अगर प्रेस भारत विरोधी एजेंडे पर चलती रहेगी तो उसे प्रेस्टीटयूट कहा ही जाएगा !

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क्या आपने कभी गौर किया है कि ज्यादातर अंग्रेजी अखबार किसी दुर्दांत आतंकवादी के मारे जाने पर क्या लिखते हैं ? मान लीजिये कि कश्मीर में ती...

क्या आपने कभी गौर किया है कि ज्यादातर अंग्रेजी अखबार किसी दुर्दांत आतंकवादी के मारे जाने पर क्या लिखते हैं ? मान लीजिये कि कश्मीर में तीन आतंकवादी मारे गए तो वे लिखते हैं थ्री मिलिटेंट किल्ड | वे कभी भी उन्हें टेररिस्ट नहीं लिखते | यही वह मानसिकता है, जिसके सहारे पर कश्मीर का अलगाववाद फलफूल रहा है | हद तो यह है कि जम्मू कश्मीर पुलिस के स्टेटमेंट में आये टेररिस्ट शब्द को भी अंग्रेजी मीडिया बदलकर मिलिटेंट कर देता है | 

कहा जा सकता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है ? फर्क ये पड़ता है कि आतंकवादी को जैसे ही मिलिटेंट कहा जाता है, उग्रवादी कहा जाता है, सारा भाव बदल जाता है | आतंकी भी गुमराह नौजवान दिखाई देने लगते हैं | आतंकवाद कोई चोरी डकैती जैसा सामान्य अपराध नहीं है, आतंकवाद तो देश के खिलाफ युद्ध है, द्रोह है। देशद्रोह के सबसे विक्षिप्त और भयंकर रूप को मीडिया सिर्फ़ 'उग्रवाद' का नाम दे देती है। पाकिस्तान से आकर कश्मीर में भारतीय सेनाओं पर गोली चलाने वाले आतंकवादी ना होकर उग्रवादी कैसे हो गए - इस एजेण्डे को जानने के लिए कोई जेम्स बाण्ड होने की जरूरत नहीं। 

अब एक नजर इन अखबारों के संवाददाताओं पर डालिए | थोडा ध्यान देते ही सारा माजरा समझ में आ जाता है | इण्डियन एक्सप्रेस (Indian Express) - बशारत मसूद ( Basharaat Masood) हिन्दुस्तान टाइम्स (Hindustan Times) - मीर एहसान (Mir Ehsan) फर्स्टपोस्ट (Firstpost) - समीर यासिर (Sameer Yasir) द वायर (The Wire) - मुदस्सिर अहमद (Mudasir Ahmed) कौन हैं इन प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्रों के ये तथाकथित संवाददाता करेसपोंडेंट ? ये सब के सब कश्मीरी हैं। अगर किसी क्षेत्र की ख़बर वहां के स्थानीय बाशिन्दे दें तो कोई हर्ज नहीं है, किन्तु यहां ही कहानी में वह ट्विस्ट आ जाता है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है. अर्थात ये चारों कश्मीर में सक्रिय किसी भी आतंकवादी को कभी भी आतंकवादी नहीं लिखते | अंग्रेजी में लिखने वाले ये सब, टेररिस्ट की जगह मिलिटेंट शब्द का ही इस्तेमाल करते हैं। जब हंगामा ज्यादा होने लगा, इस कारगुजारी को लेकर जागरूक देशभक्तों ने खिंचाई शुरू की तो क्या हुआ वह भी देखिये – 

1. Firstpost ने समीर यासिर के नाम की जगह FP Staff के नाम से समाचार लिखना शुरू कर दिया और Telegraph ने TT Bureau लिखना शरू कर दिया, किन्तु टेररिस्ट को मिलिटेंट लिखना बंद नहीं किया । टेलीग्राफ़ के ऑनलाइन पोर्टल पर आप एक ख़बर देखेंगे जिसमें 'J&K Police' का ट्वीट भी रिपोर्ट का हिस्सा है। कमाल की बात है, जहां जम्मू कश्मीर की पुलिस ने अपने ट्वीट में टेररिस्ट शब्द का इस्तेमाल किया है, लेकिन Telegraph ने अपने आर्टिकल में बदस्तूर मिलिटेंट शब्द का ही प्रयोग किया है । कोई भी “5 militants killed in Jammu & Kashmir The Telegraph” बस इतना लिखकर सर्च कर सकता है, दोनों रिपोर्ट सामने आ जायेंगी | यह एक जबरदस्त एजेण्डा है, अंतर्राष्ट्रीय जमात के सामने कश्मीर की स्थिति की गलत तस्वीर पेश करने का । दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति तो यह है कि IANS - Indo Asian News Services और PTI - Press Trust of India जैसी समाचार एजेंसियां भी जानबूझकर यही कृत्य करते दिखाई देती हैं | नतीजतन जिन अखबारों के कश्मीरी संवाददाता नहीं हैं, वे इन न्यूज़ एजेंसियों से खबर लेते हैं, और अनजाने में इस षडयंत्र का शिकार हो जाते हैं ।

ध्यान देने योग्य बात है कि PTI तो लगभग 500 भारतीय अखबारों की को-ऑपरेटिव संस्था हैं और ये सब अखबार मुख्यतः PTI से ही ख़बर उठाते हैं। अच्छी बात यह है कि देशभक्त नागरिकों के हो हल्ले के बाद या स्वयं ही आजकल कुछ अखबार खुलकर टेररिस्ट लिखने लगे हैं। किन्तु अब भी 90% प्रतिशत से ज्यादा मीडिया आतंकियों को मिलिटेंट लिखना ही पसन्द करती हैं | जब सरकारी या सैन्य अधिकारी स्पष्ट तौर पर अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में, अपने ट्वीट्स में आधिकारिक बयान में टेररिस्ट या आतंकवादी शब्द इस्तेमाल करते हैं, तब भी मीडिया की क्या मजबूरी है कि वह मिलिटेंट शब्द ही इस्तेमाल करते हैं । 

इसी क्रम का ताजा उदाहरण है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह भैया जी जोशी के बयान को तोड़ मरोड़कर पेश किया जाना | उन्होंने कल कुम्भ मेले में , विश्वास व्यक्त किया था कि -

6वर्ष के पश्चात 2025 में फिर से कुंभ संपन्न होगा, तब तक भारत के राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक राम मंदिर की भी निर्माण प्रक्रिया पूर्ण होकर राष्ट्र समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ेगा।

लेकिन हमारे देश के स्वनामधन्य मीडिया ने लिखा कि -

भैया जी जोशी ने 2025 तक राम मंदिर बनने की संभावना जताई | अब इन्हें पत्रकार कहा जाए या प्रेस्टीटयूट ? इनके घातक देश विरोधी एजेंडे के ही कारण आज “प्रेस” का सम्माननीय शब्द “प्रेस्टीटयूट” के संबोधन से जाना जाने लगा है | इसके लिए दोषी कोई और नहीं, मीडिया और पत्रकार खुद है


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क्रांतिदूत: अगर प्रेस भारत विरोधी एजेंडे पर चलती रहेगी तो उसे प्रेस्टीटयूट कहा ही जाएगा !
अगर प्रेस भारत विरोधी एजेंडे पर चलती रहेगी तो उसे प्रेस्टीटयूट कहा ही जाएगा !
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http://www.krantidoot.in/2019/01/If-the-press-continues-on-anti-India-agenda-then-it-will-be-called-a-prestitute.html
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