राह अशक्ति से मुक्ति की - पूनम नेगी

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आज के दुखों का प्रमुख कारण है अशक्ति। व्यक्ति की जीवन के प्रति आस्थाएं गड़बडा गयी हैं। अचिन्त्य चिन्तन से उत्पन्न तनाव विस्फोटक होता जा र...

आज के दुखों का प्रमुख कारण है अशक्ति। व्यक्ति की जीवन के प्रति आस्थाएं गड़बडा गयी हैं। अचिन्त्य चिन्तन से उत्पन्न तनाव विस्फोटक होता जा रहा है। सच्ची प्रसन्नता व प्रफुल्लता कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दृष्टिगोचर होती है। सभी को अभाव की शिकायत है। चाहे धन का अभाव हो, चाहे शारीरिक शक्ति का और चाहे मानसिक शक्ति व संतुलन का। आज व्यक्ति दुखी है, उद्धिग्न है। प्रत्येक भावनाशील युग की भयावह समस्याओं से मुक्ति चाहता है। कैसे मिलेगी मुक्ति? निसंदेह शक्ति के अवलम्बन से। सर्वविदित तथ्य है कि बिखराव से शक्ति का अपव्यय हो जाता है पर यदि उसे एकत्रित या केन्द्रित कर दिया जाये तो असाधारण ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है। उदाहरण के लिए यदि बारूद को बिखेर कर उसमें आग लगा दी जाये तो वह भक से जल पड़ेगी लेकिन यदि वही बारूद एक गोली में भर कर बन्दूक की नली में केन्द्रित करके निशाना लगाया जाये तो वह गोली कठोर से कठोर निशाने को भेद कर आर-पार छेद कर देगी। शक्ति संचय के लिए युग की मांग के अनुकूल सर्वाधिक उपयुक्त साधनाकाल है प्रस्तुत "नवरात्र" काल। 

जानते हैं क्यूं! जिस प्रकार दिन-रात के 24 घंटों में ईश्वर की उपासना के लिए प्रात:काल की ब्रह्मबेला सर्वोत्तम होती है, उसी प्रकार वार्षिक साधनाकाल की दृष्टि से साल में आने वाले दो नवरात्र काल (चैत्र व आश्विन) सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं। आध्यात्मिक विभूतियों की मान्यता है कि इस समय वायुमंडल में दैवीय शक्तियों के स्पंदन अत्यधिक सक्रिय होते हैं और वे सुपात्रों को साधना के अनुदान बांटने को तत्पर रहती हैं; इन नौ दिनों में सच्चे हृदय से की गयी छोटी सी साधना चमत्कारी नतीजे देती है। इसलिए हिन्दू दर्शन में "नवरात्र" को सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना जाता है। प्रस्तुत नवरात्र पर्व ऐसा देवपर्व है जिसे अध्यात्म के क्षेत्र में मुर्हुत विशेष की मान्यता प्राप्त है। ऋतु परिवर्तन की यह बेला वस्तुत: साधना के द्वारा शक्ति संचय की है। वैसे तो आत्मिक प्रगति के लिए किसी अवसर विशेष की बाध्यता नहीं होती लेकिन नवरात्र बेला में किये गये उपचार संकल्पबल के सहारे शीघ्र गति पाते तथा साधक का वर्चस्व बढ़ाते हैं। इस समय देव प्रकृति की आत्माएं किसी अदृश्य प्रेरणा से प्रेरित होकर आत्म कल्याण व लोक मंगल के क्रिया-कलापों में अनायास ही रस लेने लगती हैं । सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह भी इन दिनों तेजी से उभरते व मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं। चिंतन प्रवाह को अप्रत्याशित मोड़ देने वाली तरंगे भी इन नौ दिनों में विशेष रूप से उठती हैं। यों तो आज के आपाधापी और तेजी से दौड़ते समय में आम आदमी के पास न तो कड़ी तपश्चर्या का समय है और न ही सुदृढ़ मनोबल लेकिन यदि नौ दिनों की इस विशेष अवधि में जब वातावरण में परोक्ष रूप से देवी शक्तियों के अप्रत्याशित अनुदान बरसते रहते हैं। इसलिए साधना की इस अमृत बेला का लाभ आत्म व लोककल्याण के आकांक्षी को उठाना ही चाहिए। छोटी सी संकल्पित साधना से भी चमत्कारी परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं। 

