आजाद हिन्द फ़ौज की अनसुनी कहानी ! - दिवाकर शर्मा

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दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल | फिल्मी गाने की इस एक लाइन ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के वास्त...


दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल | फिल्मी गाने की इस एक लाइन ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के वास्तविक इतिहास को पूरी तरह झूठ की बुलंद इमारत के तहखाने में दफ़न कर दिया | आईये तत्कालीन परिस्थितियों की मीमांशा करें और उस सचाई पर नजर डालें, जिसे भारतीय इतिहासकारों ने जान बूझकर अचर्चित रखा | वे सब लेखक महानुभाव वास्तविकता जानते थे, किन्तु योजनाबद्ध उसे दर्शाया नहीं गया, कहीं लिखा नहीं गया | आज हम जिनकी चर्चा करने जा रहे हैं, उनका नाम है मोहन सिंह ! 

द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ में मोहन सिंह, मलाया में लड़ रही ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब बटालियन में कप्तान थे। जितरा में कप्तान मोहन सिंह की 1/14 पंजाब रेजिमेंट को हार का सामना करना पड़ा और मोहन सिंह को जापानी फ़ौज ने हिरासत में ले लिया | जापान के चतुर सुजान जनरल फूजीमोरी को हैरत इस बात की थी कि अंग्रेजों की तरफ से युद्ध में जो शौर्य और पराक्रम दिखा रहे थे, वे भारतीय थे | वे ही भारतीय जिन्हें अंग्रेजों ने अपना गुलाम बनाकर रखा हुआ था | फुजीमोरी ने मलाया में एक गदर पार्टी के संचालक प्रीतम सिंह से मोहन सिंह की भेंट करवाई | कहा जाता है कि गुलाम को गुलामी का अहसास करा दो, वह विद्रोह कर देगा | वही हुआ मोहन सिंह की आँखों पर चढ़ा हुआ चश्मा उतर गया, और अब तक अंग्रेजों की तरफ से लड़ने वाले मोहन सिंह ने दिसंबर 1941 में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का झंडा बुलंद करते हुए तत्कालीन भारतीय युद्धबंदियों की एक सेना बनाने का निश्चय किया । उसका नाम रखा गया आईएनए “इन्डियन नॅशनल आर्मी” |

सिंगापुर में अंग्रेजों की हार के बाद जापान में 17 फरवरी 1942 को; फुजीमोरा और मोहन सिंह ने पराजित भारतीय बटालियनों (1/14 पंजाब और 5/14 पंजाब) को सिंगापूर के एक विशाल उद्यान में संबोधित किया। जनरल फुजीमोरा ने भारत की मुक्ति के लिए सेना में शामिल होने के लिए भारतीय सैनिकों को स्वेच्छा से आमंत्रित किया । फुजिमारा ने युद्धबंदियों की इस सेना की कमान मोहन सिंह के हाथ में सौंपते हुए मोहन सिंह को भाषण के लिए आमंत्रित किया। मोहन सिंह ने अपने जोशीले भाषण के बाद सभा में उपस्थित युद्ध बंदियों से पूछा कि भारत की स्वतंत्रता की खातिर कौन कौन इस मुक्ति सेना में सम्मिलित होना चाहते हैं और स्वेच्छा से देश की खातिर बलिदान देने हेतु स्वयंसेवक बनना चाहते हैं?भाई मोहन सिंह ने १९७३ में अपने संस्करण में लिखा कि ” सभी सैनिकों से एक सहज प्रतिक्रिया थी। हाथों को उठाने के साथ-साथ, हवा में हजारों पगड़ियाँ और टोपी उड़ा दी गईं … सैनिक ‘इंक़लाब जिंदाबाद’ के नारों के साथ उत्साहित हो कर नाच कूद रहे थे| “ 

और इस तरह १७ फरवरी १९४२ को उस सभा में जब मोहन सिंह ने आज़ाद हिंद फौज या भारतीय राष्ट्रीय सेना बनाने का इरादा घोषित किया तो उद्यान में मौजूद लगभग 45,000 युद्धबंदीयों में से आधे से ज्यादा ने आजाद हिन्द फौज में शामिल होने का प्रण लिया। इस सभा के बाद, जापान के जनरल फुजीमोरा के सहयोग से अप्रैल 1942 में आजाद हिन्द फौज का औपचारिक गठन हुआ और मोहन सिंह उसके प्रथम जनरल नियुक्त हुए। जनरल मोहन सिंह ने अपने अधिकारियों की प्रथम बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर घोषणा की कि –जाति, समुदाय या धर्म के सभी मतभेदों से ऊपर हैं भारतीयता एवं स्वतंत्रता हर भारतीय का जन्मसिद्ध अधिकार है | इस संकल्प में यह भी था कि – “ आजाद हिन्द फौज केवल तभी युद्ध करेगी जब कांग्रेस और भारत के लोग इसे समर्थन देंगे । 

