गाय की रक्षा मानवता की रक्षा - डा. राधेश्याम द्विवेदी

गौमाता चराचर जगत की माता हैं। इनकी रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। अथर्ववेद में आता है कि गौ हत्यारे को काँच की गोली से उड़ा दो। अतः ह...

गौमाता चराचर जगत की माता हैं। इनकी रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। अथर्ववेद में आता है कि गौ हत्यारे को काँच की गोली से उड़ा दो। अतः हे भारतवासियो ! जागो और गोवंश की हत्या रोकने के लिए आगे आओ। गौमाता धरती का गौरव है। भारत की 40 करोड़ एकड़ भूमि पर पैदावार तथा छोटे-बड़े भूखंडों के अनुकूल कृषिकार्य मात्र गोवंश ही कर सकता है। गायों से प्राप्त विभिन्न पदार्थों से विभिन्न उत्पाद बनाये जाते हैं जो मानव-जीवन के लिए अति आवश्यक हैं। गौमाता जो आजीवन हमें अपने दूध- दही- घी आदि से पोषित करती है। अपने इन सुंदर उपहारों से जीवनभर हमारा हित करती रहती है। ऐसी गौमाता की महानता से अनभिज्ञ होकर मात्र उसके पालन-पोषण का खर्च वहन ना कर पाने के बहाने उन्हें कत्लखानों के हवाले करना विकास का कौन सी मानवीयता है ? क्या गौमाता के प्रति हमारा कोई कर्त्तव्य नहीं बनता है ?

पंडित मदन मोहन मालवीयजी ने कहा है, ‘’यदि हम गौओं की रक्षा करेंगे तो गौएँ भी हमारी रक्षा करेंगी।‘’ गौमाता की दुर्दशा देख उसकी रक्षार्थ भारत के मनीषियों ने अनेकों बलिदान दिये। पूर्वकाल में करपात्रीजी महाराज, संत प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, महात्मा गांधी , आचार्य विनोबाजी भावे आदि अनेकों संत-महात्माओं व समाज-सेवकों ने गौवध-विरोधी आंदोलन चलाये। बाबा रामदेव , साध्वी ऋतम्भरा तथा अन्यानेक सन्त महात्मा आज भी गोरक्षा के मुहिम में लगे हुए हैं। देश में समय-समय पर गौहत्या के विरोध में आन्दोलन हुए हैं। 1967 में गौ-हत्या को लेकर उग्र आन्दोलन हुआ, संसद भवन को साधु-सन्तों ने घेरा था तो पुलिस ने उन पर बल प्रयोग किया था और लाठी-गोलियां भी चलाई थीं। तत्कालीन गृहमन्त्री स्व. गुलजारी लाल नन्दा को इस्तीफा देना पड़ा था। तत्कालीन इन्दिरा सरकार ने भारत की सांस्कृतिक एवं धार्मिक आस्था से जुड़े इस मसले को गंभीरता से नहीं लिया और उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। क्योंकि गाय भारत की आत्मा है, जन-जन की आस्था का केन्द्र है। अनेक धर्मगुरु एवं शंकराचार्यजी गौवंश के संवर्धन के लिए जीवनपर्यन्त समर्पित रहे और उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों पर गौशालाएं व गोचर भूमि सृजन के लिए प्रयास किये। गौवंश का कारोबार केवल दूध व डेयरी उत्पादन के लिए ही हो। हमें नहीं भूलना चाहिए कि दुग्ध उत्पादन से लेकर डेयरी उद्योग के विभिन्न कार्यों में मुसलमान नागरिक बहुतायत में लगे हुए हैं और उनकी रोजी-रोटी इसी से चलती है। कानून का पालन करना इनका भी पहला धर्म है और गौवंश की रक्षा करने में इन्हें भी अपना योगदान देना होगा और भारत के सुदूर गांवों में कुछ अपवादों को छोड़ कर मुस्लिम नागरिक अपना यह कर्तव्य निभाते भी हैं। 

एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना भारत में :- भारतवर्ष सदियों से अहिंसा का पुजारी रहा है। आज भारत एक हिंसक और मांस निर्यातक देश के रूप में उभरता जा रहा है। यह बड़ी विडम्बना है कि एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना अन्य इस्लामिक देशों में नहीं बल्कि भारत के महाराष्ट्र प्रान्त में है। जहाँ हजारों गायें रोज कटती है। दूसरी अल कबीर गोवधशाला आंध्रप्रदेश में है। यहाँ रोज 6 हजार गौएँ , इससे दुगुनी भैसें तथा पड़वे काटे जाते हैं। इसका लगभग 20,000 टन मांस विदेशों में निर्यात होता है। यह भारत के लिए चुल्लू भर पानी में डूग मरने जैसी हालात है। हिन्दू बहुल समाज होने के बावजूद गोवंश की हत्या जारी है। इनका हजारों-हजारों टन मांस विदेशों मे निर्यात होता है। पूज्य गौमाता के साथ ऐसी निर्दयता किसी प्रकार क्षम्य नहीं है।

निर्दयतापूर्वक मारा जाना :- कत्लखाने में गौओं को मौत के कुएँ में 4 दिन तक भूखा रखा जाता है। अशक्त होकर गिरने पर घसीटते हुए मशीन के पास ले जाकर उन्हें पीट-पीटकर खड़ा किया जाता है। मशीन की एक पुली (मशीन का पकड़नेवाला एक हिस्सा) गाय के पिछले पैरों को जकड़ लेती है। तत्पश्चात् खौलता हुआ पानी 5 मिनट तक उस पर गिराया जाता है । पुली पिछले पैरों को ऊपर उठा देती है। जिससे गायें उलटी लटक जाती हैं। फिर इन गायों की आधी गर्दन काट दी जाती है ताकि खून बाहर आ जाय लेकिन गाय मरे नहीं । तत्काल गाय के पेट में एक छेद करके हवा भरी जाती है, जिससे गाय का शरीर फूल जाता है । उसी समय चमड़ा उतारने का कार्य होता है । गर्भवाले पशु का पेट फाड़कर जिंदा बच्चे को बाहर निकाला जाता है । उसके नर्म चमड़े (काफ-लेदर) को बहुत महँगे दामों में बेचा जाता है। आज देश में वैध तथा अवैधरूप से हजारों कत्लखाने चल रहे हैं, जिनमें प्रतिदिन लाखों की संख्या में पशुधन काटा जाता है ।

गाय धरती का वरदान, जिसकी महिमा महान :- गौमाता के दर्शन एवं गाय के खुरों की धूलि मस्तक पर लगाने से भाग्य की रेखाएँ बदल जाती हैं, घर में सुख-समृद्धि एवं शांति बनी रहती है। जहाँ पर गौएँ रहती हैं उस स्थान को तीर्थभूमि कहा गया है, ऐसी भूमि में जिस मनुष्य की मृत्यु होती है उसकी तत्काल सद्गति हो जाती है, यह निश्चित है। - (ब्रह्मवैवर्तपुराण,श्रीकृष्णजन्म खंड रू 21.91-93)

गो-ग्रास देने तथा गाय की परिक्रमा करने से मनोकामना सिद्ध होती है, धन-संपदा स्थिर रहती है तथा अभीष्ट की प्राप्ति होती है। गाय को प्रेम से सहलाने से ग्रहबाधा, पीड़ा, कष्ट आदि दूर होते हैं। गौ के शरीर के रोम-रोम से गूगल जैसी पवित्र सुगंध आती है। उसके शरीर से अनेक प्रकार की वायु निकलती है जो वातावरण को जंतुरहित करके पवित्र बनाती है ।

