विकसित होता कोटा बनाम लगातार पिछड़ती शिवपुरी - एक तुलनात्मक विश्लेषण - दिवाकर शर्मा

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आज हम आपको भारत के दो शहरों की कहानी बताने जा रहे है | इन दोनों शहरों की स्थिति ९० के दशक में लगभग समान कहीं जा सकती है, परन्तु ...





आज हम आपको भारत के दो शहरों की कहानी बताने जा रहे है | इन दोनों शहरों की स्थिति ९० के दशक में लगभग समान कहीं जा सकती है, परन्तु वर्तमान में इन दोनों शहरों की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है | यह दो शहर है राजस्थान स्थित कोटा एवं मध्यप्रदेश स्थित शिवपुरी | इनमें से कोटा जहाँ प्रगतिशील शहरों की श्रेणी में शुमार होकर देश की शैक्षणिक नगरी के रूप में स्थापित हो चुका है एवं हाल ही में वर्ल्ड ट्रेड फोरम की सूची में दुनिया का सातवां सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ वाला शहर बन चुका है वहीँ दूसरी ओर शिवपुरी अपनी पहचान को बनाये रखने एवं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है | 

९० के दशक के दौरान दोनों ही शहरों का मुख्य रोजगार पत्थर की खदानें हुआ करती थी | इसके अतिरिक्त जहाँ कोटा में जेके उद्योग एवं शिवपुरी में शारदा सॉल्वेंट उद्योग लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते थे | 

कोटा की बात करें तो अस्सी के अंतिम दशक एवं ९० के प्रारम्भ में कोटा दोराहे पर था | यहाँ उथल-पुथल की स्थिति थी | औद्योगिक यूनिटें बंद होने लगी | मशहूर जेके ग्रुप की यूनिटों में तालाबंदी हो गयी | अचानक हजारों परिवारों पर आफत आ गयी | कई परिवार सड़कों पर आ गए एवं कई लोगों ने आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या तक की | बेरोजगारी बढ़ी तो सामाजिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ा | इस विषम परिस्थिति से कोटा को जेके फैक्टरी में काम करने वाले कुछ ऊर्जावान लोगों ने संकट से बाहर निकाला | 

जेके में काम करने वाले हैंडीकैप्ट बीके बंसल ने अपने घर से कोचिंग प्रारम्भ की | बीके बंसल की पृष्ठभूमि इंजीनियरिंग की थी | स्थानीय स्तर पर उनकी कोचिंग चल पड़ी | 5-7 वर्षों में कई बच्चे आईआईटी-एनआईटी में चुने गए | राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार में बंसल का नाम होने लगा | इसी समय एलन कोचिंग संस्थान अस्तित्व में आया | एलन के प्रमुख भी जेके के कर्मचारी थे | एलन की पहचान मेडिकल कॉलेज की थी | वर्ष 2000 के आसपास दुसरे कोचिंग संस्थान भी खुले | रेजोनेंस, बाइब्रेन्ट, आकाश, कॅरियर पॉइंट जैसे संस्थान के आने के बाद इनके बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हुई | व्यावसायिक तरीके से यह संस्थान खड़े हुए | आज कोटा में 100 से अधिक कोचिंग संस्थान चल रहे है | इनका कारोबार करोडो में है | आज के कोटा के केंद्र में कोचिंग इंस्टिट्यूट है | इसी के आसपास सब कुछ है | एक तरह से यहाँ के कोचिंग इंस्टिट्यूट नियामक शक्ति बन चुके है | इस पर यहाँ का हर व्यक्ति मुहर लगाता है कि कैसे कुछ लोगों ने अपनी पहल से पूरे कोटा को नया जीवन दिया | इसमें सरकार या राजनीति की कोई भूमिका नहीं थी | 

कोचिंग संस्थानों के खुलने से होटलों का कारोबार नए सिरे से चलने लगा | कोचिंग संस्थानों के प्रारम्भ होने से पूर्व लोगों को होटल बेचने पड़ रहे थे परन्तु कोचिंग संस्थानों के खुलने के बाद सब कुछ बदल गया | आज कोटा में होटलों का कारोबार लगभग 300 करोड़ का है | पूरे देश से छात्र कोटा अध्ययन हेतु आते हैं, उनके कारण घर घर में पेइंग गेस्ट हॉउस और मेस चालू हो गए हैं | आज कोटा ने 5-5 पावर प्लांट है | एटॉमिक, हाइडल, थर्मल, बायो बेस्ड और गैस आधारित पावर प्लांट से साढ़े पांच हजार मेगा वाट बिजली पैदा होती है | चम्बल में सालों पानी भरा रहता है | यहाँ बिजली, पानी की कोई कमी नहीं है | डीसीएम की यूनिटें चल रहीं है उनमें फर्टिलाइजर, धागा और सीमेंट का उत्पादन हो रहा है | 

