देश के चुने हुए प्रधानमंत्री को भारत से भगाने का स्वप्न संजोने वाली ममता कितनी लोकतांत्रिक - संजय तिवारी

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देश का लोकसभा चुनाव अब अंतिम पड़ाव पर है। चुनाव प्रचार खत्म कर प्रधानमंत्री ने खुद को भगवान शिव की शरण मे सोंपकर आराधना का निश्चय किया ...


देश का लोकसभा चुनाव अब अंतिम पड़ाव पर है। चुनाव प्रचार खत्म कर प्रधानमंत्री ने खुद को भगवान शिव की शरण मे सोंपकर आराधना का निश्चय किया है। वह दो दिन सम्पूर्ण रूप से बद्री केदार की शरण मे रहेंगे। सनातन की अवधारणा भी यही है और भारतीय शास्त्रीय परम्परा भी। इस भूभाग के सम्राट को यही शोभा देता है। बाकी वे जो सनातन के विरुद्ध संजाल बनाने में जुटे थे , वे भी कुछ अवश्य करेंगे। उनकी अपनी अवधारणाओं और संस्कृति के अनुसार, मसलन मसाज, आराम, खाना पीना, सनबर्न मिटाने के उपाय और न जाने क्या क्या। फिर 23 को सभी उपरायेंगे। तब तक नरेंद्र मोदी शिव की शरण से शक्ति अर्जित कर लौटेंगे। परिणाम क्या आएगा अब इस पर इस समय बात करने का कोई औचित्य नही लेकिन इस आखिरी चरण के आते आते विपक्ष की भाषा और शैली की जो निम्नता सामने आई उस पर चिंता जरूर होती है। 

इमरजेंसी जैसे जघन्य अपराध करने वाली इंदिरा गांधी के खिलाफ जब सारा विपक्ष चुनाव लड़ रहा था उस समय भी किसी ने इंदिरा को भगाओ, देश से निकाल फेंको की भाषा नही बोली थी। इंदिरा हटाओ के नारे थे। उसके बाद देश मे अनेक ऐसे अवसर आये जब सत्ताधारी पार्टी ने असह्य अत्याचार किये। 84 में सड़कों पर सिखों का कत्लेआम हुआ। राम मंदिर आंदोलन में रामभक्तो की हत्याएं हुई। गोधरा में राम भक्तो की ट्रेन की बोगी को हजारों मुसलमानों ने घेर कर उसमें पेट्रोल के गोले फेक कर जला दिया । 59 हिंदू महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग जल कर राख हो गए। 

ऐसी अनगिनत घटनाये हुई। देश मे पिछले 70 वर्षों में सत्ता में रही पार्टी ने बहुतेरे अत्याचार किये लेकिन कभी तत्कालीन विपक्ष ने किसी नेता को देश से बाहर खदेड़ने का नारा नही दिया ।

इस बार पिछले खास कर तीन चार दिनों में बंगाल से जो नारे आ रहे है उनको सुनने के बाद बहुत चिंता हो रही है। भारत राष्ट्र का हिस्सा बंगाल है या नही , इस पर भी सोचना पड़ रहा है। ममता बनर्जी को सोहरावर्दी का इतिहास पढ़ना चाहिए । सोहरावर्दी को पाकिस्तान का भावी प्रधानमंत्री बनाने का लालच देकर तत्कालीन बंगाल में दंगे भड़काए गए थे। हिन्दुओ का कत्लेआम हो रहा था। लाखो हिन्दू काट दिए गए। सोहरावर्दी बंगाल के मुख्यमंत्री थे। उन्हें नए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की कुर्सी दिख रही थी लेकिन उसी कत्लेआम में उलझे सोहरावर्दी कुछ जान भी नही पाए , पाकिस्तान बन भी गया और सोहरावर्दी को किसी ने पूछा तक नही। 

हो सकता है ममता बनर्जी को अपनी पड़ोसन खालिद जिया से कोई मशविरा मिला हो। इसीलिए बांग्ला देशी कलाकारों को लेकर वह बंगाल में चुनाव प्रचार कर रही हैं। बांग्लादेशी घुसपैठिये इस समय ममता की सबसे बड़ी शक्ति है। यह शक्ति इतनी है कि उनके दम पर ममता नरेंद्र मोदी को भारत से बाहर भगाने का नारा दे रही है। वह भारत के प्रधानमंत्री को गिरफ्तार करने की घोषणा भी कर रही हैं। गालियों की भाषा यही नही रुकती। ममता के समर्थन में मायावती, अखिलेश, चंद्र बाबू नायडू सरीखे क्षत्रप लुटेरे भी खड़े हो गए हैं। दलितों की मसीहा मायावती को अलवर में दलित कन्या के साथ हुए गैंगरेप की कोई चिंता नही। इन सभी को मोदी की रोकने की चिंता है। बंगाल में पिछले कुछ दिनों में जितनी शर्मनाक घटनाये हुई है उन पर देश के भीतर सनातन और हिदुत्व के खिलाफ अभियान छेड़ने वाले गैंग की भी नींद नही टूट रही। यह क्या तमाशा है, बंगाल की दुर्दशा पर कोई बोल तक नही रहा है। देश मे अभी तक के चुनाव में कही कोई हिसा नही हुई । बंगाल में आग लगी है। लेकिन सारे कथित सेक्युलरिस्ट बुद्धिजीवी शांत हैं। बंगाल के हालात का संज्ञान तक लेने की हिम्मत नही। आतंकियों के लिए आधी रात को अदालत लगवाने वाले गैंग को बंगाल दिख ही नही रहा। 

