जी एम सरसों को लेकर स्वदेशी जागरण मंच का खुला ख़त प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी को !

प्रतिष्ठा में, श्री नरेंद्र मोदी माननीय प्रधान मंत्री, प्रधान मंत्री, भारत सरकार दक्षिण ब्लॉक, रायसीना हिल, नई दिल्ली - 110011 विषय : ...


प्रतिष्ठा में,
श्री नरेंद्र मोदी
माननीय प्रधान मंत्री, प्रधान मंत्री, भारत सरकार
दक्षिण ब्लॉक, रायसीना हिल, नई दिल्ली - 110011

विषय : अवैज्ञानिक, विषाक्त और जैव विविधता के लिए हानिप्रद जीएम सरसों का उत्पादन जल्दबाजी में प्रारम्भ किया जाना |

श्रीमान महोदय,

पिछले दिनों आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) द्वारा जीएम सरसों को सुरक्षित और पोषक तत्व के रूप में उत्पादन हेतु अनुमोदन किया गया है | स्वदेशी जागरण मंच, उनके द्वारा की गई उक्त सिफारिश पर अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त करता है | माना जाता है कि उक्त जीएम सरसों दिल्ली विश्वविद्यालय के विवादास्पद शोधकर्ता प्रोफेसर दीपक पेंटल द्वारा विकसित की गई थी । इस संबंध में हम यह तथ्य आपकी जानकारी में लाना चाहते हैं कि जीईएसी द्वारा 'स्वदेशी जीएम सरसों' की अनुमति देने में अनुचित जल्दबाजी की गई है तथा यह कहना कि इससे उपज बढ़ेगी और देश में खाद्य तेल का आयात कम करने में मदद मिलेगी, यह अनुमान निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा बनाए गए झूठे डेटा पर आधारित गलत निष्कर्ष है।

यह स्वदेशी बिल्कुल नहीं है -

इसे प्रारम्भ करने के लिए यह दावा किया जा रहा है कि जीएम सरसों पूर्णतः स्वदेशी है और इसे भारत में विकसित किया गया है, यह पूर्णतः असत्य है। हम आपकी जानकारी में लाना चाहते हैं कि 2002 में, प्रोआग्रो सीड कंपनी (बायर की सहायक कंपनी) ने इसी तरह के निर्माण के व्यावसायिक अनुमोदन हेतु आवेदन किया था, जिसे अब प्रो. पेंटल और उनकी टीम एचटी मोस्टर्ड डीएमएच 11 के रूप में प्रचार कर रही है। उस समय बेयर का उक्त आवेदन निरस्त करते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने कहा था कि उनके क्षेत्रीय परीक्षणों में बेहतर उपज का कोई प्रमाण नहीं मिला । यह जानामाना तथ्य है कि तथाकथित हाईब्रीड जीएम सरसों के हाइब्रिडिसेशन को बैक्टीस अमीलोलिकोफासिकेंस नामक एक मृदा जीवाणु से उत्पन्न, दो जीन बार्नेस और बारस्टार के माध्यम से उत्पन्न किया जाता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बार-बारस्टार-बार्नेस जीन, बायर क्रॉप साइंस की पेटेंट तकनीक है और बायर एक स्वदेशी कंपनी नहीं है | अतः उनके नाम पर पेटेंट कराए गए उत्पाद को स्वदेशी कैसे कहा जा सकता है ? वस्तुतः बायर ही प्रोफेसर पेंटल के सरसों में इस्तेमाल किए जाने वाले जीनों के पेटेंट के मालिक हैं, इस तथ्य को जानबूझकर भारत के लोगों से छुपाया गया है।

