संस्कृति और सृष्टि - संजय तिवारी

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जीवन एक संस्कृति है, कहा जाय तो संस्कृति ही जीवन है, यह अतिश्यिोक्ति न होगी। भारत में जीवन और संस्कृति दोनोें पर ही अतिशय गंभीर चिन्तन क...

जीवन एक संस्कृति है, कहा जाय तो संस्कृति ही जीवन है, यह अतिश्यिोक्ति न होगी। भारत में जीवन और संस्कृति दोनोें पर ही अतिशय गंभीर चिन्तन की परम्परा रही है। यह चिन्तन इतना गहरा रहा है कि संस्कृति और जीवन में कई बार ऐसा एक्य दिखता है कि दोनों ठीक वैसे ही एकाकार दिखायी पड़ते हैं जैसे महारास के कृष्ण और राधा। शायद जीवन और संस्कृति के अन्तर सम्बन्ध भी उसी आनन्द तक ले जाते हैं जिसका अनुभव कृष्ण साधक को महारास में मिलता है। भारत मेें इसीलिए मनुष्य के जीवन को केवल एक कालखण्ड की संज्ञा नहीं दी गयी है बल्कि चिरंतन प्रवाहित होने वाली एक ऐसी धारा के रूप मेें जीवन को परिभाषित किया गया है जिसमें संस्कृति को प्राणतत्व की संज्ञा मिली। तात्पर्य यह कि संस्कृति ही वह प्राण तत्व है जिससे जीवन के होने का आभाष होता है। जीवन में प्रवाह की गति ही संस्कृति को निरूपित कर रही है। यहां जीवन और संस्कृति को निरूपित करने के लिए अलग-अलग रास्तोें की तलाश नहीं करनी पड़ती है। मनुष्य जिस भी रूप में जहां भी अपने कार्य क्षेत्र में विद्यमान है उसके साथ उसकी संस्कृति के वे सभी मूल तत्व स्वतः विद्यमान है जो उसे मनुष्य के उस रूप मेें परिभाषित करने के लिए आवश्यक लगते हैं-यथा यदि कोई शिक्षक है तो शिक्षक की पूरी संस्कृति उसमेें निहित मानी जायेगी। यदि कोई चिकित्सक है तो चिकित्सकीय संस्कृति, कोई छात्र है तो अध्ययन की संस्कृति और इसी प्रकार यदि कोई किसान है तो किसान की भूमिका वाली पूरी की पूरी कृषक संस्कृति उसमें समाहित होगी ही। 

अब यहां प्रश्न यह उठता है कि किसी कृषक की सांस्कृतिक पहचान क्या होती है और क्या होनी चाहिए। भारत जैसे देश में जब किसी किसान की चर्चा होती है तो एक बना बनाया अक्श उभरता है। इसमें अनगिनत चित्र सामने आते हैं। इन चित्रोें से उभरे कोलाज मेें एक मनुष्य की कितनी ज्यादा भूमिकाएं सामने आती हेैं जिनको एक संदर्भ मेें परिभाषित कर पाना संभव नहीें है। यदि किसान को हमारे देश में ग्राम देवता की संज्ञा दी गयी है तो उसके पीछे निश्चित तौर पर कई ठोस कारण रहे होंगे।

इन कारणों को समझने के लिए जरूरी है कि पहलं पूरी संस्कृति को समझा जाय। वस्तुत: किसान या कृषक कोई सामान्य मनुष्य भर नहीं होता। वह एक ऐसा प्रणी होता है जिसमें समूचे जगत को पालने की क्षमता उसके संस्कारों से मिली होती है।एक किसान के ही बूते की बात है कि सृष्टि के समस्त प्राणियों का उदरतृप्त करने के बाद जो कुछ बचता है उतना सा ही लेकर अपने घर जाता है और संतुष्ट भी रहता है।

इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए गहरे विचारों के साथ चिंतन की प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ेगा।वर्ना बात समझा में भी नहीं आएगी और अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। कृषक होना ही अपने आप में एक सृष्टि रचने जैसा है। किसान क्या होता है जरा सोचिए- जब बैसाख महीने की तृतीया को भारत का किसान अपने खेत में पहुंच कर एक साल के लिए धरती को खोदने- जोतने और उसमें बीज डालने की अनुमति मांगना है तो उस संस्कार को केवल भाव में ही समझा जा सकता है। इस तिथि को दही, अक्षत, दूब, पल्लव और पूरे नैवेध के साथ पहले वह धरती खेदने वाले हल और कुदाल की पूजा करता है कि वह उसे बीज डालने और फसल उगाने की अनुमति प्रदान करे। अस्ताचल सूर्य की बेला में इस हरवत संस्कार के बाद वह धर तैरता है। धर में आकर खेती शुरु करने के उत्सव को मीठे पकवानों और अपनी लोक संगीत के सुरों के साथ वह आनंदित होता है और किसी अन्य परिवार के किसी व्यक्ति से दूसरे दिन सूर्य के बाहर अपने पर ही वह बात करता है। इतनी सर्तक और मांगलिक प्रक्रिया से गुजरते हुए वह इस सक्षम तृतिया से अपनी किसानी शुरु करता है। 

