लुटियंस दिल्ली बनाम साँपों का पिटारा – राजनीति के माध्यम से देश के शरीर में जहर घोलने का षडयंत्र - राकेश कृष्णन सिंह

क्या आपने कभी विचार किया है कि कई तथाकथित उदारवादी, वामपंथी और मुख्यधारा के पत्रकार, भारत की प्रगति चाहने वाले भारतीयों के खिलाफ क्यों ख...

क्या आपने कभी विचार किया है कि कई तथाकथित उदारवादी, वामपंथी और मुख्यधारा के पत्रकार, भारत की प्रगति चाहने वाले भारतीयों के खिलाफ क्यों खड़े दिखाई देते हैं? यहाँ तक कि वे आम भारतीयों के विचारप्रवाह की भी सदा आलोचना करते क्यों दिखाई देते हैं? आखिर क्यों उन्होंने डिमोनीटाईजेशन को विफल घोषित किया, भले ही अरबों आम नागरिकों ने लंबी कतारों में शांतिपूर्वक खड़े रहकर भी सरकार को अपना समर्थन दिया? उनका विरोध तब क्यूं कुंद हो जाता है, जब एक ईसाई चर्च में अपराधी तत्वों की घुसपैठ हो जाती है, या मुस्लिम आतताई बंगाल में एक पूरे हिन्दू शहर को हफ़्तों तक लूटते और जलाते रहते हैं? किन्तु जब कथित रूप से मांस परिवहन करते मुसलमानों पर हमला किया जाता है, तो इन समूहों के कर्कश स्वरों का, घडियाली आंसुओं का हफ़्तों तक अंत नहीं होता है | किन्तु जब अमरनाथ तीर्थ यात्रा के दौरान कश्मीरी आतंकवादियों द्वारा छः हिंदू महिलाओं की निर्मम ह्त्या कर दी जाती है, तो ये इसे महज एक ट्वीट के लायक घटना मानते हैं | क्यों वे हमेशा कट्टरपंथी मुसलमानों, ईसाई धर्मान्धता या चीन से प्रेरित कम्युनिस्टों जैसी भारत विरोधी शक्तियों के साथ खड़े दिखाई देते हैं? उनकी पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति क्यों हैं, भारत के विनाश या इस्लामीकरण का सबसे बुरा असर आखिर किस पर होगा?

इन बिन्दुओं को समझने के लिए आपको राजनीति की आतंरिक संरचना जानने या समाचार मीडिया के कामकाज की पूरी जानकारी समझने की जरूरत नहीं है। बस धन पर ध्यान केन्द्रित करें तो सब समझ में आ जाएगा | कहने को तो मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी है, जहां धन का सर्वाधिक प्रभाव है, लेकिन वास्तविकता यह है कि राष्ट्रीय राजधानी में धन कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां, अलग-अलग समूह हैं जैसे नौकरशाह, पत्रकार, फिक्सर, तथाकथित बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ, जो एक विशिष्ट स्थान रखते हैं और लुटियंस दिल्ली के रूप में जाने जाते हैं | इस मशीनरी के बीच एक अनैतिक सम्बन्ध पनपा है, जिसे नकद नारायण ने परवान चढ़ाया है | इनकी नजर हमेशा ऑफ-द-बुक भत्तों, दीर्घकालिक हराम की कमाई और मुफ्त के ऐशो आराम पर रहती है ।

लुटियन दिल्ली का संक्षिप्त इतिहास

1 9 31 में जब अंग्रेजों ने कोलकाता के स्थान पर नई दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया, तब शहर के मध्य स्थित केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र को साम्राज्य के नौकरशाहों के लिए आरक्षित किया गया। सुन्दर और विशाल उद्यानों और आलीशान भवनों से सुसज्जित इस क्षेत्र में अवसरों की भी भरमार थी | तबसे इस क्षेत्र को इसके डिजाइनर एड्विन लुटियन के नाम पर लुटियन दिल्ली के नाम से जाना जाने लगा। इनमें से कई प्रशासक सामान्य लोग थे - उपनिवेशवादियों की मानसिकता बहुत साफ़ थी, वे लोग भारत पर शासन करने आये थे, सेवा करने नहीं । इन प्रशासकों में कई लोग बेहद सामान्य लोग थे, जिनकी एकमात्र योग्यता उनकी सफेद त्वचा थी | न तो उनमें बुद्धि थी न कोई सामान्य ज्ञान । इसके बाद भी उन्हें अपार धनराशि का भुगतान किया जाता था। इनमें से प्रत्येक नौकरशाह के पास दर्जनों भारतीय कर्मचारी थे |

