भारतीय चिंतन में शक्ति का व्यापक स्वरूप – दिवाकर शर्मा
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‘शक्ति’ यह शब्द सुनते ही भारतीय मन में सबसे पहले माँ दुर्गा का विराट स्वरूप उभरता है। सिंह पर आरूढ़ देवी, हाथों में अस्त्र-शस्त्र और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प। महिषासुर पर देवी की विजय का चित्र हमारे सांस्कृतिक मानस में केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह उस शाश्वत सत्य का प्रतीक है कि जब अन्याय और असंतुलन बढ़ता है, तब शक्ति का जागरण आवश्यक हो जाता है। लेकिन क्या शक्ति का अर्थ केवल बाहुबल है? क्या शक्ति केवल युद्ध करने या विजय प्राप्त करने की क्षमता का नाम है? भारतीय चिंतन इन प्रश्नों का उत्तर कहीं अधिक व्यापक रूप में देता है। यहाँ शक्ति केवल किसी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र की सामर्थ्य नहीं, बल्कि वह मूल ऊर्जा है जिसके माध्यम से जीवन गतिशील होता है, सृजन होता है, परिवर्तन आता है और उद्देश्य की प्राप्ति होती है।
सूर्य का प्रकाश शक्ति है, पृथ्वी की उर्वरता शक्ति है, बीज का वृक्ष बनने का सामर्थ्य शक्ति है। माँ की ममता शक्ति है, शिक्षक का ज्ञान देना शक्ति है, किसान का श्रम शक्ति है और सैनिक का राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित करना भी शक्ति है। किसी वैज्ञानिक की जिज्ञासा, किसी कलाकार की सृजनशीलता, किसी युवा का साहस और किसी सामान्य नागरिक का कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य पर अडिग रहना इन सबके भीतर शक्ति का ही कोई न कोई रूप कार्य करता है।
भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि उसने शक्ति को केवल उपयोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे एक पूजनीय तत्व के रूप में प्रतिष्ठित किया। यही कारण है कि यहाँ शक्ति को देवी के रूप में देखा गया। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और काली - देवी के ये विभिन्न स्वरूप वस्तुतः शक्ति के विभिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहीं शक्ति ज्ञान के रूप में प्रकट होती है, कहीं समृद्धि के रूप में, कहीं संरक्षण के रूप में और कहीं अधर्म के विनाश की क्षमता के रूप में। भारतीय चिंतन में ‘शक्ति’ और ‘शिव’ का संबंध भी इसी गहराई को व्यक्त करता है। शिव चेतना के प्रतीक हैं तो शक्ति उस चेतना की सक्रिय अभिव्यक्ति। चेतना में सामर्थ्य हो, लेकिन वह कर्म में प्रकट न हो, तो उसका प्रभाव सीमित रह जाता है। दूसरी ओर, शक्ति हो लेकिन विवेक और दिशा न हो, तो वही शक्ति विनाश का कारण बन सकती है। इसलिए भारतीय दर्शन शक्ति को विवेक, मर्यादा और धर्म से जोड़कर देखता है।
यही बात आज के जीवन पर भी लागू होती है। किसी व्यक्ति के पास धन हो सकता है, पद हो सकता है, ज्ञान हो सकता है या शारीरिक सामर्थ्य हो सकता है लेकिन यदि उसके पास विवेक नहीं है, तो उसकी शक्ति समाज के लिए उपयोगी होने के बजाय हानिकारक भी बन सकती है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ असाधारण सामर्थ्य रखने वाले व्यक्तियों का पतन उनके अहंकार के कारण हुआ। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमारे पास कितनी शक्ति है उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम उस शक्ति का उपयोग किस उद्देश्य के लिए करते हैं।
नवरात्रि इसी प्रश्न पर आत्मचिंतन का अवसर देती है। नौ दिनों तक देवी के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हुए भारतीय समाज केवल किसी बाहरी शक्ति का स्मरण नहीं करता, बल्कि अपने भीतर की सुप्त शक्तियों को भी जागृत करने का संदेश ग्रहण करता है। साधना, संयम, अनुशासन, साहस, करुणा, आत्मविश्वास और संघर्ष की क्षमता - ये सभी मनुष्य के भीतर मौजूद शक्तियाँ हैं। आवश्यकता केवल उन्हें पहचानने और सही दिशा देने की है इसीलिए शक्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण रूप है - आत्मशक्ति। जीवन में परिस्थितियाँ हमेशा हमारे अनुकूल नहीं होतीं। असफलता, कठिनाई, बीमारी, आर्थिक संकट, निराशा या सामाजिक दबाव जैसे अनेक प्रसंग मनुष्य के सामने आते हैं। उस समय बाहरी परिस्थितियों को बदल पाना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन अपने भीतर परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति विकसित करना संभव है। जो व्यक्ति कठिन समय में भी अपने विवेक, धैर्य और विश्वास को बनाए रखता है, वह वास्तव में शक्तिशाली है। इसके साथ ही ज्ञान शक्ति का महत्व भी कम नहीं है। ज्ञान मनुष्य को केवल सूचनाएँ नहीं देता, बल्कि सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करता है। अज्ञान भय को जन्म देता है, जबकि ज्ञान आत्मविश्वास देता है। जिस समाज के पास ज्ञान, शिक्षा और अनुसंधान की शक्ति होती है, वह बदलती दुनिया में अपने लिए नए अवसर निर्मित कर सकता है।
