नारी शक्ति : सम्मान से आगे, समान अवसर और नेतृत्व की ओर - गीतिका वेदिका
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भारतीय संस्कृति में नारी को केवल परिवार की एक सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की मूल शक्ति के रूप में देखने की परंपरा रही है। हमारे सांस्कृतिक मानस में माँ, मातृभूमि और मातृभाषा - तीनों के साथ ‘माँ’ का भाव जुड़ा हुआ है। यही वह दृष्टि है जिसमें ज्ञान की अधिष्ठात्री सरस्वती हैं, समृद्धि की प्रतीक लक्ष्मी हैं और शक्ति तथा साहस की आराध्या दुर्गा हैं। नवरात्रि में देवी के विभिन्न स्वरूपों की उपासना इसी व्यापक सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति है।
भारतीय परंपरा में नारी को शक्ति कहना केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं है। यह इस विश्वास को व्यक्त करता है कि सृष्टि, परिवार, समाज और संस्कृति के निर्माण में नारी की भूमिका मूलभूत है। वह जन्म देती है, पालन करती है, संस्कार देती है, कठिन परिस्थितियों में परिवार को संभालती है और अनेक बार स्वयं संघर्ष करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते बनाती है लेकिन किसी समाज की वास्तविक प्रगति केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि वह नारी की पूजा कितनी करता है। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि वह नारी को जीवन जीने, सीखने, आगे बढ़ने और निर्णय लेने के कितने अवसर देता है। किसी महिला के सम्मान की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति उसके प्रति व्यवहार में दिखाई देती है - घर में, विद्यालय में, कार्यस्थल पर, सार्वजनिक जीवन में और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में।
नारी का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी गरिमा की रक्षा में होना चाहिए। उसकी सुरक्षा केवल कानूनों का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कारों का भी विषय है। उसकी शिक्षा केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि परिवार और समाज के भविष्य में निवेश है। उसका स्वास्थ्य केवल उसका निजी विषय नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न है। और उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं, बल्कि परिवार के निर्णयों और सामाजिक भागीदारी में उसकी क्षमता को भी बढ़ाती है।
इतिहास के पृष्ठों में झाँके तो भारत देश में ऐसी अनेक विदुषी और वीरांगनाओं के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने अपने समय की सीमाओं को चुनौती देते हुए समाज और राष्ट्र के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षा, साहित्य, दर्शन, शासन, समाजसेवा और संघर्ष - विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी प्रतिभा और नेतृत्व का प्रभावशाली परिचय दिया। इन उदाहरणों को केवल गौरवगाथा के रूप में स्मरण करना पर्याप्त नहीं है। उनसे यह प्रेरणा भी लेनी चाहिए कि प्रतिभा और नेतृत्व का अवसर लिंग के आधार पर सीमित नहीं होना चाहिए।
आज भारत की स्त्रियाँ उन क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बना रही हैं जिन्हें कभी मुख्यतः पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। विज्ञान और तकनीक से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान तक, खेल से लेकर सेना तक, उद्योग से लेकर प्रशासन और शिक्षा से लेकर कला एवं साहित्य तक महिलाओं की भागीदारी लगातार दिखाई दे रही है। यह परिवर्तन केवल महिलाओं की उपलब्धि नहीं है अपितु यह पूरे समाज की क्षमता के विस्तार का संकेत है। जब किसी बालिका को शिक्षा मिलती है, तो केवल एक व्यक्ति शिक्षित नहीं होता। उसके ज्ञान का प्रभाव परिवार