किसानी की इस पूरी परम्परा को वह पूरे साल एक उत्सव के रुप में चलता है। पहले दिन खेत की जुताई से शुरु होने वाले खेती के मंगलगीत कदम-कदम पर उसके साथ होते हैं। जुताई के बाद बुवाई, बावग और रोपनी- सोहनी, कटावन, पिरावन, दवांई, ओसाई से लेकर चाहे गेहूं के भूसे की सिल्ली लगानी हो या धान के पुआल की पूजंवट, याकि गन्ने के गल्ले की गांठ बांधनी हो, उसके साथ गीत और संगीत की ऐसी विशाल और विराट परम्परा चलती रहती है जिसको वही समझ सकता है जिसने भारत के गांवों में रह कर इसे देखा है।

बुवाई के गीत, रोपनी के गीत, सोहनी के गीत, बरसाते मेघों के बीच कजरी और मल्लहार हो याकि नकटा, सोहर और सोरठी- बृजभार के साथ-साथ बिहुला- बालालंखदर की विरह कथा हर कदम पर गांव-गांव का सिवान-सिवान के डीह, डीह के बरम-बरम के साथ वाली बामत और उनके वांग लगाती खजरी, ढोलक, झाल, झांझ और नगाड़ों से उपजे स्वर नाद... इनके बीच अपनी चर्मा में जुतू-बुते और बधे अंदाज से धरती की आराधना करते हर किसान की आंख में जीता- जागता सपना...

फसल कब जमी, कब उगी, कब फूली, गदराई, बालियां लटकी औी झींगुर से लेकर हजारों हजार चिरई चुरुंगों, कीट पंतगों का पेट भारती फसल खलिहान में आ गयी। खलिहान में ही धोबी, नाऊ, दर्जी, डोमिन, चमार, पुरोहित और बेटी- पाउनी की खरिहानी निकालने के बाद जो बचा वह पहुंचा, धर की डेहरी, बखार और दालान में।

जरा सोचिए... एक किसान के आलावा इस जगत के किस प्रोफेशनल में इतना माद्दा है कि अपनी गाढ़ी कमाई में से सृष्टि के अनगिनत प्राणियों को बांटने के बाद केवल बचे- खुचे को लेकर अपने घर जाये और फिर भी किसी से कोई शिकायत नहीं। रबी, खलीफ और जायद की तीनों फसलों के लिए बैसाख की उसी अक्षय तृतिया की प्रतीक्षा... फिर से हरवत... फिर से वही लोकसंसार, वही प्रकृति, उन्हीं मेघों की गुहार और साल-दर-साल सृष्टि को पालते रहने की अनथक यात्रा... यही तो है भारत का किसान और यही है एसकी कृषक संस्कृति... यहां सृष्टि पहले पलती है, पेट की चिंता संस्कारों में चलती है और जीवन का प्रवाह कभी रुकता ही नहीं... न तो किसानी के गीत मरते हैं न तो धरती को किसान थकने देता है। भारत यूं ही भारत नहीं है। मां भारती इस लिए मां भारती हैं क्योंकि उसकी संतानों में सबसे बड़ा किसान है। कृषि उसकी संस्कृति है... माटी का गंध और रोटी की सुगंध के बीच बंधे हुए संस्कारों के रिश्ते हैं।

इसलिए प्रारंभ में ही कृषि को संस्कृति और किसान को सृष्टि का पालनहार कह दिया। यह ऐसा सत्य है कि जिसका आभास केवल भारत में ही संभव है। यह अलग बात है कि प्रगति, विकास और आधुनिकता की होड़ में कहीं न कहीं हमारी व्यवस्था भी चूक कर जाती है और सृष्टि में कृषि संस्कृति के गर्भ को वह दरकिनार कर देती है। यह प्राय: व्यवस्थापकों की संकीर्णता और अज्ञानता के कारण होता है। देश की परम्परा जिसे ग्राम देवता की संज्ञा से विभूषित करती है। अधुनातन व्यवस्था उसे महज मजदूर, खेतिहर, या किसान के संबोधन में समेट कर उसका ऐसा शोषण कर डालती है कि हमारी पूरी की पूरी देव संस्कृति को गहरा आघात लगता है, और इस कदर तड़प की अवस्था में गिर जाती है, जहां केवल और केवल मरघट का सन्नाटा की समझ में आता है। किसी भी सभ्यता में किसी खास संस्कृति की ऐसी अवस्था बेहद पीड़ा देने वाली है। इसके घातक परिणामों को हमारे वर्तमान व्यवस्थापक समझ सकें इसकी दूर-दूर तक कोई उम्मीद भी नहीं है। वे जो खुद को देश, समाज और संस्कृति के अलम्बरदार मान बैठे हैं उन्हें तो इतना तक नहीं मालूम कि कृषि भारत की आत्मा है और कृषि संस्कृति के बिना भारत की परिकल्पना संभव ही नहीं है।

(लेखक भारत संस्कृति न्यास नई दिल्ली के संस्थापक और संस्कृति पर्व के संपादक है)

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