यह तो हुई आजाद हिन्द फ़ौज के गठन की कहानी, अब जानते हैं कि इसका विस्तार कैसे हुआ ? महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता लीग (इंडियन इंडिपेंडेंस लीग) ने मई 1942 में आयोजित अपने सम्मेलन में मोहन सिंह को आमंत्रित किया; जहां भारतीय स्वतंत्रता लीग को सर्वोच्च निकाय बनाया गया और आजाद हिन्द फौज (आईएनए – INA) को इसके मातहत रखा गया । आजाद हिन्द फौज के पहले प्रभाग में लगभग 16,000 सेनानी शामिल थे। इन्हें 650 सैनिकों की 12 बटालियनों में बांटा गया था । 5 सितंबर 1942 को बटालियन और रेजिमेंट कमांडरों को नियुक्त किया गया, एवं 8 – 9 सितंबर को उन्होंने दायित्व ग्रहण किए । 

रास बिहारी बोस एवं मोहन सिंह द्वारा आजाद हिन्द फौज की संयुक्त रूप से सलामी ली गयी । जनरल मोहन सिंह के कुशल नेतृत्व में आईएनए ने ब्रिटिश सेना के खिलाफ कई जासूसी और विध्वंसक गतिविधियों का आयोजन किया | इतना ही नहीं तो लगातार ब्रिटिश सेना में से भारतीय सैनिकों का पलायन शुरू हो गया । इन नए आये सैनिकों को नियमित रूप से प्रशिक्षित किया जाने लगा । किन्तु इसके बाद मोहन सिंह और जापानी सेनानायक जनरल फुजीमोरी के बीच मतभेद गहराने लगे | देशभक्त मोहन सिंह इस बात के विरोधी थे कि आजाद हिन्द फौज को जापानी सेना की एक रेजिमेंट/ डिवीज़न समझा जाए | वे आजाद हिन्द फ़ौज को एक स्वतंत्र इकाई रखना चाहते थे | किन्तु जापानी आजाद हिन्द फौज को जापानी सेना का अंग घोषित करना चाहते थे| अंतर्विरोध इतना बढ़ा कि दिसंबर 1942 में, मोहन सिंह को जापानी सैन्य पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया एवं आईएनए को जापान द्वारा दिया समर्थन वापस ले लिया गया। 

जनरल मोहन सिंह की गिरफ्तारी के बाद भारतीय स्वतंत्रता लीग के नेता के रूप में रास बिहारी बोस ने 1942 और फरवरी 1943 के बीच आजाद हिन्द फौज को विघटित नहीं होने दिया एवं उसे जोड़ के रखने के लिए जापानियों से वार्तालाप कर लेफ्टिनेंट कर्नल किआनी की कमान में जीवित रखा| इसके आगे की कहानी सर्व विदित है | हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी के साथ जापान का समझौता – नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा जर्मनी से सिंगापुर पहुंचकर रास बिहारी बोस से आजाद हिन्द फ़ौज का प्रभार ग्रहण करना । मोहन सिंह द्वारा विशिष्ठ रूप से प्रशिक्षित, पूर्ण रूप से संघटित, आजाद हिन्द फौज ने सुभाष चंद्र बोस की कमान में आने के बाद किस तरह अंग्रेजों के दांत खट्टे किये, इस पर भी काफी कुछ लिखा पढ़ा जा चुका है। 

ये हैं आजाद हिन्द फ़ौज के प्रथम जनरल मोहन सिंह | हिटलर ने जब उन्हें इनाम देना चाहा तो सरदार जी ने कहा कि हमें अच्छे से अच्छे हथियार दीजिए, क्योंकि हमें सुभाष चंद्र बोस जी जैसे देशभक्त के नेतृत्व में अपने देश को आजाद करवाना है .। हिटलर ने फिर उन्हें जो हथियार दिये , वही हथियार आजाद हिन्द फौज ने इस्तेमाल किए और सचाई तो यह है कि र॔गून में 50 हजार से ज्यादा अंग्रेजी फौज के मारे जाने के बाद ही अंग्रेजो ने भारत छोड़ने का फैसला लिया था ।


अंत में चलते चलते – अगर द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय सेना ने विद्रोह न किया होता, अगर भारतीय सैनिक अंग्रेजों के पिट्ठू ही बने रहते, उनकी तरफ से ही लड़ते रहते, तो क्या अंग्रेजों के होंसले पस्त होते ? क्या वे कभी भारत को स्वतंत्र करने की सोचते ? तो भारत की आजादी का वास्तविक श्रेय किसको ?

दिवाकर शर्मा
संपादक
www.krantidoot.in 


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आजाद हिन्द फ़ौज की अनसुनी कहानी ! - दिवाकर शर्मा
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