था, मगर शिवपुरी कांग्रेस में मानो उसी दिन निष्कासन पर्व मन गया। किसान कांग्रेस जिलाध्यक्ष पुरुषोत्तम रावत और कोलारस ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष जितेंद्र शिवहरे को छह वर्ष के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कारण बताया गया - कार्यक्रमों का टकराव। पार्टी का ब्लॉक स्तर पर झंडावंदन कार्यक्रम चल रहा था और उसी दौरान दूसरा कार्यक्रम आयोजित कर लिया गया। अनुशासन समिति के निर्णय के बाद दोनों के निष्कासन का पत्र जारी कर दिया गया।
अब सवाल यह है कि कांग्रेस में स्वतंत्रता दिवस पर भी कार्यक्रम की स्वतंत्रता कितनी है? क्या झंडे के नीचे खड़े होने से पहले यह देखना होगा कि झंडे की रस्सी किस गुट के हाथ में है? क्या कांग्रेस में अब ध्वजारोहण से ज्यादा महत्वपूर्ण ध्वज-राजनीति हो गई है?
सोशल मीडिया पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रियाओं ने इस आग में घी डालने का काम किया है। किसी ने प्रदेश नेतृत्व से सवाल पूछा कि पार्टी में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की आखिर अहमियत क्या रह गई है? किसी ने जिला कांग्रेस नेतृत्व पर चाटुकारिता को बढ़ावा देने के आरोप लगाए। किसी ने कहा कि क्षेत्र में मेहनत करने वालों की जगह “हाँ में हाँ मिलाने वालों” को महत्व मिल रहा है।
यानी मामला सिर्फ दो निष्कासन का नहीं रह गया है।
मामला अब उस पुराने सवाल तक पहुंच गया है “कांग्रेस में कार्यकर्ता कौन है और दरबारी कौन?”
एक कार्यकर्ता की पीड़ा सोशल मीडिया पर इस अंदाज में दिखाई दी कि यदि जिले की पूरी पदाधिकारी टीम का सर्वे हो जाए तो शायद यह पता चले कि किसका जनाधार कितना है और किसका आधार केवल जिलाध्यक्ष की परिक्रमा है।
राजनीति में परिक्रमा कोई नई चीज नहीं है। ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, भक्त मंदिर की परिक्रमा करते हैं और राजनीति में कुछ कार्यकर्ता पद की। फर्क सिर्फ इतना है कि ग्रहों को परिक्रमा के बदले पद नहीं मिलता!
दूसरी ओर समर्थकों ने पुरुषोत्तम रावत को किसान हित में सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ता बताते हुए सवाल उठाया कि जो व्यक्ति किसानों की आवाज प्रशासन तक पहुंचाता है, संगठन को मजबूत करने के लिए मेहनत करता है, उसे छह साल के निष्कासन का “स्वतंत्रता दिवस पुरस्कार” क्यों दिया गया?
यहां व्यंग्य खुद पूछ रहा है कि क्या किसान कांग्रेस को मजबूत करने की सजा किसान कांग्रेस से निष्कासन है? क्या कार्यकर्ता जितना ज्यादा सक्रिय होगा, उतनी जल्दी अनुशासन समिति की नजर में आएगा? क्या कांग्रेस में अब ‘काम करो और सावधान रहो’ का नया सिद्धांत लागू हो गया है?
कुछ कार्यकर्ताओं ने अपेक्षाकृत संयमित रास्ता सुझाया है। उनका कहना है कि पार्टी का फैसला उनके लिए आदेश है, लेकिन पुरुषोत्तम रावत और जितेंद्र शिवहरे से बातचीत कर गलतफहमियां दूर की जानी चाहिए और दोनों की वापसी पर पुनर्विचार होना चाहिए। यह बात शायद कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि पार्टी संगठन निष्कासन के पत्रों से नहीं, कार्यकर्ताओं के विश्वास से मजबूत होता है। पत्र जारी करना आसान है, कार्यकर्ता जोड़ना कठिन। किसी को छह साल के लिए बाहर करना एक हस्ताक्षर का काम है, लेकिन उसे छह साल तक संगठन के लिए खड़ा रखना वर्षों की मेहनत मांगता है।
सबसे तीखा सवाल तो उन कार्यकर्ताओं ने उठाया है जिन्होंने कहा कि यदि स्वतंत्रता दिवस पर अपने ब्लॉक में ब्लॉक अध्यक्ष द्वारा ध्वजारोहण करना इतनी बड़ी अनुशासनहीनता है कि निष्कासन हो जाए, तो फिर उस कार्यक्रम में शामिल सभी पदाधिकारियों पर समान कार्रवाई क्यों नहीं? अनुशासन की कैंची क्या केवल दो लोगों के लिए बनी थी? या फिर बाकी लोग उस दिन “कटिंग से बाहर” थे?
