ग्वालियर में मराठा साम्राज्य के जनक - बाजीराव पेशवा

१. बाजीराव पेशवा प्रथम का स्मरण इतिहास, कई सारी महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन का गवाह रहा है। अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ...




१. बाजीराव पेशवा प्रथम का स्मरण
इतिहास, कई सारी महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन का गवाह रहा है। अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ने दूसरों द्वारा अपने को नष्ट करने के लिए किये गये विभिन्न आक्रमणों और प्रयासों को सहा है। यद्यपि इसके चलते इसने वीरों और योद्धाओं की एक लंबी शृंखला उत्पन्न की है, जो दूसरी प्राचीन सभ्यताओं से अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए समय-समय पर उठ खड़े हुए हैं। भारत के इतिहास में एक ऐसे ही महान योद्धा और हिंदू धर्म के संरक्षक के रूप में प्रख्यात नाम है- १८वीं शताब्दी में उत्पन्न बाजीराव पेशवा।


२. श्रीमन्त बाजीराव पेशवा (१८ अगस्त १६९९ – २८ अप्रिल १७४०)
विजयनगर राज्य के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा व्यवस्थित तरीके से स्थापित हिंदू पद पादशाही के अंतर्गत हिंदू राज्य का पुनर्जन्म हुआ, जिसने पेशवाओं के समय में एक व्यापक आकार ले लिया।
तलवारबाजी में दक्ष, निपुण घुड़सवार, सर्वोत्तम रणनीतिकार और नेता के रूप में प्रख्यात बाजीराव प्रथम ने मात्र बीस वर्ष की आयु में अपने पिता से उत्तराधिकार में पेशवा का दायित्व ग्रहण किया और जिसने अपने शानदार सैन्य जीवन द्वारा हिंदूस्थान के इतिहास में एक विशेष स्थान बना लिया।
महान मराठा सेनापति और राजनीतिज्ञ पेशवा बाजीराव ने १८वीं शताब्दी के मध्य में अपने कार्यों से भारत का मानचित्र ही बदल दिया। उनके सैन्य अभियान उनकी बुद्धिमता के अद्वितीय उदाहरण हैं। औरंगजेब के बाद लड़खड़ा रहे मुगलों द्वारा जारी धार्मिक असहिष्णुता का विध्वंस करने के लिए बाजीराव उठ खड़े हुए और हिंदूत्व के एक नायक के रूप में मुगल शासकों के हमले से हिंदू धर्म की रक्षा की।
यह वही थे जिन्होंने महाराष्ट्र से परे विंध्य के परे जाकर हिंदू साम्राज्य का विस्तार किया और जिसकी गूँज कई सौ वर्षों से भारत पर राज कर रहे मुगलों की राजधानी दिल्ली के कानों तक पहुँच गयी। हिंदू साम्राज्य का निर्माण इसके संस्थापक शिवाजी द्वारा किया, जिसे बाद में बाजीराव द्वारा विस्तारित किया गया, और जो उनकी मृत्यु के बाद उनके बीस वर्षीय पुत्र के शासन काल में चरम पर पहुँचा दिया गया। पंजाब से अफगानों को खदेड़ने के बाद उनके द्वारा भगवा पताका को न केवल अटक की दीवारों पर अपितु उससे कहीं आगे तक फहरा दिया गया।
इस प्रकार बाजीराव का नाम भारत के इतिहास में हिंदू धर्म के एक महान योद्धा और सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक के रूप अंकित हो गया। वह एक प्रख्यात सेनापति थे जिन्होंने मराठों के चतुर्थ सम्राट छत्रपति शाहू के पेशवा (प्रधानमंत्री) के रूप में अपनी सेवा प्रदान की।


३. बाजीराव का जन्म और उनका प्रारंभिक जीवन
"पेशवा" पद को एक नई उँचाई तक ले जाने वाले बालाजी विश्वनाथ राव के सबसे बड़े पुत्र के रूप में बाजीराव का जन्म १८ अगस्त १७०० ई. को हुआ था। वह कोंकण क्षेत्र के प्रतिष्ठित और पारंपरिक चितपावन ब्राह्मण परिवार से थे। बालाजी विश्वनाथ (बाजीराव के पिता) यद्यपि पेशवाओं में तीसरे थे लेकिन जहाँ तक उपलब्धियों की बात है, वे अपने पूर्ववर्तियों से काफी आगे निकल गये थे।