तक पहुँचता है और कई बार आने वाली पीढ़ियों तक दिखाई देता है। जब कोई स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती है, तो उसके निर्णयों में आत्मविश्वास आता है और परिवार की आर्थिक क्षमता की बढ़ोत्तरी होती है। जब कोई महिला नेतृत्व की भूमिका में आती है, तो उसके अनुभव समाज के निर्णयों में नूतन दृष्टिकोण जोड़ सकते हैं। अतः नारी सशक्तिकरण को केवल सहायता या संरक्षण के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सशक्तिकरण का अर्थ है - अवसर, शिक्षा, सुरक्षा, सम्मान और निर्णय की क्षमता। किसी महिला को सक्षम बनाने का अर्थ उसके स्थान पर निर्णय लेना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन और प्रतिभा के बारे में निर्णय लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता और अवसर देना है।
परिवार इस परिवर्तन की पहली पाठशाला है। यदि घर में बेटे और बेटी के बीच अवसरों का अंतर रखा जाता है, तो समाज में समानता की अपेक्षा करना कठिन होगा। बेटी को शिक्षा, खेल, तकनीक, विज्ञान, कला और नेतृत्व - हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। साथ ही बेटों को भी यह संस्कार मिलना चाहिए कि सम्मान किसी विशेष अवसर पर किया जाने वाला व्यवहार नहीं, बल्कि दैनिक-जीवन के जीवन का हिस्सा है।
नारी शक्ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष मातृत्व और परिवार की भूमिका भी है। आधुनिकता का अर्थ परिवार और मातृत्व को कमतर समझना नहीं है। उसी प्रकार परिवार के दायित्व निभाने वाली महिला की भूमिका को केवल ‘घर तक सीमित’ मान लेना भी उचित नहीं है। महिला अपने जीवन की प्राथमिकताओं और परिस्थितियों के अनुसार परिवार, जीवनवृत्ति, समाज और सार्वजनिक जीवन में अलग-अलग भूमिकाएँ निभा सकती है। प्रत्येक महिला की परिस्थितियाँ और आकांक्षाएँ अलग हो सकती हैं और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। हमें यह भी समझना होगा कि नारी शक्ति का अर्थ पुरुष के विरोध में खड़ा होना नहीं है। स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धी खाँचों में बाँटकर समाज की शक्ति नहीं बढ़ाई जा सकती। परिवार और समाज सहयोग से आगे बढ़ते हैं। नारी की क्षमता को अवसर देना पुरुष की भूमिका को कम करना नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक क्षमता को बढ़ाना है। वास्तविक समानता का अर्थ यह भी नहीं कि स्त्री और पुरुष हर परिस्थिति में एक जैसे हों। दोनों की अपनी विशिष्टताएँ, अनुभव और जीवन-परिस्थितियाँ हो सकती हैं। समानता का मूल अर्थ है - सम्मान में समानता, अवसर में न्याय और अधिकारों में गरिमा।
नारी की सुरक्षा के प्रश्न पर भी समाज को केवल प्रतिक्रियात्मक दृष्टि से आगे बढ़ना होगा। विधिक पक्ष आवश्यक हैं, लेकिन मात्र विधिक नियमावली पर्याप्त नहीं होते। घर और विद्यालय से शुरू होने वाले संस्कार, सार्वजनिक स्थानों पर दायित्वपूर्ण व्यवहार, कार्यस्थलों पर सुरक्षित वातावरण और महिलाओं के प्रति सम्मानपूर्ण सामाजिक दृष्टि - ये सभी मिलकर सुरक्षित समाज का निर्माण करते हैं।
आज डिजिटल युग ने महिलाओं के लिए अनेक नए अवसर खोले हैं। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल उद्यमिता, दूरस्थ कार्य और तकनीकी प्लेटफॉर्म ने अनेक महिलाओं को अपने कौशल का उपयोग करने के नए रास्ते दिए हैं। लेकिन इसके साथ डिजिटल सुरक्षा, निजता और ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। इसलिए आधुनिक नारी सशक्तिकरण में डिजिटल साक्षरता और सुरक्षा भी महत्वपूर्ण विषय बन गए हैं।
