स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकतंत्र सेनानी पेंशन एवं सम्मान निधि, वैधानिक स्थिति – एक विवेचन

SHARE:

लेखक –गोपाल कृष्ण डण्डोतिया (पूर्व सूचना आयुक्त मध्य प्रदेश)  मध्यप्रदेश में वर्तमान राज्य सरकार द्वारा लोकतंत्र सेनानी सम्मान निधि ...

लेखक –गोपाल कृष्ण डण्डोतिया (पूर्व सूचना आयुक्त मध्य प्रदेश) 

मध्यप्रदेश में वर्तमान राज्य सरकार द्वारा लोकतंत्र सेनानी सम्मान निधि पर पहले रोक लगाने का निर्णय लिया और अब वापस ले लिया | प्रस्तुत आलेख आम जन को सारांशतः इस प्रकरण की वैधानिक स्थिति को स्पष्ट करने में सहायक हो सकेगा | 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं लोकतंत्र सेनानी सम्मान निधि / पेंशन सामान्यतः नब्बे प्रतिशत से लेकर 95 प्रतिशत तक ऐसे व्यक्तियों द्वारा प्रदत्त की गई है, जिनका उन तात्कालिक आन्दोलनों एवं अन्य गतिविधियों से सम्बन्ध ही नहीं रहा है | 

दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति तो यह है कि भारत वर्ष के स्वतंत्र होने के लगभग 25 वर्ष बाद कथित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पेंशन एवं सुविधाएं प्रारम्भ की गईं | इसी प्रकार लोकतंत्र सेनानियों की भी लगभग 30 वर्ष बाद सुधि ली गई | जबकि दोनों ही श्रेणियों में यह कार्य तत्काल किया जाना सरकार एवं समाज दोनों का ही उत्तरदायित्व था, जिसका निर्वहन व्यवस्थित किसी भी रूप में कभी नहीं किया गया | वरन प्रतीत तो यह होता रहा कि दोनों श्रेणियों का उपयोग स्वयं का कद बढाने, सहानुभूति प्राप्त करने और निकृष्ट भाषा में कहा जाए तो मत एवं सहयोग प्राप्त करने के लिए, सुविधाएं एवं निधि की राशि बढाने का प्रयोग दोहराया जाता रहा | 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पच्चीस वर्ष तक भरण पोषण एवं संरक्षण के योग्य भी नहीं समझा गया | 1972 में कहीं जाकर उन्हें 200 रुपये मासिक पेंशन देना प्रारम्भ किया गया, जो वर्तमान में तीस हजार मासिक हो गया है | साथ ही इन्हें तीसरी पीढी तक नौकरियों में आरक्षण एवं आजीवन रेलवे में ए.सी. 2 तथा हवाई यात्रा तक की सुविधा घोषित की गई है | इसी प्रकार लोकतंत्र सेनानियों को तो लगभग तीस वर्ष की अवधि के उपरांत सामान्य भरण पोषण की सुविधा के नाते सम्मान निधि मध्य प्रदेश में छः हजार से प्रारम्भ कर वर्तमान में पच्चीस हजार प्रदान की गई | 

दोनों ही प्रकार के प्रकरणों में यह तो स्पष्ट है कि समाज का एक वर्ग अत्यंत लघुतम संख्या में ही सही, हमेशा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करता है, अथवा शासन के दमन चक्र में पिसता है | ऐसे व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूहों का अभिनन्दन किया जाना, उन्हें सम्मानित किया जाना, समाज में सद्वृत्तियों का पोषण करता है, और जीवंत समाज की श्रेष्ठता का लक्षण भी होता है | जो कि दोनों ही श्रेणियों के लिए यथासमय प्रगट भी हुआ है | 

अब आती है वैधानिक स्थिति, जिसमें शासन द्वारा किये गए दमन, अवैधानिक कार्यवाहियां, बल प्रयोग, इन सबके फल स्वरुप हुई शारीरिक एवं मानसिक क्षति तथा अवैध निरोध, इन सबका परिमार्जन किस प्रकार हो, इस बारे में स्थिति निम्नानुसार है – 