इस प्रकार बाजीराव जन्म से ही समृद्ध विरासत वाले थे। बाजीराव को उन मराठा अश्वारोही सेना के सेनापतियों द्वारा भली प्रकार प्रशिक्षित किया गया था, जिन्हें २७ वर्ष के युद्ध का अनुभव था। माता की अनुपस्थिति में किशोर बाजीराव के लिए उनके पिता ही सबसे निकट थे, जिन्हें राजनीति का चलता-फिरता विद्यालय कहा जाता था। अपनी किशोरावस्था में भी बाजीराव ने शायद ही अपने पिता के किसी सैन्य अभियान को नजदीक से न देखा हो। इसके चलते बाजीराव को सैन्य विज्ञान में परिपक्वता हासिल हो गई। बाजीराव के जीवन में पिता बालाजी की भूमिका वैसी ही थी, जैसी छत्रपति शिवाजी के जीवन में माता जीजाबाई की।
१७१६ में महाराजा शाहू जी के सेनाध्यक्ष दाभाजी थोराट ने छलपूर्वक पेशवा बालाजी को गिरफ्तार कर लिया। बाजीराव ने तब अपने गिरफ्तार पिता का ही साथ चुना, जब तक कि वह कारागार से मुक्त न हो गए। बाजीराव ने अपने पिता के कारावास की अवधि के दौरान दी गई सभी यातनाओं को अपने ऊपर भी झेला। उसके (दाभाजी के) छल से दो-चार होकर इन्हें (बाजीराव को) एक नया अनुभव प्राप्त हुआ।
कारावास के बाद के अपने जीवन में बालाजी विश्वनाथ ने मराठा-मुगल संबंधों के इतिहास में नया आयाम स्थापित किया। किशोर बाजीराव उन सभी विकासों के चश्मदीद गवाह थे। १७१८ ई. में उन्होंने अपने पिता के साथ दिल्ली की यात्रा की। राजधानी में उनका सामना अकल्पनीय षडयंत्रों से हुआ, जिसने उन्हें शीघ्र ही राजनीतिक साजिशों के कुटिल रास्ते पर चलना सिखा दिया। यह और अन्य दूसरे अनुभवों ने उनकी युवा ऊर्जा, दूरदृष्टि और कौशल को निखारने में अत्यन्त सहायता की, जिसके चलते उन्होंने उस स्थान को पाया जिसपर वह पहुँचना चाहते थे। वह एक स्वाभाविक नेता थे, जो अपना उदाहरण स्वयं स्थापित करने में विश्वास रखते थे। युद्ध क्षेत्र में घोड़े को दौड़ाते हुए मराठों के अत्यधिक वर्तुलाकार दंडपट्ट तलवार का प्रयोग करते हुए अपने कौशल द्वारा अपनी सेना को प्रेरित करते थे।