नारी की शक्ति केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं है। वह समाज की संवेदनशीलता को भी प्रभावित करती है। जब महिलाएँ निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक सक्रिय होती हैं, तो परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे विषयों पर अनुभवों की विविधता सामने आती है। किसी भी समाज के लिए यह विविधता उसकी निर्णय क्षमता को व्यापक बना सकती है।
नवरात्रि में जब हम माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हैं, तब यह स्मरण करना उपयोगी होगा कि देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाना और वास्तविक जीवन में महिलाओं की गरिमा का सम्मान करना - दो अलग-अलग बातें नहीं होनी चाहिए। पूजा और व्यवहार के बीच जितनी अधिक समानता होगी, हमारी सांस्कृतिक चेतना उतनी ही अधिक सार्थक होगी। यदि हम देवी को शक्ति का प्रतीक मानते हैं, तो हमें समाज की वास्तविक महिलाओं की शक्ति को भी पहचानना होगा। वह शक्ति कभी माँ के धैर्य में दिखाई देती है, कभी बेटी के सपनों में, कभी विद्यार्थी की मेहनत में, कभी वैज्ञानिक की खोज में, कभी खिलाड़ी के संघर्ष में, कभी सैनिक के साहस में और कभी उस सामान्य स्त्री के मौन परिश्रम में, जिसकी भूमिका के बिना परिवार और समाज की व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। इसलिए नारी शक्ति का प्रश्न केवल महिलाओं का प्रश्न नहीं है। यह पूरे समाज के विकास का प्रश्न है। जिस समाज की आधी जनसंख्या अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाती, वह अपनी कुल क्षमता का भी पूर्ण उपयोग नहीं कर सकता।
आज आवश्यकता ऐसी दृष्टि की है जो नारी को केवल संरक्षण की आवश्यकता रखने वाली नहीं, बल्कि स्वयं निर्णय लेने और नेतृत्व करने में सक्षम नागरिक के रूप में देखे। ऐसी दृष्टि की, जो बेटी के जन्म को उत्सव माने, उसकी शिक्षा को प्राथमिकता दे, उसके सपनों को सम्मान दे और उसे अपने जीवन का रास्ता चुनने का अवसर दे। ऐसी दृष्टि की, जिसमें पत्नी केवल परिवार की जिम्मेदारियों की साझीदार न हो, बल्कि उसके विचारों और निर्णयों को भी समान महत्व मिले। ऐसी दृष्टि की, जिसमें माँ के त्याग को सम्मान मिले, लेकिन उसके अपने व्यक्तित्व और आकांक्षाओं को भी स्थान मिले।
नवरात्रि हमें शक्ति की आराधना का अवसर देती है। लेकिन आराधना का अर्थ केवल दीप, धूप और मंत्र तक सीमित नहीं होना चाहिए। आराधना का एक अर्थ यह भी है कि हम जिस मूल्य को पूजते हैं, उसे अपने जीवन में उतारें। यदि हम दुर्गा में शक्ति देखते हैं, तो हर बेटी में संभावना की शक्ति देखें। यदि हम सरस्वती में ज्ञान देखते हैं, तो हर बालिका की शिक्षा को महत्व दें! यदि हम लक्ष्मी में समृद्धि देखते हैं, तो महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को अवसर दें और यदि हम नारी को शक्ति कहते हैं, तो उसके सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को व्यवहार में भी स्वीकार करें! किसी समाज की वास्तविक शक्ति इस बात में दिखाई देती है कि वह अपनी स्त्रीशक्ति को कितना सम्मान, अवसर और विश्वास देता है। नारी को शक्ति मानने की हमारी सनातन परंपरा तभी जीवंत रहेगी, जब वह केवल पूजा के मंच पर नहीं, बल्कि परिवार के व्यवहार, समाज की सोच और राष्ट्र के निर्णयों में भी दिखाई दे क्योंकि नारी को अवसर देना केवल नारी को आगे बढ़ाना नहीं है बल्कि यह समाज की आधी शक्ति को जागृत करना है और जब समाज की आधी शक्ति जागृत होती है, तब राष्ट्र की पूरी शक्ति नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ लौ को उच्च निर्धूम शिखर देगी!
न गृहं गृहमित्याहुः, गृहिणी गृहमुच्यते। गृहं गृहसुतानां हि गृहिणी विना ॥इति!
न गृहं गृहमित्याहुः, गृहिणी गृहमुच्यते। गृहं गृहसुतानां हि गृहिणी विना ॥
इति!
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राष्ट्रनीति


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