डायमंड जुबिली सप्ताह के दूसरे दिन राखीगढ़ी के साक्ष्यों से भारतीय ज्ञान परंपरा पर विमर्श
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शिमला, 12 अक्टूबर 2026। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में आयोजित डायमंड जुबिली सप्ताह समारोह के दूसरे दिन भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के माध्यम से अतीत को समझने पर केंद्रित विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। प्रख्यात पुरातत्त्वविद् एवं डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे के पूर्व कुलपति प्रो. वसंत शिंदे ने “Evolution of Bharatiya Knowledge System: Archaeological Perspective with Special Reference to Rakhigarhi” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। सत्र की अध्यक्षता भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने की।
11 से 15 अक्टूबर 2026 तक आयोजित डायमंड जुबिली सप्ताह का उद्देश्य इतिहास, भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्य, कला, संस्कृति और अकादमिक चिंतन से जुड़े विषयों पर संवाद को प्रोत्साहित करना है। इसी क्रम में दूसरे दिन का व्याख्यान भारतीय ज्ञान प्रणाली के विकास को पुरातात्त्विक दृष्टिकोण से समझने तथा राखीगढ़ी जैसे महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल के अध्ययन के माध्यम से अतीत की सभ्यतागत उपलब्धियों पर विचार करने के लिए समर्पित रहा।
कला प्रदर्शनी: भारतीय कला और सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में आयोजित “Bharatiya Forms, Expressions and Consciousness” शीर्षक कला प्रदर्शनी डायमंड जुबिली सप्ताह का एक प्रमुख आकर्षण बनी हुई है। कलाकार श्रीमती निशा जायसवाल की इस प्रदर्शनी में भारतीय महाकाव्यों, पारंपरिक कलात्मक रूपों और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े विविध पक्षों को दृश्य कला के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। पद्मश्री श्रीमती शोवना नारायण द्वारा 11 अक्टूबर को उद्घाटित यह प्रदर्शनी दर्शकों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत और कलात्मक अभिव्यक्तियों से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है। प्रदर्शनी 15 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7 बजे तक रवींद्रनाथ टैगोर कला दीर्घा, पूल थिएटर के निकट, में दर्शकों के लिए खुली रहेगी। इसमें प्रवेश निःशुल्क है तथा आगंतुकों को नियमित प्रवेश टिकट से छूट प्रदान की गई है।
पुस्तक मेला: ज्ञान, साहित्य और अकादमिक संवाद का केंद्र
डायमंड जुबिली सप्ताह के अंतर्गत आयोजित पुस्तक मेला पाठकों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पुस्तक प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 11 अक्टूबर को प्रो. रघुवेंद्र तंवर और प्रो. रीचा तंवर द्वारा उद्घाटित इस मेले में प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक अपनी पुस्तकों और अकादमिक प्रकाशनों को प्रदर्शित कर रहे हैं। विभिन्न विषयों पर उपलब्ध पुस्तकें पाठकों को नए विचारों, शोधपरक सामग्री और साहित्यिक कृतियों से परिचित होने का अवसर प्रदान करती हैं। यह आयोजन पठन संस्कृति को प्रोत्साहित करने के साथ प्रकाशन जगत और अकादमिक समुदाय के बीच संवाद को भी बढ़ावा देता है। पुस्तक मेला 15 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन प्रातः 11 बजे से सायं 7 बजे तक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में जारी रहेगा। मेले में प्रवेश निःशुल्क है तथा इसके लिए नियमित प्रवेश टिकट से छूट प्रदान की गई है।
राखीगढ़ी के पुरातात्त्विक संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन
अपने व्याख्यान में प्रो. वसंत शिंदे ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के विकास को पुरातात्त्विक दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर केंद्रित विमर्श प्रस्तुत किया। व्याख्यान का विशेष संदर्भ राखीगढ़ी था, जो भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन सभ्यतागत विरासत के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
पुरातत्त्व अतीत को समझने का एक महत्वपूर्ण अनुशासन है। उत्खनन से प्राप्त अवशेष, प्राचीन बस्तियों की संरचना, भौतिक संस्कृति, कलाकृतियां तथा अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्य प्राचीन समाजों के जीवन और उनके विकासक्रम के अध्ययन में सहायक होते हैं। इन साक्ष्यों के व्यवस्थित विश्लेषण से तत्कालीन समाजों की जीवन-पद्धतियों, तकनीकी क्षमताओं, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक व्यवहारों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
राखीगढ़ी का अध्ययन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन नगरीय सभ्यता और उसके विकास से संबंधित पुरातात्त्विक प्रश्नों को समझने का अवसर प्रदान करता है। ऐसे स्थलों का अध्ययन प्राचीन समाजों के भौतिक अवशेषों को व्यापक ऐतिहासिक संदर्भों में रखने तथा सभ्यतागत विकास की प्रक्रियाओं का विश्लेषण करने में सहायक होता है।
व्याख्यान का केंद्रीय विषय भारतीय ज्ञान परंपरा के विकास को पुरातात्त्विक साक्ष्यों के साथ जोड़कर समझना था। ज्ञान परंपराओं का अध्ययन केवल लिखित ग्रंथों तक सीमित नहीं रहता; भौतिक अवशेष और पुरातात्त्विक सामग्री भी अतीत के समाजों की क्षमताओं, अनुभवों और जीवन-पद्धतियों को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इस दृष्टि से पुरातत्त्व और इतिहास का अंतर्विषयक अध्ययन भारतीय अतीत की अधिक व्यापक समझ विकसित करने में योगदान दे सकता है।
