ईमानदार चौकीदार विरुद्ध कैसे कैसे लोग - सन्दर्भ सर्वोच्च न्यायालय के आज के निर्णय |

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए आज का दिन एक प्रकार से बहुत ही खराब रहा |  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दो निर्णयों ने उन...



कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए आज का दिन एक प्रकार से बहुत ही खराब रहा | 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दो निर्णयों ने उनकी काफी हद तक फूंक निकाल दी | 

एक निर्णय तो मीनाक्षी लिखी द्वारा चौकीदार चोर है वाले मामले में प्रस्तुत मानहानि मुकदमे के सम्बन्ध में था, जिसमें उनके द्वारा खेद प्रगट करने को पर्याप्त न मानते हुए शीर्ष न्यायालय ने मानहानि का नोटिस जारी कर सुनवाई के लिए 30 अप्रैल की तारीख मुक़र्रर की है | 

साफ़ है कि सुप्रीम कोर्ट ने “चौकीदार चोर है” वाले नारे में अपना नाम घसीटने को अपनी मानहानि माना है और इसीलिए राहुल गांधी को मानहानि का नोटिस जारी कर दिया है | 

दूसरा निर्णय और भी अधिक महत्वपूर्ण है – 

इनकम टेक्स विभाग द्वारा 2010 – 11 के टेक्स निर्धारण को लेकर आज सर्वोच्च न्यायालय ने राहुल सोनिया मां बेटे की याचिका निरस्त करते हुए उन्हें ट्रिब्यूनल में जाने को कहा है 

यह मामला इतना साधारण नहीं है, आईये पहले नेशनल हेराल्ड केस से सम्बंधित इस मामले की प्रष्ठभूमि पर नजर डालते हैं | 

नेशनल हेराल्ड संचालित करने वाली एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कम्पनी को आल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने 90 करोड़ से अधिक रकम कर्ज के रूप में दी | 

बाद में 23.11.2010 को सोनिया राहुल के स्वामित्व की एक यंग इन्डियन नामक कम्पनी महज 5 लाख रुपये की शेयर पूंजी के साथ प्रारम्भ हुई । 

अगले ही माह दिसंबर में एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड पर आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के बकाया लोन को एआईसीसी ने यंग इंडियन को हस्तांतरित कर दिया । 

और मजाक देखिये कि नब्बे करोड़ का लोन महज पचास लाख रुपये लेकर आल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने यंग इंडियन के नाम कर दिया | अर्थात अब एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड कम्पनी, एआईसीसी के स्थान पर यंग इंडियन की ऋणी हो गई । (किसी कांग्रेसी ने कभी यह सवाल नहीं उठाया कि पार्टी फंड का इतना पैसा कैसे बर्बाद कर दिया गया )

मजे की बात यह कि एआईसीसी को 50 लाख रुपये का भुगतान करने के लिए भी यंग इन्डियन ने 01.03.2011 को 1 करोड़ रुपये का ऋण लिया । 

चलिए इस चर्चा में हम इस महत्वपूर्ण मुद्दे को भूल जाते हैं कि आखिर एआईसीसी ने मात्र 50 लाख रुपये में यंग इंडियन को 90.21 करोड़ रुपये की ऋण राशि क्यों हस्तांतरित की ? 

आइए हम यह भी भूल जाते हैं कि आगे चलकर एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड की संपत्तियां यंग इंडियन की कैसे हो गई ? 

महत्वपूर्ण यह है कि इनकम टेक्स विभाग ने सवाल उठाया कि यंग इंडियन को एक करोड़ का ऋण किसने दिया ? 

जिस कम्पनी ने एक करोड़ का ऋण दिया, उसका गठन महज तीन माह पूर्व ही हुआ था, या यूं कहा जाए कि वह एक प्रकार से कागजी संस्था थी | 

उस कम्पनी के पास आखिर यह एक करोड़ रुपये आये कहाँ से ? 