नवरात्र की महत्ता उसकी सदुपयोगिता में ही है। नवरात्र के नौ दिन की साधना शरीर, मन और आत्मा का शोधन करती है। इससे मन, वाणी व कर्म तीनों में शुद्धता आती है। इस नवरात्र साधना से वाह्य प्रकृति के साथ हमारी आंतरिक प्रकृति के तीनों गुणों सत्व, रज और तम में भी संतुलन आता है। इसलिए नवरात्र काल को सकारात्मक शक्ति से परिपूर्ण सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना गया है। 

तात्विक दृष्टि से विवेचन करें तो जैसे कोई शिशु अपनी मां के गर्भ में नौ महीने रह विकसित -पोषित होता है उसी तरह नवरात्र के नौ दिनों का आध्यात्मिक जागरण काल हमारी मनोभूमि को पवित्र व शुभ विचारों से पुष्पित पल्लवित करता है। 

सर्वविदित है कि हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण- तीनों प्रकार के गुण व्याप्त हैं। इन तीनों गुणों को सम पर साधने के लिए हमारे वैदिक मनीषियों ने साधना का तर्क सम्मत विधान बनाया था। दुर्गासप्तशती के अनुसार इन नौ दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना की जाती है, अगले तीन दिन रजोगुणी और अंतिम तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का विधान है। इन अलग अलग अवधियों में साधक को क्रमश: मां दुर्गा, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती की उपासना का नियम सप्तशती में मिलता है। मार्कडेय ऋषि मां दुर्गा की अभ्यर्थना करते हुए सप्तशती के तंत्रोक्त सूक्त में लिखते हैं, "या देवी सर्वभुतेषु चेतनेत्यभिधीयते" अर्थात हे मां! तुम ही सभी जीव जंतुओं में चेतना रूप में स्थित हो। तत्व रूप में कहें तो नवरात्र मां शक्ति के अलग अलग रूपों से प्रेरित व शिक्षित होने और उत्सव मनाने का पर्व है। इस अवधि में ज्यों ज्यों हमारी साधना प्रखर होती जाती है त्यों त्यों जीवन में सृजनात्मकता का प्रस्फुटन होता जाता है फिर विजयोत्सव के साथ हम अपनी साधना को सम्पन्न करते हैं; क्योंकि हम तीनो गुणों के परे त्रिगुणातीत अवस्था में आ जाते हैं। हमारे जीवन में काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ आदि जितने भी राक्षसी प्रवृति हैं उसका हनन करके विजय का उत्सव मनाते है। एक तरह से समझ लीजिये की हम अपनी बैटरी को रिचार्ज कर लेते हैं। 

दरअसल हमारे भारतीय पर्वों की यही खूबसूरती है कि वह धार्मिक कर्मकांडों के सहारे बड़ा सामाजिक सन्देश देते हैं। आप कोई भी पर्व उठा लें होली, दीवाली, रक्षाबंधन या फिर नवरात्र, आपको हर पर्व के पीछे मजबूत सामाजिक सन्देश नज़र आएगा। इसी क्रम में प्रस्तुत नवरात्र पर्व शक्ति की महत्ता का द्योतक है। देखा जाए तो नवरात्र का महत्त्व सामाजिक रूप से विविध रूपों में शक्ति पूजन के साथ को इस बात का बोध भी होता है कि अगर इस संसार में यदि राष्ट्र की मातृशक्ति सुरक्षित नहीं तो ऐसी शक्ति पूजा बेमानी है। 

