सच्चे कांग्रेसियों एक हो जाओ - प्रवीण गुगनानी

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स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का वैचारिक आधार दरकने लगा और इसने अपना कोई वैचारिक स्त्रोत संगठन बनाने का प्रयास ही नहीं किया. तुर्रा ऊपर से...

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का वैचारिक आधार दरकने लगा और इसने अपना कोई वैचारिक स्त्रोत संगठन बनाने का प्रयास ही नहीं किया. तुर्रा ऊपर से ये रहा कि शनैः शनैः कांग्रेस ने वामपंथियों को अपना गुरु मानना प्रारंभ किया और बहुत शीघ्र ही उसने स्वयं को वामपंथ का वैचारिक पुत्र या मानस पुत्र ही मान लिया. कांग्रेस की नीति, रीति, चाल चलन, हाव भाव, अभिव्यक्ति सभी कुछ पर कम्युनिस्टों ने बड़ी चतुराई से अपना कब्जा जमा लिया और उसका डीएनए ही बदल दिया. आज की कांग्रेस स्वतंत्रता पूर्व की कांग्रेस से आमूल चूल अलग होकर शत प्रतिशत वामपंथी भूमिका में आ गई है.

गांधी जी ने कांग्रेस के विसर्जन का जो आग्रह समूची कांग्रेस से किया था किंतु नेहरूजी के सत्ता मोह के कारण जो कार्य हो न पाया था उस प्रसंग को स्मरण करने का सर्वाधिक प्रासंगिक क्षण (आपातकाल के बाद) अब आया है. कांग्रेस द्वारा अपने घोषणापत्र में राष्ट्रद्रोह क़ानून को समाप्त करने व अफास्पा क़ानून को समाप्त करने की बात ऐसे काल परिस्थिति में कहकर जब देश एक संवेदनशील परिस्थिति से गुजर रहा है, स्वयं कांग्रेसियों के लिए सांप छछूंदर की विचित्र स्थिति उत्पन्न कर दी है. ख़ास तौर पर तब जबकि कांग्रेस के घोषणा पत्र में ये विभाजनकारी बातें आई और इससे लगे लगे ही गांधी नेहरू परिवार के अतिप्रिय अब्दुल्लों के वारिस फारुख अब्दुल्ला ने कश्मीर में अलग प्रधानमंत्री बनाने की बात कर दी. गांधी परिवार की इंडियन नेशनल कांग्रेस और अब्दुल्लों की नेशनल कांफ्रेंस की यह जुगलबंदी कुछ कहती है तो है, जिसे यदि देश ने समय पर न सूना तो अनर्थ हो जाएगा.

अब कांग्रेस को विसर्जित करने के सर्वाधिक प्रासंगिक क्षण वाले संदर्भ की बात करें. वह क्षण जिसमें कांग्रेस ने भगवान राम को काल्पनिक माना और इस आशय का शपथपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया, जिस क्षण में रामसेतु के विध्वंस हेतु मशीने समुद्र में भेजी, वह क्षण जिसमें कांग्रेस हिंदुओं के विरुद्ध लक्षित सांप्रदायिकता अधिनियम लाई, वह क्षण जिसमें कांग्रेस ने दीवाली की आधी रात को कांची पीठ के पूज्य शंकराचार्य जी को बंदी बना जेल भेजा, वह क्षण जिसमें कांग्रेस ने देशद्रोह क़ानून समाप्त करने की बात की, वह क्षण जिसमें अफास्पा की सर्वाधिक जरुरत के समय अफास्पा को समाप्त करने की बात की और ऐसे स्वभाव व प्रसंग वाले स्वातंत्र्योत्तर समय के कितने ही क्षण जिसमें कांग्रेस को राष्ट्र का मित्र नहीं शत्रु मानने को विवश होना पड़ता है; ये सारे मनहूस व अशुभ क्षण अब कांग्रेस को तिरोहित कर देंने को मजबूर करने की मानसिकता बनाते जा रहें हैं. इन कालिख भरे क्षणों से यह सोचने को मजबूर होना पड़ता है की क्या यह लाला लाजपतराय, बिपिनचंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक की कांग्रेस है? क्या यह भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, अशफाकउल्ला खां, बंकिमचंद्र, मदनमोहन मालवीय, गोविन्दवल्लभ पन्त, लाला लाजपत राय, गिरधारी लाल गिडवानी, दादा भाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले, डा. राजेन्द्रप्रसाद, सुभाषचंद्र बोस, वल्लभभाई पटेल की कांग्रेस है?! उत्त्तर है – नहीं!! नहीं यह इन जैसे शुचिता वादी, क्रांतिकारी व महान नेताओं की कांग्रेस नहीं है! यह केवल नेहरू गांधी परिवार की पारिवारिक जागीर वाली कांग्रेस है जिसके विसर्जन की या जिसे तिरोहित कर देनें की बात गांधी जी ने दृढ़ता पूर्वक कही थी. गांधी जी के विवेक, अंतर्दृष्टि व भविष्य चेतना ने वर्तमान कांग्रेस का भविष्य उस समय ही पढ़ लिया था तभी उन्होंने यह आदेशात्मक सुझाव दिया था कि कांग्रेस का विसर्जन कर एक नए राजनैतिक दल का गठन कर आगे बढ़ा जाए, जिसे नेहरु ने मानने से इंकार कर दिया था. 

