धर्म मजहब और धर्म निरपेक्षता (लघु आलेख )- डा. राधेश्याम द्विवेदी

महाभारत के पाण्डवों की ही भांति भारत के हिन्दुओं को भी समझ लेना होगा कि हिन्दू और मुसलमानों के मतभिन्न्ता होने से युद्ध होगा या नहीं यह ...

महाभारत के पाण्डवों की ही भांति भारत के हिन्दुओं को भी समझ लेना होगा कि हिन्दू और मुसलमानों के मतभिन्न्ता होने से युद्ध होगा या नहीं यह हिन्दुओं का विकल्प बन सकता है, परन्तु यह मुसलमानों का विकल्प बन नहीं सकता है। श्रीकृष्ण के पांच गांवों की तरह भारत के तीन टुकड़े मंजूर करवा कर देख लिये हैं। भारत के दोनों तरफ दो पाक देश बन गये थे। अंग्रेजों के चाल से यह हमेशा हमेशा के लिए समस्या दे दिये गये। काश्मीर को विशेष दर्जा देकर भी गलती ही की गयी। ये सब समस्या की जड़ बन गये। हिन्दुओं को अपने देश व घर को छोड़कर भागना ही पड़ा। उन्हें जबरन खदेड़ा गया अपनी जमीन जायदाद ज्यों की त्यों छोड़कर। 

मुस्लिमों को कौरवों की तरह हर बात पर विशेषाधिकार देकर देख लिया। हज के लिए सबसीडी देकर देख लिया , उनके लिए अलग नियम कानून (धारा 370) बनवा कर देख लिया । आप चाहे जो कर लीजिए, उनकी माँगें नहीं रुकने वाली है। उन्हें सबसे स्वादिष्ट उसी गौमाता का माँस लगेगा जो हमारे लिए पवित्र है। उसके बिना उन्हें भयानक कुपोषण होने लगता है। उन्हें सबसे प्यारी वही मस्जिदें हैं, जो हजारों साल पुराने हमारे ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़ कर बनी हैं। उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी उसकी आवाज से है जो मंदिरों की घंटियों और पूजा-पंडालों से निकलती है। उनकी ये मांगें गाय को काटने तक नहीं रुकेंगी। यह समस्या मंदिरों तक ही रहने वाली नहीं है। यह हमारे घर तक आने वाली है। हमारी बहू-बेटियों तक पहंचने वाली है। उनकी नजरें ठीक नहीं है। कभी भी आक्रान्ताओं की तरह हमसे छीन सकते हैं। वे यह तर्क देते हैं, तुम्हें गाय इतनी प्यारी है तो सड़कों पर क्यों घूम रही है ? हम तो काट कर खाएँगे। यह करना तो हमारे मजहब में लिखा है। इतना ही नहीं वे कल यह भी कहेंगे,तुम्हारी बेटी की इतनी इज्जत है तो वह अपना खूबसूरत चेहरा ढके बिना घर से निकलती ही क्यों है ?हम तो उठा कर ले जाएँगे। हमारी औरतें बुर्के में होती हैं। उन्हें कोई आंख उठायेगा तो हमारा कुरान उसे जिन्दा खा जायेगा। हम तो हिन्दुओं की औरतों को जो चाहे करें। यह मेरा संवौधानिक अधिकार है। उन्हें समस्या गाय से नहीं है, हमारे अस्तित्व से है। तुम जब तक हो,उन्हें कुछ ना कुछ समस्या रहेगी। 25 साल पहले कश्मीरी हिन्दुओं का सब कुछ छिन गया। वे शरणार्थी कैंपों में रहे, पर फिर भी वे आतंकवादी नहीं बनते। जबकि कश्मीरी मुस्लिमों को सब कुछ दिया गया। तब भी वे आतंकवादी बन कर जन्नत को जहन्नुम बना रहे हैं। पिछले साल की बाढ़ में सेना के जवानों ने जिनकी जानें बचाई। वही आज उन्हीं जवानों को पत्थरों से कुचल डालने पर आमादा हैं। इसे ही संस्कार कहते हैं। ये अंतर है धर्म और मजहब में।

एक जमाना था जब लोग मामूली चोर के जनाजे में शामिल होना भी शर्मिंदगी समझते थे। और आज काश्माीर में एसे गद्दार और देशद्रोही लोग हैं जो खुले आम पूरी बेशर्मी से एक आतंकवादी के जनाजे में शामिल होते हैं। सन्देश साफ है एक कौम, देश और तमाम दूसरी कौमों के खिलाफ युद्ध छेड़ चुकी है। अब भी अगर आपको नहीं दिखता है तो यकीनन आप अंधे हैं या फिर शत प्रतिशत देश के गद्दार। आज तक हिंदुओं ने किसी को हज पर जाने से नहीं रोका। लेकिन हमारी अमरनाथ यात्रा हर साल बाधित होती है। फिर भी हम ही असहिष्णु हैं। हमें दोषी ठहराके ये अपने एवार्ड वापस करने का नाटक करते हैं। यह तो कमाल की धर्मनिरपेक्षता है। समय रहते भारत के हिन्दुओं समझ जाओ, संभल जाओ ।

डा. राधेश्याम द्विवेदी
लेखक परिचय - डा.राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.. और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.. (हिन्दी),एल.एल.बी., सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य तथा ग्रंथालय विज्ञान की डिग्री तथा विद्यावारिधि की (पी.एच.डी) की डिग्री उपार्जित किया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम..डिग्री तथा’’बस्ती का पुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। बस्तीजयमानवसाप्ताहिक का संवाददाता, ’ग्रामदूतदैनिक साप्ताहिक में नियमित लेखन, राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, बस्ती से प्रकाशित होने वाले  ‘अगौना संदेशके तथानवसृजनत्रयमासिक का प्रकाशन संपादन भी किया। सम्प्रति 2014 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मण्डल आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्यरत हैं। प्रकाशित कृतिःइन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू डायरेक्टर जनरल आफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाई डायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया, न्यू डेलही। अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं।

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क्रांतिदूत: धर्म मजहब और धर्म निरपेक्षता (लघु आलेख )- डा. राधेश्याम द्विवेदी
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