अधर्म पर विजय का संदेश आज भी प्रासंगिक क्यों है? – विशाल गोलानी
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भारतीय जीवन में कुछ पर्व ऐसे हैं जो केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं होते, बल्कि वे हमारी सामूहिक चेतना में बसे हुए ऐसे विचार होते हैं, जो हर वर्ष हमें स्वयं को देखने, समझने और सुधारने का अवसर देते हैं। विजयादशमी ऐसा ही एक पर्व है। यह विजय का उत्सव है, लेकिन केवल युद्ध में में मिली विजय का नहीं; यह उस विचार की विजय का प्रतीक है जिसमें धर्म, मर्यादा, सत्य और न्याय को जीवन का आधार माना गया है। राम और रावण का प्रसंग भारतीय मानस में इसी विजय का प्रमुख प्रतीक बनकर उपस्थित होता है। लेकिन रामायण को केवल अच्छाई और बुराई की एक सरल कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यदि हम इसे केव केवल इस रूप में देखें कि एक ओर राम थे और दूसरी ओर रावण, तो हम उस कथा के सबसे महत्वपूर्ण संदेश को सीमित कर देंगे। राम और रावण का प्रसंग मनुष्य के भीतर मौजूद उन प्रवृत्तियों का भी प्रतीक है, जो हर युग में उसके निर्णयों को प्रभावित करती हैं। एक ओर संयम, मर्यादा, कर्तव्य, सत्य और लोकमंगल की चेतना है, तो दूसरी ओर अहंकार, लोभ, क्रोध, स्वार्थ और अधिकार के दुरुपयोग की प्रवृत्ति। इस अर्थ में रामायण केवल अतीत की कथा नहीं है बल्कि वह मनुष्य के वर्तमान और भविष्य से भी संवाद करती है।
रावण अत्यंत विद्वान था। परंपरा में उसे महान तपस्वी, शक्तिशाली शासक और अनेक विद्याओं का ज्ञाता बताया गया है। उसके पास सामर्थ्य था, संसाधन थे, वैभव था और अपनी प्रतिभा पर गर्व करने का पर्याप्त कारण भी था। लेकिन उसकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसकी शक्ति उसके विवेक से बड़ी होती चली गई। ज्ञान उसके पास था, लेकिन ज्ञान से उत्पन्न विनम्रता नहीं थी। सामर्थ्य था, लेकिन उस सामर्थ्य पर संयम नहीं था। अधिकार था, लेकिन अधिकार के साथ जुड़ा उत्तरदायित्व कमजोर पड़ गया था। परिणाम यह हुआ कि जिस शक्ति का उपयोग लोककल्याण के लिए हो सकता था, वही शक्ति विनाश का कारण बन गई।
यहीं विजयादशमी का एक गहरा संदेश छिपा है कि क्या केवल सामर्थ्य पर्याप्त है? उत्तर है नहीं। सामर्थ्य के साथ विवेक आवश्यक है। ज्ञान के साथ विनम्रता आवश्यक है। सत्ता के साथ उत्तरदायित्व आवश्यक है। सफलता के साथ संवेदनशीलता आवश्यक है। अन्यथा उपलब्धियाँ मनुष्य को ऊँचा उठाने के बजाय उसके भीतर अहंकार को बढ़ाने लगती हैं। आज का संसार विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व सामर्थ्य प्राप्त कर चुका है। मनुष्य के पास ऐसी तकनीक है जो कुछ क्षणों में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक सूचना पहुँचा सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल संचार ने मानव जीवन की संभावनाओं को व्यापक बनाया है। लेकिन जैसे-जैसे हमारी शक्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे एक प्रश्न भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि क्या हमारी नैतिक चेतना भी उसी गति से विकसित हो हो रही है? यही प्रश्न विजयादशमी को आधुनिक समय के लिए प्रासंगिक बनाता है।