इसी प्रकार संगठन शक्ति व्यक्तिगत सामर्थ्य को सामूहिक शक्ति में बदलती है। अकेला व्यक्ति सीमित संसाधनों के साथ जितना कर सकता है, संगठित समाज उससे कहीं अधिक कर सकता है। जब अनेक व्यक्ति किसी सकारात्मक उद्देश्य के लिए अपने मतभेदों से ऊपर उठकर साथ आते हैं, तब उनकी सामूहिक क्षमता परिवर्तन का आधार बनती है। परिवार से लेकर समाज और समाज से लेकर राष्ट्र तक, संगठन शक्ति विकास और स्थायित्व का महत्वपूर्ण आधार है। आर्थिक शक्ति भी आधुनिक राष्ट्रजीवन का एक आवश्यक पक्ष है। आर्थिक रूप से सक्षम समाज अपने नागरिकों के लिए बेहतर अवसर पैदा कर सकता है, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश कर सकता है तथा संकट के समय अधिक आत्मनिर्भर होकर निर्णय ले सकता है। इसी प्रकार सांस्कृतिक शक्ति किसी राष्ट्र को उसकी जड़ों से जोड़ती है। अपनी भाषा, परंपरा, साहित्य, कला, दर्शन और जीवन-मूल्यों के प्रति आत्मविश्वास किसी भी समाज को अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने में सहायता करता है।
आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, तब शक्ति की अवधारणा को नए संदर्भों में समझना और भी आवश्यक हो गया है। आधुनिक युग में केवल सैन्य शक्ति ही पर्याप्त नहीं है। विज्ञान और तकनीक, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, सामाजिक एकता, संस्कृति और मानवीय मूल्यों - इन सभी क्षेत्रों में सामर्थ्य का निर्माण करना आवश्यक है। किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति इन सभी आयामों के संतुलित विकास से निर्मित होती है। यही कारण है कि राष्ट्रशक्ति की शुरुआत अंततः व्यक्ति से होती है। एक चरित्रवान व्यक्ति एक जिम्मेदार परिवार का निर्माण करता है, जिम्मेदार परिवार स्वस्थ समाज का आधार बनता है और स्वस्थ, जागरूक तथा संगठित समाज एक समर्थ राष्ट्र की नींव रखता है। राष्ट्र निर्माण केवल बड़े निर्णयों से नहीं होता यह करोड़ों लोगों के छोटे-छोटे जिम्मेदार कार्यों से भी होता है।
शक्ति का अर्थ इसलिए किसी दूसरे को दबाने की क्षमता नहीं है। वास्तविक शक्ति वह है जो स्वयं को नियंत्रित कर सके, कमजोर को सहारा दे सके, अन्याय के सामने खड़ी हो सके और उपलब्ध सामर्थ्य का उपयोग लोकमंगल के लिए कर सके। जो शक्ति केवल अहंकार बढ़ाए, वह अंततः स्वयं को कमजोर करती है; लेकिन जो शक्ति सेवा, सृजन और संरक्षण में लगती है, वह समाज को ऊपर उठाती है।
विजयादशमी का संदेश भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है। राम और रावण का प्रसंग केवल अतीत की कथा नहीं है। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष का भी प्रतीक है। अहंकार और विनम्रता, लोभ और त्याग, असत्य और सत्य, स्वार्थ और कर्तव्य - इनके बीच का संघर्ष आज भी उतना ही प्रासंगिक है। बाहरी विजय का उत्सव मनाने के साथ यदि हम अपने भीतर की किसी कमजोरी पर विजय प्राप्त करने का संकल्प लें, तो पर्व का अर्थ और गहरा हो जाता है। शक्ति की आराधना इसलिए केवल मंदिरों में दीप जलाने या अनुष्ठान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। शक्ति की सच्ची आराधना तब होगी जब हम अपने भीतर के सामर्थ्य को पहचानें, उसे अनुशासन से विकसित करें और उसका उपयोग अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्र के हित में करें। एक विद्यार्थी अपनी पढ़ाई के प्रति ईमानदार होकर शक्ति का उपयोग करता है। एक शिक्षक अपने ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाकर शक्ति का उपयोग करता है। एक किसान अपने श्रम से अन्न पैदा करके शक्ति का उपयोग करता है। एक उद्यमी रोजगार पैदा करके शक्ति का उपयोग करता है। एक सैनिक अपने साहस से देश की रक्षा करता है। एक माँ अपने संस्कारों से परिवार की दिशा तय करती है। और एक सामान्य नागरिक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करके राष्ट्र की शक्ति में अपना योगदान देता है।
अंततः शक्ति बाहर से प्राप्त करने की वस्तु नहीं, बल्कि भीतर से जागृत करने वाली चेतना है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी क्षमताओं को पहचानें, उन्हें ज्ञान और विवेक से संस्कारित करें तथा उन्हें सकारात्मक दिशा दें क्योंकि शक्ति का सबसे सुंदर रूप वह नहीं है जो दूसरों को पराजित करे, बल्कि वह है जो स्वयं को ऊँचा उठाते हुए दूसरों को भी ऊपर उठाए। यही शक्ति का भारतीय अर्थ है। यही शक्ति का सनातन संदेश है और यही शक्ति से राष्ट्रशक्ति तक की यात्रा का पहला कदम है।
Tags :
धर्म और अध्यात्म

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