कम्पनी का नाम था मेसर्स डॉटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड (डॉटेक्स) जिसने 15.02.2011 को 1 करोड़ रुपये का ऋण दिया। 

ऋण की शर्तों में उल्लेखित है कि ऋण वापसी की अवधी चेक की तारीख से 1 वर्ष की है। अर्थात एक प्रकार से यंग इंडियन ने ऋण भुगतान में, ऋण के नियमों और शर्तों का गंभीर उल्लंघन किया, किन्तु इसके बाद भी डॉटेक्स ने कभी भी यंग इंडियन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। डॉटएक्स इस विषय पर कोई भी उचित स्पष्टीकरण देने में विफल रहा कि उसने ऋण की वापसी के लिए कोई प्रयत्न क्यों नहीं किया । 

श्री सुनील भंडारी और श्री सुनील सांनेरिया डॉटेक्स के निदेशक थे। ये दोनों डॉटेक्स के अतिरिक्त कोलकाता स्थित 50 अन्य कंपनियों के भी निदेशक थे | आयकर विभाग द्वारा छापे / सर्वेक्षणों के दौरान, इनमें से कई कंपनियों को "आवास प्रविष्टियां" प्रदान करने के व्यवसाय में संलग्न पाया गया । आवास प्रविष्टि का अर्थ है - "नकद लेकर समतुल्य राशि के चेक जारी करना" | बैंक खातों की प्रतियां ने इसे पूरी तरह साबित भी कर दिया । 

चेक प्राप्तकर्ता द्वारा समतुल्य राशि के नकद भुगतान के बदले इन कंपनियों द्वारा चेक जारी किए जाते हैं, अर्थात् एक कंपनी नकद के साथ इन कंपनियों तक पहुंचती है, और वे चेक की रकम के बराबर राशि देते हैं | बदले में ये कंपनियों ने ऐसे सौदे पर 1% से 5% कमीशन लेती हैं । जारी किए गए चेक प्राप्तकर्ता की पुस्तकों में "ऋण" के रूप में दिखाए गए, जिन्हें कभी भी चुकाया नहीं गया, क्योंकि यह ऋण नहीं, बल्कि मनी लांड्रिंग का मामला था" | 

इस प्रकार यंग इंडियन के साथ हुआ 1 करोड़ रुपये का यह लेन-देन भी भारत सरकार की वित्तीय खुफिया इकाई की नज़रों में "संदिग्ध लेनदेन " के रूप देखी जा रही है । 

उपरोक्त सभी आधार पर, यह निष्कर्ष निकाला गया कि: 

"इस मामले में 1 करोड़ रुपये की राशि मैसर्स यंग इंडियन की स्वयं की है" 

उपरोक्त सभी बातें आयकर के आदेश में उल्लेखित है। इससे एक बड़ा सवाल उठता है - 

कि क्या वास्तव में यंग इन्डियन द्वारा जमा कराये गए 1 करोड़ रुपये वस्तुतः काला धन था ? 

है ना मजेदार सवाल ? 

यह सवाल तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम यंग इंडियन के कर्ताधर्ताओं के नामों पर नजर डालते हैं – 

१ श्रीमती सोनिया गांधी – २२ जनवरी २०११ से डायरेक्टर कुल शेयर १९०० (३८ % ) 

2 राहुल गांधी – १३ दिसंबर २०१० से डायरेक्टर कुल शेयर १९०० (३८ % ) 

३ मोतीलाल वोरा - २२ जनवरी २०११ से डायरेक्टर कुल शेयर ६०० (१२ % ) 

4 ओस्कर फर्नांडीज - २२ जनवरी २०११ से डायरेक्टर कुल शेयर ६०० (१२ % ) 

५ सर्यन गंगाराम पित्रोदा उपाख्य सेम पित्रोदा – २३ नवम्बर २०१० से डायरेक्टर कुल शेयर ५५० जो ओस्कर फर्नांडीज को ट्रांसफर कर दिए गए 

६ सुमन दुबे - २३ नवम्बर २०१० से डायरेक्टर कुल शेयर ५५० जो मोतीलाल वोरा को ट्रांसफर किये गए 

ईमानदार चौकीदार को लगातार चोर बोलने वाले स्वयं क्या हैं, यह विचारणीय होना चाहिए या नहीं ? 

उत्तर आप स्वयं तलाशिये |

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ईमानदार चौकीदार विरुद्ध कैसे कैसे लोग - सन्दर्भ सर्वोच्च न्यायालय के आज के निर्णय |
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