यज्ञ से जीवन रक्षा :- देशी गाय के गोबर के कण्डों पर गाय का घी, जौ, तिल, चावल और मिश्री अथवा शक्कर डालकर हवन किया जाता है तो महत्वपूर्ण गैसें उत्पन्न होती हैं । उनमें से एक प्रोपिलीन ऑक्साईड गैस बरसात लाने में सहायक होती है । श्इथिलीन ऑक्साइडश् का गैस संक्रामक रोगों में एवं जीवनरक्षक दवाओं के रूप में प्रयोग होता है। इससे पर्यावरण शुद्ध, पवित्र तथा आरोग्यप्रद बनता है । इसलिए प्राचीन काल में अपने पूर्वज, राजा-महाराजा, ऋषि-मुनि, संत-महात्मा निरंतर अश्वमेध, विष्णुयाग, सहस्रकुंडी इत्यादि यज्ञ करते रहते थे। इससे खूब वर्षा होती थी व पर्यावरण शुद्ध और पवित्र होता था, महामारियाँ भी नहीं फैलती थीं।

अकाशीय ऊर्जा का संग्राहक - अंतरिक्ष में असंख्य तारे, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र, ग्रह, उपग्रह और असंख्य आकाशगंगाएँ हैं। आकाश से दिन-रात अनेक प्रकार की ऊर्जा की वर्षा पृथ्वी पर होती रहती है। उस ऊर्जा को झेलने का कार्य गौ के सींग करते हैं। गाय के सींगों का आकार पिरामिड जैसा होता है। यह एक शक्तिशाली श्एन्टेनाश् है। सींगों की मदद से गौ सभी अवकाशीय ऊर्जाओं को शरीर में संचित कर लेती है और वही ऊर्जा हमें गोझरण, दूध और गोबर के द्वारा देती है। इसके अलावा गाय की पीठ पर ककुद (डिल्ला) होता है जो कि सूर्य-अकाशीय कई तत्त्वों को शरीर में दूध, गोझरण तथा गोबर के द्वारा हमें देता है। गोमूत्र अवकाशीय ऊर्जा का भंडार है।

गोमूत्र चिकित्सा :- गोमूत्र विषाणुनाशक, रक्तविकार व वात-पित्त कफजन्य विकारों को दूर करने वाला एक श्रेष्ठ एवं पवित्र रसायन द्रव्य है । यह कायिक, मानसिक दोनों प्रकार के रोगों का नाश करता है । गोझरण प्रतिजैविक (एन्टीबायोटिक) है तथा सत्त्वगुण की वृद्धि करता है । यह शरीर में श्वेत रक्तकणों की वृद्धि कर रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाता है । इसके सेवन से शरीरगत विष मल-मूत्र व पसीने के द्वारा बाहर निकल जाते हैं। गोझरण शरीर के लिए आवश्यक विटामिन ए, बी, सी, डी और इ की पूर्ति करता है। इसके सेवन से प्राणशक्ति बढ़ती है। यह गुर्दे-संबंधी रोग दूर कर गुर्दे की सक्रियता और क्षमता को बढ़ाता है।

गोमांस भक्षण के भीषण दुष्परिणाम :-

(1 ) गोमांस एक घातक विषाणु को शरण देता है जिससे भोजन पूर्णतया विषाक्त हो जाता है ।
(2) गोमांस में डायोक्सिन नामक विषैला आर्गैनिक रसायन पर्याप्त मात्रा में होता है, जिससे कैंसर, एन्डोमीटिरियोसिस ,अक्षमता, निरंतर थकान, नाड़ीरोग, रक्तविकार तथा रोगप्रतिरोधक क्षमता का ह्रास आदि अनेक रोगों का जन्म होता है ।
(3) गोमांस व मज्जा भक्षण से घातक व भयावह जानलेवा रोग पैदा हो जाते हैं । इसका कोई उपचार नहीं है और ये बहुत घातक हेते हैं । यह मस्तिष्क का रोग परिवार में वंशानुगत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचारित हो जाता है । इस प्रकार गोमांस भक्षण से वह वंश ही समाप्त हो जाता है ।
(4) गोमांस भक्षण से मानव शरीर में प्रोस्टेगलेंडीन नामक हरमोन उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण हृदयरोग और पक्षाघात जैसे जानलेवा रोगों को जन्म देता है ।
(5) गोमांस में लम्बी कार्बन श्रृंखलावाले प्रोटीन रहते हैं, गोमांस भक्षक-वात रोग और जोडों के दर्द के शिकार हो जाते हैं ।
(6) यूनानी चिकित्सा शोध से पता चला है कि गाय के गोश्त खाने से पागलपन, गठिया और कोढ़ आदि बीमारियाँ हो सकती हैं ।
(7) हृदयरोग विशेषज्ञ परामर्श देते हैं कि गाय आदि पशुओं के मांस अचानक हृदय गति रुकने में भूमिका निभाता है । 

गाय की वैज्ञानिक महत्ता व फायदे :-

1. एक महान रूसी वैज्ञानिक शिवोरिच के अनुसार गाय के दूध में आणविक विकिरणों को रोकने की क्षमता है ।
2. गाय के गोबर से लीपे हुए घर (हानिकारक) विकिरणों का प्रतिरोध करती हैं ।
3. सूर्य की गोकिरण को सोखने की क्षमता मात्र गाय में ही है। गाय के दूध में सुवर्णक्षार पाए जाते हैं।
4. गायों के चलने की आवाज से स्वतरू बहुत सारी मानसिक खराबियाँ एवं बीमारियाँ दूर हो जाती है ।
5. मद्रास के प्रसिद्ध डॉ. किंग के अनुसार गाय के गोबर में हैजा के कीटाणुओं को खत्म करने की शक्ति है ।
6. क्षयरोग के रोगी को जब गौशाला में रखते हैं तब उसका गाय के गोबर और गोमूत्र की सुगंध से इलाज होता है ।
7. यह सिद्ध हो चुका है कि गोमूत्र में ताँबा होता है जो मनुष्य शरीर में जाते ही सोने में परिणत हो जाता है जिसमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता है ।
8. गाय को पृथ्वी का सबसे बडा वैद्यराज(चिकित्सक) माना गया है ।


गौहत्या की रोकथाम में हमारा योगदान- गाय से प्राप्त दूध, दही, घी ,गोझरण व गोझरण युक्त फिनायल एवं गाय के गोबर से निर्मित वस्तुओं को हम अपने दैनिक जीवन की आवश्यकता बना लें। गाय से प्राप्त इन सभी चीजों का अधिक-से-अधिक उपयोग करना भी गाय की सेवा है। रोजगार के अवसर देने की दृष्टि से गोपालन सबसे अच्छा साधन है । गौ आधारित उद्योग रू फिनायल, धूपबत्ती, अगरबत्ती, अन्न सुरक्षा टिकिया, मच्छर निरोधक क्वायल, गोमय शेम्पू, बर्तन मांजने का पाउडर, गोरस भंडार, गोबर गैस प्लांट इत्यादि । गायों को कसाइयों के हाथों न बेचें। गायों के चमड़े से बनी वस्तुओं जैसे जूता, टोपी, बेल्ट, पर्स आदि का उपयोग बिल्कुल न करें । हिंदू संस्कृति में यह नियम था कि भोजन मेंसे गाय के लिए अग्राशन निकाला जाता था, जिसे हम भूल गये। अतः आज से हम नियम लें कि भोजन में से गाय के लिए अग्राशन निकालेंगे। गो-ग्रास खिलाने का आग्रह रखें। किसान-परिवार तथा जिनके पास जगह हो वे गौपालन कर गौसेवा का पुण्य व स्वास्थ्य-लाभ अर्जित करें।वर्तमान में गौरक्षा व देश की सांस्कृतिक परम्परा को बचाने के लिए संस्कृति रक्षक संघ ने क्रांति का शंखनाद किया है।आइये, हम सब साथ मिलकर गाय व संस्कृति की रक्षा के लिए आगे बढें ।

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गाय की रक्षा मानवता की रक्षा - डा. राधेश्याम द्विवेदी
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