कांग्रेस की परेशानी यह है कि बाहर से मुकाबला भाजपा से है और भीतर मुकाबला आपस में। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन संगठन के भीतर चुनावी गणित अभी से शुरू दिखाई देने लगा है। आज दो पदाधिकारी निष्कासित हुए हैं। कल कितने कार्यकर्ता नाराज होंगे? आज सोशल मीडिया पर सवाल हैं। कल क्या यही सवाल बूथ तक पहुंचेंगे? आज लोग पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं। कल कहीं पुनर्विचार की जगह पलायन न शुरू हो जाए?
राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं हैं कि कुछ नाराज कांग्रेसी दूसरे दलों के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं। हालांकि ऐसी चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि जब संगठन में संवाद के दरवाजे बंद होते हैं, तब दूसरी पार्टियों की खिड़कियां अचानक खुली हुई दिखाई देने लगती हैं और अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस के लिए यह सिर्फ दो पदाधिकारियों का मामला नहीं रहेगा क्योंकि कार्यकर्ता जब पार्टी छोड़ता है तो अकेला नहीं जाता वह अपने साथ मोहल्ले की नाराजगी, गांव की चर्चा, बूथ की समीकरण और वर्षों की बनाई पहचान भी लेकर जाता है। शिवपुरी कांग्रेस के सामने इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलेगी या संगठन को आदेश-पत्रों की फाइल में खोजती रहेगी?
कांग्रेस की हालत पर व्यंग्य की चार पंक्तियां शायद पर्याप्त हैं
«झंडा था हाथ में, मगर सवालों में संगठन था,
आजादी का पर्व था, पर कार्यकर्ता बंधन में था।
किसने किसका कार्यक्रम किया—बहस चलती रही,
कांग्रेस खुद से ही लड़ी और विपक्ष मुस्कराता रहा।»
और यदि यही सिलसिला चलता रहा तो 2028 का चुनाव आने से पहले ही कांग्रेस के सामने एक और चुनाव हो सकता है कि “कौन किसके साथ है?” क्योंकि चुनावी मैदान में जनता से वोट मांगने से पहले संगठन को अपने कार्यकर्ताओं से विश्वास मांगना पड़ता है।
शिवपुरी कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह कार्यकर्ताओं की पार्टी बनना चाहती है या पदाधिकारियों की पंचायत। वरना स्थिति ऐसी हो सकती है कि मंच पर नेता भाषण देते रहें “कांग्रेस एकजुट है…” और नीचे खड़ा कार्यकर्ता मन ही मन पूछता रहे “अगर सब एकजुट हैं, तो फिर इतने लोग नाराज क्यों हैं?”
यही वह सवाल है जिसका जवाब कांग्रेस को सोशल मीडिया पर नहीं, अपने संगठन के भीतर देना होगा। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष की हार से ज्यादा खतरनाक होती है अपनों का भरोसा हार जाना और राजनीति में सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जिस पार्टी को अपने प्रतिद्वंद्वी से लड़ना था, वह अगर अपने ही कार्यकर्ताओं से लड़ने लगे, तो विपक्ष को मेहनत करने की जरूरत ही कितनी बचती है? जनता सब देख रही है, कार्यकर्ता सब लिख रहा है और राजनीति सब याद रखती है।
आजादी का पर्व था, पर कार्यकर्ता बंधन में था।
किसने किसका कार्यक्रम किया—बहस चलती रही,
कांग्रेस खुद से ही लड़ी और विपक्ष मुस्कराता रहा।»
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