मोदी की श्रीलंका यात्रा - कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना- ओंकारेश्वर पांडेय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गये तो श्रीलंका थे। पर उनकी निगाहें चीन पर लगी थीं। श्रीलंका जाकर पहला झटका उन्होंने चीन को दिया , जब श्रीलंक...

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गये तो श्रीलंका थे। पर उनकी निगाहें चीन पर लगी थीं। श्रीलंका जाकर पहला झटका उन्होंने चीन को दिया, जब श्रीलंका ने एक चीनी पनडुब्बी को कोलंबो बंदरगाह में ठहरने की अनुमति देने से साफ इनकार करते हुए कहा कि - यह असंभव है। चीन दशकों से भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अब मोदी के नेतृत्व वाला भारत चीन की हर चाल को काटने में लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीलंका के साथ टूटते तार को मजबूती से जोड़ने की कोशिश की है। 

दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गये तो श्रीलंका थे, पर उनकी निगाहें चीन की चाल पर लगी थीं। ये महज एक संयोग नहीं था कि उसी दिन चीन के राष्ट्रपति चीन की उस महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट एंड वन रोड कार्यक्रम को अंतिम रूप देने में लगे हुए थे, जो चीन को यूरोप और मध्यपूर्व के साथ जोड़ने वाली एक अत्यधिक व्यापक बुनियादी ढांचे वाली परियोजना है। रविवार 14 मई को बीजिंग में आयोजित इस समारोह में हिस्सा लेने के लिए दुनिया भर से लगभग 30 नेता पहुंचे, लेकिन भारत ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया। 

चीन की वन बेल्ट एंड वन रोड नामक यह परियोजना प्राचीन रेशम मार्ग आर्थिक क्षेत्र या 21वीं सदी सामुद्रिक सिल्क मार्ग के जरिए 100 देशों को जोड़ने वाली एक भीमकाय परियोजना है। पांच महादेशों से गुजरने वाली इस परियोजना पर चीन अबतक 50 बिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश कर चुका है। और अनुमान है कि आगे इस पर कुल 900 बिलियन डॉलर का निवेश होगा।

लेकिन भारत ने इसमें शामिल होने से इसलिए इनकार किया, क्योंकि एक तरफ चीन ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह एनएसजी में भारत के प्रवेश को रोक रखा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी आतंकवादियों के लेकर भी उसका रुख नकारात्मक है। इसके अलावा यह परियोजना भारत के पाक कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से से भी होकर गुजरती है, जो अभी भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का कारण बना हुआ है। चीन की इस परियोजना में भारत के शामिल होने से लगता कि भारत ने पाक कब्जे वाले कश्मीर पर पाक और चीन के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया है। लिहाजा भारत ने इसमें नहीं शामिल होने का ठीक फैसला किया। 

इधर चीन श्रीलंका में भारी निवेश कर वहां भी भारत की राहें मुश्किल बना रहा था। श्रीलंका सार्क में भारत का सबसे बड़ा साझीदार है। लेकिन चीनी निवेश के कारण वहां भी भारत के लिए नयी चुनौतियां खड़ी हो रही थीं। जबकि वहां के कोलंबो बंदरगाह में भारत से 70 प्रतिशत से अधिक ट्रांस-शिपमेंट होती है। लेकिन श्रीलंका में भारत का प्रभाव कम करने के लिए चीन ने सिर्फ 2016 में ही वहां 15 बिलियन की फंडिंग और निवेश किया है। इस तरह श्रीलंका में चीन की आर्थिक सक्रियता भारत के आगे बढ़ने की रफ्तार को सीमित ही नहीं कर रही थी, बल्कि हमारे व्यावसायिक हितों को नुकसान भी पहुंचा रही थी। इस लिहाज से मोदी की श्रीलंका यात्रा के खास मायने हैं।

