जानिये 63 पत्नियों के हत्यारे “मुगल” की ऐतिहासिक दुर्दांत कत्लोगारद की गवाही देती बीजापुर की “साठ-कब्र” के बारे में |

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क्षत्रपति शिवाजी और आदिलशाही का सतत संघर्ष चला | साल 1645 में जब महज 15 वर्ष के थे, तब उन्होंने आदिलशाह पर अकस्मात आक्रमण कर तोरण के किल...

क्षत्रपति शिवाजी और आदिलशाही का सतत संघर्ष चला | साल 1645 में जब महज 15 वर्ष के थे, तब उन्होंने आदिलशाह पर अकस्मात आक्रमण कर तोरण के किले पर कब्ज़ा कर लिया | उसके बाद तो मानो उनकी विजय यात्रा प्रारम्भ हो गई | उनकी प्रेरणा ने उनके साथियों में आत्मोत्सर्ग की अद्भुत भावना भर दी थी | आज भी मावलों मराठों के पराक्रम की अद्भुत गाथा गाई जाती है – 

शीश कटा पर देह लड़ी थी, कोंडाना पर गाज गिरी थी | 

कण कण में चेतनता भरने, क्षत्रपति की स्फूर्ति चाहिए | तो बाजी प्रभू देशपांडे, ताना जी मौलसिरे जैसी अनेकों बलिदानी गाथाएँ दर्शाती हैं कि कैसे उन्होंने मुगलों के छक्के छुडाये | कुशल रणनीति और पराक्रम दोनों के समन्वय ने आखिर वह दिन लाया जब शिवाजी महाराज को छत्रपति घोषित किया गया | पूरे भारत की नदियों से लाये गए जल से उनके अभिषेक के साथ “हिन्दू पद पादशाही” की स्थापना हुई | 

आदिल शाह ने शिवाजी को मारने के लिए अफजल खान को भेजा | अफजल खान की विशाल सेना ने प्रतापगढ़ किले में शिवाजी को घेर लिया | महीनों तक चली इस घेराबंदी के बाद सुलह समझौते की बात चली और तय हुआ कि दोनों बिना हथियारों के किले की तलहटी में एक झोपड़ी में मिलेंगे | शिवाजी को आभाष था कि अफजलखान कोई न कोई बदमाशी जरूर करेगा | इसलिए वे पूरी तैयारी से गए | उन्होंने अपने कपड़ों के नीचे कवच, दायें हाथ में बघनख पहने हुए थे | शिवाजी को आता देखकर विशालकाय अफजल खान आलिंगन के बहाने उन्हें दबोचने आगे बढ़ा | उसने आलिंगन करते समय जैसे ही कटार से शिवाजी को मारना चाहा, शिवाजी ने बघनख से उसके पेट की आतें बाहर निकाल लीं | घायल अफजल खान धोखा धोखा चिल्लाते हुए वहां से भागा | उसे अपनी मौत सामने दिखने लगी थी | लेकिन इस भय ने भी उसकी क्रूरता को और बढ़ा दिया | 

इतिहास में जहाँ महारानी पद्मिनी व हजारों राजपूत बालाओं के जौहर की गाथाएँ दर्ज हैं वहीं अफजल खान की क्रूर गाथा भी ह्रदय विदीर्ण करती है | बैसे भी इस्लामी शासनकाल के विषय में इतिहास के पन्ने रंगे पड़े हैं, जहाँ भाई-भाई, और पिता-पुत्र में सत्ता के लिये खूनी रंजिशें हुईं, लेकिन अफजल खान ने तो मानो सबको मात दे दी | 

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी 63 पत्नियों को सिर्फ़ इसलिये मार डाले कि कहीं उसके मरने के बाद वे दोबारा शादी न कर लें… है ना आश्चर्यजनक बात!!! बीजापुर-अठानी रोड पर लगभग 5 किलोमीटर दूर एक उजाड़ स्थल पर पाँच एकड़ में फ़ैली कब्रें इस ऐतिहासिक दुर्दांत कत्लोगारद की गवाही देती हैं | इस स्थान को “सात कबर” के नाम से जाना जाता है, जहाँ सात पंक्तियों में 63 कब्र बनी हुई हैं | इसी स्थान पर आदिलशाही सल्तनत के सेनापति अफ़ज़ल खान द्वारा अपनी 63 पत्नियों को ज़िंदा दफना दिया था | इस खण्डहर में काले पत्थर के चबूतरे पर ये 63 कब्रें बनाई गई हैं

वामपंथियों मानसिकता ने हमारे इतिहास में मुगल बादशाहों के अच्छे-अच्छे, नर्म-नर्म, मुलायम-मुलायम किस्से-कहानी ही भर रखे हैं, जिनके द्वारा उन्हें सतत महान, सदभावनापूर्ण और दयालु(?) बताया है, लेकिन इस प्रकार 63 पत्नियों की हत्या वाली बातें जानबूझकर छुपाकर रखी गई हैं। भारत के खूनी इतिहास से मुगलों द्वारा किये गये अत्याचारों को अगली पीढ़ी को उनके कारनामों के बारे में जानकारी होना चाहिए | वर्ना “मैकाले-मार्क्स” के प्रभाव में वे तो यही सोचते रहेंगे कि अकबर एक दयालु बादशाह था (भले ही उसने सैकड़ों हिन्दुओं का कत्ल किया हो), शाहजहाँ अपनी बेगम से बहुत प्यार करता था (मुमताज़ ने 14 बच्चे पैदा किये और उसकी मौत भी एक डिलेवरी के दौरान ही हुई, ऐसा भयानक प्यार?) | तात्पर्य यह कि इस “दयालु मुगल शासक” वाले वामपंथी “मिथक” को तोड़ना बहुत ज़रूरी है। युवा पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व के उचित विकास के लिये सही इतिहास बताना ही चाहिये,वरना उन्हें 63 पत्नियों के हत्यारे के बारे में कैसे पता चलेगा ?

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क्रांतिदूत: जानिये 63 पत्नियों के हत्यारे “मुगल” की ऐतिहासिक दुर्दांत कत्लोगारद की गवाही देती बीजापुर की “साठ-कब्र” के बारे में |
जानिये 63 पत्नियों के हत्यारे “मुगल” की ऐतिहासिक दुर्दांत कत्लोगारद की गवाही देती बीजापुर की “साठ-कब्र” के बारे में |
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