उच्च पैदावार का दावा भी गलत है -

एक अन्य पहलू जिसे हम उजागर करना चाहते हैं, वह यह कि जीएम सरसों से घरेलू उत्पादन में वृद्धि का किया जाने वाला दावा भी पूर्णतः निराधार और गलत है, नाही इससे हमारी आयात निर्भरता कम होगी। जीएमओ सरसों से स्वदेशी संकर की तुलना में अधिक उपज का कोई प्रमाण नहीं है । रैपसीड सरसों के अनुसंधान (डीआरएमआर) भरतपुर के आंकड़े स्पष्ट करते है कि प्रो. दीपक पैंटेल का यह दावा कि उनके जीएम सरसों ने 26 प्रतिशत उपज बढ़ाया है, भ्रामक है | देश में कई संकर किसमें मौजूद हैं, जिन्होंने ट्रांसजेनिक किस्म डीएमएच -11 को पीछे छोड़ दिया है। वास्तव में अपने शोध को महत्व दिलाने की खातिर इससे कहीं बेहतर गैर-जीएम संकर के अस्तित्व को छुपा दिया गया है | इसके स्थान पर उन्होंने जीएम सरसों के उपज की कुछ पुरानी और कम उत्पादन देने वाली किस्मों से तुलनात्मक आकड़ों का जाल रचा है । सचाई यह है कि सरसों की गैर-जीएम की मौजूदा किस्में प्रो. पेंटल की जीएम सरसों से कमसेकम 25 प्रतिशत अधिक उपज देती हैं ।

विदेशी मुद्रा में अपेक्षित बचत का गलत दावा -

हम यह बात भी आपकी जानकारी में लाना चाहते हैं कि शोधकर्ता द्वारा यह तथ्य छुपाया गया है कि बायर को रॉयल्टी भुगतान करना होगा, क्योंकि जीएम सरसों जोकि बायर के पेटेंटयुक्त बार्नाज-बारस्टार-बार्नेस जीन सिस्टम पर आधारित है | यह भी माना जा रहा है कि बायर अपने मौजूदा ब्रांडों के माध्यम से ग्लूफोसिन के प्रयोग को बढ़ावा देगा, जिससे उसे और भी अधिक लाभ होगा । अतः यह संदेह पुख्ता होता है कि सरसों का आयात कम हो ना हो, किन्तु पेटेंट के नाम पर देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा और अधिक बाहर जायेगी, साथ ही इसके उत्पादन हेतु जरूरी हेरिबाइसाइड का आयात भी करना होगा, जिससे देश की बहुराष्ट्रीय कंपनी पर निर्भरता बढ़ेगी ।

मानव और पशु स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव का पर्याप्त अध्ययन नहीं -

इस संबंध में हम फिर से लिखने के लिए विवश हैं कि खाद्य तेल के रूप में मानव और पशु स्वास्थ्य पर जीएम सरसों के प्रभाव का पता लगाने के लिए कोई दीर्घकालिक परीक्षण नहीं किए गए हैं। कृपया ध्यान दीजिये कि दुनिया भर में साबित हो चुका है कि जीएम फसलें व उनके साथ पैदा होने वाले खर पतवार, मधु मक्खियों के लिए हानिकारक हैं । जैसा कि आप जानते ही हैं कि मधुमक्खियां केवल शहद उत्पादन के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि कृषि उपज बढ़ाने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहता है । यह यही कारण है कि मधुमक्खी पालने वाले जीएम सरसों के प्रस्तावित उत्पादन के विरोध में सड़कों पर उतर आये हैं।