४. पेशवा (प्रधानमंत्री) के रूप में बाजीराव
२ अप्रिल १७१९ को पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने अपनी अंतिम साँसे ली। तब सतारा शाही दरबार में एकत्रित विभिन्न मराठा शक्तियों के जेहन में केवल एक ही प्रश्न बार-बार आ रहा था कि क्या मृतक पेशवा का मात्र १९ वर्षीय गैर-अनुभवी पुत्र बाजीराव इस सर्वोच्च पद को सँभाल पाएगा? वहाँ इस बात को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचनाओं का दौर चल रहा था कि क्या इतने अल्प वयस्क किशोर को यह पद दिया जा सकता है?
मानवीय गुणों की परख के महान जौहरी महाराजा शाहू ने इस प्रश्न का उत्तर देने में तनिक भी देर नहीं लगाई। उन्होंने तुरंत ही बाजीराव को नया पेशवा नियुक्त करने की घोषणा कर दी। इस घोषणा को शीघ्र ही एक शाही समारोह में परिवर्तित कर दिया गया। वह १७ अप्रिल १७१९ का दिन था जब बाजीराव को शाही औपचारिकताओं के साथ पेशवा का पद प्रदान किया गया। उन्हें (बाजीराव को) यह उच्च प्रतिष्ठित पद आनुवंशिक उत्तराधिकार या उनके स्वर्गीय पिता के द्वारा किये गये महान कार्यों के फलस्वरूप नहीं दिया गया, अपितु उनकी राजनैतिक दूरदर्शिता से युक्त दृढ़ मानसिक और शारीरिक संरचना के कारण सौपा गया। इसके बावजूद भी कुछ कुलीन जन और मंत्री थे, जो बाजीराव के खिलाफ अपने ईर्ष्या को छुपा नहीं पा रहे थे। बाजीराव ने राजा के निर्णय के औचित्य को गलत ठहराने का एक भी अवसर अपने विरोधियों को नहीं दिया, और इस प्रकार अपने विरोधियों का मुँह को बंद करने में वह सफल रहे।


५. पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में हिंदू साम्राज्य का विस्तार
बाजीराव ने शीघ्र ही यह महसूस किया कि सामंतवादी शक्तियों में विभाजन की प्रवृत्ति व्यापक रूप से उपस्थित है, अतः राजा और राज्य के सम्मान को इन केंद्रापसारी शक्तियों से दूर रखने की आवश्यकता है। और तभी ही हिंदू पद पादशाही के विस्तार को सुनिश्चित किया जा सकता है। बाजीराव की यथार्थवादी अंतर्दृष्टि अभूतपूर्व थी। वह अपने आसपास के प्रतिकूल परिवेश से भलीभाँति परिचित थे। विंध्य के पार उत्तर में हिंदू पद पादशाही के विशाल विस्तार पर आधारित हिंदू साम्राज्य की सुरक्षा के प्रयोजन से भीतरी शत्रुओं सहित मुगल सुल्तान के प्रतिनिधि निजाम, जंजीरा के आतंकवादी सिद्दी और डरावने पुर्तगालियों ने उनसे तत्काल प्रभावकारी उपाय करने की याचना की।
बाजीराव का यह मानना था कि यदि शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य या "हिंदू पद पादशाही" के उदात्त स्वप्न को पूरा करना है तो सातारा और कोल्हापुर के दोनों मराठा धड़ों को आपस में मिलाना आवश्यक है। जब बाजीराव ने यह महसूस किया कि कोल्हापुर धड़े को उनकी यह बात अस्वीकार है तो उन्होंने अपने लक्ष्य को बिना उनकी सहायता के पाने का निश्चय किया। हिंदवी स्वराज्य के अपने इस स्वप्न को पूरा करने के लिए बाजीराव का मस्तिष्क बहुत तेजी से चल रहा था, और उन्होंने यह निश्चय किया कि अपने इन विचारों को छत्रपति शाहू के दरबार में रखा जाए।
शाहू महाराज और उनके दरबार के सामने एकदम सीधा, तैयारी और आत्मविश्वास के साथ खड़ा होते हुए नया पेशवा युवा बाजीराव मजबूत आवाज में बोला- "आईए, हम बंजर दक्कन को पार कर मध्य भारत को जीत लें। इस समय मुगल कमजोर, धृष्ट, व्यभिचारी और अफीम-नशेड़ी हो चुके हैं। सदियों से उत्तर के तहखाने में संचित धन-संपदा अब हमारी हो सकती है। यह उपयुक्त समय है जब हम अपनी पवित्र मातृभूमि भारतवर्ष से इन म्लेच्छों और बर्बरों को बाहर निकाल सकते हैं। आईए, इन्हें हिमालय से आगे वहाँ फेंक दें, जहाँ से यह आये थे। निश्चय ही, भगवा ध्वज कृष्णा से सिन्धु नदी तक फहराएगा। अब हिन्दूस्थान हमारा है।"
दरबार के प्रतिनिधियों ने इस पर विचार करते हुए यह परामर्श दिया कि हमें सबसे पहले दक्कन पर ध्यान देना चाहिए लेकिन बाजीराव ने अपनी मूल योजना के कार्यान्वयन पर बल दिया।
एकटक नजर से शाहू महाराज की तरफ देखते हुए उन्होंने कहा, "पेड़ के तने को काटने से उसकी डालियाँ अपने आप गिर जाएँगी। आप हमारी बात पर ध्यान दीजिए, मैं और मेरे लोग अटक के दीवार पर अवश्य ही भगवा पताका फहराकर रहेंगे।"

छत्रपति शाहू महाराज उनसे बहुत प्रभावित हुए और कहा, "आगे बढ़ें और धरती के स्वर्ग हिमालय तक अपनी भगवा पताका फहराएँ" और इस तरह वीर योद्धा पेशवा को अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ने की अनुमति दे दी।
यह कहानी बाजीराव की दूरदृष्टि और उन पर शाहू महाराज के विश्वास को दर्शाती है। शाहू महाराज ने किशोर वय में ही उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए और १७०७ में समाप्त हुए मुगल-मराठा संघर्ष में बाजीराव के नेतृत्व वाली विजयी और पराक्रमी शाही सेना पर विश्वास करते हुए बाजीराव को पेशवा के रूप में नियुक्त किया। बाजीराव की महान सफलता में, उनके महाराज का उचित निर्णय और युद्ध की बाजी को अपने पक्ष में करने वाले उनके अनुभवी सैनिकों का बड़ा योगदान था। इस प्रकार उनके निरंतर के विजय अभियानों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मराठा सेना की वीरता का लोहा मनवा दिया जिससे शत्रु पक्ष मराठा सेना का नाम सुनते ही भय व आतंक से ग्रस्त हो जाता था।
बाजीराव लगातार बीस वर्षों तक उत्तर की तरफ बढ़ते रहे, प्रत्येक वर्ष उनकी दूरी दिल्ली से कम होती जाती थी और मुगल साम्राज्य के पतन का समय नजदीक आता जा रहा था। यह कहा जाता है कि मुगल बादशाह उनसे इस हद तक आतंकित हो गया था कि उसने बाजीराव से प्रत्यक्षतः मिलने से इंकार कर दिया था और उनकी उपस्थिति में बैठने से भी उसे डर लगता था। मथुरा से लेकर बनारस और सोमनाथ तक हिन्दुओं के पवित्र तीर्थयात्रा के मार्ग को उनके द्वारा शोषण, भय व उत्पीड़न से मुक्त करा दिया गया था।
बाजीराव का विजय अभियान १७२३ में उत्तर-पश्चिम में मालवा और गुजरात को जीतने से प्रारंभ हुआ। बाजीराव ने गुजरात और मध्य भारत के अधिकांश क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और यहां तक कि दिल्ली पर आक्रमण करके मुगल सल्तनत की नींव हिलाकर रख दी। यह बाजीराव ही थे जिन्होंने निरंतर आगे बढ़ते हुए और कई सारे मुगल राज्यों पर कब्जा करके उन्हें अपने आधिपत्य में ले लिया। बाजीराव की राजनीतिक बुद्धिमता उनकी राजपूत नीति में निहित थी। वे राजपूत राज्यों और मुगल शासकों के पूर्व समर्थकों के साथ टकराव से बचते थे, और इस प्रकार उन्होंने मराठों और राजपूतों के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंधों को स्थापित करते हुए एक नये युग का सूत्रपात किया। उन राजपूत राज्यों में शामिल थे- बुंदी, आमेर, डूंगरगढ़, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर इत्यादि। खतरनाक रूप से दिल्ली की ओर बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए सुल्तान ने एक बार फिर पराजित निजाम से सहायता की याचना की। बाजीराव ने फिर से उसे घेर लिया। इस कार्य ने दिल्ली दरबार में बाजीराव की ताकत का एक और अप्रतिम नमूना दिखा दिया।
उन्होंने अपने महाराज की आज्ञा से १७२८ में मराठा साम्राज्य की प्रशासनिक राजधानी सतारा से पुणे स्थापित कर दी।
बाजीराव की सबसे बड़ी सफलता महोबा के नजदीक बुंगश खान को हराना था, जिसे मुगल सेना का सबसे बहादुर सेनापति माना जाता था, और उसे तब परास्त किया जब वह बुंदेलखंड के वृद्ध हिंदू राजा को परेशान कर रहा था। बाजीराव के द्वारा प्रदान की गई इस सैन्य सहायता ने छत्रसाल को हमेशा के लिए उनका आभारी बना दिया।
यह कहा जाता है कि छत्रसाल मोहम्मद खान बुंगश के खिलाफ बचाव की मुद्रा में आ गए थे, तब उन्होंने निम्न दोहे के माध्यम से बाजीराव के पास एक संदेश भेजा था :