अ) स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को उपरोक्त स्थितियों का सामना विदेशी शासन एवं उनके अंतर्गत कार्यरत अन्य अभिकरणों द्वारा करना पड़ा, जिसका परिमार्जन निश्चित रूप से धनराशी के रूप में, स्वतंत्रता के उपरांत करने का दायित्व भारत सरकार का था व है | 

आ) लोकतंत्र सेनानियों के मामले में चूंकि शासन सत्ता स्वदेशी ही थी, इस कारण इस बारे में निर्णय भी सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा प्रदत्त, निर्णयों के परुप्रेक्ष में ही किया जाना चाहिए | आपातकाल राजनीतिक रूप से तो सभी दलों ने राजनैतिक भूल एवं व्यक्तिगत कारणों के आधार पर किये गए दोषपूर्ण राजनैतिक निर्णय के रूप में स्वीकार किया है, किन्तु जो राजनैतिक दल इस हेतु उतरदायी था, उसने भी स्पष्ट रूप से तो नहीं, परन्तु परोक्ष रूप से भूल के रूप में इसे स्वीकार ही किया है | इसका प्रमाण यह है कि आपातकाल की पुनरावृत्ति रोकने हेतु तत्कालीन जनता सरकार द्वारा, जो संसोधन किये गए थे, उनका विरोध न करते हुए, अपनी अपरोक्ष सहमति ही प्रदान की | कई स्थानों पर तो कई नेताओं ने स्पष्ट रूप से इसे राजनैतिक भूल के रूप में स्वीकार किया है | 

इ) अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का इतिहास देखें | आपातकाल के दौरान, देश के सभी उच्च न्यायालयों द्वारा आपातकाल में निरोधित व्यक्तियों को मुक्त करने के आदेश के साथ ही आपातकालीन कार्यवाही को असंवैधानिक ठहराया गया था | किन्तु तभी एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय में तत्कालीन केंद्र शासन की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता श्री नीरेन डे ने तर्क दिया कि “आज यदि कोई शासकीय अधिकारी किसी को गोली मारकर समाप्त भी कर दे, तो उससे इस बात का कारण पूछने का अधिकार किसी को अर्थात न्यायालय को भी नहीं” है | इस घोर अमानवीय तर्क को भी मान्यता देते हुए सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय खंडपीठ ने चार – एक के बहुमत से आपातकालीन व्यवस्था को विधि संगत तथा उचित ठहराया | परिणाम स्वरुप निर्दोष लोगों को अवैध निरोध में रखे जाने की दुष्ट श्रंखला आपातकाल की समाप्ति तक निरंतर जारी रही | (AIR 1976 एस.सी. 1207 हैबियस कॉर्पस केस) 

ई) माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय के उपरान्त तो सरकार और भी मनमर्जी से निर्णय लेने लगी, यहाँ तक कि संसद की अवधि भी पांच वर्ष से बढाकर सात वर्ष कर दिया गया | ऐसे में जबकि समस्त लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं एवं न्यायालयीन मार्ग अवरुद्ध हो गए, तब “केवल अवसर ही न्यायदाता होगा”, की उक्ति सत्य प्रमाणित हुई और अकस्मात घोषित लोकसभा निर्वाचन परिणाम ने मार्च 1977 में उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया | इस प्रकार जनादेश वैधानिक आदेश पर भारी साबित हुआ | 

उ) तदुपरांत कई कार्यवाहियां हुईं, पीड़ितों ने क्षतिपूर्ति तथा अन्य प्रकार के वैधानिक प्रयत्न किये व तत्कालीन राज्य शासन द्वारा मीसाबंदियों को अल्पकालीन ऋण प्रदान किया गया, जिसे कई मीसाबंदियों ने ब्याज सहित वापस कर दिया तथा कई ने उसे प्राप्त ही नहीं किया | तब कतिपय नेताओं ने यहाँ तक घोषणा की थी कि हम ऋण प्राप्त करने अथवा सुविधाएं प्राप्त करने हेतु आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष कर जेल नहीं गए थे | 

