जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्रघाती मानसिकता का मूल कारण ! - शिवानन्द द्विवेदी सहर

सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने के नाम पर दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में गत 9 फरवरी की शाम 'कितने अफजल मारोगे, हर घर...



सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने के नाम पर दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में गत 9 फरवरी की शाम 'कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा' एवं 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगाए गए। कश्मीर की आजादी के नारे भी लगाए गए। ऐसा नारा लगाने वाले कोई और नहीं, बल्कि वामपंथी छात्र संगठन आईसा एवं एसएफआई से जुड़े छात्र थे। उन्होंने आतंकी अफजल को शहीद बताकर सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर भी अभद्र सवाल उठाए।

हालांकि इसमें आश्चर्य करने जैसा कुछ भी नहीं है! हो भी क्यों, ऐसा तो वामपंथी दशकों से करते आ रहे हैं! आश्चर्य तो तब होता जब ये वामपंथी छात्र 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद' या 'भारतमाता की जय' बोल दिए होते। कुछ ही महीनों पहले जब छात्र संघ के गठन के बाद पहली बैठक के दौरान भी वामपंथी छात्र संगठनों का राष्ट्र विरोधी चेहरा बेनकाब हुआ था। उस बैठक में जम्मू-कश्मीर के संबंध में जब यह प्रस्ताव लाया गया कि ‘जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’, तो छात्र संघ के वामपंथी पदाधिकारियों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट करके इसे पारित नहीं होने दिया था।

जेएनयू छात्र संघ की प्रथम बैठक में एबीवीपी से निर्वाचित संस्कृत विभाग के काउंसलर ने जम्मू-कश्मीर से जुड़ा यह प्रस्ताव रखा था जिसके पक्ष में कुल 12 वोट (सभी एबीवीपी) पड़े जबकि विरोध में कुल 19 वोट (सभी वामपंथी) पड़े थे, लिहाजा यह प्रस्ताव पारित न हो सका। जेएनयू में जब छात्र संघ की बैठक हो रही थी और वैचारिकता के धरातल पर जम्मू-कश्मीर को भारत का अंग मानने से वामपंथी छात्र नेता इंकार कर रहे थे, उसी दौरान जेएनयू को लेकर बाहर की मीडिया में एक और बहस चल रही थी।

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मीडिया ने अपने सूत्रों के हवाले से यह खबर खूब चलाई कि सुब्रमण्यन स्वामी को जेएनयू का अगला कुलपति बनाए जाने का प्रस्ताव मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा दिया गया है। मीडिया में यह खबर पुष्ट और अपुष्ट ढंग से खूब चली।

जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन भी स्वामी के विरोध की कवायदों को लेकर बयानबाजी करने लगे। चूंकि मामला इसलिए बड़ा हो गया, क्योंकि खुद सुब्रमण्यन स्वामी ने इस मसले पर ट्वीट कर दिया। स्वामी ने यह तो स्पष्ट नहीं किया कि उनको ऐसा को प्रस्ताव मिला है या नहीं अथवा वे इसके लिए तैयार हैं कि नहीं, लेकिन उन्होंने यह जरूर कह दिया कि जेएनयू में एंटी-नारकोटिक्स ब्यूरो का कार्यालय खुलना चाहिए और राष्ट्र विरोधियों को कैम्पस से बाहर निकालने के लिए सीमा सुरक्षा बल को तैनात किया जाना चाहिए।

स्वामी ने ट्वीट में लिखा कि मुझे लगता है कि जेएनयू के परिसर में नारकोटिक्सरोधी ब्यूरो का शाखा कार्यालय खोलने की जरूरत है, जो छात्रावासों में छापे मारे और नक्सलियों, जिहादियों और राष्ट्रविरोधियों को गिरफ्तार करे। बीएसएफ का शिविर भी हो।

आज जब एक बार फिर वामपंथ का राष्ट्रविरोधी चेहरा बेनकाब हुआ है तो कहीं न कहीं स्वामी के उस बयान की प्रासंगिकता बढ़ गई है। अब यह मानना गलत नहीं होगा कि जेएनयू के संदर्भ में स्वामी की चिंता बेजा नहीं है, बल्कि उसके पुख्ता कारण हैं।

हालांकि स्वामी के बयान और जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठनों में जम्मू-कश्मीर को लेकर राष्ट्र विरोधी सोच का सही मूल्यांकन केवल वर्तमान घटनाक्रम के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इतिहास में दफन उन तमाम तथ्यों से पर्दा उठाने पर यह स्पष्ट होगा कि सुब्रमण्यन स्वामी क्यों ठीक हैं और जेएनयू का वाम धड़ा क्यों राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल है!

छुपा लिए गए इतिहास से जब पर्दा उठेगा तो तत्कालीन राजनीति के कई चेहरे बेनकाब होंगे और फिर जेएनयू में तत्कालीन सत्ता-पोषित वामपंथियों का मूल मकसद भी बेनकाब होगा। अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे जेएनयू के वामपंथी संगठनों द्वारा यह कहा जाना कि 'जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है', कोई नई बात नहीं है। वे हमेशा से ही ऐसा कहते रहे हैं। चूंकि जेएनयू की स्थापना के पीछे उसे वाम अखाड़ा बनाने की सुनियोजित साजिश जेएनयू की स्थापना के समय की तत्कालीन इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार द्वारा रची गई थी।

देश की राजधानी से अपने अनुकूल बौद्धिक माहौल तैयार करने, अपने वैचारिकता के अनुकूल किताबों के कंटेंट तय करने, अपने अनुकूल इतिहास गढ़ने के लिए जेएनयू की स्थापना की गई थी। सत्ता-पोषित सुविधाभोग और विलासी जीवन पद्धति जेएनयू को विरासत में मिली।

बौद्धिक मोर्चे पर कांग्रेस के अनुकूल माहौल बनाए रखने के लिए तत्कालीन इंदिरा सरकार ने जेएनयू नामक इस प्रकल्प को स्थापित किया। अब सवाल है कि आखिर दिल्ली जैसी जगह जहां एक वामपंथी विधायक तक की राजनीतिक हैसियत नहीं बन पाई है, वहां जेएनयू का यह किला ‘लाल-सलाम’ के नारों से दशकों तक कैसे अभेद बना रहा है? इस सवाल का जवाब 60 के दशक के उत्तरार्ध एवं 70 के दशक की शुरुआत में जाने पर मिल जाता है।

दरअसल, यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी खुद के लिए ही कांग्रेस में महफूज नहीं महसूस कर रही थीं। कांग्रेस में विरोधी खेमा सिंडिकेट-इंडिकेट के रूप में कमर कसने लगा था। गैर-कांग्रेसवाद का असर देश में यों चला कि 60 के दशक में ही देश के 10 राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकार बन चुकी थी।

इंदिरा की स्वीकार्यता और नेहरू की विरासत की आभा भी कमजोर पड़ने लगी थी। चूंकि इंदिरा गांधी को यह आभास हो चुका था कि अब राजनीति और सत्ता में बने रहना केवल नेहरू की पारिवारिक विरासत के नाम पर संभव नहीं है, लिहाजा वे विकल्पों पर काम शुरू कर चुकी थीं।

60 के दशक के अंतिम दौर में कांग्रेस में इंदिरा के लिए ऐसी स्थिति तक आ गई कि उन्हें सरकार चलाने के लिए वामपंथियों की मदद लेनी पड़ी और इसके एवज में कम्युनिस्टों ने भी अकादमिक संस्थाओं पर कब्जा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।

दूसरी तरफ जनसंघ आदि का विस्तार भी देश में होने लगा था। वोट अब बैंक की शक्ल में आसानी से कांग्रेस के झोले में जाता नहीं दिख रहा था। परिणामत: इंदिरा गांधी ने सेकुलरिज्म बनाम सांप्रदायिकता के मुद्दे पर भरोसा दिखाया। हालांकि हिन्दुत्व की राजनीति के जवाब में सांप्रदायिकता का विमर्श तो इंदिरा देश में चलाना चाहती थीं लेकिन यह काम वो सीधे कांग्रेस की बजाए कुछ अन्य चेहरों के भरोसे करना चाहती थीं।

चूंकि इंदिरा को इस बात का डर जरूर रहा होगा कि यदि हिन्दुत्व को सांप्रदायिकता के तौर पर प्रचारित करने का काम खुद कांग्रेस करने लगेगी तो कहीं हिन्दू ध्रुवीकरण कांग्रेस के खिलाफ न हो जाए अत: प्रत्यक्ष जोखिम इंदिरा लेना नहीं चाहती थीं। हिन्दुत्व के बहाने सांप्रदायिकता पर विमर्श तो चलाना ही था और इसका काम जेएनयू में अपने लोगों को बिठाकर इंदिरा ने कम्युनिस्टों के माध्यम से उन्हें सौंप दिया।

