भारत की आजादी और रजवाड़े – भाग 4 (कश्मीर का भारत में विलय)

भारत की स्वतन्त्रता के समय कश्मीर के शासक हिन्दू राजा हरिसिंह थे ! उस समय कश्मीर की मुख्य राजनैतिक पार्टी मुस्लिम कांफ्रेंस (आगे चलकर ...



भारत की स्वतन्त्रता के समय कश्मीर के शासक हिन्दू राजा हरिसिंह थे ! उस समय कश्मीर की मुख्य राजनैतिक पार्टी मुस्लिम कांफ्रेंस (आगे चलकर नेशनल कांफ्रेंस) थी जिसकी कमान शेख अब्दुल्लाह के हाथ में थी !

कश्मीरी पंडित और राज्य के अधिकाँश मुसलमान भी कश्मीर का भारत में ही विलय चाहते थे जो पाकिस्तान को कतई बर्दास्त नहीं था ! अतः पाकिस्तान ने वर्ष १९४७-४८ में कबायली और छद्म सेना से कश्मीर पर आक्रमण कराया और काफी हिस्से पर कब्जा कर लिया ! उस समय भारत ने पकिस्तान से इस विवाद को जनमत-संग्रह के माध्यम से सुलझाने का अनुरोध किया था जिसे पाकिस्तान ने ठुकरा दिया था ! 

महाराजा हरीसिंह और नेहरु के तल्ख़ सम्बन्ध –

कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के सम्बन्ध न तो शेख अब्दुल्लाह से और न ही नेहरु से मधुर रह पाए ! महाराजा हरिसिंह शेख अब्दुल्लाह की कुटिल चालों, स्वार्थी एवं अलगाववादी विचारों एवं कश्मीर में हिन्दू विरोधी रवैये से भली भाँती परिचित थे ! वह यह भी जानते थे कि “क्विट कश्मीर आन्दोलन” के द्वारा शेख अब्दुल्लाह उन्हें हटा कर स्वयं शासन संभालने को लालायित है ! 

जैसे ही नेहरु प्रधानमन्त्री बने वैसे ही एक घटना घटी जिसने इस कटुता को और बढ़ा दिया ! शेख अब्दुल्लाह ने एक कांफ्रेंस का आयोजन श्रीनगर में किया, जिसमे नेहरु को भी आमंत्रित किया गया ! आयोजित कांफ्रेंस का प्रमुख प्रस्ताव था महाराजा हरिसिंह को हटाना ! अतः हरिसिंह ने नेहरु से इस कांफ्रेंस में न आने का आग्रह किया परन्तु नेहरु नहीं माने और वह जम्मू पहुंचे जहाँ उन्हें श्रीनगर जाने से पूर्व ही रोक दिया गया ! नेहरु ने इसे अपना अपमान समझा और इसे जीवन भर नहीं भूले ! जब पाकिस्तानी सेना व कबीलाई आक्रमण कश्मीर पर हुआ तब नेहरु ने बदले की भावना से जानबूझकर भारतीय सेना को कश्मीर में भेजने में विलम्ब किया !

मोहम्मद अली जिन्ना निसंदेह कश्मीर का विलय पाकिस्तान में करना चाहता था इस उद्देश्य को पूर्ण करने हेतु उसने अपने सैन्य सचिव को महाराजा हरी सिंह से मिलने हेतु तीन बार भेजा जिसे महाराजा ने बार-बार बीमारी का बहाना बनाते हुए टाला ! जिन्ना ने महाराजा से गर्मी की छुट्टियां कश्मीर में बिताने हेतु इजाजत मांगी जिसे महाराज ने विनम्रता पूर्वक यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वह पडोसी देश के गवर्नर जनरल को ठहराने की औपचारिकता पूर्ण करने में सक्षम नहीं है ! 

वहीँ दूसरी तरफ शेख अब्दुलाह की नजरें कश्मीर की गद्दी पर थी ! वह कश्मीर को मुस्लिम राष्ट्र बनाना चाह रहा था ! माउंटबेटन भी जून माह में 3 दिन कश्मीर में रुके वे भी कश्मीर का विलय पकिस्तान में ही करने के पक्षधर थे ! माउंटबेटन ने मेहरचंद महाजन से कहा भी था कि “भौगोलिक स्थिति” को देखते हुए कश्मीर को भारत का हिस्सा बन जाना चाहिए ! 

कश्मीर का भारत में विलय कराने में श्री गुरूजी की भूमिका 

कश्मीर का भारत में विलय कराने में श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरूजी’ ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन किया ! यद्यपि देशी रियासतों के भारत में विलय से सम्बंधित कार्य का प्रभाव सरदार बल्लभ भाई पटेल पर था, परन्तु जम्मू कश्मीर प्रकरण को नेहरु ने अपने नियंत्रण में ले रखा था ! जिसका परिणाम भारतवासी आज तक भुगत रहे है !कश्मीर प्रकरण को लेकर श्री गुरूजी ने सजगता दिखाई और १९४७ में सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर में संघ कार्य का विस्तार किया ! 

सर्वश्री बलराज मधोक, जगदीश अबोल, हरी भनोट जैसे संघ के कर्मठ कार्यकर्ता शेख अब्दुल्ला और रामचंद्र काक के इरादों को भली भांति पहचान चुके थे परन्तु महाराजा हरिसिंह के मन में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय करने को लेकर हिचकिचाहट थी जिसकी जानकारी सरदार बल्लभभाई पटेल एवं मेहरचन्द्र महाजन को थी !