ऊ) इसके बाद 24 अगस्त 2017 को निजता के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया, उसमें आपातकाल के दौरान दिए गए पूर्व निर्णय को को विधि विरुद्ध एवं दोषपूर्ण वर्णित करते हुए न केवल निरस्त किया, बल्कि उक्त निर्णय में विमत का निर्णय देने वाले जस्टिस श्री एच आर खन्ना के निर्णय को प्रामाणिक एवं विधि संगत तथा अनुकरणीय घोषित किया गया | (रिट पिटीशन (सिविल) न. 494 ऑफ़ 2012) उक्त वैधानिक निर्णय के बाद तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुरूप प्रत्येक अवैधानिक रूप से निरुद्ध व्यक्ति क्षतिपूर्ति का पात्र है तथा यह क्षतिपूर्ति एवं पारिणामिक रूप से क्षतिधन और अधिकाधिक होता जाता है, जब कि इस प्रकार का कोई निरोध सामने के पक्ष द्वारा स्वीकृत रूप से किया गया हो | स्वाभाविक ही आपातकाल के दौरान छः माह से अधिक निरोध में रखे गए व्यक्ति तो असीमित रूप से आर्थिक क्षतिपूर्ति के आधिकारिक रूप से पात्र व्यक्ति हैं, जिन्हें वर्तमान के आंकलन से क्षतिपूर्ति के रूप में ही सही अधिकतम पेंशन और सुविधाएं प्राप्त करने का अधिकार है | यह किसी दल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष की कृपा पर आधारित नहीं है, बल्कि यह एक वैधानिक अधिकार है | यहाँ यह लिखना भी असंगत नहीं होगा कि इस तथ्य की ओर दुर्भाग्य से केंद्र सरकार ने भी ध्यान नहीं दिया है, जबकि आपातकाल केवल राज्य का मामला नहीं रहा | 

ऋ) अब रही जांच की बात, तो वह कराया जाना आवश्यक एवं न्यायोचित तो है ही, हमारी सामाजिक दुरावस्था एवं राजनैतिक दुश्चरित्रता को भी सामने लाता है | जैसा कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में भी एक सज्जन जो प्रत्येक 26 जनवरी एवं 15 अगस्त को जिलाधिकारियों से शोल श्रीफल प्राप्त करते थे, वे उन दोनों महान दिवसों के बीच के कालखंड में एक या दो बार पुलिस के डंडे प्राप्त करते हुए हाथ में “सट्टा खेलना पाप है, पुलिस हमारी बाप है” लिखी हुई पट्टिका लेकर नगर के व्यस्ततम बाजार से निकाले जाते थे | कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के फर्जी प्रमाण पत्रों के प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय तक गए हैं | एक तो अद्वितीय प्रकरण था, जिसमें महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का जन्म ही 1947 के उपरांत का था | इस प्रकार कि घटनाएँ और प्रकरण लोकतंत्र सेनानियों के मामले में भी निश्चित रूप से कम नहीं होंगी | परन्तु समाज को विपन्नावस्था के उन लोगों के बारे में भी ध्यान रखना ही चाहिए, जैसा कि एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रकरण दर्शाता है | उन महानुभाव की विपन्नावस्था ने उन्हें अपनी बहिन को ही स्वयं की पत्नी दर्शाने को विवश किया, जिससे उसे उनके देहांत के बाद उत्तराधिकारी पेंशन तो मिलती रहे | 

ऌ) उपरोक्त स्थिति के उपरांत यह भी द्रष्टव्य है कि आज के वातावरण में भी एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ऐसे हैं, जिन्होंने स्वयं होकर पेंशन और कोई सुविधा प्राप्त नहीं की | इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मीसाबंदी रहे अधिकाँश प्रचारकों ने लोकतंत्र सेनानी सम्मान निधि के नाम पर एक भी पैसा प्राप्त नहीं किया | इस सबके लिखने का मूल उद्देश केवल इतना ही है कि समाज इसे किसी प्रकार का अनुदान या रहम न समझे, तथा शासन इसे कोई उपकार अथवा उनके द्वारा किये जाने वाला कोई मनोवेगी कृत्य न समझे, अपितु यह संघर्ष के विरुद्ध रत व्यक्तियों का वैधानिक अधिकार है | और लोकतंत्र सेनानी उसे अधिकार के रूप में ही प्राप्त करने के पात्र हैं | 