आखिर ममता बनर्जी की ताकत क्या है। किसकी सह पर वे इस स्तर पर उतर गई है। असली जानकारी देश की खुफिया एजेंसियों को अवश्य है। यह प्रमाणित तथ्य है कि इस बार का यह चुनाव केवल भारत के भीतर ही नही लड़ा जा रहा। यह उन सभी भूखंडों पर लड़ा जा रहा है जहां भारतीयता और सनातन के विरुद्ध घृणा का भाव है। जरा गौर करने की बात है कि बंगाल जिस तरह भारत विरोधी ताकतों का केंद्र बन गया है, जिस जगह से मोदी को भारत से भगाओ के नारे लग रहे हैं , उसमे किसका स्वार्थ हो सकता है। यह केवल ममता बनर्जी मुख्यमंत्री की आवाज नही हो सकती। ममता की गतिविधियों पर गौर कीजिए। चुनाव से काफी पहले से ही वह मोदी विरोधी अभियान में जुट गई थी। उस समय उन्हें बहुत सफलता नही मिली। बाद में सभी क्षत्रपो ने मिल कर महागठबंधन बनाया और मोदी को रोकने का नारा लेकर चुनाव में कूद गए। पूरे देश मे इनका कोई एक नेता आज भी नही है। दूसरी ओर कांग्रेस ने खुद को वोटकटवा बनाकर चुनावी समीकरण में खुद की जोड़ा। सभी मिल कर मोदी के खिलाफ मोर्चा सम्हाल रहे है। जिन्होंने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर एक दूसरे से सत्ता हथियाया वे भी इस समय एक होकर मोदी को रोकने में लगे है। बहुत ही विचित्र मंजर है। 

खास बात तो यह है कि इस चुनाव के सर्वे केवल भारत मे नही हो रहे, कुछ खाड़ी देशो के सर्वे भी चल रहे है जिनकी टारगेट कर के केवल मुसलमान समुदाय में भेजा जा रहा है। इसका प्रमाण मुझे श्रावस्ती में देखने को मिला। वहां के एक मुसलमान के मोबाइल में खाड़ी के किसी देश से एक सर्वे आया जिसमे के चौकाने वाले आंकड़े भी थे। सोचिये कि किसी खाड़ी देश को भला भारत के चुनाव का सर्वे करने की क्या पड़ी है। ऐसा उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव में भी हुआ था जब पाकितान की तरफ से मायावती को खुल कर समर्थन किया जा रहा था। उस समय के कई प्रमाण आज भी ऑन रेकॉर्ड हैं।

इस बार मैं शुरू से ही लिख रहा हूं कि भारत के यह चुनाव भारत से ज्यादा भारत के बाहर से लडे जा रहा है। बंगाल के हालात इसके बड़े उदाहरण हैं। देश की शांति और प्रगति से ईर्ष्या रखने वालों की कमी नही है। वे इस कार्य मे भारत के भीतर ही अपनी ताकत बना कर लगा रहे है। भारत मे ऐसे ताकतों की बहुलता है। 

सोचिये, मोदी को क्यो रोकना है? मोदी से किसका नुकसान हो रहा है? मोदी के आने से किसको भय लग रहा ? वे जो जमानत पर हैं या जेल जाने से डरे हुए है,

उनके लिए भारत केवल लूट का सामान है। उनके अतीत को देखिए । वर्तमान को देखिए। अरबो खरबो की उनकी संपत्ति देखिये। तय कीजिये वे किसके भले के लिए मोदी के विरोध में लामबंद हुए हैं।

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क्रांतिदूत: देश के चुने हुए प्रधानमंत्री को भारत से भगाने का स्वप्न संजोने वाली ममता कितनी लोकतांत्रिक - संजय तिवारी
देश के चुने हुए प्रधानमंत्री को भारत से भगाने का स्वप्न संजोने वाली ममता कितनी लोकतांत्रिक - संजय तिवारी
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