मैंने जब दो वर्ष पूर्व मेरी पुस्तक “कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा” लिखी थी तब मैंने उसकी प्रस्तावना में ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि “कांग्रेस मुक्त भारत” का अर्थ कांग्रेस की समाप्ति नहीं है, कांग्रेस मुक्त भारत का अर्थ कांग्रेस की इस पूरी सोच से मुक्ति से है जिस सोच के कुछ ज्वलंत किंतु अल्प उदाहरण मैंने ऊपर लिखें हैं. कांग्रेस के परिवार वाद व उस परिवार के काले कारनामों ने इस देश को कई ऐसे अवसर दियें हैं जब यह लगा कि कांग्रेस एक राजनैतिक दल नहीं बल्कि एक “फैमिलियर प्रापर्टी” है. स्वतंत्रता पूर्व के विभाजन के समय के, स्वतंत्रता बाद के अनेकों स्याह किस्से कांग्रेस को उसके गौरवशाली अतीत व गौरवशाली नेताओं की पृष्ठभूमि से अलग कर देनें को मजबूर करते हैं. स्वातंत्र्योत्तर कांग्रेस बड़ी ही तेजी से अपने पच्चीसों उज्जवल, महान, त्यागी व शुचिता पूर्ण नेताओं से पल्ला झाड़ा व उन्हें भूलने, विस्मृत करने व उन्हें इतिहास के पन्नों में भीतर कहीं दबा देनें के दुष्प्रयास में जूट गई थी. वर्तमान कांग्रेस के पारिवारिक नेतृत्व ने दुराशय पूर्वक यह चाहा और ऐसी दुर्भि संधियां की कि, कांग्रेस के दर्जनों राष्ट्रवादी नेताओं का व्यक्तित्व, कृतित्व देश के सामने या तो आया नहीं या केवल उतना ही आया जितना कि इस राष्ट्र के नागरिकों की स्मृतियों में से स्वमेव निकल पाया. आप अपने आस पास के पाठ्यक्रम, चौक चौराहों पर लगी मूर्तियों, सार्वजनिक संस्थानों के नामकरण, नगरों मार्गों के नाम आदि पर गौर करें तो पायेंगे की वर्तमान कांग्रेस ने गांधी परिवार से इतर/अलग के अपने गौरवशाली इतिहास को किस प्रकार धोबी पछाड़ लगा लगा के धो दिया है. कांग्रेस के इतिहास को धोने की प्रक्रिया में राष्ट्रपति वी. वी. गिरी, फखरुद्दीन अली अहमद, इंदिरा गांधी के आपातकाल, पंजाब में भिंडरावाले को जन्म देने, इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा से लेकर और ज्ञानी जैलसिंह से लेकर श्रीमती प्रतिभा पाटिल जैसे मनोनयनों की अंतर्कथा बहुत कुछ कहती है. पिछले दो ढ़ाई दशकों में बाबू जगजीवनराम, मोरारजी भाई, चौधरी चरणसिंह, भारत रत्न प्रणब दा आदि जैसे अनेक लोगों का कांग्रेस से बाहर जाना भी इस दिशा में एक बड़े अनकहे इतिहास को व्यक्त करता है. प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा “द टर्बुलेंट इयर्स” भी कांग्रेस के भीतर के स्याह को उजाले में लाने का बड़ा काम करती है. मुझे लगता है कि कांग्रेस को एक विरासत के रूप में संजोने का एतिहासिक अवसर अब भी देश व कांग्रेस के पास है. इंडियन नेशनल कांग्रेस पर अब भ्रष्टाचार, परिवारवाद, वंशवाद, देश विभाजन, देश द्रोह के आरोप और अधिक न लगें इस हेतु स्वयं कांग्रेस के भीतर से इक आवाज उभरनी चाहिए. और, मुझे लगता है कि अब कांग्रेस के भीतर से यह आवाज अति शीघ्र मुखरित ही नहीं बल्कि चिंघाड़ कर निकलने वाली है. हाल ही के २०१९ के लोकसभा चुनाव के दौरान फारूख अब्दुल्ला की कश्मीर के अलग प्रधानमंत्री वाली बात पर रहस्यमय चुप्पी कांग्रेस को पुनः कटघरे में खड़ा करती है. पुराने से पुराने जीवित बुजुर्ग कांग्रेसी हों या नई आयु के कुछ चुनिंदा राष्ट्रवादी कांग्रेसी वे सभी निश्चित ही मन ही मन फारुख अब्दुल्ला की भारत के भीतर दो प्रधानमंत्री वाली बात के मुखर विरोध की मानसकिता में होंगे किंतु पार्टी नेतृत्व की चुप्पी के कारण मज़बूरी में चुप है. इस बीच कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व की नेशनल हेराल्ड केस में संलिप्तता और जमानत आदि के किस्से और इटली के मामा मिशेल बंधुओं की बात से लेकर राबर्ट वाड्रा तक के जमीन खोरी के किस्से कांग्रेस के विसर्जन हेतु पर्याप्त भूमिका बना रहें हैं.

प्रवीण गुगनानी 


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