मीसाबंदियों के मानवाधिकार का किस प्रकार उल्लंघन हुआ, इसका प्रमाण है, आपातकाल के दौरान शिवपुरी जेल, जहाँ तीन कैदियों के लिए बनी हुई कोठरी में अठारह मीसाबंदियों को ठूंसा गया था और महीनों वहीँ रहने को विवश किया गया था | हालत यह थी कि अगर एक को करबट बदलनी होती थी, तो वह बगल में सोये हुए दूसरे साथी को कहता था – भैय्या जरा करबट ले ले | 

इतना ही नहीं तो मेनुअल के अनुसार जो भोजन सामग्री मिलती थी, वह कितनी अपर्याप्त होती थी, इसका एक रोचक उदाहरण है | सबके हिस्से में चार रोटी और दाल आती थी | एक मीसाबंदी की खुराक कुछ अधिक जानकर सर्व श्री मुन्नालाल गुप्ता, गोपाल डंडोतिया व अशोक पांडे ने अपने हिस्से की एक एक रोटी उनको देना तय किया | कुछ समय पश्चात जब उक्त मीसाबंदी से पूछा कि भैया अब तो पेट भर जाता होगा न ? तो उन्होंने रूहांसे स्वर में जबाब दिया, भाई साहब इनसे क्या होता है, मैं तो इतनी ही और खा सकता हूँ |

COMMENTS

नाम

अखबारों की कतरन,38,अपराध,1,आंतरिक सुरक्षा,15,इतिहास,66,उत्तराखंड,4,ओशोवाणी,16,कहानियां,37,काव्य सुधा,69,खाना खजाना,20,खेल,19,चिकटे जी,25,जनसंपर्क विभाग म.प्र.,4,तकनीक,83,दतिया,1,दुनिया रंगविरंगी,33,देश,159,धर्म और अध्यात्म,206,पर्यटन,14,पुस्तक सार,45,प्रेरक प्रसंग,80,फिल्मी दुनिया,9,बीजेपी,37,बुरा न मानो होली है,2,भगत सिंह,5,भारत संस्कृति न्यास,7,भोपाल,24,मध्यप्रदेश,272,मनुस्मृति,14,मनोरंजन,45,महापुरुष जीवन गाथा,102,मेरा भारत महान,292,मेरी राम कहानी,23,राजनीति,57,राजीव जी दीक्षित,18,राष्ट्रनीति,25,लेख,991,विज्ञापन,1,विडियो,23,विदेश,46,विवेकानंद साहित्य,10,वैदिक ज्ञान,70,व्यंग,7,व्यक्ति परिचय,23,शिवपुरी,322,संघगाथा,53,संस्मरण,35,समाचार,484,समाचार समीक्षा,728,साक्षात्कार,8,सोशल मीडिया,3,स्वास्थ्य,23,हमारा यूट्यूब चैनल,3,election 2019,22,
ltr
item
क्रांतिदूत: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकतंत्र सेनानी पेंशन एवं सम्मान निधि, वैधानिक स्थिति – एक विवेचन
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, लोकतंत्र सेनानी पेंशन एवं सम्मान निधि, वैधानिक स्थिति – एक विवेचन
https://2.bp.blogspot.com/-RRkimKUhErY/XD_ppXrMBuI/AAAAAAAAH5k/XzwdUcG1NAkb0QiMdakTLDHppBGzG4R7gCLcBGAs/s400/12.jpg
https://2.bp.blogspot.com/-RRkimKUhErY/XD_ppXrMBuI/AAAAAAAAH5k/XzwdUcG1NAkb0QiMdakTLDHppBGzG4R7gCLcBGAs/s72-c/12.jpg
क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2019/01/Freedom-fighters-democracy-fighters-pension-and-honor-fund-statutory-status.html
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/2019/01/Freedom-fighters-democracy-fighters-pension-and-honor-fund-statutory-status.html
true
8510248389967890617
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy