A.I.M.I.M./ मजलिस -ऐ- इत्तेहादुल मुसलमीन का घिनौना इतिहास - दिवाकर शर्मा

आजकल एक नाम राजनैतिक गलियारों में बड़ी चर्चा में है और वह नाम है असुदुद्दीन ओवैसी ! यह वही श्रीमान है जिन्हें भारत में रहकर भी भारत माता ...

आजकल एक नाम राजनैतिक गलियारों में बड़ी चर्चा में है और वह नाम है असुदुद्दीन ओवैसी ! यह वही श्रीमान है जिन्हें भारत में रहकर भी भारत माता की जय बोलने में भारी कष्ट हो रहा है ! आखिर ऐसा क्योँ ? इसे पूरे देश को जानना बेहद आवश्यक है और भारत माता की जय बोलने में उन्हें हो रहे दर्द को समझने के लिए पहले हमें यह जानना होगा कि आखिर इनकी पार्टी का इतिहास क्या है ?

आजादी से पूर्व हैदराबाद राज्य, ब्रिटिश भारत की रियासत थी ! हैदराबाद ब्रिटेन जितनी बड़ी एक रियासत थी ! उस समय इसमें वर्तमान के आन्ध्र प्रदेश,कर्नाटका,महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई जिले सम्मिलित थे ! सन् 1724 से सन् 1948 तक निजाम हैदराबाद राज्य के शासक थे ! हैदराबाद रियासत के निजाम उस वक़्त दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति थे ! हैदराबाद के निजाम अपनी इस रियासत को भारत में सम्मिलित न कर उसे स्वतंत्र रियासत रखना चाहते थे परतु ऐसा हो न पाया !

स्वतंत्रता सेनानियों के प्रदीर्घ हैदराबाद मुक्ति संग्राम के उपरान्त 1948 में भारत सरकार द्वारा निजाम शासन के विरुद्ध पुलिस कारवाई करके हैदराबाद को भारत में समाहित कर लिया गया ! 17 सितम्बर 1948 का दिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वास्तव में एक निर्णायक मोड़ था ! हैदराबाद की जनता की सामूहिक इच्छा-शक्ति ने न केवल इस क्षेत्र को एक स्वतंत्र देश बनाने हेतु निजाम के प्रयासों को निष्फल कर दिया बल्कि इस प्रांत को भारत संघ में मिलाने का भी निश्चय किया !

जब 15 अगस्त, 1947 को पूरा भारत स्वतंत्रता दिवस मना रहा था तो निजाम के राजसी शासन के लोग हैदराबाद राज्य को भारत में मिलाने की मांग करने पर अत्याचार और दमन का सामना कर रहे थे ! हैदराबाद की जनता ने निजाम और उसकी निजी सेना ‘रजाकारों’ की क्रूरता से निडर होकर अपनी आजादी के लिए पूरे जोश से लड़ाई जारी रखी !

भारत के तत्कालीन गृहमंत्री एवं ‘लौह पुरूष’ सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा पुलिस कार्रवाई करने हेतु लिए गए साहसिक निर्णय ने निजाम को 17 सितम्बर, 1948 को आत्म-समर्पण करने और भारत संघ में सम्मिलित होने पर मजबूर कर दिया ! इस कार्यवाई को ‘आपरेशन पोलो’ नाम दिया गया था, इसलिए शेष भारत को अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता मिलने के बाद हैदराबाद की जनता को अपनी आजादी के लिए 13 महीने और 2 दिन संघर्ष करना पड़ा था ! यदि निजाम को उसके षड़यंत्र में सफल होने दिया जाता तो भारत का नक्शा वह नहीं होता जो आज है !

क्या है “रजाकार” 

निज़ाम के पास 22,000 फौजियों की सेना थी जिसमे अरब, पठान, रोहिल्ले आदि शामिल थे ! उन दिनों मजलिसी नेता कासिम रिज़वी ने निजाम की हकुमत बचाने के लिए निजाम के आदेश पर एक मिलिशिया यानि निजी सांप्रदायिक मुस्लिम सेना का गठन किया जिसे ‘रजाकार’ के नाम से जाना जाता है ! इसमें शामिल रजाकारों की तादाद उन दिनों 2 लाख तक बतायी जाती है ! आम मुस्लिम आबादी पर कासिम की पकड़ भी इस संगठन के जरिये समझी जा सकती है !

इन्हीं रजाकारों ने बाद में ‘मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन’ नामक राजनितिक दल का गठन किया, जिसका झंडा उठा कर असदुद्दीन औवेसी और अकबरूद्दीन औवेसी आज भी सांप्रदायिक व भारत की अखंडता विरूद्ध बयानबाजी व हरकतें करते रहतें हैं !

रजाकार एक संगठित हथियारबंद गिरोह था जो रियासत में खुलेआम साम्प्रदायिक लूटपाट, ह्त्या और बलात्कार को अंजाम दे रहा था ! निजाम और उसकी सरकार १९४७ आते आते पूरी तरह से इनकी गिरफ्त में थी ! हैदराबाद में वही होता था जो रजाकार गिरोह का नेता कासिम रजवी चाहता था !