पुरातत्त्व और इतिहास के बीच अंतर्विषयक संवाद
प्रो. शिंदे के व्याख्यान ने भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन में पुरातात्त्विक अनुसंधान की भूमिका को प्रमुखता प्रदान की। अतीत के अध्ययन में साहित्यिक स्रोतों, ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों को उनके संबंधित संदर्भों में समझना महत्वपूर्ण होता है। विभिन्न प्रकार के स्रोतों के तुलनात्मक और प्रमाण-आधारित अध्ययन से ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की अधिक संतुलित व्याख्या की संभावनाएं विकसित होती हैं।
राखीगढ़ी जैसे पुरातात्त्विक स्थलों का अध्ययन शोधकर्ताओं को प्राचीन समाजों की संरचना और सभ्यतागत विकास से जुड़े प्रश्नों की पड़ताल करने का अवसर देता है। साथ ही, यह इस बात पर भी ध्यान आकर्षित करता है कि अतीत के बारे में हमारी समझ निरंतर नए साक्ष्यों, अनुसंधान पद्धतियों और अकादमिक विमर्श के माध्यम से विकसित होती रहती है।
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में आयोजित यह व्याख्यान इतिहास, पुरातत्त्व और भारतीय ज्ञान परंपरा के बीच अंतर्संबंधों पर विचार करने का एक महत्वपूर्ण मंच बना। डायमंड जुबिली सप्ताह के अकादमिक कार्यक्रमों में इस विषय को शामिल करना भारतीय सभ्यतागत अतीत के अध्ययन में बहुविषयक दृष्टिकोण की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
प्रो. वसंत शिंदे का अकादमिक योगदान
प्रो. वसंत शिंदे पुरातत्त्व के क्षेत्र में अपने अकादमिक कार्य के लिए जाने जाते हैं। वे पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के पूर्व कुलपति रहे हैं। उनके व्याख्यान ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के विकास पर विचार करते हुए पुरातात्त्विक अध्ययन की उपयोगिता और प्राचीन स्थलों से प्राप्त साक्ष्यों के महत्व को सामने रखने का अवसर प्रदान किया।
राखीगढ़ी को विशेष संदर्भ बनाकर प्रस्तुत विषय ने श्रोताओं के सामने यह प्रश्न रखा कि प्राचीन सभ्यताओं के भौतिक अवशेषों का अध्ययन अतीत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की समझ को किस प्रकार समृद्ध कर सकता है। यह विमर्श भारतीय इतिहास के अध्ययन में पुरातात्त्विक अनुसंधान की भूमिका और अकादमिक संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी की अध्यक्षता
सत्र की अध्यक्षता भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने की। उनके अध्यक्षीय संबोधन ने व्याख्यान के विषय को संस्थान की व्यापक अकादमिक दृष्टि और डायमंड जुबिली सप्ताह के उद्देश्य से जोड़ने का अवसर प्रदान किया।
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान विभिन्न विषयों और ज्ञान परंपराओं के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने वाला अकादमिक मंच है। भारतीय ज्ञान प्रणाली के विकास को पुरातात्त्विक परिप्रेक्ष्य में समझने पर केंद्रित यह व्याख्यान इसी बहुविषयक दृष्टिकोण के अनुरूप रहा। सत्र में स्वागत एवं वक्ता-परिचय संस्थान के फेलो प्रो. प्रमोद पी. जोगलेकर ने प्रस्तुत किया। इसके पश्चात वक्ता का अभिनंदन किया गया। व्याख्यान के बाद निदेशक प्रो. चतुर्वेदी ने अध्यक्षीय संबोधन दिया। कार्यक्रम का समापन डॉ. राजीव कुमार मिश्रा, पुस्तकालयाध्यक्ष एवं अकादमिक संसाधन अधिकारी, द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
डायमंड जुबिली सप्ताह: ज्ञान, शोध और सांस्कृतिक विरासत का साझा मंच
डायमंड जुबिली सप्ताह के दूसरे दिन का कार्यक्रम भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन में पुरातत्त्व की भूमिका को केंद्र में लाने वाला अकादमिक आयोजन रहा। पहले दिन इतिहास, कला प्रदर्शनी, पुस्तक मेले और पुस्तक लोकार्पण के माध्यम से शुरू हुआ विमर्श दूसरे दिन प्राचीन सभ्यताओं और पुरातात्त्विक साक्ष्यों की ओर आगे बढ़ा।
11 से 15 अक्टूबर तक चलने वाले इस समारोह में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान इतिहास, साहित्य, संस्कृति, कला और ज्ञान के विविध आयामों पर संवाद को प्रोत्साहित कर रहा है। समारोह का उद्देश्य इन विषयों को केवल अकादमिक समुदाय तक सीमित न रखते हुए व्यापक बौद्धिक और सांस्कृतिक विमर्श से जोड़ना है।
डायमंड जुबिली सप्ताह के आगामी कार्यक्रमों में 13 अक्टूबर को “Vande Mataram” विषय पर श्री अखिलेश झा, भारतीय सिविल लेखा सेवा (ICAS), ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली का विशेष व्याख्यान निर्धारित है। इसके अतिरिक्त 15 अक्टूबर को संस्थान में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की प्रतिमा का अनावरण, कांगड़ा लघुचित्रों पर आधारित कला दीर्घा का उद्घाटन, पुस्तक लोकार्पण और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला का डायमंड जुबिली सप्ताह ज्ञान, इतिहास, कला और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों पर सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
डॉ. अखिलेश पाठक
पीआरओ, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला
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समाचार
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