कोटा आज दो भागों में विभक्त हो चूका है | एक नया कोटा तो दूसरा पुराना कोटा | नए कोटा में कुछ वर्ष पूर्व एक हजार वर्ग फुट जमीन की कीमत कुछ हजार रुपये हुआ करती थी अब करोड़ से कम नहीं है | नए कोटा में बड़ी बड़ी इमारतें बन रहीं है, हॉस्टल बन रहे है, मेस का धंधा चल निकला है | रियल स्टेट म पांच सौ करोड़ के रनिंग कैपिटल पर काम चल रहा है | विज्ञान नगर, तलवंडी, महावीर नगर, रंगबाड़ी, गुमानपुरा, जवाहर नगर, आरके पुरम जैसे इलाके बस गए जो कभी कोटा के बाहरी हिस्से हुआ करते थे | 

अब बात करते है शिवपुरी की | 

शिवपुरी में सम्पन्नता की कमी कभी नहीं रही | कमी रही तो इच्छा शक्ति की, कल्पनाशीलता की | शहर के धनपतियों ने शिवपुरी छोडकर इंदौर, उज्जैन, दिल्ली, मुम्बई का रुख किया और वहां पूंजी निवेश कर सफलता की सीढियां चढ़ने लगे | उन्होंने यह विचार नहीं किया कि शिवपुरी में वे बिना ताज के सरताज थे, जबकि महानगरों के अथाह समुद्र में मात्र एक लहर के समान | बेशक वे करोड़पति से अरब पति बन गए हों, किन्तु उनसे कई गुना ज्यादा धनपति व ऐश्वर्यशाली लोग वहां पहले से ही विद्यमान थे | 

खदान उद्योग को राजनीति की दीमक चट कर गई तो शारदा साल्वेंट को परिस्थितियों ने निगल लिया | कोटा में जे.के. बंद होने के बाद उसके कर्मचारियों ने अपने शहर के लिए प्रगति के द्वार खोले, किन्तु शिवपुरी में किसी ने इस दिशा में गंभीरता से नहीं सोचा, जिन कुछ लोगों ने कुछ अलग करने का प्रयत्न किया उन्हें यहाँ की जनता का पर्याप्त सहयोग प्राप्त नहीं हुआ | कुछ कोचिंग संस्थान कोटा जैसे शहरों की तर्ज पर शिवपुरी में विगत कुछ वर्षों में खोले गए है परन्तु बच्चों को पढ़ने बाहर भेजने की मानसिकता के चलते इंडक्टैंस जैसे कोचिंग संस्थान, जहाँ बाहर के अनुभवी शिक्षकों के माध्यम से शिक्षा की आधुनिक व्यवस्था की गयी है, भी उतना प्रसिद्ध नहीं हो पा रहे है जिसके वह हक़दार है | खदान के लीज सिस्टम ने केवल राजनेताओं को करोडपति अरबपति बनाया, किन्तु मेहनतकश मजदूर फाकेकशी को ही मजबूर रहा | बाद में बदनामी के चलते लीज सिस्टम ख़तम किया गया, किन्तु खदानों को चलाने की कोई नई पद्धति सरकार ने नहीं सोची | जब नेताओं को आर्थिक लाभ नहीं मिलना तो फिर खदान चलाने में भला किसकी दिलचस्पी ? 

कोटा में आम जन जागरुक है, वहां राजनेताओं को अर्श से फर्श पर लाते जनता को देर नहीं लगती | इसलिए वे चोंकन्ने रहते हैं, और आमजन के हित अहित का विचार भी करते हैं | राजस्थान के गृह मंत्री शांति धारीवाल , कोटा राजघराने के युवराज एवं पूर्व सांसद इज्यराज सिंह जैसे नामचीन नेता को भी वहां पराजय का स्वाद चखना पड़ा | किन्तु शिवपुरी तो भोलेभंडारी शिव की नगरी है, यहाँ नेताओं को पूर्ण अभयदान है | खुदी हुई सड़कें भले ही जनता को दमे का मरीज बना दें, बारिश के बाद डेंगू के शिकार होकर नौनिहाल मरते रहें, मजाल है किसी के कान पर जूं रेंग जाए | 

कहने का आशय यह कि किसी भी शहर की प्रगति शहर वासियों की जागरूकता व इच्छाशक्ति पर ही निर्भर होती है | अगर वे सुस्त हैं, तो चुस्त नौकरशाही और राजनेता उनका शोषण करेंगे ही | हरा चरागाह मिले जहाँ रखवाली को कोई बिजूका भी ना हो, तो चरने में किसको ऐतराज होगा ?

दिवाकर शर्मा
संपादक - क्रांतिदूत डॉट इन


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क्रांतिदूत: विकसित होता कोटा बनाम लगातार पिछड़ती शिवपुरी - एक तुलनात्मक विश्लेषण - दिवाकर शर्मा
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