जम्मू कश्मीर पर संकट के बादल उमड़ते देख सरदार बल्लभ भाई पटेल ने मेहरचन्द्र महाजन को गुरूजी से संपर्क करने को कहा ! जिसके परिणामस्वरूप संकट की स्थिति में फंसे जम्मू कश्मीर को उबारने हेतु श्री गुरूजी 17 अक्टूबर १९४७ को श्रीनगर गए और अगले ही दिन राजा हरिसिंह से भेंट कर उन्हें भारत में तत्काल विलय की आवश्यकता और महत्त्व का ज्ञान कराया जिसके परिणामस्वरूप हरिसिंह राज्य को भारत में विलय के लिए सहर्ष तैयार हो गए ! 

महाराजा हरी सिंह और गुरूजी की इस भेंट के महज एक सप्ताह के अन्दर ही पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर में कबिलाइयों के माध्यम से बर्बर आक्रमण किया ! जब पाकिस्तान के द्वारा 22 अक्टूबर १९४७ के दिन सेना के साथ कबिलाइयों ने मुजफ्फराबाद की और कूच किया तब कश्मीर के प्रधानमन्त्री मेहरचन्द्र महाजन ने सरकार से बार-बार सहायता करने का अनुरोध किया परन्तु भारत सरकार का रवैया उदासीन रहा ! भारत सरकार के गुप्तचर विभाग ने भी इस सन्दर्भ में कोई पूर्व जानकारी नहीं दी ! कश्मीर के ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने बिना वर्दी के 250 जवानों के साथ पाकिस्तानी सेना को रोकने की कोशिश की लेकिन वह सभी वीरगति को प्राप्त हुए !
24 अक्टूबर को माउंटबेटन ने ‘सुरक्षा कमेटी’ की बैठक की परन्तु इस बैठक में भी महाराजा को किसी भी प्रकार की सहायता देने का निर्णय नहीं किया गया ! 26 अक्टूबर को पुनः कमेटी की बैठक हुई ! बैठक के अध्यक्ष माउंटबेटन महाराजा हरिसिंह को किसी भी प्रकार का सहयोग देने के पक्ष में नहीं थे कारण था महाराजा के हस्ताक्षर सहित विलय के कागजात प्राप्त न होना ! ऐसे में सरदार पटेल ने अपने सचिव वी.पी. मेनन को महाराजा के हस्ताक्षर युक्त दस्तावेज लाने को 26 अक्टूबर को कहा ! विलय पत्र प्राप्त होने के बाद 27 अक्टूबर को हवाई जहाज द्वारा श्रीनगर में भारतीय सेना भेजी गयी !

जब भारत की विजय वाहिनी सेनायें कबीलाइयों को खदेड़ रही थी सात नवम्बर को बारामूला को कबिलाइयों के कब्जे से मुक्त करा लिया था परन्तु नेहरु ने शेख अब्दुल्ल्ला की सलाह पर तुरंत युद्ध विराम की घोषणा कर दी जिसका परिणाम यह हुआ कि कश्मीर का एक तिहाई भाग जिसमे मुजफ्फराबाद, पुंछ,मीरपुर,गिलगित आदि क्षेत्र आते है उन पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया है जो आज ‘आजाद कश्मीर’ के नाम से जाना जाता है ! यह सब हुआ हमारे अदूरदर्शी नेताओं के कारण !

लगातार भूल करते जा रहे नेहरू ने एक और बड़ी भूल की ! वह माउंटबेटन की सलाह पर 1 जनवरी १९४८ को कश्मीर का मामला सयुंक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में ले गए ! इसके माध्यम से नेहरू विश्व के सामने अपनी इमानदार छवि का प्रदर्शन करना चाहते थे परन्तु यह प्रश्न विश्व पंचायत में युद्ध का मुद्दा बन गया ! नेहरु ने एक भूल और की जब देश के अनेक नेताओं के विरोध के बावजूद शेख अब्दुल्ला की सलाह मान भारतीय संविधान में धारा ३७० जोड़ दी ! न्यायाधीश डी.डी. बसु ने इस धारा को असंवैधानिक एवं राजनीति से प्रेरित बतलाया ! डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने स्वयं इसका विरोध किया तथा इस धारा को जोड़ने से मना कर दिया ! इस पर नेहरु ने रियासत राज्यमंत्री गोपाल स्वामी आयंगर द्वारा 17 अक्टूबर १९४९ को यह प्रस्ताव रखवाया ! इसमें कश्मीर के लिए अलग संविधान की स्वीकृति दी गयी ! जिसमे भारत का कोई भी क़ानून यहाँ की विधानसभा द्वारा पारित होने तक लागू नहीं होगा ! दुसरे शब्दों में दो संविधान,दो प्रधान तथा दो निशान को मान्यता दी हाई ! कश्मीर जाने के लिए परमिट की अनिवार्यता की गयी ! 

शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री बने ! इस धारा को जोड़ने से बढ़कर दूसरी कोई भयंकर भूल हो ही नहीं सकती थी ! उसी काल में महान राजनेता डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने दो विधान,दो प्रधान,दो निशान के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन किया ! वे परमिट व्यवस्था को तोड़ कर श्रीनगर गए जहाँ जेल में उनकी संदिग्ध मौत हुई ! नेहरु को बड़ी देर से अपनी गलती का अहसास हुआ ! शेख अब्दुल्ला को कारागार में डाल दिया गया परन्तु नेहरु ने अपनी मृत्यु से पहले अप्रैल १९६४ को उस पुनः रिहा कर दिया !     

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भारत की आजादी और रजवाड़े – भाग 4 (कश्मीर का भारत में विलय)
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