दो साल के भीतर दूसरी बार श्रीलंका की यात्रा पर गए पीएम नरेंद्र मोदी ने वाराणसी और कोलंबो के बीच सीधी फ्लाइट शुरू करने की घोषणा कर दोनों देशों के बीच संबंधों को और प्रगाढ़ बनाने की पहल की है। उन्होंने घोषणा की कि इस साल अगस्त में, एयर इंडिया कोलंबो और वाराणसी के बीच सीधी उड़ानें भरना शुरू कर देगा। इससे श्रीलंका के हमारे भाई-बहनों के लिए बुद्ध की धरती की यात्रा आसान हो जाएगी और आप सीधे श्रावस्ती, कुशीनगर, संकासा, कौशंबी और सारनाथ की यात्रा कर पाएंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस दिन श्रीलंका की धरती पर कदम रखा, उस दिन श्रीलंका में अंतर्राष्ट्रीय वेसाक समारोह मनाया जा रहा था। श्रीलंका के बौद्ध पंचांग में यह सबसे अहम दिन माना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी इस समारोह के मुख्य अतिथि थे। अपने भाषण के दौरान मोदी ने कहा कि इस शुभ अवसर पर पूर्णत: आत्मजागृत सम्यकसम्बुद्ध की इस धरती पर मैं अपने साथ 125 अरब लोगों की शुभकामनाएं भी लाया हूं।

वास्तव में प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में श्रीलंका-भारत संबंधों ने एक नया और सकारात्मक मोड़ लिया है। दोनों देश उच्चस्तरीय कूटनीति के साथ जुड़ने के इच्छुक रहे हैं और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय यात्राएं कई गुना बढ़ गई हैं। इससे पहले राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने तीन-तीन बार दिल्ली के दौरे किए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-श्रीलंका संबंधों में पारस्परिक अविश्वास को समाप्त कर विश्वास का एक नया दौर शुरु करने की कोशिश की है। क्योंकि पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने भारत को एक पड़ोसी दोस्त की बजाय एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में देखा और क्षेत्रीय समीकरण के संतुलन के लिए उन्होंने चीन की तरफ अपना स्पष्ट झुकाव दिखाना शुरु किया। मोदी ने इस हालात को बदलने की सफल कोशिश की है। मोदी की यात्रा से पहले श्रीलंका द्वारा चीन की पनडुब्बी को हंबनटोटा बंदरगाह में उतारने की इजाजत देने के अनुरोध को ठुकरा देना भारत की पहली कूटनीतिक सफलता है। श्रीलंका ने न सिर्फ चीन के आग्रह को नकार दिया, बल्कि भारत की चिंताओं को देखते हुए चीन को दो टूक कह दिया कि यह असंभव है। इससे पहले श्रीलंका ने अक्टू बर 2014 में एक चीनी पनडुब्बीर को कोलंबो में खड़ा करने की इजाजत दी थी, जिसपर भारत ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था।

प्रधानमंत्री मोदी ने श्रीलंका के साथ सांस्कृतिक संबंधों को आधार बनाकर रिश्ते सुधारने की शानदार पहल की है। श्रीलंकाई लोग बहुतायत से जिस बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, उसके प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का जन्मस्थान भारत है। बौद्ध धर्म के संदेश के जरिए मोदी ने तमिल राजनीति की गंदगी से दोनों देशों के बीच के संबंधों को दूर ले जाकर सांस्कृतिक एकता के दायरे में ले आने की कोशिश की है। दोनों देशों के बीच धार्मिक व सांस्कृतिक एकता बढ़ने से न सिर्फ दोनों देशों के बीच 2500 वर्ष से चले आ रहे संबंधों में फिर से गर्मी आएगी, बल्कि भारत खुद को एक ऐसी सौहार्द्रपूर्ण शक्ति के रूप में पेश कर सकता है, जिसे श्रीलंका के सिर्फ विकास और कल्याण में दिलचस्पी है।

मोदी ने श्रीलंका जाकर तमिलों के मुद्दे को भी नजरंदाज नहीं किया। उन्होंने श्रीलंका में बेघर हुए तमिल लोगों के लिए 10,000 अतिरिक्त मकान बनाने की घोषणा की। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय के लिहाज से सिंहली, तमिल और मुस्लिम सभी के हित एक समान हैं।

श्रीलंका के साथ भारत के संबंधों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए भारत को दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक सहयोग के अलावा शिक्षा, शोध, सिनेमा, जल और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों को भी शामिल करना चाहिए। निश्चय ही इससे दोनों देशों के संबंध बेहद प्रगाढ़ हो जाएंगे।
 श्रीलंका जाकर प्रधानमंत्री मोदी ने चीन को साफ संदेश दिया है कि वह उसकी हर चाल से वाकिफ है और उसका जवाब देने के लिए सतर्क और तत्पर भी है।  
 
ओंकारेश्वर पांडेय
(लेखक दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं। 
संपर्क -editoronkar@gmail.com )


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