‘‘खेजड़ी ‘‘ के एक वृक्ष बचाने के लिए 363 बलिदानियों की महान गाथा !

रेतीले धोरों वाला मरुभूमि राजस्थान एक वैभवशाली अनूठा प्रदेश हैं ! यहां की रंग-रंगीली वेशभूषा, रेतीले टीलों के पीछे धीमे स्वर में उठने वा...

रेतीले धोरों वाला मरुभूमि राजस्थान एक वैभवशाली अनूठा प्रदेश हैं ! यहां की रंग-रंगीली वेशभूषा, रेतीले टीलों के पीछे धीमे स्वर में उठने वाला सुरीला संगीत, कलात्मक लोक नृत्य, स्वादिष्ठ खानपान, कलात्मक चित्रकारी व स्थापत्य कला की तो पूरे विश्व में धूम है ही, इसके अलावा इस वीर भूमि के इतिहास में कुछ ऐसी अनूठी परम्परायें हैं जो दुनियां के किसी भी देश के इतिहास में देखने को नही मिलती हैं !

युवराज को बचाने के लिये अपने पुत्र को बलिदान कर देने वाली पन्ना धाय जैसी मां के अलावा भी यहां एक वृक्ष बचाने के लिए आज से ढ़ाई सौ वर्ष पूर्व तीन सौ तिरेसठ स्त्री-पुरुषों का बलिदान रेत पर लिखी एक ऐसी महान गाथा हैं जिसे सुनकर हर व्यक्ति रोमांचित हुए बिना नही रह सकता हैं ! जिस एक पेड़ को बचाने के लिये विश्व कि सबसे बड़ी कुर्बानी दी गई वह वृक्ष है राजस्थान का सर्वाधिक महत्तवपूर्ण ‘‘खेजड़ी ‘‘ का वृक्ष ! इस वृक्ष को राजस्थान में कल्पवृक्ष के समान माना गया है ! खेजड़ी वृक्ष की बहुउपयोगिता को देखते हुये ही राजस्थान सरकार द्वारा इस वृक्ष को राज्य वृक्ष घोषित कर संरक्षित वृक्षो की सूची में शामिल किया है !

जोधपुर से महज पच्चीस किलोमीटर दूर आज से 285 वर्ष पूर्व सन् 1730 में खेजड़ी के वृक्ष को बचाने के लिए विश्नोई समाज के लोग एक के बाद एक कर पेड़ों से लिपटते रहे और राजा के कारिंदे उनको कुल्हाड़ियों से काटते रहे ! उनका एक ही लक्ष्य था कि “सिर सांचे रूंख रहे तो भी सस्ता जाण” यानि सिर कटने से पेड़ बचता है तो भी सस्ता मान ! पेड़ बचाने के लिए कुल 363 नर-नारियों ने अपना बलिदान दिया ! खून की नदी बह उठी, लेकिन राजा के कारिंदे नहीं थमे। ! आखिरकार राजा के आदेश पर भादवा सुदी दशम को यह क्रम थमा ! पूरी दुनिया में कहीं ऐसा उदाहरण नहीं है कि पेड़ों के बचाने के लिए एक साथ इतनी बड़ी संख्या में अपना बलिदान दिया हो !

सन् 1730 की भाद्रपद सुदी दशमी के दिन ‘‘खेजड़ी ‘‘ग्राम में ‘‘खेजड़ी‘‘ वृक्ष को बचाने के लिए तीन सौ तिरेसठ लोगों द्वारा किया गया बलिदान मनुष्य के प्रकृति प्रेम की अनोखी मिसाल हैं ! जोधपुर के राज अभयसिंह को अपने नए महल निर्माण के लिए चूने को पकाने के लिए लकड़ियों की आवश्यकता थी ! राजा का दीवान गिरधर दास भंडारी आज्ञा की पालना में कारिंदों को लेकर शहर से पच्चीस किलोमीटर दूर खेजड़ला स्थान पर पहुंच गया ! खेजड़ी के वृक्ष काटने को सूचना पर वे वहां एकत्र हो गए ! उन्होंने इसका विरोध किया, लेकिन दीवान नहीं माना ! उसने पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने का आदेश दिया ! इस पर अमृता देवी नाम की महिला ने पहल करते हुए खेजड़ी के वृक्ष पर बाहे डाल खड़ी हो गई ! राजा के कारिंदे इस पर नहीं रुके और उन्होंने अमृता देवी को कुल्हाड़ी से काट डाला ! इसके बाद एक-एक कर लोग आगे आते रहे और कटते रहे, लेकिन राजा के कारिंदे नहीं थमे ! एक-एक कर 84 गांवों के 217 परिवारों के 363 नर-नारियों ने इस अद्वितीय यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी ! इसकी सूचना राजा को मिली तो उसने इस पर रोक लगाई ! बाद में राजा ने आदेश जारी कर दिया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी का वृक्ष नहीं काटा जाएगा ! आज भी मारवाड़ में खेजड़ी के पेड़ को कहीं भी काटा नहीं जाता है !

खेजड़ला में हर साल भादवा सुदी दशम(इस बार 23 सितम्बर) को पेड़ बचाने को शहीद हुए इन 363 लोगों की याद में मेला भरता है ! विश्नोई समाज ने यहां पर शहीद स्मारक भी बनवा रखा है ! इस मेले में दूर-दूर से पर्यावरण विद् सहित बड़ी संख्या में लोग पहुंचते है ! इस दिन यहां होने वाले यज्ञ में करीब डेढ़ हजार किलोग्राम घी होम किया जाता है !

हमें कर्जदार होना चाहिए इन बलिदानियों का ! सरकार को भी चाहिए कि ऐसी बलिदान कथाओं को अपने पाठ्यक्रम में स्थान दे ! पाठक गणों से भी अनुरोध है कि इस शोर्य गाथा को अपने बच्चों को सुनाएं ! मित्रों को बताएं !

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क्रांतिदूत: ‘‘खेजड़ी ‘‘ के एक वृक्ष बचाने के लिए 363 बलिदानियों की महान गाथा !
‘‘खेजड़ी ‘‘ के एक वृक्ष बचाने के लिए 363 बलिदानियों की महान गाथा !
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क्रांतिदूत
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