जेल की चहारदीवारी में सुकरात का शिष्यों को उपदेश

एथेंस में एक प्रथा थी कि प्रतिवर्ष डेलोस को एक जहाज भेजा जाता था | उसे उन्होंने एक पवित्र मिशन की संज्ञा दी थी | थीसियस द्वारा स्वयं के ...

एथेंस में एक प्रथा थी कि प्रतिवर्ष डेलोस को एक जहाज भेजा जाता था | उसे उन्होंने एक पवित्र मिशन की संज्ञा दी थी | थीसियस द्वारा स्वयं के साथ साथ सात युवकों व सात युवतियों को जहाज द्वारा बचाए जाने की स्मृति में यह जहाज भेजा जाता था | जब तक यह जहाज डेलोस से लौट नही आता था, तब तक किसी को भी मृत्युदण्ड नहीं दिया जाता था | तूफ़ान में फंस जाने के कारण जहाज आने में विलम्ब हुआ और इसके चलते मृत्यु दण्ड मिलने के बाद भी सुकरात को लम्बे समय कारावास में रहकर प्रतीक्षा करना पडी | उस दौरान उनके शिष्य व मित्र उनसे मिलने आते रहे | उनमें मुख्य थे क्रीटो, अपोलोड़ोरस, फ़ीडो, सिबिस, सिम्मियास आदि | प्रस्तुत है उस समय व्यक्त किये गए सुकरात के विचार –

जिसे मनुष्य सुख कहते हैं, वह कितनी अद्भुत चीज है | उसका दुःख के साथ कितना अद्भुत सम्बन्ध है, जो कहने को उसका विपरीत लगता है | जीवन में सुख दुःख कभी एक साथ नहीं आते, किन्तु जब कोई पीछे पड़कर एक को पाने की चेष्टा करता है, तो पीछे पीछे दूसरा भी आता ही है | मानो ये दोनों अलग चीजें न हों, बल्कि एक का सिरा दूसरे से मिला हुआ हो |

देवतागण हमारे अभिभावक हैं और मनुष्य उनकी संपत्ति के भाग हैं | अतः किसी भी व्यक्ति को अपना जीवन नष्ट करने का अधिकार नहीं है | उसे तब तक प्रतीक्षा करनी चाहिए, जब तक कि ईश्वर इसकी जरूरत न समझे |

जो लोग सही ढंग से दर्शनशास्त्र का अध्ययन करते हैं, वे वस्तुतः मरने की क्रिया और मृत्यु का ही अध्ययन करते हैं | आत्मा की शरीर से वियुक्ति ही मृत्यु है | आत्मा का वास्तविक सत्य बुद्धि या युक्ति से ही ज्ञात होता है | दार्शनिक की आत्मा शरीर की अवमानना करती है, उससे परे होकर एकाकी होने की चेष्टा करती है | उसे न भोजन – पानी की लिप्सा होती और न ही यौन सुख व अन्य शारीरिक सुखों की |

आवेग, इच्छा, भय जैसी शारीरिक वृत्तियों के कारण ही युद्ध, गुटबंदी और लड़ाईयां होती हैं, क्योंकि सारे युद्धों का मूल धन प्राप्ति की इच्छा है | क्योंकि हम शरीर की दासता में बंधकर सोचते हैं | नतीजा यह होता है कि हम सत्य की उपलब्धि में समर्थ नहीं होते | यदि हमें विशुद्ध ज्ञान प्राप्त करना है तो हमें शरीर की दासता से मुक्त होना होगा | अब प्रश्न यह उठता है कि यदि सशरीर विशुद्ध ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती, तो दो में से एक बात सही होगी – यातो हम ज्ञान प्राप्त कर ही नहीं सकते और या हम मृत्यु के बाद ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं | अपने जीवनकाल में हम ज्ञान के निकट उसी स्थिति में पहुँच सकते हैं, जब हम शरीर के साथ बहुत जरूरी स्थिति के अलावा किसी प्रकार का सम्बन्ध या संचार न रखें, हम शरीर से वियुक्त व संयमित होकर रहें, जब तक कि ईश्वर स्वयं हमें मुक्त नहीं कर देते |

संयम का अर्थ है अपने आवेगों पर नियंत्रण | इसी प्रकार असंयमित की परिभाषा है – मनुष्य का सुखोपभोग की इच्छा से परिचालन | सुखों के अधीन होना |

मैं अपने जीवन में सही रास्ते पर जा सका या नहीं और सफल हो सका या नहीं, यह थोड़े समय में मालूम कर लूंगा, जब मैं ईश्वर की इच्छा से ही परलोक सिधार जाऊँगा | 

विपर्याय सार्वभौमिक नियम हैं | विभाजन और संगठन, ठंडा और गर्म, इसी प्रकार निद्रा जागरण का विपर्यय है | निद्रा से जागरण की अवस्था उत्पन्न होती है, और जागरण से निद्रा की अवस्था | अब मृत्यु और जीवन के विषय में विचार करें | जिस प्रकार जीवित से मृतक होता है, उसी प्रकार मृतक से जीवित उत्पन्न होता है | मनुष्य अपने जीवन में जो ज्ञान प्राप्त करता है, उसमें से बहुतांश पिछले जन्म के ज्ञान का पुनःस्मरण ही होता है | 

हम मनुष्यगण शरीर और आत्मा से मिलकर बने हैं | शरीर दृश्य है, जबकि आत्मा अदृश्य | जब आत्मा और शरीर संयुक्त होते हैं तो प्रकृति एक को दास तो दूसरे को मालिक बना देती है | आत्मा दिव्य के नजदीक होने से शासक तो नश्वर शरीर दास होता है | दोनों का स्वभाव खोजी होता है | शरीर खोजता है इन्द्रियानुभूति को, जबकि आत्मा की खोज की दिशा होती है – चिरंतन, अनश्वर और अपरिवर्तनीय | आत्मा की इसी स्थिति को ज्ञान कहते हैं | 

किन्तु इसके विपरीत आत्मा जेलखाने रूपी शरीर के सींखचों के अन्दर कैद होकर अज्ञान के अन्धकार में भटकती रहती है, जिसका सबसे भयंकर तत्व होता है वासना | दर्शन शास्त्र का कार्य मुक्ति दिलाना है | आत्मा को यह अनुभव करना कि उसे सुख दुःख की गुलामी में नहीं पड़ना है | 

यदि मृत्यु सभी बातों से मुक्ति होती तो दुष्टों के लिए तो बहुत बड़े वरदान के रूप में होती | क्योंकि मरने के बाद वे अपने शरीर द्वारा की गई दुष्टता से वियुक्त हो जाते | आत्मा तो अम्र है, किन्तु बुराई से उसका एकमात्र त्राण है, अधिक से अधिक पूर्ण और ज्ञानी बनने में | आत्मा परलोक में अपनी शिक्षा और संस्कारों के अतिरिक्त कुछ नहीं ले जाती | और यही बात अंतिम यात्रा में सबसे बड़ा लाभ या हानि है | परलोक का मार्ग न तो सरल है और न एक | सबके मार्ग अलग अलग हैं | 

शिष्यों को उपदेश देने के बाद सुकरात की ह्रदय द्रावक अंतिम यात्रा -

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क्रांतिदूत: जेल की चहारदीवारी में सुकरात का शिष्यों को उपदेश
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