जो गति भई गजेंद्र की, वही गति हमरी आज।बाजी जात बुंदेल की, बाजी रखियो लाज ॥

जब बाजीराव को यह संदेश प्राप्त हुआ तब वह अपना भोजन ग्रहण कर रहे थे। वह भोजन छोड़कर तुरंत उठ खड़े हुए और घोड़े पर सवार हो गए। यह देखकर उनकी पत्नी ने कहा कि कम-से-कम आप भोजन तो ग्रहण कर लें और तब जाएँ। तब उन्होंने अपनी पत्नी को उत्तर दिया, "अगर देरी करने से छत्रसाल हार गये तो इतिहास यही कहेगा कि बाजीराव खाना खा रहा था इसलिए देर हो गयी।" वे यह निर्देश देते हुए कुछ सैनिकों को लेकर तुरंत निकल गये कि जितनी जल्दी हो पूरी सेना पीछे से आ जाये। जल्दी ही बुंगश को हरा दिया गया और तब छत्रसाल ने खुश होकर मराठा प्रमुख को अपने राज्य का एक तिहाई हिस्सा प्रदान कर दिया।
बाजीराव के द्वारा मुगल बादशाही को विध्वंसक रूप से तोड़ने और ग्वालियर के सिंधिया राजवंश (रानोजी शिंदे), इंदौर के होल्कर (मल्हार राव), बड़ौदा के गायकवाड़ (पिलजी), और धार के पवार (उदयजी) के रूप में अपने जागीरदार स्थापित करने के द्वारा मराठा राज्यसंघ को भव्य रूप में स्थापित किया गया।
मुगल, पठान और मध्य एशियाई जैसे बादशाहों के महान योद्धा बाजीराव के द्वारा पराजित हुए। निजाम-उल-मुल्क, खान-ए-दुर्रान, मुहम्मद खान ये कुछ ऐसे योद्धाओं के नाम हैं, जो मराठों की वीरता के आगे धराशायी हो गये। बाजीराव की महान उपलब्धियों में भोपाल और पालखेड का युद्ध, पश्चिमी भारत में पुर्तगाली आक्रमणकारियों के ऊपर विजय इत्यादि शामिल हैं।
बाजीराव ने ४१ से अधिक लड़ाइयाँ लड़ीं और उनमें से किसी में भी वह पराजित नहीं हुए। वह विश्व इतिहास के उन तीन सेनापतियों में शामिल हैं, जिसने एक भी युद्ध नहीं हारा। कई महान इतिहासकारों ने उनकी तुलना अक्सर नेपोलियन बोनापार्ट से की है। पालखेड का युद्ध उनकी नवोन्मेषी युद्ध रणनीतियों का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। कोई भी इस युद्ध के बारे में जानने के बाद उनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। भोपाल में निजाम के साथ उनका युद्ध उनकी कुशल युद्ध रणनीतियों और राजनीतिक दृष्टि की परिपक्वता का सर्वोत्तम नमूना माना जाता है। एक उत्कृष्ट सैन्य रणनीतिकार, एक जन्मजात नेता और बहादुर सैनिक होने के साथ ही बाजीराव, छत्रपति शिवाजी के स्वप्न को साकार करने वाले सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।
६. उत्तराधिकार
अप्रिल १७४० में, जब बाजीराव अपने जागीर के अंदर आने वाले खारगाँव के रावरखेडी नामक गाँव में अपनी सेना के साथ कूच करने की तैयारी कर रहे थे, तब वे गंभीर रूप से बीमार हो गये और अंततः नर्मदा के तीर पर २८ अप्रिल १७४० को उनका देहावसान हो गया।
एक प्रख्यात अंग्रेज इतिहासकार सर रिचर्ड कारनैक टेंपल लिखते हैं, "उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था- तंबूओं वाले शिविर में अपने आदमियों के साथ। उन्हें आज भी मराठों के बीच लड़ाकू पेशवा और हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में याद किया जाता है।"
जब बाजीराव ने पेशवा का पद सँभाला था तब मराठों के राज्य की सीमा पश्चिमी भारत के क्षेत्रों तक ही सीमित थी। १७४० में, उनकी मृत्यु के समय यानि २० वर्ष बाद में, मराठों ने पश्चिमी और मध्य भारत के एक विशाल हिस्से पर विजय प्राप्त कर लिया था और दक्षिण भारतीय प्रायद्वीप तक वे हावी हो गये थे। यद्यपि बाजीराव मराठों की भगवा पताका को हिमालय पर फहराने की अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर पाए, लेकिन उनके पुत्र रघुनाथ राव ने १७५७ ई. में अटक के किले पर भगवा ध्वज को फहराकर और सिंधु नदी को पार कर के अपने पिता को स्वप्न को साकार किया।
निरंतर बिना थके २० वर्षों तक हिंदवी स्वराज्य स्थापित करने के कारण उन्हें (बाजीराव को) हिंदू शक्ति के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। उनके पुत्रों ने भगवा पताका को दिग-दिगंत में फहराने के उनके मिशन को जारी रखते हुए १७५८ में उत्तर में अटक के किले पर विजय प्राप्त करते हुए अफगानिस्तान की सीमा को छू लिया, और उसी समय में भारत के दक्षिणी किनारे को भी जीत लिया। लोगों में स्वतंत्रता के प्रति उत्कट अभिलाषा की प्रेरणा द्वारा और आधुनिक समय में हिंदुओं को विजय का प्रतीक बनाने के द्वारा वे धर्म की रचनात्मक और विनाशकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे।
पेशवा बाजीराव प्रथम अपने जीवन काल में महानायक के रूप में प्रख्यात थे और मृत्यु के बाद भी लोगों के मन उनकी यह छवि उसी प्रकार विद्यमान थी। उनकी उपस्थिति हिंदू जन मानस पर अमिट रूप से अंकित हो चुकी है और इसे समय के अंतराल द्वारा भी खंडित नहीं किया जा सकता।