जब 1 9 47 में ब्रिटिश जल्दबाजी में भारत से गए, तो उनके वे ही कर्मचारी उनके स्थान पर प्रशासक बन बैठे, जिन्हें हम मैकाले के मानसपुत्र कह सकते हैं | इन लबाड प्रशासकों ने भारत में एक नई श्रेणी को जन्म दिया, जो केवल नाम से भारतीय थे, अन्यथा भारतीय संस्कृति और भारतीयता के विचार से उनका दूर दूर तक कोई बास्ता न था | उलटे आम भारतीयों के प्रति पूर्वाग्रह इन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था | अतः जो व्यवहार ब्रिटिश शासकों ने आम भारतीयों के साथ किया था, वही व्यवहार इन लोगों ने जारी रखा । वे थॉमस मैकाले के अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम 1835 का उत्पाद थे, जिसका एकमात्र उद्देश्य उन लोगों का एक वर्ग बनाना था, जो ब्रिटिश प्रशासन को भारत में शासन करने में सहायता करेंगे।

लगभग हर देश में जब दमनकारी शासकों या उपनिवेशवादियों को स्वतंत्रता सेनानियों या क्रांतिकारियों द्वारा उखाड़ फेंका गया, तो उन देशों ने पुराने तरीकों को त्याग कर नई व्यवस्था बनाई । फिर चाहे 1917 की क्रांति के बाद रूस की आजादी हो, 1949 की क्रान्ति के बाद का चीन हो, या 1975 में अमेरिकियों को हराने के बाद का वियतनाम, सब जगह यही हुआ ।

इसके विपरीत, जल्दबाजी में ब्रिटिश वापसी के बाद, भारत में कुछ भी बदलाव नहीं हुआ। केवल नाम बदल गया, औपनिवेशिक लुटेरों का स्थान कांग्रेस संस्कृति ने ले लिया, यह एक आसान संक्रमण था । ब्रिटिश काल में उनकी लूट को सुविधाजनक बनाने वाली नौकरशाही ने, नाममात्र को आजाद भारतीयों को लूटने में अपने साथ राजनीतिक वर्ग को भी शामिल कर लिया । इसीका कारण रहा कि जब कांग्रेस ने उद्योगों के संचालन हेतु सोशलिस्ट स्टाइल परमिटों की शुरुआत की, तो बिचौलिए अंदर आ गए। ये फिक्सर्स जल्द ही पत्रकारों से जुड़ गए, जिन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के माध्यम से बड़ी आसानी से बहुत कमाई हो सकती है।

उपरोक्त समूहों के बीच का यह गठबंधन सबके लिए बहुत लाभदायक था | अतः जिससे भी इन्हें खतरा प्रतीत होता है, वह इनके निशाने पर आ जाता है | जैसे सिसिली में माफिया ने ईमानदार न्यायाधीशों और उन पुलिसकर्मियों को खत्म करने की कोशिश की, जो उनक रास्ते की रुकावट बने | उसी प्रकार भारत का यह लुटियन माफिया, जो भी इनके चारागाह की घांस कम करने की रत्ती भर की कोशिश करता है, या इनको यह आभाष भर होता है कि वह इनके लिये खतरा बन सकता है, तो ये सब एकजुट होकर उसे रास्ते से हटाने में जुट जाते हैं | यही कारण है कि वह मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व उनके निशाने पर है | विशेष रूप से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, जो लुटियंस दिल्ली की इतनी योजनापूर्वक गढ़ी हुई लूट संस्कृति को खत्म करने की धमकी देते हैं। 

साभार आधार - indiafacts.org


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