शक्ति अपने आप में न तो अच्छी होती है, न बुरी। उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। एक ही तकनीक किसी के जीवन को बचाने का माध्यम बन सकती है और किसी दूसरे के हाथों विनाश का साधन। धन किसी परिवार को आत्मनिर्भर बना सकता है, लेकिन वही धन लोभ का कारण भी बन सकता है। सत्ता समाज में व्यवस्था और न्याय स्थापित कर सकती है, लेकिन यदि उसमें उत्तरदायित्व का अभाव हो जाए तो वही सत्ता शोषण का माध्यम बन सकती है। ज्ञान मनुष्य को मुक्त कर सकता है, लेकिन यदि उसमें अहंकार जुड़ जाए तो वही ज्ञान दूसरों को छोटा समझने का कारण बन सकता है इसलिए भारतीय चिंतन में विजय केवल बाहरी शक्ति से प्राप्त परिणाम नहीं है। वास्तविक विजय उस स्थिति को कहा जा सकता है, जहाँ मनुष्य अपनी शक्ति को मर्यादा में रखकर उसका उपयोग बड़े उद्देश्य के लिए करता है।
राम का चरित्र इसी संतुलन का प्रतीक बनता है। रामकथा में संघर्ष है, लेकिन संघर्ष के बीच मर्यादा भी है। कठिन परिस्थितियाँ हैं, लेकिन उनके बीच कर्तव्यबोध भी है। व्यक्तिगत पीड़ा है, लेकिन उसके ऊपर व्यापक उत्तरदायित्व की भावना दिखाई देती है। यही कारण है कि राम का चरित्र केवल विजय प्राप्त करने वाले योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि मर्यादा और धर्मबुद्धि के प्रतीक के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
विजयादशमी का संदेश हमें यह समझाता है कि जीवन में हर विजय का मूल्य इस बात से तय होता है कि वह किस प्रकार प्राप्त की गई और उसके बाद उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया गया। यदि विजय के बाद अहंकार जन्म ले ले, तो वह विजय लंबे समय तक टिक नहीं सकती। यदि सफलता के बाद मनुष्य दूसरों परी को को तुच्छ समझने लगे, तो सफलता उसके व्यक्तित्व को समृद्ध करने के बजाय उसे भीतर से कमजोर करने लगती है। इसलिए विजय के साथ विनम्रता का होना उतना ही आवश्यक है जितना संघर्ष के समय साहस का।
हमारे समय की चुनौतियाँ भी किसी रावण से कम जटिल नहीं हैं। आज रावण केवल किसी कथा का पात्र नहीं है। वह हमारे भीतर और हमारे आसपास मौजूद अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीक बन सकता है। जब अहंकार हमें अपनी गलती स्वीकार करने से रोकता है, तब हमारे भीतर का रावण सक्रिय होता है। जब लोभ आवश्यकता से अधिक पाने की बेचैनी पैदा करता है, तब वही प्रवृत्ति सामने आती है। जब क्रोध विवेक को ढक देता है, जब असत्य को सुविधा के लिए स्वीकार कर लिया जाता है, जब स्वार्थ के सामने संबंध और सामाजिक उत्तरदायित्व छोटे पड़ जाते हैं, तब भी हम उसी संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं जिसे विजयादशमी प्रतीकात्मक रूप से हमारे सामने रखती है।
इस दृष्टि से विजयादशमी किसी दूसरे के दोष खोजने का पर्व नहीं है। यह स्वयं के भीतर देखने का पर्व है। हम प्रायः रावण के दस सिरों को देखकर यह सोचते हैं कि वे किसी बाहरी दुष्टता का प्रतीक हैं। लेकिन यदि हम इसे आत्मचिंतन के रूप में देखें तो वे हमारे भीतर मौजूद अनेक कमजोरियों की ओर संकेत कर सकते हैं। क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ, असत्य, हिंसा, आलस्य और असंयम जैसी प्रवृत्तियाँ मनुष्य के व्यक्तित्व को भीतर से कमजोर कर सकती हैं। हर व्यक्ति के भीतर इनका स्तर अलग हो सकता है, लेकिन संघर्ष सभी के जीवन में किसी न किसी रूप में उपस्थित रहता है। यही कारण है कि विजयादशमी का सबसे सार्थक संकल्प शायद यह नहीं कि हम किसी दूसरे को बदलेंगे, बल्कि यह कि हम स्वयं में परिवर्तन की शुरुआत करेंगे।