COMMENTS

नाम

अखबारों की कतरन अपराध आंतरिक सुरक्षा इतिहास उत्तराखंड ओशोवाणी कहानियां काव्य सुधा खाना खजाना खेल चिकटे जी तकनीक दुनिया रंगविरंगी देश धर्म और अध्यात्म पर्यटन पुस्तक सार प्रेरक प्रसंग बीजेपी बुरा न मानो होली है भगत सिंह भारत संस्कृति न्यास भोपाल मध्यप्रदेश मनुस्मृति मनोरंजन महापुरुष जीवन गाथा मेरा भारत महान मेरी राम कहानी राजीव जी दीक्षित लेख विज्ञापन विडियो विदेश वैदिक ज्ञान व्यंग व्यक्ति परिचय शिवपुरी संघगाथा संस्मरण समाचार समाचार समीक्षा साक्षात्कार सोशल मीडिया स्वास्थ्य
false
ltr
item
क्रांतिदूत: ग्वालियर में मराठा साम्राज्य के जनक - बाजीराव पेशवा
ग्वालियर में मराठा साम्राज्य के जनक - बाजीराव पेशवा
http://www.switch2life.com/Images/Indian_Heroes/BajiraoPeshwa/3.jpg
क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2014/11/blog-post_29.html
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/2014/11/blog-post_29.html
true
8510248389967890617
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy