जैन तीर्थंकर बाहुबली !

जैन साहित्य के अनुसार राम के पूर्वज थे ऋषभदेव ! उनकी दो रानियाँ थीं ! देवी यशस्विता और सुनंदा ! बड़ी रानी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे भ...



जैन साहित्य के अनुसार राम के पूर्वज थे ऋषभदेव ! उनकी दो रानियाँ थीं ! देवी यशस्विता और सुनंदा ! बड़ी रानी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे भरत, जबकि छोटी सुनंदा ने एक ही पुत्र को जन्म दिया, जिनका नाम रखा गया भद्रबाहु ! भरत नाट्यशास्त्र और अर्थ विज्ञान में प्रवीण हुए, तो भद्रबाहू ने मल्लयुद्ध और कुश्ती में महारथ हासिल की ! अजातबाहु भद्रबाहु को उनकी बलिष्ठ काया और अप्रतिम साहस के कारण बाहुबली कहा जाने लगा !

युग धर्म के अनुसार ऋषभ देव संसार से विरक्त हुए और उन्होंने सन्यास का मार्ग चुना ! वनगमन के पूर्व उन्होंने अपना सम्पूर्ण साम्राज्य अपने दोनों बेटों में बाँट दिया ! बड़े भरत को अयोध्या का अधिपति बनाया तो छोटे भद्रबाहू को पौढ़नपुर का अधिपति नियुक्त किया ! सदैव प्रजा की सेवा करते रहने का उपदेश देकर राजा ऋषभदेव ने वन को प्रस्थान किया ! 

पराक्रमी भरत ने तपस्या द्वारा अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त किये ! उनमें से एक था दिव्य सुदर्शन चक्र के समान का ही एक चक्र ! इस असाधारण आयुध की विशेषता यह थी कि कोई शत्रु इसके सामने पल भर भी नहीं टिक सकता था ! गहन अन्धकार को भी विदीर्ण करने वाला कोंकणी रत्न तथा एक दिव्य क्षत्र भी उनके आवास की शोभा बढाता था ! भरत शीघ्र ही दिग्विजयी सम्राट बन गए ! व्यक्ति में सत्व, रज और तम तीनों गुण होते हैं ! लगातार की सफलता से भरत में भी अहंकार आ गया ! मैं सम्पूर्ण प्रथ्वी का विजेता सम्राट हूँ, इस भाव ने उनको जकड लिया ! उन्होंने ऋषभ पर्वत पर अपनी कीर्ति कथा लिखवाना तय किया, ताकि दूर दूर तक से लोग उनके नाम को देख सकें ! 

भगवान को अहंकार पसंद नहीं, जन भरत ऋषभ पर्वत पर पहुंचे तो अचंभित रह गए ! पर्वत पर इंच मात्र भी स्थान शेष नहीं था ! उनके पूर्ववर्ती दिग्विजई सम्राटों की यश गाथा पहले से ही पूरे पर्वत पर अंकित थी ! भरत ने इस ईश्वरीय संकेत को भी नहीं समझा तथा अपने दण्डरत्न की मदद से पूर्व राजाओं की गाथा को मिटाकर अपनी गौरव गाथा अंकित करवाई ! उसके पश्चात वे अपनी राजधानी वापस लौटे ! अपने सम्राट के विजयोत्सव को मनाने सम्पूर्ण अयोध्या नव दुल्हन के समान सजाई गई थी ! मंगल वाद्य बज रहे थे ! उनके भ्राता गण भी उनकी अगवानी को वहां उपस्थित थे ! एक रथ पर आगे आगे दिव्य चक्र रत्न भी चल रहा था ! घोर आश्चर्य ! जैसे ही चक्र रत्न का रथ द्वार पर पहुंचा उसकी गति अवरुद्ध हो गई ! घोड़ों ने भरसक प्रयत्न किया किन्तु रथ एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा ! टस से मस नहीं हुआ !

ज्योतिषियों ने बताया कि नगर में कोई ऐसा व्यक्ति है, जो आपसे अधिक पराक्रमी है ! सबकी नजर बाहुबली पर जा टिकी ! राजा भरत के क्रोध का पार नहीं रहा ! अहंकार में विवेक शून्य हो जाता है ! उन्होंने बाहुबली को चुनौती दी, या तो मेरी अधीनता स्वीकार करो, या युद्ध करो ! बाहुबली भाई की इज्जत करते थे, किन्तु उनको यह अहंकार उचित प्रतीत नहीं हुआ ! उन्होंने भाई का रण निमंत्रण स्वीकार कर लिया | सबने समझाया कि दोनों भाई सैन्य युद्ध करें यह उचित नहीं होगा, बेहतर हो मल्ल युद्ध से ही जय पराजय का निर्णय कर लें ! मल्ल युद्ध प्रारम्भ हुआ ! लड़ते लड़ते बाहुबली ने बड़े भाई को अपनी बलिष्ठ भुजाओं में सर के ऊपर उठा लिया ! लोगों को लगा कि अब वे उन्हें घुमाकर जमीन पर पटक देंगे ! किन्तु नहीं, बाहुबली ने हौले से भरत को जमीन पर उतारा और उनके चरण स्पर्श कर कहा –

भैया मुझे राज्य की कोई चाह नहीं है ! जिस राज्य के लिए आपके मन में विकार आ गया, उसे लेकर मैं क्या करूंगा ! मुझे तपस्या के लिए वन जाने की अनुमति प्रदान करें ! मैंने पितृतुल्य बड़े भाई को ठेस पहुंचाई, मुझे यह राज्य नहीं चाहिए ! आप इसके योग्य भी हैं, इसे आप ही सम्हालें ! 

भरत भाई के सामने पानी पानी हो गए ! छोटे भाई की उदारता ने उनके ह्रदय की महानता को भी जगा दिया ! उन्होंने कहा कि मेरी गलती की इतनी बड़ी सजा मत दो ! तुम चले गए तो मैं इस राज्य का क्या करूंगा ? 

किन्तु बाहुबली का निश्चय अडिग था ! वे सब कुछ त्यागकर दीक्षा लेने अपने पिता ऋषभदेव के पास चल दिए ! पिता से दीक्षा लेकर उन्होंने निस्तब्ध, सुनसान स्थान पर तपस्या प्रारम्भ की ! घनघोर कठोर तपस्या ! अनेक वर्ष व्यतीत हो गए ! लता गुल्मों ने पूर्णतः ढक लिया ! शरीर पर चींटियों और दीमकों ने बाम्बी बना ली ! जिनमें कुछ सर्पों ने भी अपना आवास बना लिया ! उनका तप इतना उग्र हो गया था कि उन्हें न तो अपने वस्त्रों का ध्यान था और नही अपने शरीर का ! जब भरत अपने सैन्य दल के साथ उन्हें ढूँढते हुए वहां पहुंचे तो सिवाय स्वांस प्रश्वांस की आवाज के उन्हें कुछ भी द्रष्टिगोचर नहीं हुआ ! भरत ने अपने पिता के पास जाकर मार्गदर्शन चाहा तो उन्होंने कहा कि बाहुबली शरीर को भूल चुके है, किन्तु वे अभी भी यह मान रहे हैं कि वे तुम्हारे राज्य की भूमि पर तपस्यारत हैं ! यह भाव मिटते ही उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हो जायेगी !

भरत अविलम्ब उस स्थान पर वापस पहुंचे, जहाँ बाहुबली तपस्या कर रहे थे ! उन्होंने अपने छोटे भाई के चरणस्पर्श कर कहा – भाई अपने मन से यह विचार निकाल दो कि तुम मेरी भूमि पर खड़े हो ! यह भूमि तो तुमने ही मुझे दी है ! मैं तो तुम्हारी थाती की रक्षा भर कर रहा हूँ ! और फिर यह सम्पूर्ण सृष्टि तो उस परमात्मा की ही है ! न मेरी न तुम्हारी ! अतः आसक्ति को त्यागकर निर्विकार भाव से साधना करो ! 

बाहुबली परमात्मा से एकाकार हो गए ! बाहुबली ने पिता से पहले ही मोक्ष पा लिया ! वे आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए ! जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की वह स्थान था आज के कर्नाटक के हासन जिले का श्रवणवेलगोल ! चक्रवर्ती सम्राट भरत ने उस स्थान पर बाहुबली की एक अति सुन्दर विशाल प्रतिमा बनवाई थी ! कालान्तर में उक्त तपस्थली और वह प्रतिमा लुप्त हो गई, केवल जैन साहित्य में उसका वर्णन भर शेष रह गया ! 

आज जो विशालकाय गगनचुम्बी मूर्ति वहां स्थित है, उसका निर्माण कर्नाटक के तलवनपुरा के प्रधान सेनापति चामुंडराय ने अपनी माँ की इच्छापूर्ति के लिए निर्मित करवाई थी ! मूर्ति निर्माण के पश्चात जब प्राण प्रतिष्ठा के समय दुग्धस्नान करवाया जा रहा था तब का भी एक अलौकिक प्रसंग है | मंत्रोच्चार के साथ दुग्ध से भरे कलश बाहुबली कि प्रतिमा पर उन्डेले जा रहे थे, किन्तु प्रतिमा का केवल चेहरा ही गीला हो पा रहा था ! बड़ी कठिनाई से भगवान् के वक्षस्थल और गर्दन गीले हुए ! 

तभी एक निर्धन बुढिया एक छोटी सी लुटिया में दूध लेकर वहां पहुंची ! लोगों उसका उपहास किया, कि इतने कलश से अभिषेक नहीं हो पाया, इस लुटिया से क्या होगा ! पर वृद्धा के आग्रह को मान देते हुए चामुंडराय ने उसे अवसर प्रदान किया ! जैसे ही वृद्धा ने अपनी लुटिया का दूध भगवान् के मस्तक पर उंडेला, आश्चर्य हो गया ! मस्तक से झरता हुआ दुग्ध बाहुबली के चरणों तक जा पहुंचा ! उनके अंग प्रत्यंग धुल गए ! सच है भगवान् तो प्रेम और सच्ची भक्ति के ही भूखे हैं ! जिस महाभिषेक को चामुंडराय की अपार सम्पदा नहीं करा सकी, उसे वृद्धा के अंजुरी भर दूध ने कर दिखाया ! तभी से प्रति बारह वर्ष के पश्चात उसी स्मृति में बाहुबली का महामस्तकाभिषेक समारोह आयोजित होता है |

तभी से प्रति बारह वर्ष 

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