आजादी के समय निज़ाम ने भारत में विलय करने से इंकार कर दिया था ! सितम्बर 1948 तक कई वार्ताओं के दौर चले लेकिन निज़ाम टस से मस न हुआ ! निज़ाम की निजामशाही के खिलाफ़, उसके जमीदारों के खिलाफ आज़ाद भारत में आम जनता का पहला संगठित विद्रोह हुआ !

निज़ाम की हकुमत को 17 सितंबर 1948 में पांच दिन का भारतीय फ़ौजी अभियान ‘आपरेशन पोलो’ उर्फ़ पुलिस एक्शन के सामने घुटने टेक देने पडे ! निजाम के अरब कमांडर अल इदरूस को जनरल चौधरी के सामने समर्पण करना पड़ा ! इस लड़ाई में भारत के 32 फ़ौजी मरे, निजाम की तरफ से मरने वालो की संख्या 1863 बतायी गयी लेकिन उन हालात में हुई व्यापक हिंसा में मरने वालों की संख्या विभिन्न इतिहासकारों के माध्यम से 50 हजार से दो लाख तक बताई जाती है !

MIM चीफ कासिम रिजवी 1948 से 1957 तक जेल में रहा फिर पाकिस्तान चले जाने की शर्त पर उसे रिहा करके कराची भेज दिया गया !

जब तक सरदार पटेल गृहमंत्री रहे तब तक उनके आदेश पर MIM पर 1948 से 1957 तक प्रतिबन्ध रहा, इसके सभी प्रमुख लोगो को जेल में डाल दिया गया था लेकिन 1957 में जब जवाहर लाल नेहरु दूसरी बार भारत के प्रधानमन्त्री बने तो उन्होंने देश को बांटने वाली इस पार्टी MIM पर से प्रतिबन्ध उठा लिया और इसे एक राजनैतिक दल की मान्यता जबरदस्त विरोध के बावजूद दिलवा दी ! 


प्रतिबन्ध हटने के बाद हैदराबाद में मुसलमानों ने MIM की बैठक बुलाई और एक कट्टर मुस्लिम अब्दुल वाहिद ओवैसी जिसके ऊपर कई कई आपराधिक केस दर्ज थे उसे MIM का चीफ बनाया गया फिर बाद में वाहिद के बेटे सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने MIM की कमान सम्भाली, सलाहुद्दीन ओवैसी और इंदिरा गाँधी में बहुत ही ज्यादा निकटता थी, इस निकटता के पीछे भी बहुत रोचक कहानी है – इंदिरा गाँधी ने सलाहुद्दीन ओवैसी को हर तरह से मदद दिया उसे खूब पैसा भी दिया गया मकसद एक ही था कि किसी भी कीमत पर आंध्रप्रदेश में तेजी से लोकप्रिय नेता के तौर पर उभर रहे फिल्म अभिनेता एनटी रामाराव को रोका जाये, एन टी रामा राव को रोकने के लिए इंदिरा गाँधी ने बहुत ही गंदा खेल खेला जिसकी कीमत देश आज भी चूका रहा है, इंदिरा गाँधी ने MIM से गठबन्धन करके उसे तीन लोकसभा और आठ विधानसभा सीट पर जीत दिलाकर एक बड़ी राजनितिक ताकत दे दी और साथ ही आजाद भारत में सांप्रदायिक विद्वेष के लिये मशहूर अलगाववादी हत्यारा ताकतों को केंद्र तक का सीधा रास्ता प्रदान कर भारत में मुस्लिम अलगाववाद को फिर से हवा दी !

2008 में सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी के मरने के बाद उसका बड़ा बेटा असाद्दुदीन ओवैसी MIM का चीफ बना और मजे की बात ये है की आज भी इस देशद्रोही और गद्दार ओवैसी खानदान की गाँधी खानदान से दोस्ती बदस्तूर जारी है और आज दोनों ओवैसी भाई राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के अच्छे दोस्तों में शुमार किये जाते है !


अकबरुद्दीन अपने वाहियात तेवरों से पहले भी चर्चा में आ चुका है ! तसलीमा नसरीन की हैदराबाद में मुखालफत करने,रुश्दी पर लगे फतवे को लागू करने के मजलिसी फरमान को वह पहले सार्वजनिक कर चुका हैं जाहिर हैं ऐसे जज्बाती मुद्दों पर आम मुसलमान बहुत खुश होता है, उसकी खुशियों में चार चाँद लगाने के लिए उर्दू प्रैस ऐसे सवालों को हमेशा ज़िंदा रखती है और इन अखबारों को अकबरुद्दीन जैसा आदमी बिकवाने में मदद करता है ! जो मुद्दा मुद्दा नहीं होता वह मुसलमानों के जहन में एक बड़ा सवाल बना दिया जाता है ! इन बनावटी मुद्दों पर मजलिस जैसी जमाते चुनाव जीत जाती है ! 

