भक्ति उत्सव या हाउजी पार्टी? धर्म के नाम पर कैसा दिखावा!
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आज अखबार के एक कोने में खबर थी कि तथाकथित शेरों के एक क्लब ने भक्ति उत्सव आयोजित किया, जहां भजन हुए, डांडिया हुआ और फिर हाउजी भी खेली गई। खबर पढ़कर लगा कि कलियुग में भक्ति की परिभाषा भी बदल गई है। अब भगवान का नाम लीजिए, भजन गाइए, धार्मिकता का आवरण ओढ़िए और फिर हाउजी के रोमांच में डूब जाइए। मनोरंजन भी हो जाएगा और आयोजन को भक्ति उत्सव का पवित्र नाम भी मिल जाएगा!
प्रश्न हाउजी खेलने का नहीं, उसे भक्ति का अंग बताने का है। सामाजिक मनोरंजन को मनोरंजन कहने में आखिर संकोच कैसा? भक्ति के नाम पर हर गतिविधि को उचित ठहराने की यह कैसी मानसिकता है? हाउजी खेल भक्ति उत्सव का मुख्य आकर्षण बन जाए, तो धार्मिकता के इस प्रदर्शन पर सवाल क्यों न उठें?
समाजसेवा का दावा करने वालों से अपेक्षा होती है कि वे समाज को संस्कारों की दिशा देंगे, न कि धर्म को मनोरंजन की पैकिंग में बेचेंगे। समाजसेवा केवल आयोजन करने, तालियां बटोरने और अखबारों में तस्वीरें छपवाने का नाम नहीं है। असली प्रतिष्ठा चरित्र और विचारों से बनती है, कार्यक्रमों के चमकदार नामों से नहीं। दुःख इस बात का है कि भक्ति, जो मनुष्य को भीतर से निर्मल बनाने का माध्यम है, उसे भी अब आकर्षण और प्रचार का साधन बनाया जा रहा है। भजन से शुरुआत और हाउजी पर समापन और फिर दावा कि शाम भक्ति के रंगों में सराबोर रही! सवाल है कि भक्ति का रंग गहरा था या मनोरंजन का शोर?
आयोजन करना है तो मनोरंजन कहिए, भक्ति करनी है तो उसे प्रदर्शन मत बनाइए। भगवान के नाम को अपने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने का साधन बनाना आसान है, लेकिन उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारना कठिन।याद रखिये, धार्मिक शब्दों का प्रयोग किसी आयोजन धार्मिक नहीं बना देता। भक्ति मंच सजाने से नहीं, मन और आचरण संवारने से सिद्ध होती है।
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दिवाकर की दुनाली से

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