एक अन्य संभावित गुप्त विपत्ति -

कुछ बहुत खतरनाक तथ्यों पर ध्यान देना भी जरूरी है, क्योंकि जीएम सरसों को बास्टा प्रतिरोधक गुण के साथ इंजीनियर किया गया है। बास्टा बायर का खर पतवार नाशक है, जिसमें ग्लुफोसाइंट नामक एक तत्व है, साथ ही सर्फटेक्टर्स व अन्य जहर भी हैं । ग्लुफोसेंट एक न्यूरोटॉक्सिन है, अर्थात एक ऐसा जहर जो सीधे नाडी तंत्र पर प्रभाव डालता है | सरसों में बस्ता प्रतिरोधक का कोई आकलन नहीं किया गया था। एक अनौपचारिक बयान दिया गया है कि हेर्बिसाइड सहिष्णु गुण एक मार्कर के रूप में इस्तेमाल किया गया है। लेकिन एक बार बस्ता प्रतिरोधी गुण पेश करने के बाद, कोई भी बायर को खर पतवार नाशक के रूप में बास्सा बेचने से नहीं रोक पायेगा | बहुराष्ट्रीय कम्पनियां देश को जहरीले रसायनों का एक बाजार बनाना चाहती हैं। पहले हमारी खेती में रोगाणु फैलाना फिर उपच्रार के नाम पर जहर फैलाना, यही है उनका बेमिसाल नुस्खा । आशंका है कि जीएम सरसों की खेती में बायर्स के हर्बीसाईड (खरपतवार नाशक) के उपयोग से वहां की जमीन व आसपास का क्षेत्र अन्य फसलों के लिए अनुपयुक्त हो जायेगा। इस संदर्भ में आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना उपयुक्त होगा कि ग्लूफ़ोसिंट के प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए, हाल ही में यूरोपीय संघ द्वारा उसके प्रयोग पर कई प्रतिबंध लगाए गए हैं।

आखिर यह जल्दबाजी क्यों ?

जैसा कि ऊपर बताया गया है, प्रोफेसर पेनल का जीएम सरसों स्वदेशी नहीं है, न ही स्वदेशी संकर के मुकाबले इससे कोई उपज बढ़ने वाली है और न ही यह हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण और जैव विविधता के लिए भी ठीक है, ऐसे में अधिकारियों द्वारा की जा रही अनुचित जल्दबाजी समझ से परे तो है ही, साथ में उनके इरादों के बारे में भी गंभीर संदेह उत्पन्न होता है ।

यह दूसरी बार है, जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है, जब एक जीएम खाद्य फसल के वाणिज्यिक उत्पादन के लिए अनुमोदन हेतु विचार किया जा रहा है। इससे पहले यूपीए सरकार के दौरान भी बीटी बेंगन के मामले में ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा था । तब तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जय राम रमेश ने जनभावनाओं को तरजीह देते हुए बीटी बेंगन पर शोध करवाया और उसका डेटा सार्वजनिक कर अंततः बीटी बेंगन के उत्पादन को रोक दिया । वह बैंगन बड़े पैमाने पर मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता और कृषि के लिए हानिकारक होता |

इसके अलावा यह मामला भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, जिसमें माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अटॉर्नी जनरल द्वारा यह आश्वासन दिया गया है कि भारत सरकार "सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व अनुमोदन के बिना" डीएमएच 11 का उत्पादन प्रारम्भ नहीं करेगी | जब तक मामला अंतिम रूप से निराकृत नहीं होता, यथा स्थिति का भी अंतरिम मौखिक आदेश दिया गया है । इस मामले की कार्यवाही अब प्रगति पर है |

आग्रह -

अंत में हम इस बात को दोहराना चाहेंगे कि इस मामले में सत्य को छुपाया जा रहा है और सरकार को सुरक्षा, उपज और आईपीआर (पेटेंट वाले जीनों के कारण) के बारे में गुमराह किया जा रहा है। स्वदेशी जागरण मंच इस मामले में हस्तक्षेप करने तथा जीएम सरसों को निश्चित तौर पर कोई अनुमति न देने हेतु आपसे निवेदन करता है ।

देश के सर्वोत्तम हित में, जिसके लिए आप प्रतिबद्ध हैं, सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद के साथ,

धन्यवाद सहित 

सादर

डॉ अश्विनी महाजन
अखिल भारतीय सह संयोजक,
स्वदेशी जागरण मंच

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क्रांतिदूत: जी एम सरसों को लेकर स्वदेशी जागरण मंच का खुला ख़त प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी को !
जी एम सरसों को लेकर स्वदेशी जागरण मंच का खुला ख़त प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी को !
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