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शिवपुरी में गंगाधर ही शक्तिमान है!

 



शिवपुरी में जो दिखता है, वास्तव में होता नहीं और जो होता है, वह दिखाई नहीं देता। यह ऐसा शहर है जहाँ अचानक नए नेतृत्व खड़े हो जाते हैं या यूँ कहें कि खड़े कर दिए जाते हैं। वहीं वर्षों से समाज, संगठन या सार्वजनिक जीवन में समर्पित और प्रतिष्ठित लोगों को रातोंरात किनारे कर दिया जाता है। फिर एक कहानी गढ़ी जाती है कि यह परिवर्तन किसी प्रभावशाली व्यक्तित्व की इच्छा या पहल का परिणाम है। लेकिन पर्दे के पीछे की पटकथा कहीं और लिखी जा चुकी होती है और मंच पर केवल किरदार बदले जाते हैं।


शिवपुरी की राजनीति और समाजसेवा भले ही अलग-अलग क्षेत्र माने जाते हों, लेकिन यहाँ कई बार दोनों एक-दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं। समाजसेवा के नाम पर मंच सजता है तो कुछ गिने-चुने चेहरे लगातार सुर्खियों में रहते हैं और राजनीतिक मंच सजता है तो वही चेहरे अलग-अलग भूमिकाओं में फिर दिखाई देने लगते हैं। हैरत तो तब होती है जब पता ही नहीं चलता कि कल तक जो व्यक्ति एक मंच पर किसी के साथ खड़ा था, आज दूसरे मंच पर उसी के विरोधी खेमे का प्रतिनिधि कैसे बन गया। यहाँ गुटबाजी, जातिवाद और पत्रकारिता तक कई बार सिद्धांतों से अधिक सुविधा और समय की गणित से संचालित होती दिखाई देती है। कौन-सा चेहरा कब किसके साथ खड़ा होगा, किस समय कौन-सा मुखौटा पहनना है और कब पुराने संबंधों को भूलकर नए समीकरणों का हिस्सा बन जाना है मानो सबकी पटकथा पहले से तैयार हो। चेहरे बदलते हैं, मंच बदलते हैं, संबोधन बदलते हैं, लेकिन मानसिकता वही रहती है। यही वह सामाजिक प्रदूषण है जो धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन में विश्वास को कमजोर करता है।


सबसे विचित्र स्थिति उस व्यक्ति की है जो ईमानदारी से व्यापार करता है, मेहनत से अपना व्यवसाय खड़ा करता है और समाज में सम्मान के साथ जीना चाहता है। उसके भीतर यह भय पैदा कर दिया जाता है कि कहीं कोई संगठित समूह उसे किसी दिन ‘माफिया’ घोषित न करवा दे। दूसरी ओर, जिन पर गंभीर सवाल उठते हैं, उनके लिए वही व्यवस्था देखते ही देखते नए विशेषण खोज लेती है - व्यापारी, समाजसेवी, बुद्धिजीवी, धार्मिक व्यक्तित्व, प्रकृति प्रेमी और न जाने क्या-क्या। फिर यही चेहरे अलग-अलग मंचों पर दिखाई देते हैं। कहीं सम्मानित होते हैं, कहीं मुख्य अतिथि बनते हैं, कहीं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत होते हैं तो कहीं राजनीतिक समीकरणों के महत्वपूर्ण किरदार बन जाते हैं। मंच बदलता है, बैनर बदलता है, संबोधन बदलता है, लेकिन चेहरे वही रहते हैं और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब कोई राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक बदलाव होता है तो उसका श्रेय किसी प्रभावशाली व्यक्तित्व को दे दिया जाता है। संदेश ऐसा बनाया जाता है कि मानो फलाँ व्यक्ति की इच्छा के कारण यह परिवर्तन हुआ। विरोध करने वालों को लगता है कि उन्होंने किसी बड़े प्रभावशाली व्यक्ति से टकराव मोल ले लिया है, जबकि वास्तविकता यह हो सकती है कि उस निर्णय से जिन लोगों का स्वार्थ सिद्ध होना था, उनका काम पहले ही हो चुका हो।


यानी असली खेल निर्णय से अधिक उस निर्णय की धारणा बनाने का है। जनता को यह विश्वास दिला दिया जाए कि शक्ति किसी एक चेहरे के पास है, तो पर्दे के पीछे काम करने वालों के लिए रास्ता आसान हो जाता है। प्रभावशाली चेहरा सामने रहता है, लाभार्थी पीछे से लाभ उठाते हैं और विरोध का सारा निशाना उसी चेहरे पर चला जाता है। यही कारण है कि शिवपुरी को केवल दिखाई देने वाले चेहरों से समझना आसान नहीं है। यहाँ मंच पर खड़े किरदारों से अधिक महत्वपूर्ण वे लोग हो सकते हैं जो मंच के पीछे खड़े होकर रोशनी की दिशा तय करते हैं। शायद इसी पूरे खेल को देखकर शिवपुरी की राजनीति और सामाजिक तंत्र पर व्यंग्य करते हुए यही कहना पड़ता है कि  “शिवपुरी में गंगाधर ही शक्तिमान है!”  क्योंकि यहाँ सवाल यह नहीं कि शक्तिमान कौन दिखाई दे रहा है, सवाल यह है कि शक्तिमान को शक्तिमान दिखा कौन रहा है?

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