अपने अनुकूल विमर्श को मुख्यधारा के एजेंडे में लाने का इंदिरा गांधी का यह तरीका बिलकुल अंग्रेजों जैसा था। खैर, मलाई खाने की आस में कम्युनिस्ट दलों ने इंदिरा के साथ मिलकर अहम पदों के बदले कांग्रेसी एजेंडे को संस्थाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने का काम बखूबी संभाल लिया।

जेएनयू के प्रोफेसर उसी समय से आज तक वामपंथ की खोल ओढ़कर देश में हिन्दुत्व को सांप्रदायिकता बताने की किताबें, लेख, रिसर्च गढ़ने लगे। जेएनयू में दाखिले और नियुक्ति का मानदंड तो वामपंथी होना लगभग परोक्ष रूप से तय हो चुका था। वैचारिक छुआछूत इतना ठूंस-ठूंसकर भरा गया कि इतने दशकों बाद भी वैचारिक विविधताओं का समान प्रतिनिधित्व आज तक जेएनयू में कायम नहीं हो सका है!

आज स्थिति बदल रही है। जनादेश का मिजाज बदल रहा है। कांग्रेस अपने पापों की सजा भुगतने को अभिशप्त है अत: जेएनयू में भी बदलाव स्वाभाविक है। जेएनयू में अब दूसरी विचारधाराएं भी स्थापित होने लगी हैं।

विचारधारा थोपने का रोना रोने वाले वामपंथी यह क्यों नहीं बताते कि आखिर इन 5 दशकों में जेएनयू में वैचारिक प्रतिनिधित्व के नाम पर किसी एक विचारधारा का कब्जा क्यों रहा है? जिस दिल्ली में वे एक पार्षद नहीं बना पाते, वहां वे जेएनयू कैंपस में किस जनाधार के आधार पर कब्जा किए बैठे रहे हैं?

अगर सुब्रमण्यन स्वामी कहते हैं कि जेएनयू से राष्ट्रविरोधी और नक्सली लोगों को सीमा सुरक्षा बल की मदद से बाहर निकाला जाए, तो क्या गलत कहते हैं? अगर राज्य द्वारा नक्सलवाद प्रतिबंधित है और अलगाववाद को पनाह नहीं दिया जा सकता तो फिर छात्र संघ के उन 19 वोटों की शिनाख्त क्यों नहीं की जाए, जो यह कहते हैं कि ‘जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है'!

आखिर इसे अलगाववाद न कहा जाए तो क्या कहा जाए? अगर जेएनयू में अलगाववादी ताकतों के लिए बौद्धिक सेल के रूप में अकादमिक स्तर पर काम हो रहा है तो उसे क्यों न रोका जाए? जम्मू-कश्मीर पर हुई वोटिंग ने यह साबित कर दिया है कि आज भी जेएनयू में अलगाववादी ताकतों का बोलबाला है और उनको रोकने के लिए राज्य अगर सख्ती से पेश नहीं आया तो यह और घातक होगा। दूसरी बात स्वामी के एंटी-नारकोटिक्स सेंटर की स्थापना जेएनयू में कराने की, तो यह कोई बुरी बात तो नहीं! दुनिया के कई देशों के शैक्षणिक संस्थान अपने कैंपस में एंटी-नारकोटिक्स केंद्र खोलकर सुधार कार्यक्रम चलाते हैं। फिर जेएनयू के वामपंथियों को इससे दर्द क्यों होता है?

सही मायने में अगर देखा जाए तो वैचारिकता की खाल ओढ़कर कांग्रेस के बौद्धिक सेल के तौर पर काम कर रहे इन जेएनयू के वामपंथी संगठनों का एकमात्र उद्देश्य देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को विमर्श में हवा देना और देश की मूल संस्कृति के खिलाफ बौद्धिक कुप्रचार करना है। इसके लिए इनको बाकायदा कांग्रेस शासन से परोक्ष मदद मिलती रही है।

अब चूंकि आंतरिक राजनीति से लगाए प्रतिनिधित्व तक में सभी विचारों के प्रतिनिधित्व वाले लोगों को शामिल करने का अवसर पैदा हो रहा है तो इनके पेट में दर्द उठ रहा है। इस दर्द को ये फासीवाद और भगवाकरण कहकर तो प्रचारित करते हैं लेकिन यह नहीं बता पाते कि पिछले 40-50 साल में इन्होंने दूसरी विचारधारा को अपने आंगन में कितनी जगह दी है?

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