इक्कीसवीं सदी में इस्लाम के नाम पर सियासत करने वाले का मकान हैदराबाद के सबसे महंगे इलाके बंजारा हिल में है ! जब ये श्रीमान तक़रीर दे रहे हैं तब इस बात पर कोई गौर नहीं करता कि मंच पर एक भी महिला नहीं है ! इनके पिता का इन्तेकाल हुआ संसदीय सीट खाली हुई तब इन्हें पार्टी में कोई दूसरा काबिल इंसान नहीं दिखा ! इनके बड़े भाई असदुद्दीन औवेसी आज अपने पिता की जगह संसद में बैठे हैं और खुद अकबरुद्दीन नेता मजलिस आंध्र प्रदेश विधान सभा सदस्य हैं !

देश या आंध्र प्रदेश में किसी की भी लहर चल रही हो, लेकिन हैदराबाद पर उसका असर नहीं होता है ! पूरे देश में हैदराबाद ही एक ऐसी लोकसभा सीट है, जहां के चुनाव में मुख्य सियासी दल गंभीर रूप से मैदान में नहीं उतरते हैं ! मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) या यूं कह लें कि ओवैसी परिवार का यहां पर इतना अधिक दखल है कि पिछले ढाई दशक से ओवैसी परिवार का कोई भी नुमाइंदा हैदराबाद लोकसभा सीट से कभी चुनाव हारा ही नहीं है ! हालांकि इस परिवार के लोगों को हराने के लिए लगभग सभी पार्टियों ने काफी जोर लगाया ! भारतीय जनता पार्टी ने तो अपने राष्ट्रीय नेता एम. वेंकैया नायडू तक को उतारा, लेकिन वह भी अपना असर छोड़ने में नाकाम रहे ! यहां हर बार हर पार्टी और प्रत्याशी के हाथ निराशा ही लगी ! इस क्षेत्र में मतदाताओं का ध्रुवीकरण पूरी तरह से धार्मिक आधार पर होता है ! एमआईएम को मुख्य रूप से मुस्लिमों का समर्थन प्राप्त है !

असदुद्दीन के दादा अब्दुल वहीद ओवैसी ने यहां से 1962 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन वह जीतने में विफल रहे ! इसके बाद 1977 में इसी सीट से निर्दलीय अपना किस्मत आजामाया, लेकिन दोबारा भी भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया था ! असदुद्दीन के पिता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने टीडीपी की लहर के बीच पहली बार यह सीट 1984 में जीती थी ! इसके बाद वह 1999 तक लगातार इस सीट से जीतते रहे ! खराब सेहत की वजह से सलाहुद्दीन ने अपने बड़े बेटे के लिए इस सीट को छोड़ दिया, जो उस समय विधानसभा में अपनी पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे ! तब से अब तक वह दो बार यहां से जीत कर सांसद बन चुके हैं !

मूलतः मजलिस के इतिहास को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. 1928 में नवाब महमूद नवाज़ खान के हाथों स्थापना से लेकर 1948 तक जबकि यह संगठन हैदराबाद को एक अलग मुस्लिम राज्य बनाए रखने की वकालत करता था ! उस पर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत में विलय के बाद भारत सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था और दूसरा भाग जो 1957 में इस पार्टी की बहाली के बाद शुरू हुआ जब उस ने अपने नाम में “ऑल इंडिया” जोड़ा और साथ ही अपने संविधान को बदला, कासिम राजवी ने, जो हैदराबाद राज्य के विरुद्ध भारत सरकार की कारवाई के समय मजलिस का अध्यक्ष था और गिरफ्तार कर लिया गया था, उसने पाकिस्तान चले जाने से पहले इस पार्टी की बागडोर उस समय के एक मशहूर वकील अब्दुल वाहिद ओवैसी के हवाले कर दी थी,,उसके बाद से यह पार्टी इसी परिवार के हाथ में रही है !

मजलिस की चुनावी सफलता के सफ़र का अध्ययन करने पर कोई भी इस नतीजे पर पहुँच सकता है कि इसमें कांग्रेस का कितना बढ़ा हाथ है? कांग्रेस के समर्थन और गठबंधन के बिना मजलिस का विधान सभा में पहुँचना संभव न था ! कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता ने देश को एक से बढ़कर एक कद्दावर लम्पट नेता दिए हैं ! 

आज अकबरुद्दीन आदिलाबाद में जिस बेअदबी के साथ भारतीय इतिहास के छक्के छुडा चुका है क्या वह संभव होता यदि उसके वालिद सलाहुद्दीन को सांसद बनवाने में कांग्रेस ने अतीत में मदद न की होती ?

कांग्रेस के दिशाहीन और मूल्यरहित राजनीतिक व्यवहार ने देश की राजनीति को बहुत नुकसान पहुँचाया है, केरल में कम्युनिस्टों के खिलाफ मुस्लिम लीग से समझौता करना उसके वैचारिक दिवालियेपन और राजनीतिक अवसरवाद का परिणाम है जिससे देश की दक्षिण पंथी ताकतों को उसपर हमला करने का अवसर मिला बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों को पैर जमाने का मौक़ा मिला !

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A.I.M.I.M./ मजलिस -ऐ- इत्तेहादुल मुसलमीन का घिनौना इतिहास - दिवाकर शर्मा
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