पञ्च पर्वों का पर्व है दीपावली |

दीप और अवली से मिलकर बना है शब्द दीपावली, जिसका अर्थ है दीपकों की पंक्ति । संपूर्ण भारतवर्ष में कार्तिक मास में कृष्‍ण पक्ष की अमावस...



दीप और अवली से मिलकर बना है शब्द दीपावली, जिसका अर्थ है दीपकों की पंक्ति । संपूर्ण भारतवर्ष में कार्तिक मास में कृष्‍ण पक्ष की अमावस्‍या को दीपावली का त्‍यौहार मनाया जाता है ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार सनातन धर्म को मानने वालों द्वारा दीपावली मनाने के कारण-

पहला तो यह कि देवी लक्ष्मी जी कार्तिक मॉस की अमावस्या के दिन ही समुद्र मंथन में से अवतार लेकर प्रकट हुई थी। दूसरा यह कि चौदह वर्षो के वनवास के दौरान भगवान श्री राम, लंका के अत्‍याचारी राजा रावण का वध करके इसी दिन पुन: अयोध्‍या को लौटे और उनके आने की खुशी में पूरे अयोध्‍या में घी के दीए जलाये गए | सम्‍पूर्ण अयोध्‍या को जगमगा दिया गया । उसी दिन से कार्तिक मास की अमावस्‍या को दीवाली के रूप में मनाया जाने लगा।

तीसरी कथा भक्त प्रहलाद से सम्बंधित है | मान्यता है कि दीपावली के ही दिन नृसिंह रूप में विष्‍णु भगवान ने प्रकट होकर हिरणकशिपु को महल के प्रवेश द्वार पर जो न तो घर के भीतर था और न हीं घर के बाहर, गोधूलि बेला में जो न तो दिन था और ना ही रात, नरसिंह रूप में जो आधा मनुष्‍य था और आधा पशु, अर्थात जो न तो पूरी तरह से मनुष्‍य था और न ही पशु हिरणककिशपु को अपनी जंघा पर लिटाकर, जो न तो धरती में था और न ही आसमान में, अपने तीखे लंबे तेज नाखूनों से मारा था जो न तो अस्‍त्र था, न ही कोई शस्‍त्र ।

जिस दिन भगवान विष्‍णु ने हिरणकशिपु का वध किया था, उस दिन को दीवाली के त्‍यौहार के रूप में मनाया जाता है।

इसी प्रकार सिक्ख धर्म के अनुयाई दीपावली इस कारण मनाते हैं, क्योंकि इसी दिन उनके छठवें गुरू हरगोबिन्‍द सिंह जी जेल से रिहा हुए थे। इसी तरह से जैन धर्म के लोग इस त्‍यौहार को इसलिए मनाते हैं क्‍योंकि इसी दिन जैन संप्रदाय के चौबीसवें तीर्थकार महावीर स्‍वामी का निर्वाण हुआ था। इस दिन मंदिरों में निर्वाण लाडू चढाया जाता है | स्वामी दयानंद सरस्वती का निर्वाण दिवस होने से आर्यसमाजियों के लिए भी दीपावली महत्व पूर्ण है | 

हिन्‍दु धर्म में दीपावली को पंच पर्वो का त्‍योहार कहा जाता है जो धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज पर समाप्‍त होते हैं। यानी पंच पर्वों के अन्‍तर्गत धनतेरस, नरक चतुर्थी, दिपावली, राम-श्‍याम अथवा गोवर्धन पूजन और भैया दूज सम्मिलित हैं। पूरे भारत सहित सम्‍पूर्ण दुनियां में जहां कहीं भी हिन्‍दू, जैन, सिख, आर्य समाज और प्रवासी भारतीय हैं, वे सभी इस दिपावली के त्‍यौहार को पूर्ण उत्‍साह के साथ मनाते हैं क्‍योकि इस त्‍यौहार का न केवल धार्मि‍क महत्‍व है बल्कि व्‍यापारिक महत्‍व भी है।

वस्तुतः दीपावली एक दिन का नहीं बल्कि पांच दिन का पर्व है |

पंच पर्व -
धनतेरस

इस पर्व पर लोग अपने घरों में यथासम्‍भव सोने का सामान खरीदकर लाते हैं और मान्‍यता ये होती है कि इस दिन सोना खरीदने से उसमें काफी वृद्धि होती है। लेकिन आज के दिन का अपना अलग ही महत्‍व है क्‍योंकि आज के दिन ही भगवान धनवन्‍तरी का जन्‍म हुआ था जो कि समुन्‍द्र मंथन के दौरान अपने साथ अमृत का कलश व आयुर्वेद लेकर प्रकट हुए थे और इसी कारण से भगवान धनवन्‍तरी को औषधी का जनक भी कहा जाता है।

इस दिन तुलसी के पौधों के पास व घर के द्वार पर दीपक जलाया जाना शुरू करते हैं, और ये दिया अगले 5 दिनों तक हर रोज जलाया जाता है।

नरक चतुर्दशी

नरक चतुर्दशी को कहीं-कहीं छोटी दिपावली भी कहा जाता है क्‍योंकि ये दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाती है और इस दिन मूल रूप से यम पूजा हेतु दीपक जलाए जाते हैं, जिसे दीप दान कहा जाता है।

मान्‍यता ये है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। इस दिन को यम पूजा के रूप में भी मनाया जाता है, जो कि घर से अकाल मृत्‍यु की सम्‍भावना को समाप्‍त करता है। यम पूजा के रूप में अपने घर कि चौखट पर चावल के ढेरी बना कर उस पर सरसो के तेल का दीपक जलाया जाता है। ऐसा करने से अकाल मृत्‍यु नही होती है। साथ ही इस दिन गायों के सींग को रंगकर उन्हें घास और अन्न देकर प्रदक्षिणा की जाती है।

दीपावली

भारतीय नव वर्ष की शुरूआत इसी दिन से मानी जाती है इसलिए व्यापारी बन्‍धु अपने नए लेखाशास्‍त्र यानी नये बही-खाते इसी दिन से प्रारम्भ करते हैं और अपनी दुकानों, फैक्ट्री, दफ़्तर आदि में भी लक्ष्मी-पूजन का आयोजन करते हैं

साथ ही इसी नववर्ष के दिन सूर्योदय से पूर्व ही गलियों में नमक बिकने आता है, जिसे “बरकत” के नाम से पुकारते हैं और वह नमक सभी लोग खरीदा करते हैं क्‍योंकि मान्‍यता ये है कि ये नमक खरीदने से सम्‍पूर्ण वर्ष पर्यन्‍त धन-समृद्धि की वृद्धि होती रहती है।

दीपावली के दिन सभी घरों में लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा की जाती है और हिन्दू मान्यतानुसार अमावस्या की इस रात्रि में लक्ष्मी जी धरती पर भ्रमण करती हैं तथा लोगों को वैभव की आशीष देती है।

भगवान गणपति प्रथम पूजनीय हैं, इसलिए सर्वप्रथम पंच विधि से उनकी पूजा-आराधना करने के बाद माता लक्ष्‍मी जी की षोड़श विधि से पूजा-अर्चना करने से घर में कभी धन-धान्‍य की कमी नहीं होती।

वृषभ लग्‍न व सिंह लग्‍न के मुहूर्त में ही लक्ष्‍मी पूजन किया जाना चाहिए क्‍योंकि ये दोनों लग्‍न, भारतीय ज्‍योतिष शास्‍त्र के अनुसार स्थिर लग्‍न माने जाते हैं इसलिए स्थिर लग्‍न में लक्ष्‍मी पूजन करने से घर में स्थिर लक्ष्‍मी का वास होता है।

दीपावली हमेंशा अमावश्‍या की रात्रि को ही मनाई जाती है, अतः यह दिन तंत्र-मंत्र सिद्धि की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है । नवरात्रि के ही समान दीपावली की रात्रि को भी लोग सिद्धि प्राप्त करने हेतु पूजापाठ करते हैं ।

ये भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक दिपावली मनाई थी।

गोवर्धन पूजा

दीपावली के अगले दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर भगवान इन्द्र को पराजित कर उनके गर्व का नाश किया था तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा-अर्चना कर गायों का पूजन किया था। इसलिए दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन की पूजा-अर्चना करते हुए भगवान कृष्‍ण को याद किया जाता है।

इसी दिन भगवान राम के वनवास से लौटने के बाद उनके दर्शन के लिए अयोध्‍यावासी उनसे मिलने आये थे और अपने प्रभु को पुन: अयोध्‍या आने के संदर्भ में एक-दुसरे को बधाई दी थी, इस कारण से इस दिन को रामा-श्‍यामा का दिन भी कहा जाता है और इस दिन सभी लोग अपने परिचित लोगों से मिलने उनके घर जाते हैं व पुराने पड़ चुके रिश्‍तों में फिर से जान डालते हैं।

भाईदूज

दिपावली के तीसरे दिन “भाईदूज” का त्यौहार मनाया जाता है और इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर उसकी सलामती की प्रार्थना करती हैं। यह त्यौहार उत्तर भारत में भी बड़ी आस्था से मनाया जाता है तथा इस त्यौहार को “यम द्वितीया” के नाम से भी जाना जाता है।

कहा जाता है कि यम की बहन यमुना देवी ने इसी दिन यम को तिलक लगा कर यम का पूजन किया था। इसीलिए इस दिन को यम द्वितिया के नाम से भी जाना जाता है।


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पञ्च पर्वों का पर्व है दीपावली |
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