यदि कोई व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण पाने का संकल्प लेता है, तो वह अपने भीतर एक विजय की शुरुआत करता है। यदि कोई अपने व्यवहार में असत्य को कम करने का निर्णय लेता है, तो वह एक विजय की ओर बढ़ता है। यदि कोई अपने परिवार के प्रति अधिक जिम्मेदार बनने का प्रयास करता है, तो यह भी विजय है। यदि कोई अपने समय का सही उपयोग करने, अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने, अपने ज्ञान को बढ़ाने और समाज के लिए कुछ करने का निर्णय लेता है, तो यह भी विजय का ही रूप है क्योंकि विजय हमेशा रणभूमि में नहीं होती। कई बार सबसे कठिन युद्ध हमारे भीतर चलता है।
अपने क्रोध को रोक लेना किसी बहस को जीतने से बड़ी विजय हो सकती है। अपने अहंकार को पीछे रखकर किसी योग्य व्यक्ति की प्रशंसा कर देना एक बड़ी विजय हो सकती है। अपनी सुविधा छोड़कर किसी जरूरतमंद की सहायता करना एक बड़ी विजय हो सकती है। गलत रास्ता आसान होने के बावजूद सही रास्ते को चुनना भी विजय है। इस अर्थ में विजयादशमी हमें बाहरी संसार से पहले अपने भीतर के संसार को व्यवस्थित करने का अवसर देती है। भारतीय परंपरा में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं माना गया। धर्म को कर्तव्य, मर्यादा, सत्य और उचित आचरण से भी जोड़ा गया है। इसलिए अधर्म पर विजय का अर्थ केवल किसी शत्रु को पराजित करना नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाना भी है जो व्यक्ति और समाज के संतुलन को बिगाड़ती हैं। आज जब समाज अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रहा है, तब यह विचार और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, लेकिन उसके साथ सहयोग की आवश्यकता भी बढ़ रही है। सूचना की गति बढ़ रही है, लेकिन विवेक की आवश्यकता उससे भी अधिक बढ़ रही है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विस्तार हो रहा है, लेकिन उसके साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हम जितने शक्तिशाली होते जाएँ, उतने ही जिम्मेदार भी होना पड़ेगा। यही शक्ति और मर्यादा का संबंध है।
पुतला जलाने की परंपरा अपने आप में एक प्रतीक है। आग में जलता हुआ पुतला हमें यह दृश्य दिखाता है कि अहंकार और अधर्म का अंत संभव है। लेकिन यदि उस दृश्य के बाद हमारा जीवन वैसा ही बना रहे, तो उत्सव केवल बाहरी प्रदर्शन बनकर रह जाता है। पुतला बाहर जलता है, लेकिन यदि भीतर का अहंकार जस का तस रह जाए, तो विजय का अर्थ अधूरा रह जाता है। इसलिए विजयादशमी का सबसे सुंदर रूप वह हो सकता है जिसमें हम उत्सव के साथ आत्ममंथन भी करें।
हम स्वयं से पूछें - इस वर्ष मैंने अपने भीतर क्या बदला? क्या में पहले से अधिक संयमी हुआ? क्या मैंने अपने परिवार के लिए अधिक समय निकाला? क्या मैंने किसी के प्रति अनावश्यक क्रोध कम किया? क्या मैंने अपने ज्ञान को बढ़ाया? क्या मैंने किसी जरूरतमंद की सहायता की? क्या मैंने अपने समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभाया? इन प्रश्नों के उत्तर ही हमारी व्यक्तिगत विजय की दिशा तय कर सकते हैं।
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राष्ट्रनीति

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