आज हमारे समाज में हर रोज, हर घंटे महिला अपराध बढ़ते जा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के साल 2017 के आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि देश में दुष्कर्म और यौन शोषण के मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। तमाम कानून बनने के बाद भी दुष्कर्म की घटनाएं लगातार जारी हैं। कभी सोचा है हमने कि जैसे-जैसे हमारा समाज अधिक शिक्षित और प्रगतिशील होता जा रहा है, वैसे-वैसे ही समाज में महिलाओं के यौन उत्पीड़न के मामले बढ़ रहे हैं। हाल के दिनों में नाबालिग बच्चियों (कन्याओं) के साथ दुष्कर्म के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी होना गम्भीर चिन्ता का विषय है। परन्तु क्या हम वाकई चिंतित है, यह प्रश्न उससे भी बड़ा है। अध्यात्मवेत्ताओं का मानना है कि इन कुत्सित अपराधों का मूल कारण है हमारा हमारी जड़ों से कटते जाना, अपने सांस्कृतिक जीवनमूल्यों को दरकिनार कर पश्चिम की नितांत भोगवादी संस्कृति व बाजार के मायाजाल में फंसना। भारतीय मनीषा करती है कि समाज में पशु प्रवृत्तियां तभी प्रबल होती हैं जब मानव समाज में सात्विकता व नैतिकता का हृास हो जाता है और व्यक्ति अपने कर्तव्य से च्युत होकर भोग विलास, स्वार्थ एवं अधिकार मद के कारण विवेक शून्य हो जाता है। यही वजह है कि मात्र कड़े कानून बना देने से ही इस प्रकार की घटनाओं पर रोक लग पाना सम्भव नहीं है। इसके लिये समाज को भी नैतिक रूप से सजग होना पड़ेगा। हमारे समाज में भ्रूण हत्या, बलात्कार जैसे कुकृत्य से लेकर दहेज़ हत्या तक अनेक ऐसे प्रचलन हैं, जिनका ज़िक्र करते हुए भी न केवल व्यक्तिगत रूप में हमारा माथा शर्म से झुकता है, बल्कि सामाजिक रूप से भी हम कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहते। 

सनद रहे कि मातृ सत्तात्मक समाज हमारी आर्य संस्कृति की अनूठी विशिष्टता है। भारत की यशस्वी संस्कृति स्त्री को विभिन्न रूपों में मान देती है। वह जन्मदात्री मां के रूप में पोषक है, पत्नी के रूप में गृहलक्ष्मी तथा बहन व बेटी के रूप में घर की रौनक। प्रत्येक स्वरूप रूप में उसका अपना ही महत्व है। हमारे यहां "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: " कह कर नारी को देवी का मान दिया गया है। देवी दुर्गा वस्तुत: स्त्री शक्ति की अपरिमितता की द्योतक हैं। हमारे ऋषियों ने आदिशक्ति की इसी गौरव गरिमा को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए ऋतु परिवर्तन की बेला में नवरात्र साधना की परम्परा डाली थी। वैदिक चिंतन कहता है कि मां आदिशक्ति ही विविध अंश रूपों में सभी देवशक्तियों में विराजमान हैं। उनके बिना समस्त देवशक्तियां अपूर्ण हैं। शक्ति यानी भयमुक्ति। शक्ति उपासना के इस विशिष्ट साधनाकाल में साधक आदि शक्ति की उपासना के साथ विभिन्न रूपों नारी शक्ति की गरिमा को साकार रूप देते हैं। श्रीमद्देवी भागवत के "दुर्गा सप्तशती" अंश में भगवती दुर्गा की अभ्यर्थना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की गयी है। सप्तशती के 13 अध्यायों में इन्हीं महाशक्ति के द्वारा आसुरी शक्तियों के विनाश की कथा विस्तार वर्णित है जिसके पीछे शक्ति की महत्ता का दिव्य तत्व दर्शन निहित है। महिषासुर पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। कथा का तत्वदर्शन है कि जब भी समाज पाशविक प्रवृत्तियां सिर उठाती हैं तब संसार में हाहाकार मच जाता है। दुर्भाग्यवश आज हमारा समाज अपनी गौरवशाली भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल जीवनमूल्यों को भुलाता जा रहा है। यही वजह है कि अनाचार, दुराचार, कदाचार व भ्रष्टाचार जैसे असुर अपना शिकंजा फैलाए हुए हैं। आइए, भूल सुधारें और नवरात्र के इस पावन साधनाकाल में अपनी मातृशक्ति की सुरक्षा, संरक्षा व विकास का संकल्प लेकर मां शक्ति की आराधना करें, तभी हम उनकी प्रसन्नता का कृपा प्रसाद पा सकेंगे।

पूनम नेगी 

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